अध्याय 18
Bg 18.1
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; संन्यासस्य—संन्यास का; महा-बाहो—हे महाबाहु; तत्त्वम्—सत्य; इच्छामि—मैं चाहता हूँ; वेदितुम्—जानना; त्यागस्य—त्याग का; च—भी; हृषीकेश—हे इन्द्रियों के स्वामी; पृथक्—पृथक् रूप से; केशी-निषूदन—हे केशी असुर के संहारक।
अर्जुन ने कहा : हे महाबाहु, मैं त्याग [त्याग] तथा संन्यास-आश्रम [संन्यास] का प्रयोजन जानना चाहता हूँ। हे केशी असुर के संहारक, हे हृषीकेश!
वस्तुतः भगवद्गीता सत्रह अध्यायों में समाप्त हो जाती है। अठारहवाँ अध्याय पूर्व में विवेचित विषयों का पूरक सारांश है। भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण इस बात पर बल देते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है। इसी बिन्दु का सारांश अठारहवें अध्याय में ज्ञान के परम गुह्यतम मार्ग के रूप में दिया गया है। प्रथम छह अध्यायों में भक्ति पर बल दिया गया : योगिनाम् अपि सर्वेषाम्… “समस्त योगियों अथवा दिव्यवादियों में जो अपने अन्तर में सदा मेरा ही चिन्तन करता है, वही श्रेष्ठ है।” अगले छह अध्यायों में शुद्ध भक्ति तथा उसके स्वरूप एवं कर्म का विवेचन हुआ। तृतीय छह अध्यायों में ज्ञान, त्याग, भौतिक प्रकृति एवं दिव्य प्रकृति के कर्म तथा भक्ति का वर्णन किया गया। यह निष्कर्ष निकाला गया कि समस्त कर्म परमेश्वर के साथ संयुक्त होकर ही सम्पन्न किए जाने चाहिए, जिसका सार ॐ तत् सत् इन शब्दों में निहित है, जो विष्णु अर्थात् परम पुरुष की ओर संकेत करते हैं। भगवद्गीता के तृतीय भाग में पूर्ववर्ती आचार्यगण के दृष्टान्त तथा ब्रह्म-सूत्र अर्थात् वेदान्त-सूत्र के आधार पर भक्ति को प्रतिष्ठित किया गया, जो यह उद्धृत करता है कि भक्ति ही जीवन का परम प्रयोजन है, अन्य कुछ नहीं। कुछ निर्विशेषवादी स्वयं को वेदान्त-सूत्र के ज्ञान का एकाधिकारी मानते हैं, किन्तु वस्तुतः वेदान्त-सूत्र का अभिप्राय भक्ति को समझाना ही है, क्योंकि भगवान् स्वयं वेदान्त-सूत्र के रचयिता हैं, और वे ही उसके ज्ञाता हैं। इसका वर्णन पन्द्रहवें अध्याय में हुआ है। प्रत्येक शास्त्र में, प्रत्येक वेद में भक्ति ही लक्ष्य है। इसी की व्याख्या भगवद्गीता में की गई है।
जिस प्रकार द्वितीय अध्याय में समस्त विषयवस्तु का संक्षिप्त परिचय दिया गया, उसी प्रकार अठारहवें अध्याय में भी समस्त उपदेशों का सारांश दिया गया है। जीवन का प्रयोजन त्याग तथा प्रकृति के तीन भौतिक गुणों से ऊपर की दिव्य स्थिति की प्राप्ति बताया गया है। अर्जुन भगवद्गीता के दो भिन्न विषयों, अर्थात् त्याग (त्याग) तथा संन्यास-आश्रम (संन्यास) को स्पष्ट करना चाहते हैं। अतः वे इन दोनों शब्दों का अर्थ पूछ रहे हैं।
इस श्लोक में परमेश्वर को सम्बोधित करने हेतु प्रयुक्त दो शब्द—हृषीकेश तथा केशिनिषूदन—सार्थक हैं। हृषीकेश श्रीकृष्ण हैं, समस्त इन्द्रियों के स्वामी, जो हमें मानसिक प्रशान्ति प्राप्त करने में सदा सहायता कर सकते हैं। अर्जुन उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे समस्त विषय को इस प्रकार संक्षेप में बताएँ कि वह समभाव में स्थित रह सके। तथापि उसके मन में कुछ सन्देह हैं, और सन्देहों की तुलना सदा असुरों से की जाती है। इसी कारण वह श्रीकृष्ण को केशिनिषूदन कहकर सम्बोधित करता है। केशी एक अत्यन्त भयंकर असुर था, जिसे भगवान् ने मारा था; अब अर्जुन यह आशा कर रहा है कि श्रीकृष्ण सन्देह रूपी असुर का संहार करेंगे।
