अध्याय 16

Bg 16.1-3

श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ २ ॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; अभयम्—निर्भयता; सत्त्व-संशुद्धिः—अपने अस्तित्व का शुद्धिकरण; ज्ञान—ज्ञान; योग—संयोग का; व्यवस्थितिः—स्थिति; दानम्—दान; दमः च—तथा मन का संयम; यज्ञः च—तथा यज्ञ का सम्पादन; स्वाध्यायः—वैदिक साहित्य का अध्ययन; तपः—तपस्या; आर्जवम्—सरलता; अहिंसा—अहिंसा; सत्यम्—सत्यता; अक्रोधः—क्रोध से मुक्ति; त्यागः—त्याग; शान्तिः—शान्ति; अपैशुनम्—दोष-दर्शन से विमुखता; दया—दया; भूतेषु—समस्त जीवों के प्रति; अलोलुप्त्वम्—लोभ से मुक्ति; मार्दवम्—मृदुता; ह्रीः—विनम्रता; अचापलम्—संकल्प; तेजः—ओज; क्षमा—क्षमा; धृतिः—धैर्य; शौचम्—शुचिता; अद्रोहः—ईर्ष्या से मुक्ति; —नहीं; अतिमानिता—मान की अपेक्षा; भवन्ति—होते हैं; सम्पदम्—गुण; दैवीम्—दिव्य; अभिजातस्य—जिसने जन्म लिया है; भारत—हे भरतपुत्र।

श्रीभगवान् ने कहा : निर्भयता, अपने अस्तित्व का शुद्धिकरण, आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन, दान, आत्मसंयम, यज्ञ का सम्पादन, वेदों का अध्ययन, तपस्या तथा सरलता; अहिंसा, सत्यता, क्रोध से मुक्ति; त्याग, शान्ति, दोष-दर्शन से विमुखता, करुणा तथा लोभ से मुक्ति; मृदुता, विनम्रता तथा अटल संकल्प; ओज, क्षमा, धैर्य, शुचिता, ईर्ष्या से मुक्ति तथा मान की लालसा का अभाव—हे भरतपुत्र! ये दिव्य गुण दैवी प्रकृति से सम्पन्न देवतुल्य मनुष्यों में होते हैं।

पन्द्रहवें अध्याय के आरम्भ में इस भौतिक जगत् रूपी वटवृक्ष की व्याख्या की गई थी। उससे निकलने वाली अतिरिक्त जड़ों की तुलना जीवों के कर्मों से की गई थी, जिनमें कुछ शुभ और कुछ अशुभ थे। नवें अध्याय में भी देवताओं अथवा देवतुल्य जनों, तथा असुरों अथवा अधर्मी जनों अर्थात् राक्षसों की विवेचना की गई थी। अब, वैदिक विधानों के अनुसार सत्त्वगुण में किए गए कर्म मोक्ष-मार्ग पर प्रगति के लिए शुभ माने जाते हैं, और ऐसे कर्म देव-प्रकृति अर्थात् स्वभावतः दिव्य कहलाते हैं। जो दिव्य प्रकृति में स्थित हैं, वे मोक्ष-मार्ग पर अग्रसर होते हैं। दूसरी ओर, जो रजोगुण तथा तमोगुण में कर्म करते हैं, उनके लिए मोक्ष की कोई सम्भावना नहीं। या तो उन्हें इस भौतिक जगत् में मनुष्य रूप में रहना पड़ेगा, या वे पशु-योनियों अथवा उससे भी निम्न जीवन-रूपों में उतर जाएँगे। इस सोलहवें अध्याय में भगवान् दिव्य प्रकृति तथा उसके सहवर्ती गुणों, एवं आसुरी प्रकृति तथा उसके गुणों—दोनों की व्याख्या करते हैं। साथ ही वे इन गुणों के लाभ तथा हानि को भी समझाते हैं।

दिव्य गुणों अथवा देवतुल्य प्रवृत्तियों से जन्म लेने वाले के सन्दर्भ में अभिजातस्य शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। देवतुल्य वातावरण में सन्तान उत्पन्न करना वैदिक शास्त्रों में गर्भाधान-संस्कार कहलाता है। यदि माता-पिता देवतुल्य गुणों से युक्त सन्तान चाहते हैं, तो उन्हें मनुष्य के दस सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए। भगवद्गीता में हम पहले भी पढ़ चुके हैं कि उत्तम सन्तान उत्पन्न करने हेतु यौन-जीवन स्वयं श्रीकृष्ण हैं। यौन-जीवन निन्द्य नहीं है, बशर्ते यह प्रक्रिया कृष्णभावनामृत में प्रयुक्त हो। जो कृष्णभावनामृत में हैं, उन्हें कम-से-कम बिल्लियों-कुत्तों के समान सन्तान उत्पन्न नहीं करनी चाहिए, अपितु ऐसी सन्तान उत्पन्न करनी चाहिए जो जन्म के पश्चात् कृष्णभावनाभावित बन सके। कृष्णभावनामृत में लीन पिता अथवा माता से उत्पन्न सन्तान का यही लाभ होना चाहिए।

वर्णाश्रम-धर्म नामक सामाजिक संस्था—जो समाज को चार वर्गों अथवा वर्णों में विभाजित करती है—मनुष्य-समाज को जन्म के आधार पर विभाजित करने के लिए नहीं है। ऐसे विभाजन शैक्षिक योग्यताओं के अनुसार हैं। वे समाज को शान्ति तथा समृद्धि की स्थिति में रखने हेतु हैं। यहाँ वर्णित गुणों की व्याख्या दिव्य गुणों के रूप में की गई है, जिनका प्रयोजन मनुष्य को आध्यात्मिक बोध में प्रगति कराना है, ताकि वह भौतिक जगत् से मुक्त हो सके। वर्णाश्रम संस्था में संन्यासी अर्थात् संन्यास आश्रम में स्थित व्यक्ति समस्त सामाजिक स्तरों तथा आश्रमों का प्रमुख अथवा आध्यात्मिक गुरु माना जाता है। ब्राह्मण समाज के अन्य तीन वर्गों अर्थात् क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों का आध्यात्मिक गुरु माना जाता है, किन्तु संन्यासी, जो इस संस्था के शिखर पर है, ब्राह्मणों का भी आध्यात्मिक गुरु माना जाता है। संन्यासी के लिए प्रथम योग्यता निर्भयता होनी चाहिए। चूँकि संन्यासी को बिना किसी सहारे या सहारे के आश्वासन के अकेले रहना होता है, अतः उसे केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि वह सोचता है, “अपने सम्बन्धों को त्याग देने के पश्चात् मेरी रक्षा कौन करेगा?” तो उसे संन्यास आश्रम स्वीकार नहीं करना चाहिए। मनुष्य को पूर्णतः विश्वस्त होना चाहिए कि श्रीकृष्ण अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने स्थानिक अंश परमात्मा के रूप में सदा भीतर विद्यमान हैं, कि वे सब कुछ देख रहे हैं और सदा जानते हैं कि मनुष्य क्या करने का अभिप्राय रखता है। अतः मनुष्य को यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि श्रीकृष्ण परमात्मा रूप में अपने शरणागत जीव की देखभाल करेंगे। मनुष्य को सोचना चाहिए, “मैं कभी अकेला नहीं रहूँगा। चाहे मैं किसी वन के सघनतम अन्धकारमय प्रदेश में रहूँ, श्रीकृष्ण मेरे साथ रहेंगे, और वे मुझे पूर्ण संरक्षण देंगे।” यही विश्वास अभयम् अर्थात् निर्भयता कहलाता है। संन्यास आश्रम में स्थित व्यक्ति के लिए यह मनःस्थिति आवश्यक है। तत्पश्चात् उसे अपने अस्तित्व को शुद्ध करना होता है। संन्यास आश्रम में पालन करने योग्य अनेक नियम तथा विधान हैं। इन सबमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि संन्यासी को स्त्री से किसी भी प्रकार का घनिष्ठ सम्बन्ध रखना कठोरता से वर्जित है। उसे एकान्त स्थान में स्त्री से बात करना तक वर्जित है। भगवान् चैतन्य आदर्श संन्यासी थे, और जब वे पुरी में थे तब उनकी स्त्री-भक्तजन प्रणाम अर्पित करने हेतु उनके समीप तक नहीं आ सकती थीं। उन्हें दूर से ही प्रणाम करने का परामर्श दिया जाता था। यह स्त्री-वर्ग के प्रति घृणा का चिह्न नहीं है, अपितु संन्यासी पर लगाया गया यह बन्धन है कि वह स्त्रियों से घनिष्ठ सम्बन्ध न रखे। अपने अस्तित्व को शुद्ध करने हेतु मनुष्य को जीवन की किसी विशिष्ट स्थिति के नियमों तथा विधानों का पालन करना होता है। संन्यासी के लिए स्त्रियों से घनिष्ठ सम्बन्ध तथा इन्द्रियतृप्ति हेतु धन-संग्रह कठोरता से वर्जित हैं। आदर्श संन्यासी स्वयं भगवान् चैतन्य थे, और हम उनके जीवन से सीख सकते हैं कि वे स्त्रियों के विषय में अत्यन्त कठोर थे। यद्यपि वे भगवान् के सर्वाधिक उदार अवतार माने जाते हैं, जो अत्यन्त पतित बद्धजीवों को भी स्वीकार करते हैं, फिर भी उन्होंने स्त्री-संग के विषय में संन्यास आश्रम के नियमों तथा विधानों का कठोरता से पालन किया। उनके एक घनिष्ठ पार्षद, अर्थात् छोटा हरिदास, अपने अन्य अन्तरंग पार्षदों के साथ भगवान् चैतन्य के साथ व्यक्तिगत रूप से सम्बद्ध थे, किन्तु किसी कारण इस छोटा हरिदास ने एक युवती को कामभाव से देखा, और भगवान् चैतन्य इतने कठोर थे कि उन्होंने तत्क्षण उसे अपने पार्षदों के समाज से निष्कासित कर दिया। भगवान् चैतन्य ने कहा, “संन्यासी के लिए, अथवा किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए जो भौतिक प्रकृति के बन्धन से बाहर निकलने की आकांक्षा रखता है तथा स्वयं को आध्यात्मिक प्रकृति तक उठाकर भगवद्धाम लौटने का प्रयत्न कर रहा है—उसके लिए इन्द्रियतृप्ति हेतु भौतिक सम्पत्तियों तथा स्त्रियों की ओर देखना—उनका भोग करना तो दूर, मात्र ऐसी प्रवृत्ति से उनकी ओर देखना—इतना निन्द्य है कि ऐसी अवैध इच्छाओं का अनुभव करने से पूर्व उसके लिए आत्मघात कर लेना श्रेयस्कर है।” अतः ये शुद्धिकरण की प्रक्रियाएँ हैं।

अगला तत्त्व है ज्ञान-योग-व्यवस्थितिः अर्थात् ज्ञान के अनुशीलन में संलग्न होना। संन्यासी जीवन का प्रयोजन उन गृहस्थों तथा अन्य जनों को ज्ञान वितरित करना है, जो आध्यात्मिक उन्नति के अपने वास्तविक जीवन को भूल चुके हैं। संन्यासी को अपनी जीविका हेतु द्वार-द्वार माँगना होता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह भिखारी है। विनम्रता भी दिव्य रूप से स्थित व्यक्ति की एक योग्यता है, और परम विनम्रता के कारण ही संन्यासी द्वार-द्वार जाता है—ठीक भिक्षा के प्रयोजन से नहीं, अपितु गृहस्थों को देखने तथा उन्हें कृष्णभावनामृत के प्रति जाग्रत करने हेतु। यही संन्यासी का कर्तव्य है। यदि वह वस्तुतः उन्नत है और उसके आध्यात्मिक गुरु द्वारा ऐसा आदेश दिया गया है, तो उसे तर्क तथा बोध सहित श्रीकृष्ण का प्रचार करना चाहिए, और यदि वह इतना उन्नत नहीं है, तो उसे संन्यास आश्रम स्वीकार नहीं करना चाहिए। किन्तु यदि उसने पर्याप्त ज्ञान के बिना भी संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया है, तो उसे ज्ञान के अनुशीलन हेतु किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से श्रवण करने में पूर्णतः संलग्न होना चाहिए। संन्यासी अथवा संन्यास आश्रम में स्थित व्यक्ति को निर्भयता, सत्त्व-संशुद्धिः (शुचिता) तथा ज्ञान-योग (ज्ञान) में स्थित होना चाहिए।

अगला तत्त्व है दान। दान का प्रयोजन गृहस्थों के लिए है। गृहस्थों को सम्माननीय साधनों से जीविका अर्जित करनी चाहिए तथा अपनी आय का पचास प्रतिशत समस्त संसार में कृष्णभावनामृत के प्रचार हेतु व्यय करना चाहिए। अतः गृहस्थ को ऐसी सांस्थानिक संस्थाओं को दान देना चाहिए जो इस रीति से संलग्न हैं। दान उचित पात्र को दिया जाना चाहिए। दान के विभिन्न प्रकार हैं, जैसा आगे समझाया जाएगा—सत्त्व, रज तथा तमोगुण में दान। शास्त्रों द्वारा सत्त्वगुण में दान की अनुशंसा की जाती है, किन्तु रज तथा तमोगुण में दान की अनुशंसा नहीं की जाती, क्योंकि वह केवल धन का अपव्यय है। दान केवल समस्त संसार में कृष्णभावनामृत के प्रचार हेतु दिया जाना चाहिए। यही सत्त्वगुण में दान है।

तत्पश्चात् जहाँ तक दमः (आत्मसंयम) का सम्बन्ध है, यह केवल धार्मिक समाज के अन्य आश्रमों के लिए ही नहीं, अपितु विशेष रूप से गृहस्थ के लिए है। यद्यपि गृहस्थ की पत्नी होती है, फिर भी उसे यौन-जीवन के लिए अपनी इन्द्रियों का अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए। गृहस्थों के लिए यौन-जीवन में भी प्रतिबन्ध हैं, जिसमें केवल सन्तानोत्पत्ति हेतु ही प्रवृत्त होना चाहिए। यदि उसे सन्तान की आवश्यकता नहीं, तो उसे अपनी पत्नी के साथ यौन-जीवन का भोग नहीं करना चाहिए। आधुनिक समाज सन्तान के उत्तरदायित्व से बचने हेतु गर्भनिरोधक उपायों अथवा उससे भी अधिक निन्द्य उपायों के साथ यौन-जीवन का भोग करता है। यह दिव्य गुण में नहीं, अपितु आसुरी है। यदि कोई, चाहे वह गृहस्थ ही क्यों न हो, आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहता है, तो उसे अपने यौन-जीवन का संयम करना चाहिए और श्रीकृष्ण की सेवा के प्रयोजन के बिना सन्तान उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। यदि वह ऐसी सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ है जो कृष्णभावनामृत में रहेंगी, तो मनुष्य सैकड़ों सन्तान उत्पन्न कर सकता है, किन्तु इस सामर्थ्य के बिना उसे केवल इन्द्रिय-सुख हेतु लिप्त नहीं होना चाहिए।

यज्ञ गृहस्थों द्वारा सम्पादित किया जाने वाला एक अन्य तत्त्व है, क्योंकि यज्ञों के लिए विपुल धन की आवश्यकता होती है। अन्य आश्रमों, अर्थात् ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास के पास धन नहीं होता; वे भिक्षा से जीवन-निर्वाह करते हैं। अतः विभिन्न प्रकार के यज्ञों का सम्पादन गृहस्थ के लिए है। उन्हें वैदिक साहित्य में निर्दिष्ट अग्नि-होत्र यज्ञ सम्पन्न करने चाहिए, किन्तु ऐसे यज्ञ वर्तमान समय में अत्यन्त व्ययसाध्य हैं, और किसी भी गृहस्थ के लिए उन्हें सम्पन्न करना सम्भव नहीं। इस युग में अनुशंसित सर्वश्रेष्ठ यज्ञ संकीर्तन-यज्ञ कहलाता है—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप। यह सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वाधिक अल्प-व्यय वाला यज्ञ है; प्रत्येक जन इसे अपना सकता है और लाभ प्राप्त कर सकता है। अतः ये तीन तत्त्व, अर्थात् दान, इन्द्रिय-संयम तथा यज्ञ का सम्पादन, गृहस्थ के लिए हैं।

तत्पश्चात् स्वाध्यायः अर्थात् वैदिक अध्ययन, तथा तपस् अर्थात् तपस्या, तथा आर्जवम् अर्थात् मृदुता या सरलता—ये ब्रह्मचर्य अथवा विद्यार्थी-जीवन के लिए हैं। ब्रह्मचारियों का स्त्रियों से कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए; उन्हें ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करना चाहिए तथा आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन हेतु मन को वैदिक साहित्य के अध्ययन में संलग्न करना चाहिए। यही स्वाध्यायः कहलाता है। तपस् अथवा तपस्या विशेष रूप से वानप्रस्थ जीवन के लिए है। मनुष्य को आजीवन गृहस्थ नहीं बने रहना चाहिए; उसे सदा स्मरण रखना चाहिए कि जीवन के चार आश्रम हैं—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। अतः गृहस्थ अर्थात् गार्हस्थ्य जीवन के पश्चात् मनुष्य को विरत हो जाना चाहिए। यदि कोई सौ वर्ष जीवित रहता है, तो उसे पच्चीस वर्ष विद्यार्थी-जीवन में, पच्चीस गृहस्थ जीवन में, पच्चीस वानप्रस्थ जीवन में तथा पच्चीस संन्यास आश्रम में व्यतीत करने चाहिए। ये वैदिक धार्मिक अनुशासन के विधान हैं। गार्हस्थ्य जीवन से विरत मनुष्य को शरीर, मन तथा वाणी की तपस्याओं का अभ्यास करना चाहिए। यही तपस्या है। समस्त वर्णाश्रम-धर्म समाज तपस्या के लिए है। तपस्या के बिना कोई भी मनुष्य मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। यह मत कि जीवन में तपस्या की कोई आवश्यकता नहीं, कि मनुष्य कल्पना करता रहे और सब कुछ ठीक हो जाएगा—न वैदिक साहित्य में अनुशंसित है और न भगवद्गीता में। ऐसे मत प्रदर्शनप्रिय आध्यात्मिकतावादियों द्वारा गढ़े जाते हैं, जो अधिकाधिक अनुयायी एकत्र करने का प्रयत्न करते हैं। यदि प्रतिबन्ध, नियम तथा विधान हों, तो लोग आकृष्ट नहीं होंगे। अतएव जो धर्म के नाम पर केवल प्रदर्शन हेतु अनुयायी चाहते हैं, वे न अपने शिष्यों के जीवन को प्रतिबन्धित करते हैं और न अपने जीवन को। किन्तु वह विधि वेदों द्वारा अनुमोदित नहीं है।

जहाँ तक सरलता का सम्बन्ध है, इस सिद्धान्त का पालन केवल किसी विशिष्ट आश्रम को ही नहीं, अपितु प्रत्येक सदस्य को करना चाहिए, चाहे वह ब्रह्मचर्य-आश्रम में हो, या गृहस्थ-आश्रम में या वानप्रस्थ-आश्रम में। मनुष्य को अत्यन्त सरलता से जीवन व्यतीत करना चाहिए।