Bg 18.10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
न—कभी नहीं; द्वेष्टि—घृणा करता है; अकुशलम्—अमंगलमय; कर्म—कर्म; कुशले—मंगलमय में; न—न ही; अनुषज्जते—आसक्त होता है; त्यागी—त्यागी; सत्त्व—सतोगुण; समाविष्टः—में लीन; मेधावी—बुद्धिमान्; छिन्न—छिन्न; संशयः—समस्त सन्देह।
जो सतोगुण में स्थित हैं, जो न तो अमंगलमय कर्म से घृणा करते हैं और न ही मंगलमय कर्म में आसक्त होते हैं, उन्हें कर्म के विषय में कोई सन्देह नहीं रहता।
भगवद्गीता में कहा गया है कि मनुष्य किसी भी समय कर्म का त्याग नहीं कर सकता। अतः जो श्रीकृष्ण के लिए कर्म करता है और सकाम फलों का भोग नहीं करता, जो सब कुछ श्रीकृष्ण को अर्पित कर देता है, वही वस्तुतः त्यागी है। अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के अनेक सदस्य अपने कार्यालय में अथवा कारखाने में अथवा किसी अन्य स्थान पर अत्यन्त परिश्रम करते हैं, और जो कुछ वे कमाते हैं, संघ को दे देते हैं। ऐसी अत्यन्त उन्नत आत्माएँ वस्तुतः संन्यासी हैं और संन्यास-आश्रम में स्थित हैं। यहाँ स्पष्ट रूप से रूपरेखा दी गई है कि कर्म के फलों का त्याग कैसे किया जाए और किस प्रयोजन हेतु फलों का त्याग किया जाना चाहिए।
Bg 18.11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
न—कभी नहीं; हि—निश्चय ही; देह-भृता—देहधारी के लिए; शक्यम्—सम्भव; त्यक्तुम्—त्यागना; कर्माणि—कर्मों का; अशेषतः—पूर्णतया; यः तु—जो कोई; कर्म—कर्म; फल—फल; त्यागी—त्यागी; सः—वह; त्यागी—त्यागी; इति—इस प्रकार; अभिधीयते—कहा जाता है।
किसी देहधारी प्राणी के लिए समस्त कर्मों का त्याग करना वस्तुतः असम्भव है। अतः कहा जाता है कि जो कर्म के फलों का त्याग करता है, वही सच्चा त्यागी है।
कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति, जो श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध के ज्ञान में कर्म करता है, सदा मुक्त रहता है। अतः उसे मृत्यु के पश्चात् अपने कर्मों के फलों का भोग अथवा कष्ट नहीं भोगना पड़ता।
Bg 18.12
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥
अनिष्टम्—नरक की ओर ले जाने वाला; इष्टम्—स्वर्ग की ओर ले जाने वाला; मिश्रम् च—अथवा मिश्रित; त्रि-विधम्—तीन प्रकार का; कर्मणः—कर्म का; फलम्—फल; भवति—होता है; अत्यागिनाम्—अत्यागियों को; प्रेत्य—मृत्यु के पश्चात्; न तु—किन्तु नहीं; संन्यासिनाम्—संन्यास-आश्रम वालों को; क्वचित्—किसी भी समय।
जो त्यागी नहीं है, उसे मृत्यु के पश्चात् कर्म के त्रिविध फल—इष्ट, अनिष्ट तथा मिश्रित—प्राप्त होते हैं। किन्तु जो संन्यास-आश्रम में स्थित हैं, उन्हें भोगने अथवा कष्ट सहने हेतु ऐसे कोई फल नहीं होते।
कृष्णभावनामृत में अथवा सतोगुण में स्थित व्यक्ति किसी से अथवा किसी ऐसी वस्तु से घृणा नहीं करता जो उसके शरीर को कष्ट देती है। वह उचित स्थान पर तथा उचित समय पर अपने कर्तव्य के कष्टप्रद प्रभावों से भयभीत हुए बिना कर्म करता है। दिव्यता में स्थित ऐसे व्यक्ति को अत्यन्त बुद्धिमान् तथा अपने कर्मों में समस्त सन्देहों से परे समझना चाहिए।
Bg 18.13-14