अहिंसा का अर्थ है किसी भी जीव के प्रगतिशील जीवन को न रोकना। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि शरीर के मारे जाने के पश्चात् भी आत्मा-स्फुलिंग कभी नहीं मारी जाती, अतः इन्द्रियतृप्ति हेतु पशुओं को मारने में कोई हानि नहीं। लोग अब प्रचुर मात्रा में अन्न, फल तथा दुग्ध की उपलब्धता के होते हुए भी पशु खाने के व्यसनी हो गए हैं। पशु-वध की कोई आवश्यकता नहीं। यह विधान प्रत्येक जन के लिए है। जब कोई अन्य विकल्प न हो, तो मनुष्य किसी पशु को मार सकता है, किन्तु उसे यज्ञ में अर्पित किया जाना चाहिए। किसी भी प्रकार, जब मानवता के लिए प्रचुर खाद्य-आपूर्ति हो, तो आध्यात्मिक बोध में प्रगति की कामना करने वाले व्यक्तियों को पशुओं पर हिंसा नहीं करनी चाहिए। वास्तविक अहिंसा का अर्थ है किसी के प्रगतिशील जीवन को न रोकना। पशु भी एक पशु-योनि से दूसरी में संक्रमण करते हुए अपने विकासात्मक जीवन में प्रगति कर रहे हैं। यदि किसी विशिष्ट पशु को मार दिया जाए, तो उसकी प्रगति रुक जाती है। यदि कोई पशु किसी विशिष्ट शरीर में इतने दिनों या इतने वर्षों तक रहने वाला है और असमय मार दिया जाता है, तो उसे अन्य जीवन-योनि में पदोन्नत होने हेतु शेष दिनों को पूर्ण करने के लिए पुनः उसी जीवन-रूप में आना पड़ता है। अतः मात्र अपने स्वाद को तृप्त करने हेतु उनकी प्रगति को नहीं रोकना चाहिए। यही अहिंसा कहलाती है।

सत्यम्। इस शब्द का अर्थ है कि मनुष्य को किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए सत्य को विकृत नहीं करना चाहिए। वैदिक साहित्य में कुछ कठिन अंश हैं, किन्तु उनका अर्थ अथवा प्रयोजन किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से सीखना चाहिए। वेदों को समझने की यही प्रक्रिया है। श्रुति का अर्थ है कि मनुष्य को अधिकारी से श्रवण करना चाहिए। मनुष्य को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु कोई व्याख्या नहीं गढ़नी चाहिए। भगवद्गीता पर इतनी टीकाएँ हैं जो मूल पाठ की भ्रामक व्याख्या करती हैं। शब्द का वास्तविक तात्पर्य प्रस्तुत किया जाना चाहिए, और वह किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से सीखना चाहिए।

अक्रोधः का अर्थ है क्रोध का संयम करना। यदि उत्तेजना भी हो, तो मनुष्य को सहनशील रहना चाहिए, क्योंकि एक बार क्रुद्ध हो जाने पर उसका समूचा शरीर दूषित हो जाता है। क्रोध रजोगुण तथा काम का उत्पाद है, अतः जो दिव्य रूप से स्थित है, उसे स्वयं को क्रोध से रोकना चाहिए। अपैशुनम् का अर्थ है कि मनुष्य को दूसरों में दोष नहीं खोजना चाहिए या उन्हें अनावश्यक रूप से शुद्ध नहीं करना चाहिए। निस्सन्देह चोर को चोर कहना दोष-दर्शन नहीं है, किन्तु किसी ईमानदार व्यक्ति को चोर कहना आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने वाले के लिए अत्यन्त अपराधपूर्ण है। ह्रीः का अर्थ है कि मनुष्य को अत्यन्त विनम्र होना चाहिए तथा कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जो निन्द्य हो। अचापलम् अर्थात् संकल्प का अर्थ है कि मनुष्य को किसी प्रयास में विचलित अथवा हताश नहीं होना चाहिए। किसी प्रयास में विफलता हो सकती है, किन्तु मनुष्य को उसके लिए खिन्न नहीं होना चाहिए; उसे धैर्य तथा संकल्प के साथ प्रगति करनी चाहिए। यहाँ प्रयुक्त तेजः शब्द क्षत्रियों के लिए है। क्षत्रियों को दुर्बलों को संरक्षण देने में समर्थ होने हेतु सदा अत्यन्त बलवान् होना चाहिए। उन्हें स्वयं को अहिंसक के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। यदि हिंसा अपेक्षित हो, तो उन्हें उसका प्रदर्शन करना ही चाहिए।

शौचम् का अर्थ है शुचिता—केवल मन तथा शरीर में ही नहीं, अपितु मनुष्य के व्यवहार में भी। यह विशेष रूप से व्यापारी वर्ग के लिए है, जिन्हें काले बाज़ार में लेन-देन नहीं करना चाहिए। नातिमानिता अर्थात् मान की अपेक्षा न करना, शूद्रों अर्थात् श्रमिक वर्ग पर लागू होता है, जो वैदिक विधानों के अनुसार चारों वर्गों में निम्नतम माने जाते हैं। उन्हें अनावश्यक प्रतिष्ठा या मान से फूलना नहीं चाहिए तथा अपनी स्थिति में बने रहना चाहिए। सामाजिक व्यवस्था के निर्वाह हेतु उच्च वर्ग को सम्मान अर्पित करना शूद्रों का कर्तव्य है।

यहाँ वर्णित ये समस्त सोलह योग्यताएँ दिव्य गुण हैं। सामाजिक व्यवस्था की भिन्न-भिन्न स्थितियों के अनुसार इनका अनुशीलन किया जाना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यद्यपि भौतिक परिस्थितियाँ दुःखमय हैं, फिर भी यदि समस्त वर्गों के मनुष्यों द्वारा अभ्यास से ये गुण विकसित किए जाएँ, तो क्रमशः दिव्य बोध के सर्वोच्च स्तर तक उठना सम्भव है।

Bg 16.10

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥

कामम्—काम; आश्रित्य—शरण लेकर; दुष्पूरम्—अतृप्य; दम्भ—घमण्ड; मान—मिथ्या प्रतिष्ठा; मद-अन्विताः—दर्प में लीन; मोहात्—मोह के कारण; गृहीत्वा—ग्रहण करके; असत्—अनित्य; ग्राहान्—वस्तुओं को; प्रवर्तन्ते—फलते-फूलते हैं; अशुचि—अशुद्ध; व्रताः—व्रती।

आसुरी जन, अतृप्य काम, घमण्ड तथा मिथ्या प्रतिष्ठा की शरण लेकर, और इस प्रकार मोहग्रस्त होकर, अनित्य की ओर आकृष्ट हुए, सदा अशुद्ध कर्म के व्रती रहते हैं।

आसुरी मनोवृत्ति का यहाँ वर्णन है। असुरों का काम कभी तृप्त नहीं होता। वे भौतिक भोग की अपनी अतृप्य इच्छाओं को निरन्तर बढ़ाते जाएँगे। यद्यपि अनित्य वस्तुओं को स्वीकार करने के कारण वे सदा चिन्ताओं से पूर्ण रहते हैं, फिर भी वे मोह के कारण ऐसे कर्मों में संलग्न रहते हैं। उनमें कोई ज्ञान नहीं है और वे यह नहीं बता सकते कि वे ग़लत मार्ग की ओर बढ़ रहे हैं। अनित्य वस्तुओं को स्वीकार करके, ऐसे आसुरी जन अपना ईश्वर गढ़ लेते हैं, अपने स्तोत्र गढ़ लेते हैं और तदनुसार जप करते हैं। परिणाम यह होता है कि वे दो वस्तुओं की ओर अधिकाधिक आकृष्ट हो जाते हैं—यौन-भोग तथा भौतिक धन का संचय। इस सन्दर्भ में अशुचि-व्रताः अर्थात् अशुद्ध व्रत शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ऐसे आसुरी जन केवल मद्य, स्त्री, द्यूत तथा मांस-भक्षण की ओर आकृष्ट रहते हैं; ये ही उनके अशुचि अर्थात् अशुद्ध आचरण हैं। घमण्ड तथा मिथ्या प्रतिष्ठा से प्रेरित होकर, वे धर्म के कुछ सिद्धान्त गढ़ लेते हैं जो वैदिक विधानों द्वारा अनुमोदित नहीं हैं। यद्यपि ऐसे आसुरी जन संसार में सर्वाधिक निन्द्य हैं, फिर भी कृत्रिम साधनों से संसार उनके लिए एक मिथ्या मान सृजित कर देता है। यद्यपि वे नरक की ओर फिसल रहे हैं, फिर भी वे स्वयं को अत्यन्त उन्नत मानते हैं।

Bg 16.11-12

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥ १२ ॥

चिन्ताम्—भय तथा चिन्ताओं को; अपरिमेयाम्—अपरिमेय; —तथा; प्रलय-अन्ताम्—मृत्यु-पर्यन्त; उपाश्रिताः—उनकी शरण लेकर; काम-उपभोग—इन्द्रियतृप्ति; परमाः—जीवन का परम लक्ष्य; एतावत्—इतना; इति—इस प्रकार; निश्चिताः—निश्चय किए हुए; आशा-पाश—आशा के जाल में बन्धन; शतैः—सैकड़ों से; बद्धाः—बँधे हुए; काम—काम; क्रोध—क्रोध; परायणाः—सदा उसी मनोवृत्ति में स्थित; ईहन्ते—इच्छा करते हैं; काम—काम; भोग—इन्द्रिय-भोग; अर्थम्—उस प्रयोजन हेतु; अन्यायेन—अवैध रूप से; अर्थ—धन; सञ्चयान्—संचय करते हैं।

वे मानते हैं कि जीवन के अन्त तक इन्द्रियों को तृप्त करना मानव-सभ्यता की प्रमुख आवश्यकता है। इस प्रकार उनकी चिन्ता का कोई अन्त नहीं होता। सैकड़ों-सहस्रों इच्छाओं से, काम तथा क्रोध से बँधे हुए, वे इन्द्रियतृप्ति हेतु अवैध साधनों से धन एकत्र करते हैं।

आसुरी जन यह स्वीकार करते हैं कि इन्द्रियों का भोग जीवन का परम लक्ष्य है, और इस धारणा को वे मृत्यु-पर्यन्त बनाए रखते हैं। वे मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास नहीं करते, और न वे इसमें विश्वास करते हैं कि मनुष्य अपने कर्म अर्थात् इस संसार में किए गए कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर धारण करता है। उनकी जीवन-योजनाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं, और वे योजना पर योजना बनाते जाते हैं, जिनमें से कोई भी कभी पूर्ण नहीं होती। ऐसी आसुरी मनोवृत्ति वाले एक व्यक्ति का हमें व्यक्तिगत अनुभव है, जो मृत्यु के क्षण में भी चिकित्सक से अपना जीवन चार वर्ष और बढ़ाने का अनुरोध कर रहा था, क्योंकि उसकी योजनाएँ अभी पूर्ण नहीं हुई थीं। ऐसे मूर्ख लोग नहीं जानते कि चिकित्सक एक क्षण के लिए भी जीवन नहीं बढ़ा सकता। जब बुलावा आता है, तब मनुष्य की इच्छा का कोई विचार नहीं होता। प्रकृति के नियम जितना मनुष्य के भोग में बदा है, उससे एक क्षण भी अधिक की अनुमति नहीं देते।

आसुरी व्यक्ति, जिसे ईश्वर अथवा अपने भीतर स्थित परमात्मा में कोई श्रद्धा नहीं, केवल इन्द्रियतृप्ति हेतु सब प्रकार के पापकर्म करता है। वह नहीं जानता कि उसके हृदय के भीतर एक साक्षी विराजमान है। परमात्मा व्यष्टि-आत्मा के कर्मों का अवलोकन कर रहे हैं। जैसा वैदिक साहित्य, उपनिषदों में कहा गया है, एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं; एक कर्म कर रहा है और शाखाओं के फलों का भोग अथवा कष्ट भोग रहा है, और दूसरा साक्षी है। किन्तु जो आसुरी है, उसे वैदिक शास्त्र का कोई ज्ञान नहीं है, और न उसमें कोई श्रद्धा है; अतएव वह परिणामों की चिन्ता किए बिना इन्द्रिय-भोग हेतु कुछ भी करने में स्वयं को स्वतन्त्र अनुभव करता है।

Bg 16.13-15

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥

इदम्—यह; अद्य—आज; मया—मेरे द्वारा; लब्धम्—अर्जित; इमम्—इस; प्राप्स्ये—मैं प्राप्त करूँगा; मनोरथम्—अपनी इच्छाओं के अनुसार; इदम्—यह; अस्ति—है; इदम्—यह; अपि—भी; मे—मेरा; भविष्यति—भविष्य में बढ़ेगा; पुनः—फिर; धनम्—धन; असौ—वह; मया—मेरे द्वारा; हतः—मारा जा चुका है; शत्रुः—शत्रु; हनिष्ये—मैं मारूँगा; —भी; अपरान्—अन्यों को; अपि—निश्चय ही; ईश्वरः—स्वामी; अहम्—मैं हूँ; अहम्—मैं हूँ; भोगी—भोक्ता; सिद्धः—सिद्ध; अहम्—मैं हूँ; बलवान्—बलवान्; सुखी—सुखी; आढ्यः—धनवान्; अभिजनवान्—कुलीन सम्बन्धियों से घिरा हुआ; अस्मि—मैं हूँ; कः—कौन और; अन्यः—दूसरा; अस्ति—है; सदृशः—समान; मया—मेरे; यक्ष्ये—मैं यज्ञ करूँगा; दास्यामि—मैं दान दूँगा; मोदिष्ये—मैं आनन्द मनाऊँगा; इति—इस प्रकार; अज्ञान—अज्ञान; विमोहिताः—से मोहित।

आसुरी व्यक्ति सोचता है : “आज मेरे पास इतना धन है, और मैं अपनी योजनाओं के अनुसार और अधिक प्राप्त करूँगा। इतना अब मेरा है, और यह भविष्य में अधिकाधिक बढ़ेगा। वह मेरा शत्रु है, और मैंने उसे मार डाला है; और मेरे अन्य शत्रु भी मारे जाएँगे। मैं सबका स्वामी हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं सिद्ध, बलवान् तथा सुखी हूँ। मैं सर्वाधिक धनवान् व्यक्ति हूँ, कुलीन सम्बन्धियों से घिरा हुआ हूँ। मेरे समान बलवान् तथा सुखी अन्य कोई नहीं है। मैं यज्ञ करूँगा, मैं कुछ दान दूँगा, और इस प्रकार मैं आनन्द मनाऊँगा।” इस प्रकार ऐसे व्यक्ति अज्ञान से मोहित रहते हैं।

Bg 16.16

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥

अनेक—अनेक; चित्त-विभ्रान्ताः—चिन्ताओं से व्याकुल; मोह—मोह के; जाल—जाल से; समावृताः—घिरे हुए; प्रसक्ताः—आसक्त; काम—काम; भोगेषु—इन्द्रियतृप्ति में; पतन्ति—गिरते हैं; नरके—नरक में; अशुचौ—अशुद्ध।

इस प्रकार विविध चिन्ताओं से व्याकुल तथा मोह के जाल से बँधा हुआ मनुष्य इन्द्रिय-भोग में अत्यधिक आसक्त हो जाता है और अशुद्ध नरक में गिर जाता है।

आसुरी मनुष्य धन अर्जित करने की अपनी इच्छा की कोई सीमा नहीं जानता। वह असीम है। वह केवल यही सोचता है कि इस समय उसके पास कितना आकलन है और उस धन-राशि को अधिकाधिक संलग्न करने की योजना बनाता है। इस कारण वह किसी भी पापमय रीति से कर्म करने में संकोच नहीं करता और अवैध भोग हेतु काले बाज़ार में लेन-देन करता है। वह अपनी पहले से विद्यमान सम्पत्तियों—जैसे भूमि, परिवार, घर तथा बैंक-शेष—पर मुग्ध रहता है, और सदा उन्हें बढ़ाने की योजना बनाता रहता है। वह अपने ही बल में विश्वास करता है, और यह नहीं जानता कि जो भी वह अर्जित कर रहा है, वह उसके अतीत के पुण्यकर्मों के कारण है। उसे ऐसी वस्तुएँ संचित करने का अवसर दिया गया है, किन्तु उसे अतीत के कारणों की कोई धारणा नहीं है। वह केवल यही सोचता है कि उसकी समस्त धन-राशि उसके अपने प्रयास के कारण है। आसुरी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत कर्म के बल में विश्वास करता है, कर्म के नियम में नहीं। कर्म के नियम के अनुसार मनुष्य अतीत के सत्कर्म के कारण किसी उच्च कुल में जन्म लेता है, अथवा धनवान् बनता है, अथवा अत्यन्त सुशिक्षित, अथवा अत्यन्त सुन्दर। आसुरी व्यक्ति सोचता है कि ये सब वस्तुएँ आकस्मिक तथा उसकी व्यक्तिगत क्षमता के बल के कारण हैं। वह विभिन्न प्रकार के लोगों, सौन्दर्य तथा शिक्षा के पीछे किसी व्यवस्था का अनुभव नहीं करता। जो कोई ऐसे आसुरी मनुष्य के साथ प्रतिस्पर्धा में आता है, वह उसका शत्रु है। अनेक आसुरी जन हैं, और प्रत्येक दूसरों का शत्रु है। यह शत्रुता अधिकाधिक गहरी होती जाती है—व्यक्तियों के बीच, फिर परिवारों के बीच, फिर समाजों के बीच, और अन्ततः राष्ट्रों के बीच। अतएव समूचे संसार में निरन्तर संघर्ष, युद्ध तथा शत्रुता बनी रहती है।

प्रत्येक आसुरी व्यक्ति सोचता है कि वह अन्य सबकी बलि देकर जीवित रह सकता है। सामान्यतः, आसुरी व्यक्ति स्वयं को परमेश्वर मानता है, और एक आसुरी प्रचारक अपने अनुयायियों से कहता है, “तुम ईश्वर को अन्यत्र क्यों खोज रहे हो? तुम सब स्वयं ही ईश्वर हो! जो भी तुम्हें अच्छा लगे, वह तुम कर सकते हो। ईश्वर में विश्वास मत करो। ईश्वर को फेंक दो। ईश्वर मर चुका है।” ये आसुरी जन के उपदेश हैं।

यद्यपि आसुरी व्यक्ति अन्यों को समान रूप से धनवान् तथा प्रभावशाली, अथवा उससे भी अधिक देखता है, फिर भी वह सोचता है कि उससे अधिक धनवान् कोई नहीं और उससे अधिक प्रभावशाली कोई नहीं। जहाँ तक उच्चतर लोक-व्यवस्था में पदोन्नति का सम्बन्ध है, वह यज्ञ करने में विश्वास नहीं करता। असुर सोचते हैं कि वे यज्ञ की अपनी प्रक्रिया गढ़ लेंगे तथा कोई यन्त्र तैयार करेंगे, जिसके द्वारा वे किसी भी उच्चतर लोक तक पहुँच सकेंगे। ऐसे आसुरी मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रावण था। उसने लोगों के समक्ष एक योजना प्रस्तुत की, जिसके द्वारा वह एक सीढ़ी बनाएगा ताकि कोई भी व्यक्ति वेदों में निर्दिष्ट यज्ञों को सम्पन्न किए बिना स्वर्गलोक तक पहुँच सके। इसी प्रकार, वर्तमान युग में ऐसे आसुरी जन यान्त्रिक व्यवस्था द्वारा उच्चतर लोक-व्यवस्थाओं तक पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं। ये भ्रम के उदाहरण हैं। परिणाम यह होता है कि अपने अज्ञान में, वे नरक की ओर फिसल रहे हैं। यहाँ संस्कृत शब्द मोहजाल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जाल का अर्थ है फँसाने वाली जाली; जाल में फँसी मछलियों के समान, उनके पास बाहर निकलने का कोई उपाय नहीं।