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १४ ॥
पञ्च—पाँच; एतानि—ये सब; महा-बाहो—हे महाबाहु; कारणानि—कारण; निबोध—भली-भाँति समझो; मे—मुझसे; सांख्ये—वेदों में; कृतान्ते—कर्म के पश्चात्; प्रोक्तानि—कहे गए; सिद्धये—सिद्धि हेतु; सर्व—समस्त; कर्मणाम्—कर्मों के; अधिष्ठानम्—स्थान; तथा—भी; कर्ता—कर्ता; करणम् च—तथा करण; पृथक्-विधम्—विभिन्न प्रकार के; विविधाः च—नाना प्रकार के; पृथक्—पृथक्-पृथक्; चेष्टाः—प्रयत्न; दैवम्—परमेश्वर; च—भी; एव—निश्चय ही; अत्र—यहाँ; पञ्चमम्—पाँचवाँ।
हे महाबाहु अर्जुन, मुझसे उन पाँच कारकों के विषय में जानो जो समस्त कर्म की सिद्धि करते हैं। सांख्य-दर्शन में इन्हें कर्म का स्थान, कर्ता, इन्द्रियाँ, प्रयत्न तथा अन्ततः परमात्मा घोषित किया गया है।
यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि जब किसी भी सम्पन्न कर्म की कोई-न-कोई प्रतिक्रिया अवश्य होती है, तो कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति कर्म की प्रतिक्रियाओं का कष्ट अथवा भोग कैसे नहीं भोगता? यह कैसे सम्भव है, यह दर्शाने हेतु भगवान् वेदान्त-दर्शन को उद्धृत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि समस्त कर्मों के तथा प्रत्येक कर्म में सफलता के पाँच कारण होते हैं, और मनुष्य को इन पाँच कारणों को जानना चाहिए। सांख्य का अर्थ है ज्ञान का स्कन्ध, और वेदान्त समस्त प्रमुख आचार्यगण द्वारा स्वीकृत ज्ञान का अन्तिम स्कन्ध है। शंकर भी वेदान्त-सूत्र को इसी रूप में स्वीकार करते हैं। अतएव ऐसे प्रमाण से परामर्श करना चाहिए।
जैसा कि गीता में कहा गया है, “सर्वस्य चाहं हृदि,” परम संकल्प परमात्मा में निहित है। वे ही सबको कुछ निश्चित कर्मों में प्रवृत्त करते हैं। उनके भीतर से प्राप्त निर्देशन के अधीन किए गए कर्म कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करते, न तो इस जीवन में और न मृत्यु के पश्चात् के जीवन में।
कर्म के करण इन्द्रियाँ हैं, और इन्द्रियों के माध्यम से आत्मा विविध प्रकार से कर्म करती है, तथा प्रत्येक कर्म हेतु एक भिन्न प्रयत्न होता है। किन्तु मनुष्य के समस्त कर्म परमात्मा की इच्छा पर निर्भर करते हैं, जो हृदय के भीतर मित्र रूप में विराजमान हैं। परमेश्वर परम कारण हैं। ऐसी परिस्थितियों में, जो हृदय के भीतर स्थित परमात्मा के निर्देशन में कृष्णभावनामृत में कर्म कर रहा है, वह स्वाभाविक रूप से किसी कर्म से बँधता नहीं। जो पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, वे अन्ततः अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं होते। सब कुछ परम संकल्प, परमात्मा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् पर निर्भर है।
Bg 18.15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
शरीर—शरीर; वाक्—वाणी; मनोभिः—मन के द्वारा; यत्—जो कुछ; कर्म—कर्म; प्रारभते—आरम्भ करता है; नरः—मनुष्य; न्याय्यम्—उचित; वा—अथवा; विपरीतम्—विपरीत; वा—अथवा; पञ्च—पाँच; एते—ये सब; तस्य—उसके; हेतवः—कारण।
मनुष्य शरीर, मन अथवा वाणी से जो भी उचित या अनुचित कर्म करता है, वह इन्हीं पाँच कारकों से उत्पन्न होता है।