Bg 16.17

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥

आत्म-सम्भाविताः—आत्मतुष्ट; स्तब्धाः—धृष्ट; धन-मान—धन तथा मिथ्या प्रतिष्ठा; मद-अन्विताः—दर्प में लीन; यजन्ते—यज्ञ करते हैं; नाम—केवल नाममात्र; यज्ञैः—ऐसे यज्ञ से; ते—वे; दम्भेन—दर्प के कारण; अविधि-पूर्वकम्—किसी नियम तथा विधान का पालन किए बिना।

आत्मतुष्ट तथा सदा धृष्ट, धन एवं मिथ्या प्रतिष्ठा से मोहित होकर, वे कभी-कभी किसी नियम अथवा विधान का पालन किए बिना केवल नाममात्र के यज्ञ करते हैं।

स्वयं को सर्वस्व मानते हुए, किसी अधिकारी अथवा शास्त्र की चिन्ता न करते हुए, आसुरी जन कभी-कभी तथाकथित धार्मिक अथवा यज्ञ-सम्बन्धी कर्मकाण्ड करते हैं। और चूँकि वे अधिकारी में विश्वास नहीं करते, अतः वे अत्यन्त धृष्ट होते हैं। यह कुछ धन तथा मिथ्या प्रतिष्ठा के संचय से उत्पन्न मोह के कारण है। कभी-कभी ऐसे असुर प्रचारक की भूमिका धारण कर लेते हैं, लोगों को पथभ्रष्ट करते हैं, और धार्मिक सुधारकों अथवा ईश्वर के अवतारों के रूप में विख्यात हो जाते हैं। वे यज्ञ करने का प्रदर्शन करते हैं, अथवा देवताओं की पूजा करते हैं, अथवा अपना ईश्वर गढ़ लेते हैं। सामान्य लोग उन्हें ईश्वर के रूप में प्रचारित करते हैं तथा उनकी पूजा करते हैं, और मूर्खों द्वारा वे धर्म के सिद्धान्तों में, अथवा आध्यात्मिक ज्ञान के सिद्धान्तों में उन्नत माने जाते हैं। वे संन्यास आश्रम का वेश धारण कर लेते हैं और उस वेश में सब प्रकार की निरर्थक बातें करते हैं। वस्तुतः जिसने इस संसार का त्याग किया है, उसके लिए अनेक प्रतिबन्ध हैं। तथापि असुर ऐसे प्रतिबन्धों की चिन्ता नहीं करते। वे सोचते हैं कि जो भी मार्ग कोई गढ़ सके, वही उसका अपना मार्ग है; ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे मानक मार्ग कहा जाए और जिसका पालन करना पड़े। अविधि-पूर्वकम् शब्द, जिसका अर्थ है नियमों तथा विधानों की अवहेलना, यहाँ विशेष रूप से बल देकर कहा गया है। ये बातें सदा अज्ञान तथा मोह के कारण होती हैं।

Bg 16.18

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥

अहङ्कारम्—मिथ्या अहंकार; बलम्—बल; दर्पम्—घमण्ड; कामम्—काम; क्रोधम्—क्रोध; —भी; संश्रिताः—शरण लेकर; माम्—मुझे; आत्म—अपने; पर-देहेषु—अन्य शरीरों में; प्रद्विषन्तः—निन्दा करते हैं; अभ्यसूयकाः—ईर्ष्यालु।

मिथ्या अहंकार, बल, घमण्ड, काम तथा क्रोध से भ्रमित होकर, असुर अपने तथा अन्यों के शरीरों में स्थित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से ईर्ष्या करता है, और वास्तविक धर्म की निन्दा करता है।

आसुरी व्यक्ति, सदा भगवान् की सर्वोच्चता के विरुद्ध होने के कारण, शास्त्रों में विश्वास करना नहीं चाहता। वह शास्त्रों से तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अस्तित्व से—दोनों से ईर्ष्या करता है। यह उसकी तथाकथित प्रतिष्ठा तथा उसके धन एवं बल के संचय के कारण होता है। वह नहीं जानता कि वर्तमान जीवन अगले जीवन की तैयारी है। यह न जानने के कारण, वह वस्तुतः अपने ही प्रति, तथा अन्यों के प्रति भी ईर्ष्यालु है। वह अन्य शरीरों पर तथा अपने शरीर पर हिंसा करता है। वह भगवान् के परम नियन्त्रण की चिन्ता नहीं करता, क्योंकि उसे कोई ज्ञान नहीं है। शास्त्रों तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से ईर्ष्या करते हुए, वह ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध मिथ्या तर्क प्रस्तुत करता है तथा शास्त्रीय अधिकार का खण्डन करता है। वह प्रत्येक कर्म में स्वयं को स्वतन्त्र तथा बलवान् मानता है। वह सोचता है कि चूँकि बल, शक्ति अथवा धन में कोई उसकी बराबरी नहीं कर सकता, अतः वह किसी भी प्रकार से कर्म कर सकता है और कोई उसे रोक नहीं सकता। यदि उसका कोई शत्रु है जो उसके इन्द्रिय-कर्मों की प्रगति को रोक सके, तो वह अपने ही बल से उसे काट गिराने की योजना बनाता है।

Bg 16.19

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥

तान्—उन; अहम्—मैं; द्विषतः—ईर्ष्यालु; क्रूरान्—दुष्ट; संसारेषु—भौतिक अस्तित्व के सागर में; नराधमान्—मनुष्यों में निम्नतम; क्षिपामि—डालता हूँ; अजस्रम्—असंख्य; अशुभान्—अशुभ; आसुरीषु—आसुरी; एव—निश्चय ही; योनिषु—गर्भों में।

जो ईर्ष्यालु तथा दुष्ट हैं, जो मनुष्यों में निम्नतम हैं, उन्हें मैं भौतिक अस्तित्व के सागर में, विविध आसुरी जीवन-योनियों में डाल देता हूँ।

इस श्लोक में स्पष्ट रूप से इंगित है कि किसी विशिष्ट व्यष्टि-आत्मा को किसी विशिष्ट शरीर में रखना परम इच्छा का विशेषाधिकार है। आसुरी व्यक्ति भगवान् की सर्वोच्चता को स्वीकार करने के लिए सहमत न हो सकता है, और यह तथ्य है कि वह अपनी सनक के अनुसार कर्म कर सकता है, किन्तु उसका अगला जन्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के निर्णय पर निर्भर करेगा, स्वयं उस पर नहीं। श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध में कहा गया है कि व्यष्टि-आत्मा, अपनी मृत्यु के पश्चात्, एक माता के गर्भ में डाल दिया जाता है, जहाँ वह श्रेष्ठ शक्ति की देखरेख में एक विशिष्ट प्रकार का शरीर प्राप्त करता है। अतएव भौतिक अस्तित्व में हम इतनी जीवन-योनियाँ पाते हैं—पशु, कीट, मनुष्य, इत्यादि। ये सभी श्रेष्ठ शक्ति द्वारा व्यवस्थित हैं। वे आकस्मिक नहीं हैं। जहाँ तक असुरों का सम्बन्ध है, यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वे निरन्तर असुरों के गर्भों में डाले जाते हैं, और इस प्रकार वे ईर्ष्यालु, मनुष्यों में निम्नतम बने रहते हैं। ऐसी आसुरी जीवन-योनियाँ सदा काम से पूर्ण, सदा हिंसक तथा द्वेषपूर्ण और सदा अशुद्ध मानी जाती हैं। वे ठीक किसी जंगल के असंख्य पशुओं के समान हैं।

Bg 16.20

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥

आसुरीम्—आसुरी; योनिम्—योनि; आपन्नाः—प्राप्त करते हुए; मूढाः—मूर्ख; जन्मनि जन्मनि—जन्म-जन्मान्तर में; माम्—मुझे; अप्राप्य—प्राप्त किये बिना; एव—निश्चय ही; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; ततः—तत्पश्चात्; यान्ति—जाते हैं; अधमाम्—निकृष्ट; गतिम्—गति को।

आसुरी जीवन की योनियों में बारम्बार जन्म पाते हुए ऐसे व्यक्ति मुझे कभी प्राप्त नहीं कर पाते। धीरे-धीरे वे अस्तित्व के अत्यन्त निन्दनीय प्रकार में गिरते चले जाते हैं।

यह विख्यात है कि ईश्वर सर्वकरुणामय हैं, किन्तु यहाँ हम पाते हैं कि ईश्वर असुरों पर कभी करुणा नहीं करते। स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आसुरी प्रकृति के लोग जन्म-जन्मान्तर में वैसे ही असुरों के गर्भ में डाले जाते हैं, और परमेश्वर की कृपा प्राप्त न होने के कारण वे नीचे और नीचे गिरते जाते हैं, यहाँ तक कि अन्ततः वे बिल्ली, कुत्ते और सूअर जैसे शरीर प्राप्त करते हैं। स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ऐसे असुरों को परवर्ती जीवन की किसी भी अवस्था में ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का प्रायः कोई अवसर नहीं रहता। वेदों में भी कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति धीरे-धीरे गिरते हुए कुत्ते और सूअर बन जाते हैं। इस सन्दर्भ में यह तर्क किया जा सकता है कि यदि ईश्वर ऐसे असुरों पर करुणामय नहीं हैं, तो उन्हें सर्वकरुणामय रूप में प्रचारित नहीं करना चाहिए। इस प्रश्न के उत्तर में वेदान्त-सूत्र में हम पाते हैं कि परमेश्वर किसी से द्वेष नहीं करते। असुरों को जीवन की निम्नतम अवस्था में रखना तो मात्र उनकी कृपा का ही एक और रूप है। कभी-कभी असुरों का वध परमेश्वर द्वारा किया जाता है, किन्तु यह वध भी उनके लिए कल्याणकारी ही होता है, क्योंकि वैदिक साहित्य में हम पाते हैं कि जो कोई परमेश्वर द्वारा मारा जाता है वह मुक्त हो जाता है। इतिहास में अनेक असुरों के उदाहरण हैं—रावण, कंस, हिरण्यकशिपु—जिनका वध करने के लिए ही भगवान् ने विविध अवतार धारण किये। अतः यदि असुर इतने सौभाग्यशाली हों कि उनके द्वारा मारे जाएँ, तो उन पर भी ईश्वर की कृपा प्रकट होती है।

Bg 16.21

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥

त्रि-विधम्—तीन प्रकार के; नरकस्य—नरक के; इदम्—यह; द्वारम्—द्वार; नाशनम्—विनाशकारी; आत्मनः—आत्मा का; कामः—काम; क्रोधः—क्रोध; तथा—तथा; लोभः—लोभ; तस्मात्—अतः; एतत्—इन; त्रयम्—तीनों को; त्यजेत्—त्याग देना चाहिए।

इस नरक की ओर ले जाने वाले तीन द्वार हैं—काम, क्रोध और लोभ। प्रत्येक विवेकशील मनुष्य को इन्हें त्याग देना चाहिए, क्योंकि ये आत्मा के अधःपतन की ओर ले जाते हैं।

यहाँ आसुरी जीवन के आरम्भ का वर्णन है। मनुष्य अपने काम को तृप्त करने का प्रयास करता है, और जब वह ऐसा नहीं कर पाता, तब क्रोध और लोभ उत्पन्न होते हैं। जो विवेकशील मनुष्य आसुरी जीवन की योनियों में फिसलना नहीं चाहता, उसे इन तीनों शत्रुओं को त्यागने का प्रयत्न करना चाहिए, जो आत्मा का इस सीमा तक वध कर सकते हैं कि इस भौतिक बन्धन से मुक्ति की कोई सम्भावना ही न रह जाए।

Bg 16.22

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥

एतैः—इनसे; विमुक्तः—मुक्त होकर; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; तमः-द्वारैः—अज्ञान के द्वारों से; त्रिभिः—तीन प्रकार के; नरः—मनुष्य; आचरति—सम्पन्न करता है; आत्मनः—आत्मा का; श्रेयः—कल्याण; ततः—तत्पश्चात्; याति—जाता है; पराम्—परम; गतिम्—गति को।

हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य नरक के इन तीन द्वारों से बच निकलता है, वह आत्म-साक्षात्कार के अनुकूल कर्म करता है और इस प्रकार धीरे-धीरे परम गति को प्राप्त होता है।

मनुष्य-जीवन के इन तीन शत्रुओं—काम, क्रोध और लोभ—से अत्यन्त सावधान रहना चाहिए। मनुष्य जितना अधिक काम, क्रोध और लोभ से मुक्त होता है, उतना ही उसका अस्तित्व शुद्ध होता जाता है। तब वह वैदिक साहित्य में विहित नियमों का पालन कर सकता है। मनुष्य-जीवन के नियामक सिद्धान्तों का पालन करते हुए मनुष्य धीरे-धीरे अपने को आध्यात्मिक अनुभूति के स्तर तक उठा लेता है। यदि कोई इतना सौभाग्यशाली हो कि ऐसे अभ्यास द्वारा कृष्णभावनामृत के स्तर तक उठ जाए, तो उसके लिए सफलता सुनिश्चित है। वैदिक साहित्य में क्रिया एवं प्रतिक्रिया की विधियाँ इसलिए निर्धारित की गई हैं कि मनुष्य शुद्धि की अवस्था तक पहुँच सके। समूची विधि काम, लोभ और क्रोध के त्याग पर आधारित है। इस प्रक्रिया का ज्ञान अर्जित करके मनुष्य आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च अवस्था तक उन्नत हो सकता है; और यह आत्म-साक्षात्कार भक्ति में पूर्णता को प्राप्त होता है। उस भक्ति में बद्धजीव की मुक्ति सुनिश्चित है। अतः वैदिक प्रणाली के अनुसार जीवन के चार आश्रम तथा जीवन की चार अवस्थाएँ स्थापित की गई हैं, जिन्हें वर्ण-व्यवस्था तथा आश्रम-व्यवस्था कहते हैं। समाज के भिन्न-भिन्न वर्णों अथवा विभागों के लिए भिन्न-भिन्न नियम हैं, और यदि कोई मनुष्य उनका पालन करने में समर्थ हो, तो वह स्वतः ही आध्यात्मिक अनुभूति के सर्वोच्च स्तर तक उठ जाएगा। तब वह नि:सन्देह मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

Bg 16.23

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ २३ ॥

यः—जो कोई; शास्त्र-विधिम्—शास्त्रों के नियमों को; उत्सृज्य—त्यागकर; वर्तते—रहता है; काम-कारतः—काम के वशीभूत होकर स्वेच्छाचार करते हुए; —कभी नहीं; सः—वह; सिद्धिम्—सिद्धि; अवाप्नोति—प्राप्त करता है; —कभी नहीं; सुखम्—सुख; —कभी नहीं; पराम्—परम; गतिम्—सिद्धावस्था को।

किन्तु जो मनुष्य शास्त्रीय आदेशों को त्यागकर अपनी मनमानी के अनुसार आचरण करता है, वह न तो सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख और न ही परम गति को।

जैसा कि पूर्व में वर्णित है, शास्त्र-विधि अर्थात् शास्त्र का निर्देश मानव-समाज के विभिन्न वर्णों और आश्रमों के लिए दिया गया है। प्रत्येक से इन नियमों के पालन की अपेक्षा की जाती है। यदि कोई इनका पालन न करके अपने काम, लोभ और इच्छा के अनुसार स्वेच्छाचार करता है, तो वह अपने जीवन में कभी सिद्ध नहीं होगा। दूसरे शब्दों में, कोई मनुष्य सैद्धान्तिक रूप से इन समस्त बातों को जानता हो, किन्तु यदि वह उन्हें अपने जीवन में लागू नहीं करता, तो उसे मनुष्यों में निकृष्टतम जानना चाहिए। मनुष्य-योनि में जीव से यह अपेक्षा की जाती है कि वह विवेकशील हो और अपने जीवन को सर्वोच्च स्तर तक उठाने के लिए दिये गये नियमों का पालन करे, किन्तु यदि वह उनका पालन नहीं करता, तो वह अपना अधःपतन कर लेता है। परन्तु यदि वह नियमों, विधियों तथा नैतिक सिद्धान्तों का पालन भी करे और अन्ततः परमेश्वर को समझने की अवस्था तक न पहुँचे, तो उसका समस्त ज्ञान व्यर्थ हो जाता है। अतएव मनुष्य को धीरे-धीरे अपने को कृष्णभावनामृत तथा भक्ति के स्तर तक उठाना चाहिए; तभी और वहीं वह सर्वोच्च सिद्धावस्था को प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं।

काम-कारतः शब्द अत्यन्त सार्थक है। जो व्यक्ति जान-बूझकर नियमों का उल्लंघन करता है, वह काम के वशीभूत होकर आचरण करता है। वह जानता है कि यह निषिद्ध है, फिर भी वह वैसा ही करता है। इसी को स्वेच्छाचार कहते हैं। वह जानता है कि अमुक कर्म करना चाहिए, फिर भी वह उसे नहीं करता; इसीलिए उसे स्वेच्छाचारी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति परमेश्वर द्वारा निन्दित होने के लिए ही नियत हैं। ऐसे व्यक्ति उस सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकते जो मनुष्य-जीवन के लिए अभिप्रेत है। मनुष्य-जीवन विशेष रूप से अपने अस्तित्व की शुद्धि के लिए है, और जो नियमों एवं विधियों का पालन नहीं करता, वह न तो अपने को शुद्ध कर सकता है और न ही सुख की वास्तविक अवस्था को प्राप्त कर सकता है।

Bg 16.24

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥

तस्मात्—अतः; शास्त्रम्—शास्त्र; प्रमाणम्—प्रमाण; ते—तुम्हारा; कार्य—कर्तव्य; अकार्य—निषिद्ध कर्म; व्यवस्थितौ—निर्धारण में; ज्ञात्वा—जानकर; शास्त्र—शास्त्र के; विधान—नियम; उक्तम्—जैसा घोषित किया गया है; कर्म—कर्म; कर्तुम्—करने हेतु; इह अर्हसि—तुम्हें करना चाहिए।

मनुष्य को शास्त्रों के नियमों द्वारा यह समझना चाहिए कि कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है। ऐसे नियमों एवं विधियों को जानकर मनुष्य को इस प्रकार कर्म करना चाहिए कि वह धीरे-धीरे उन्नत हो सके।

जैसा कि पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है, वेदों के समस्त नियम और विधियाँ श्रीकृष्ण को जानने के लिए ही हैं। यदि कोई भगवद्गीता से श्रीकृष्ण को समझ ले और कृष्णभावनामृत में स्थित होकर भक्ति में संलग्न हो जाए, तो वह वैदिक साहित्य द्वारा प्रदत्त ज्ञान की सर्वोच्च पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस प्रक्रिया को अत्यन्त सुगम बना दिया : उन्होंने लोगों से केवल हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करने, भगवान् की भक्ति में संलग्न होने तथा अर्चाविग्रह को अर्पित भोजन के अवशेष ग्रहण करने को कहा। जो व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से इन समस्त भक्ति-कर्मों में संलग्न है, उसे समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन कर चुका हुआ ही समझना चाहिए। वह पूर्ण रूप से निष्कर्ष पर पहुँच गया है। निस्सन्देह, जो साधारण व्यक्ति कृष्णभावनामृत में नहीं हैं अथवा जो भक्ति में संलग्न नहीं हैं, उनके लिए क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसका निर्णय वेदों के आदेशों द्वारा होना चाहिए। मनुष्य को बिना तर्क किये तदनुसार आचरण करना चाहिए। इसी को शास्त्र अर्थात् धर्मग्रन्थ के सिद्धान्तों का पालन कहते हैं। शास्त्र उन चार प्रमुख दोषों से रहित है जो बद्धजीव में दृष्टिगोचर होते हैं : अपूर्ण इन्द्रियाँ, छल करने की प्रवृत्ति, भूल करने की निश्चितता तथा माया में पड़ने की निश्चितता। बद्ध जीवन के ये चार प्रमुख दोष मनुष्य को नियम और विधियाँ प्रस्तुत करने के अयोग्य बना देते हैं। अतएव शास्त्र में वर्णित नियम और विधियाँ—इन दोषों से परे होने के कारण—समस्त महान् सन्तों, आचार्यों तथा महात्माओं द्वारा बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार की जाती हैं।