इस श्लोक में “उचित” तथा “अनुचित” शब्द अत्यन्त सार्थक हैं। उचित कर्म वह कर्म है जो शास्त्रों में निर्धारित निर्देशों के अनुसार किया जाता है, और अनुचित कर्म वह कर्म है जो शास्त्रीय विधानों के सिद्धान्तों के विरुद्ध किया जाता है। किन्तु जो भी किया जाता है, उसके पूर्ण सम्पादन हेतु इन पाँच कारकों की आवश्यकता होती है।
Bg 18.16
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
तत्र—वहाँ; एवम्—निश्चय ही; सति—होने पर; कर्तारम्—कर्ता; आत्मानम्—आत्मा को; केवलम्—केवल; तु—किन्तु; यः—जो कोई; पश्यति—देखता है; अकृत-बुद्धित्वात्—अल्पबुद्धि के कारण; न—कभी नहीं; सः—वह; पश्यति—देखता है; दुर्मतिः—मूर्ख।
अतः जो इन पाँच कारकों पर विचार न करके स्वयं को ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह निश्चय ही अधिक बुद्धिमान् नहीं है और वस्तुओं को जैसी वे हैं, वैसा नहीं देख सकता।
मूर्ख व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि परमात्मा मित्र रूप में भीतर विराजमान हैं और उसके कर्मों का संचालन कर रहे हैं। यद्यपि भौतिक कारण स्थान, कर्ता, प्रयत्न तथा इन्द्रियाँ हैं, किन्तु अन्तिम कारण परमेश्वर, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। अतएव मनुष्य को केवल चार भौतिक कारणों को ही नहीं, अपितु परम निमित्त कारण को भी देखना चाहिए। जो परमेश्वर को नहीं देखता, वह स्वयं को ही करण मान बैठता है।
Bg 18.17
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥
यस्य—जिसका; न—कभी नहीं; अहङ्कृतः—मिथ्या अहंकार; भावः—स्वभाव; बुद्धिः—बुद्धि; यस्य—जिसकी; न—कभी नहीं; लिप्यते—आसक्त होती है; हत्वा अपि—मारकर भी; सः—वह; इमान्—इस; लोकान्—संसार को; न—कभी नहीं; हन्ति—मारता है; न—कभी नहीं; निबध्यते—बँधता है।
जो मिथ्या अहंकार से प्रेरित नहीं है, जिसकी बुद्धि आसक्त नहीं होती, वह इस संसार में मनुष्यों का वध करके भी न तो वधकर्ता है और न ही अपने कर्मों से बँधता है।
इस श्लोक में भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि न लड़ने की इच्छा मिथ्या अहंकार से उत्पन्न होती है। अर्जुन स्वयं को कर्म का कर्ता मान रहा था, किन्तु उसने भीतर तथा बाहर की परम अनुमति पर विचार नहीं किया। यदि कोई यह नहीं जानता कि एक परम अनुमति विद्यमान है, तो वह कर्म ही क्यों करे? किन्तु जो कर्म के करण को, कर्ता रूप में स्वयं को, तथा परमेश्वर को परम अनुमति-दाता के रूप में जानता है, वह प्रत्येक कार्य करने में पूर्ण है। ऐसा व्यक्ति कभी मोह में नहीं रहता। वैयक्तिक कर्म तथा उत्तरदायित्व मिथ्या अहंकार एवं ईश्वर-विमुखता, अर्थात् कृष्णभावनामृत के अभाव से उत्पन्न होते हैं। जो कोई परमात्मा अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के निर्देशन में कृष्णभावनामृत में कर्म कर रहा है, वह वध करते हुए भी वध नहीं करता। न ही वह कभी ऐसे वध की प्रतिक्रिया से प्रभावित होता है। जब कोई सैनिक किसी उच्चाधिकारी के आदेश पर वध करता है, तो वह दण्ड का पात्र नहीं होता। किन्तु यदि कोई सैनिक अपने वैयक्तिक हेतु से वध करता है, तो वह निश्चय ही न्यायालय द्वारा दण्ड का पात्र होता है।
Bg 18.18
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥
ज्ञानम्—ज्ञान; ज्ञेयम्—ज्ञेय (ज्ञान का विषय); परिज्ञाता—ज्ञाता; त्रि-विधा—तीन प्रकार की; कर्म—कर्म; चोदना—प्रेरणा; करणम्—इन्द्रियाँ; कर्म—कर्म; कर्ता—कर्ता; इति—इस प्रकार; त्रि-विधः—तीन प्रकार का; कर्म—कर्म; संग्रहः—संचय।
ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता—ये तीन कारक कर्म को प्रेरित करते हैं; इन्द्रियाँ, कर्म तथा कर्ता—ये कर्म के त्रिविध आधार हैं।
दैनिक कर्म की तीन प्रकार की प्रेरणाएँ हैं—ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता। कर्म के साधन, कर्म स्वयं तथा कर्ता—ये कर्म के घटक कहलाते हैं। किसी भी मनुष्य द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म इन्हीं तत्त्वों से युक्त होता है। कर्म करने से पूर्व कोई न कोई प्रेरणा रहती है, जिसे अन्तःस्फुरणा कहते हैं। कर्म के मूर्त रूप में आने से पूर्व जो भी समाधान प्राप्त होता है, वह कर्म का सूक्ष्म रूप है। तत्पश्चात् कर्म क्रिया का रूप धारण कर लेता है। पहले मनुष्य को चिन्तन, अनुभूति तथा संकल्प की मानसिक प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है, और वही प्रेरणा कहलाती है। वस्तुतः कर्म करने की जो श्रद्धा है, वही ज्ञान है। कर्म की प्रेरणा चाहे शास्त्र से प्राप्त हो अथवा आध्यात्मिक गुरु के उपदेश से, वह एक ही है। जब प्रेरणा विद्यमान हो और कर्ता भी विद्यमान हो, तब इन्द्रियों की सहायता से वास्तविक क्रिया घटित होती है। मन समस्त इन्द्रियों का केन्द्र है, और विषय कर्म स्वयं है। ये कर्म के विभिन्न चरण हैं, जैसा कि भगवद्गीता में वर्णित है। समस्त क्रियाओं का योग कर्म का संचय कहलाता है।
Bg 18.19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥
ज्ञानम्—ज्ञान; कर्म—कर्म; च—भी; कर्ता—कर्ता; च—भी; त्रिधा—तीन प्रकार के; एव—निश्चय ही; गुण-भेदतः—प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार; प्रोच्यते—कहे जाते हैं; गुण-संख्याने—विभिन्न गुणों के अनुसार; यथावत्—जैसे वे कार्य करते हैं; शृणु—सुनो; तानि—उन सबको; अपि—भी।
प्रकृति के तीन गुणों के अनुरूप तीन प्रकार के ज्ञान, कर्म तथा कर्ता होते हैं। अब मैं उनका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो।
चौदहवें अध्याय में प्रकृति के गुणों के तीन विभागों का विस्तार से वर्णन किया गया था। उस अध्याय में कहा गया था कि सत्त्वगुण प्रकाशमान है, रजोगुण भौतिकतावादी है, और तमोगुण आलस्य तथा प्रमाद को बढ़ाने वाला है। प्रकृति के समस्त गुण बन्धनकारी हैं; वे मुक्ति के स्रोत नहीं हैं। सत्त्वगुण में स्थित होने पर भी मनुष्य बद्ध ही रहता है। सत्रहवें अध्याय में प्रकृति के विभिन्न गुणों में स्थित विभिन्न प्रकार के मनुष्यों द्वारा की जाने वाली विविध प्रकार की पूजा का वर्णन किया गया था। इस श्लोक में भगवान् तीनों भौतिक गुणों के अनुसार विभिन्न प्रकार के ज्ञान, कर्ता तथा कर्म स्वयं के विषय में कहना चाहते हैं।
Bg 18.2
श्रीभगवानुवाच ।
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; काम्यानाम्—कामना सहित; कर्मणाम्—कर्मों का; न्यासम्—त्याग; संन्यासम्—संन्यास-आश्रम; कवयः—विद्वज्जन; विदुः—जानते हैं; सर्व—समस्त; कर्म—कर्मों के; फल—फलों का; त्यागम्—त्याग; प्राहुः—कहते हैं; त्यागम्—त्याग; विचक्षणाः—अनुभवी जन।