भारत में आध्यात्मिक बोध के अनेक सम्प्रदाय हैं, जिन्हें सामान्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है : निर्विशेषवादी तथा सविशेषवादी। तथापि दोनों ही अपना जीवन वेदों के सिद्धान्तों के अनुसार चलाते हैं। शास्त्रों के सिद्धान्तों का पालन किये बिना कोई अपने को सिद्धावस्था तक नहीं उठा सकता। अतः जो वास्तव में शास्त्रों के तात्पर्य को समझता है, उसे ही सौभाग्यशाली माना जाता है।

मानव-समाज में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझने के सिद्धान्तों के प्रति विमुखता ही समस्त अधःपतनों का कारण है। यही मनुष्य-जीवन का सबसे बड़ा अपराध है। इसी कारण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भौतिक शक्ति माया हमें त्रिविध तापों के रूप में सदा कष्ट देती रहती है। यह भौतिक शक्ति प्रकृति के तीन गुणों से निर्मित है। परमेश्वर को समझने का मार्ग खुलने से पूर्व मनुष्य को कम-से-कम सत्त्वगुण तक अपने को उठाना होता है। सत्त्वगुण के स्तर तक अपने को उठाये बिना मनुष्य रजोगुण और तमोगुण में ही बना रहता है, जो आसुरी जीवन के कारण हैं। रजोगुण और तमोगुण में स्थित लोग शास्त्रों का उपहास करते हैं, सन्त पुरुष का उपहास करते हैं, तथा आध्यात्मिक गुरु के यथार्थ बोध का उपहास करते हैं, और वे शास्त्रों के नियमों की कोई परवाह नहीं करते। भक्ति की महिमा सुनने पर भी वे आकृष्ट नहीं होते। इस प्रकार वे अपनी उन्नति का अपना ही मार्ग गढ़ लेते हैं। ये मानव-समाज के कुछ ऐसे दोष हैं, जो जीवन की आसुरी अवस्था की ओर ले जाते हैं। तथापि यदि कोई किसी यथार्थ एवं प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में रहने में समर्थ हो, जो उसे उन्नति के मार्ग पर, उच्चतर अवस्था की ओर ले जा सके, तो उसका जीवन सफल हो जाता है।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय “दैवी एवं आसुरी प्रकृति” विषयक भक्तिवेदान्त तात्पर्यों की समाप्ति होती है।

Bg 16.4

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ ४ ॥

दम्भः—अहंकार; दर्पः—घमण्ड; अभिमानः—दर्प; —तथा; क्रोधः—क्रोध; पारुष्यम्—कठोरता; एव—निश्चय ही; —तथा; अज्ञानम्—अज्ञान; —तथा; अभिजातस्य—जिसने जन्म लिया है; पार्थ—हे पृथापुत्र; सम्पदम्—प्रकृति; आसुरीम्—आसुरी।

हे पृथापुत्र! घमण्ड, अहंकार, क्रोध, दर्प, कठोरता तथा अज्ञान—ये गुण आसुरी प्रकृति वालों में होते हैं।

इस श्लोक में नरक के राजमार्ग का वर्णन है। आसुरी जन धर्म तथा आध्यात्मिक विज्ञान में उन्नति का प्रदर्शन करना चाहते हैं, यद्यपि वे सिद्धान्तों का पालन नहीं करते। वे किसी प्रकार की शिक्षा अथवा प्रचुर धन रखने में सदा घमण्डी अथवा दर्पयुक्त रहते हैं। वे चाहते हैं कि दूसरे उनकी पूजा करें, और सम्माननीयता की माँग करते हैं, यद्यपि वे सम्मान के योग्य नहीं होते। तुच्छ बातों पर वे अत्यन्त क्रुद्ध हो जाते हैं और मृदुता से नहीं, अपितु कठोरता से बोलते हैं। वे नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। वे सब कुछ स्वेच्छाचारी ढंग से, अपनी इच्छा के अनुसार करते हैं, और किसी अधिकारी को नहीं मानते। ये आसुरी गुण उनके द्वारा अपनी माताओं के गर्भ में शरीरों के आरम्भ से ही ग्रहण कर लिए जाते हैं, और जैसे-जैसे वे बढ़ते हैं, वे इन समस्त अशुभ गुणों को प्रकट करते हैं।

Bg 16.5

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥

दैवी—दिव्य; सम्पत्—प्रकृति; विमोक्षाय—मोक्ष के लिए; निबन्धाय—बन्धन के लिए; आसुरी—आसुरी गुण; मता—मानी जाती है; मा—मत; शुचः—चिन्ता करो; सम्पदम्—प्रकृति; दैवीम्—दिव्य; अभिजातः—जन्मे हुए; असि—तुम हो; पाण्डव—हे पाण्डुपुत्र।

दिव्य गुण मोक्ष के लिए अनुकूल हैं, जबकि आसुरी गुण बन्धन का कारण बनते हैं। हे पाण्डुपुत्र! चिन्ता मत करो, क्योंकि तुम दिव्य गुणों के साथ जन्मे हो।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह कहकर प्रोत्साहित किया कि वह आसुरी गुणों के साथ जन्मा नहीं है। उसका युद्ध में सम्मिलित होना आसुरी नहीं था, क्योंकि वह पक्ष-विपक्ष पर विचार कर रहा था। वह विचार कर रहा था कि भीष्म तथा द्रोण जैसे सम्माननीय व्यक्तियों का वध किया जाना चाहिए या नहीं, अतः वह क्रोध, मिथ्या प्रतिष्ठा अथवा कठोरता के प्रभाव में कर्म नहीं कर रहा था। अतएव वह असुरों के गुण का नहीं था। क्षत्रिय अर्थात् सैनिक के लिए शत्रु पर बाण चलाना दिव्य माना जाता है, और ऐसे कर्तव्य से विरत होना आसुरी है। इसलिए अर्जुन के लिए शोक का कोई कारण नहीं था। जो कोई जीवन के विभिन्न आश्रमों के नियमित सिद्धान्तों का पालन करता है, वह दिव्य रूप से स्थित होता है।

Bg 16.6

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥

द्वौ—दो; भूत-सर्गौ—सृजित जीव; लोके—इस संसार में; अस्मिन्—इस; दैवः—देवतुल्य; आसुरः—आसुरी; एव—निश्चय ही; —तथा; दैवः—दिव्य; विस्तरशः—विस्तारपूर्वक; प्रोक्तः—कहा गया; असुरम्—आसुरी; पार्थ—हे पृथापुत्र; मे—मुझसे; शृणु—सुनो।

हे पृथापुत्र! इस संसार में दो प्रकार के सृजित जीव हैं। एक दिव्य कहलाता है और दूसरा आसुरी। मैं तुम्हें दिव्य गुणों की विस्तारपूर्वक व्याख्या पहले ही कर चुका हूँ। अब मुझसे आसुरी गुणों के विषय में सुनो।

भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन को यह आश्वासन देने के पश्चात् कि वह दिव्य गुणों के साथ जन्मा है, अब आसुरी मार्ग का वर्णन कर रहे हैं। इस संसार में बद्धजीव दो वर्गों में विभाजित हैं। जो दिव्य गुणों के साथ जन्मे हैं, वे एक नियमित जीवन का पालन करते हैं; अर्थात् वे शास्त्रों के विधानों तथा अधिकारियों का अनुसरण करते हैं। मनुष्य को प्रामाणिक शास्त्र के आलोक में अपने कर्तव्यों का सम्पादन करना चाहिए। यह मनोवृत्ति दिव्य कहलाती है। जो शास्त्रों में निर्धारित नियामक सिद्धान्तों का पालन नहीं करता और जो अपनी सनक के अनुसार कर्म करता है, वह आसुरी अथवा असुर कहलाता है। शास्त्रों के नियामक सिद्धान्तों का पालन करने के अतिरिक्त अन्य कोई कसौटी नहीं है। वैदिक साहित्य में उल्लेख है कि देवता तथा असुर—दोनों प्रजापति से उत्पन्न हैं; एकमात्र अन्तर यह है कि एक वर्ग वैदिक विधानों का पालन करता है और दूसरा नहीं करता।

Bg 16.7

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥

प्रवृत्तिम्—उचित कर्म; —भी; निवृत्तिम्—अनुचित कर्म; —तथा; जनाः—जन; —कभी नहीं; विदुः—जानते हैं; आसुराः—आसुरी गुण वाले; —कभी नहीं; शौचम्—शुचिता; —न ही; अपि—भी; —तथा; आचारः—आचरण; —कभी नहीं; सत्यम्—सत्य; तेषु—उनमें; विद्यते—होता है।

जो आसुरी हैं, वे नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। उनमें न शुचिता, न उचित आचरण, न सत्य पाया जाता है।

प्रत्येक सभ्य मानव-समाज में शास्त्रीय नियमों तथा विधानों का कोई-न-कोई समूह होता है, जिनका आरम्भ से ही पालन किया जाता है—विशेष रूप से आर्यों में, जो वैदिक सभ्यता को अपनाते हैं और जो सर्वाधिक उन्नत सभ्य लोग माने जाते हैं। जो शास्त्रीय विधानों का पालन नहीं करते, वे असुर माने जाते हैं। अतः यहाँ कहा गया है कि असुर न शास्त्रीय नियमों को जानते हैं, और न उनके पालन की कोई प्रवृत्ति रखते हैं। उनमें से अधिकांश उन्हें नहीं जानते, और यदि उनमें से कुछ जानते भी हैं, तो उनमें उनके पालन की प्रवृत्ति नहीं होती। उनमें न श्रद्धा है, और न वे वैदिक विधानों के अनुसार कर्म करने के इच्छुक हैं। असुर न बाह्य रूप से शुद्ध होते हैं, न आन्तरिक रूप से।

मनुष्य को स्नान, दन्त-मार्जन, वस्त्र-परिवर्तन आदि द्वारा अपने शरीर को स्वच्छ रखने में सदा सावधान रहना चाहिए। जहाँ तक आन्तरिक शुचिता का सम्बन्ध है, मनुष्य को सदा ईश्वर के पवित्र नामों का स्मरण करना चाहिए तथा हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करना चाहिए। असुर बाह्य तथा आन्तरिक शुचिता के इन समस्त नियमों को न पसन्द करते हैं, न उनका पालन करते हैं।

जहाँ तक आचरण का सम्बन्ध है, मानव-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले अनेक नियम तथा विधान हैं, जैसे मनु-संहिता, जो मानव-जाति का विधान है। आज तक भी जो हिन्दू हैं, वे मनु-संहिता का अनुसरण करते हैं। उत्तराधिकार के नियम तथा अन्य वैधानिक व्यवस्थाएँ इसी ग्रन्थ से व्युत्पन्न हैं। अब, मनु-संहिता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्त्री को स्वतन्त्रता नहीं दी जानी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्रियों को दासियों के रूप में रखा जाए, अपितु वे बालकों के समान हैं। बालकों को स्वतन्त्रता नहीं दी जाती, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें दास के रूप में रखा जाता है। असुरों ने अब ऐसे विधानों की उपेक्षा कर दी है, और वे सोचते हैं कि स्त्रियों को पुरुषों के समान ही स्वतन्त्रता दी जानी चाहिए। तथापि, इससे संसार की सामाजिक दशा में सुधार नहीं हुआ है। वस्तुतः स्त्री को जीवन की प्रत्येक अवस्था में संरक्षण दिया जाना चाहिए। उसे बाल्यकाल में पिता द्वारा, यौवन में पति द्वारा तथा वृद्धावस्था में वयस्क पुत्रों द्वारा संरक्षण दिया जाना चाहिए। मनु-संहिता के अनुसार यही उचित सामाजिक आचरण है। किन्तु आधुनिक शिक्षा ने स्त्री-जीवन की एक कृत्रिम, दर्पयुक्त धारणा गढ़ ली है, और इसीलिए विवाह अब मानव-समाज में व्यावहारिक रूप से एक कल्पना मात्र है। और न ही अब स्त्री की नैतिक दशा अत्यन्त उत्तम है। अतएव असुर कोई ऐसी शिक्षा स्वीकार नहीं करते जो समाज के लिए हितकर हो, और चूँकि वे महान् ऋषियों के अनुभव तथा ऋषियों द्वारा निर्धारित नियमों एवं विधानों का पालन नहीं करते, अतः आसुरी जनों की सामाजिक दशा अत्यन्त दुःखमय है।

Bg 16.8

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥

असत्यम्—असत्य; अप्रतिष्ठम्—आधारहीन; ते—वे; जगत्—विश्व-प्रकटीकरण; आहुः—कहा जाता है; अनीश्वरम्—बिना किसी नियन्ता के; अपरस्पर—परस्पर काम से; सम्भूतम्—उत्पन्न; किम् अन्यत्—अन्य कोई कारण नहीं; काम-हैतुकम्—यह केवल काम के कारण है।

वे कहते हैं कि यह संसार असत्य है, इसका कोई आधार नहीं है और इसका कोई नियन्ता ईश्वर नहीं है। यह काम-वासना से उत्पन्न हुआ है, और काम के अतिरिक्त इसका कोई कारण नहीं है।

आसुरी जन यह निष्कर्ष निकालते हैं कि संसार माया-जाल है। न कोई कारण है, न कार्य, न नियन्ता, न प्रयोजन—सब कुछ असत्य है। वे कहते हैं कि यह विश्व-प्रकटीकरण आकस्मिक भौतिक क्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं के कारण उत्पन्न होता है। वे यह नहीं सोचते कि संसार किसी निश्चित प्रयोजन हेतु ईश्वर द्वारा सृजित किया गया था। उनका अपना सिद्धान्त है—कि संसार अपने ही ढंग से अस्तित्व में आया है और यह मानने का कोई कारण नहीं कि इसके पीछे कोई ईश्वर है। उनके लिए आत्मा तथा पदार्थ में कोई अन्तर नहीं है, और वे परमात्मा को स्वीकार नहीं करते। सब कुछ केवल पदार्थ है, और समूचा ब्रह्माण्ड अज्ञान का पुंज माना जाता है। उनके अनुसार सब कुछ शून्य है, और जो भी प्रकटीकरण विद्यमान है, वह हमारी प्रत्यक्ष-बोध की अज्ञानता के कारण है। वे यह मान लेते हैं कि विविधता का समस्त प्रकटीकरण अज्ञान का प्रदर्शन है। जिस प्रकार स्वप्न में हम अनेक वस्तुएँ सृजित कर लेते हैं, जिनका वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार जब हम जागृत होंगे तब देखेंगे कि सब कुछ मात्र एक स्वप्न है। किन्तु तथ्यतः, यद्यपि असुर कहते हैं कि जीवन एक स्वप्न है, फिर भी वे इस स्वप्न का भोग करने में अत्यन्त निपुण हैं। और इस प्रकार, ज्ञान अर्जित करने के स्थान पर वे अपने स्वप्नलोक में अधिकाधिक उलझ जाते हैं। वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जैसे बालक मात्र स्त्री-पुरुष के बीच यौन-संसर्ग का परिणाम है, वैसे ही यह संसार बिना किसी आत्मा के जन्मा है। उनके लिए यह केवल पदार्थ का संयोग है जिसने जीवों को उत्पन्न किया है, और आत्मा के अस्तित्व का कोई प्रश्न नहीं है। जैसे अनेक जीव पसीने से तथा मृत शरीर से बिना किसी कारण के निकल आते हैं, वैसे ही समूचा सजीव जगत् विश्व-प्रकटीकरण के भौतिक संयोगों से निकल आया है। अतः भौतिक प्रकृति ही इस प्रकटीकरण का कारण है, और अन्य कोई कारण नहीं है। वे भगवद्गीता में श्रीकृष्ण के शब्दों में विश्वास नहीं करते—मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स-चराचरम्। “मेरे निर्देशन में समूचा भौतिक जगत् गतिशील है।” दूसरे शब्दों में, असुरों में इस संसार की सृष्टि का कोई पूर्ण ज्ञान नहीं है; उनमें से प्रत्येक का अपना कोई विशिष्ट सिद्धान्त है। उनके अनुसार शास्त्रों की एक व्याख्या दूसरी के समान ही अच्छी है, क्योंकि वे शास्त्रीय विधानों की किसी मानक समझ में विश्वास नहीं करते।

Bg 16.9

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥

एताम्—इस; दृष्टिम्—दृष्टि को; अवष्टभ्य—स्वीकार करके; नष्ट—खोया हुआ; आत्मानः—आत्मा; अल्प-बुद्धयः—अल्पबुद्धि; प्रभवन्ति—फलते-फूलते हैं; उग्र-कर्माणः—कष्टप्रद कर्मों में; क्षयाय—विनाश के लिए; जगतः—संसार के; अहिताः—अहितकर।

ऐसे निष्कर्षों का अनुसरण करते हुए, आसुरी जन, जो स्वयं को खो चुके हैं और जिनमें कोई बुद्धि नहीं है, अहितकर तथा भयंकर कर्मों में संलग्न होते हैं, जो संसार के विनाश हेतु अभिप्रेत हैं।

आसुरी जन ऐसे कर्मों में संलग्न हैं जो संसार को विनाश की ओर ले जाएँगे। भगवान् यहाँ कहते हैं कि वे अल्पबुद्धि हैं। भौतिकतावादी, जिनकी ईश्वर के विषय में कोई धारणा नहीं है, सोचते हैं कि वे प्रगति कर रहे हैं। किन्तु भगवद्गीता के अनुसार वे अबुद्धिमान् तथा समस्त विवेक से रहित हैं। वे इस भौतिक जगत् का अधिकतम सीमा तक भोग करने का प्रयत्न करते हैं और अतएव सदा इन्द्रियतृप्ति हेतु कुछ-न-कुछ आविष्कार करने में संलग्न रहते हैं। ऐसे भौतिकतावादी आविष्कार मानव-सभ्यता की उन्नति माने जाते हैं, किन्तु परिणाम यह होता है कि लोग अधिकाधिक हिंसक तथा अधिकाधिक क्रूर होते जाते हैं—पशुओं के प्रति क्रूर तथा अन्य मनुष्यों के प्रति क्रूर। उन्हें यह कोई बोध नहीं कि एक-दूसरे के प्रति कैसा व्यवहार किया जाए। आसुरी जनों में पशु-वध अत्यन्त प्रमुख है। ऐसे लोग संसार के शत्रु माने जाते हैं, क्योंकि अन्ततः वे ऐसी कोई वस्तु आविष्कृत अथवा सृजित करेंगे जो सबके लिए विनाश लाएगी। अप्रत्यक्ष रूप से यह श्लोक नाभिकीय अस्त्रों के आविष्कार की पूर्व-सूचना देता है, जिन पर आज समूचा संसार अत्यन्त गर्वित है। किसी भी क्षण युद्ध हो सकता है, और ये परमाणु अस्त्र महाविनाश रच सकते हैं। ऐसी वस्तुएँ केवल संसार के विनाश हेतु सृजित की जाती हैं, और यही यहाँ इंगित है। ईश्वर-विमुखता के कारण ही ऐसे अस्त्र मानव-समाज में आविष्कृत किए जाते हैं; वे संसार की शान्ति तथा समृद्धि के लिए अभिप्रेत नहीं हैं।