श्रीभगवान् ने कहा : समस्त कर्मों के फलों का परित्याग ही विद्वानों द्वारा त्याग [त्याग] कहलाता है। और उसी अवस्था को महान् विद्वज्जन संन्यास-आश्रम [संन्यास] कहते हैं।
फल की कामना से किए जाने वाले कर्मों का त्याग कर देना चाहिए। यही भगवद्गीता का उपदेश है। किन्तु उन्नत आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ले जाने वाले कर्मों का त्याग नहीं किया जाना चाहिए। इसे अगले श्लोक में स्पष्ट किया जाएगा। वैदिक साहित्य में किसी विशिष्ट प्रयोजन हेतु यज्ञ करने की अनेक विधियाँ निर्धारित हैं। उत्तम पुत्र प्राप्त करने अथवा उच्चतर लोकों में उन्नति प्राप्त करने के लिए कुछ यज्ञ करने योग्य होते हैं, किन्तु कामनाओं से प्रेरित यज्ञ बन्द कर दिए जाने चाहिए। तथापि हृदय की शुद्धि अथवा आध्यात्मिक विज्ञान में उन्नति हेतु किए जाने वाले यज्ञ का त्याग नहीं किया जाना चाहिए।
Bg 18.20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥
सर्व-भूतेषु—समस्त जीवों में; येन—जिसके द्वारा; एकम्—एक; भावम्—स्थिति; अव्ययम्—अविनाशी; ईक्षते—देखता है; अविभक्तम्—अविभाजित; विभक्तेषु—असंख्य विभाजितों में; तत्—वह; ज्ञानम्—ज्ञान; विद्धि—जानो; सात्त्विकम्—सत्त्वगुणी।
जिस ज्ञान से मनुष्य समस्त अस्तित्वों में एक अविभाजित आध्यात्मिक प्रकृति को देखता है—विभाजितों में अविभाजित—उसे सत्त्वगुणी ज्ञान जानो।
जो व्यक्ति प्रत्येक जीव में—चाहे वह देवता हो, मनुष्य, पशु, पक्षी, हिंस्र जन्तु, जलचर अथवा वनस्पति हो—एक ही आत्मा को देखता है, वह सत्त्वगुणी ज्ञान से युक्त होता है। समस्त जीवों में एक ही आत्मा विद्यमान है, यद्यपि उनके पूर्व कर्मों के अनुसार उनके शरीर भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसा कि सातवें अध्याय में वर्णित है, प्रत्येक शरीर में जीवन-शक्ति का प्रकटीकरण परमेश्वर की परा प्रकृति के कारण होता है। अतः उस एक परा प्रकृति को, उस जीवन-शक्ति को, प्रत्येक शरीर में देखना ही सत्त्वगुण में देखना है। यद्यपि शरीर नश्वर हैं, वह जीवन-ऊर्जा अविनाशी है। यह भेद शरीर के आधार पर अनुभव होता है, क्योंकि बद्ध जीवन में भौतिक अस्तित्व के अनेक रूप हैं; इसी कारण वे विभाजित प्रतीत होते हैं। ऐसा निर्विशेष ज्ञान अन्ततः आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
Bg 18.21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥
पृथक्त्वेन—विभाजन के कारण; तु—किन्तु; यत् ज्ञानम्—जो ज्ञान; नाना-भावान्—अनेकविध स्थितियों को; पृथक्-विधान्—भिन्न-भिन्न रूप से; वेत्ति—जो जानता है; सर्वेषु—समस्त; भूतेषु—जीवों में; तत् ज्ञानम्—वह ज्ञान; विद्धि—जानना चाहिए; राजसम्—रजोगुणी।
जिस ज्ञान से भिन्न-भिन्न प्रकार का जीव भिन्न-भिन्न शरीरों में निवास करता हुआ देखा जाता है, उसे रजोगुणी ज्ञान जानो।
यह धारणा कि भौतिक शरीर ही जीव है और शरीर के विनाश के साथ ही चेतना भी नष्ट हो जाती है—रजोगुणी ज्ञान कहलाती है। उस ज्ञान के अनुसार विभिन्न प्रकार की चेतना के विकास के कारण शरीर एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, अन्यथा चेतना को प्रकट करने वाली कोई पृथक् आत्मा नहीं है। शरीर ही आत्मा है, और इस शरीर से परे कोई पृथक् आत्मा नहीं है। ऐसे ज्ञान के अनुसार चेतना क्षणिक है। अथवा कोई व्यष्टि-आत्माएँ नहीं हैं, अपितु एक सर्वव्यापी आत्मा है, जो ज्ञान से परिपूर्ण है, और यह शरीर क्षणिक अज्ञान का प्रकटीकरण है। अथवा इस शरीर से परे कोई विशेष व्यष्टि अथवा परमात्मा नहीं है। ऐसी समस्त धारणाएँ रजोगुण की उपज मानी जाती हैं।
Bg 18.22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
यत्—जो; तु—किन्तु; कृत्स्नवत्—सर्वस्व रूप में; एकस्मिन्—एक में; कार्ये—कर्म में; सक्तम्—आसक्त; अहैतुकम्—बिना किसी कारण के; अतत्त्व-अर्थवत्—यथार्थता से रहित; अल्पम् च—तथा अत्यन्त अल्प; तत्—वह; तामसम्—तमोगुण में; उदाहृतम्—कहा जाता है।
और जिस ज्ञान से मनुष्य एक प्रकार के कर्म में सर्वस्व समझकर आसक्त रहता है, जो सत्य के ज्ञान से रहित है, तथा जो अत्यन्त अल्प है, उसे तमोगुणी कहा जाता है।
सामान्य मनुष्य का “ज्ञान” सदा तमोगुण अथवा अज्ञान में रहता है, क्योंकि बद्ध जीवन में प्रत्येक जीव तमोगुण में ही जन्म लेता है। जो मनुष्य अधिकारियों अथवा शास्त्रीय आदेशों के माध्यम से ज्ञान विकसित नहीं करता, उसका ज्ञान शरीर तक ही सीमित रहता है। उसे शास्त्र के निर्देशों के अनुसार कर्म करने की चिन्ता नहीं होती। उसके लिए धन ही ईश्वर है, और ज्ञान का अर्थ है शारीरिक माँगों की पूर्ति। ऐसे ज्ञान का परम सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता। यह कमोबेश साधारण पशुओं के ज्ञान के समान है—खाने, सोने, रक्षा करने तथा मैथुन करने का ज्ञान। ऐसे ज्ञान को यहाँ तमोगुण की उपज बताया गया है। दूसरे शब्दों में, इस शरीर से परे आत्मा सम्बन्धी ज्ञान सत्त्वगुणी ज्ञान कहलाता है, सांसारिक तर्क तथा मनोधर्म के बल पर अनेक सिद्धान्तों एवं मतों को उत्पन्न करने वाला ज्ञान रजोगुण की उपज है, और केवल शरीर को सुखी रखने से सम्बन्धित ज्ञान तमोगुणी कहा जाता है।
Bg 18.23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
नियतम्—नियमित; संग-रहितम्—आसक्ति रहित; अराग-द्वेषतः—राग अथवा द्वेष के बिना; कृतम्—किया गया; अफल-प्रेप्सुना—फल की कामना के बिना; कर्म—कर्म; यत्—जो; तत्—वह; सात्त्विकम्—सत्त्वगुण में; उच्यते—कहलाता है।
जहाँ तक कर्मों का सम्बन्ध है, जो कर्तव्य के अनुरूप कर्म आसक्ति रहित होकर, राग अथवा द्वेष के बिना, फल का त्याग करने वाले मनुष्य द्वारा किया जाता है, वह सत्त्वगुणी कर्म कहलाता है।
समाज के विभिन्न आश्रमों तथा विभागों के अनुसार शास्त्रों में विहित नियमित वृत्तिपरक कर्तव्य, जो आसक्ति अथवा स्वामित्व-भाव के बिना और इसी कारण किसी राग अथवा द्वेष के बिना, तथा आत्म-तुष्टि अथवा आत्म-भोग के बिना परमेश्वर की प्रसन्नता हेतु कृष्णभावनामृत में सम्पन्न किए जाते हैं, सत्त्वगुणी कर्म कहलाते हैं।
Bg 18.24
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
यत्—जो; तु—किन्तु; काम-ईप्सुना—फल की कामना से; कर्म—कर्म; साहंकारेण—अहंकार सहित; वा—अथवा; पुनः—फिर; क्रियते—किया जाता है; बहुल-आयासम्—महान् परिश्रम सहित; तत्—वह; राजसम्—रजोगुण में; उदाहृतम्—कहा जाता है।
किन्तु अपनी इच्छाओं की तृप्ति चाहने वाले मनुष्य द्वारा महान् प्रयत्न से किया गया, तथा मिथ्या अहंकार के भाव से किया गया कर्म रजोगुणी कर्म कहलाता है।
Bg 18.25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥
अनुबन्धम्—भावी बन्धन; क्षयम्—विनाश; हिंसाम्—हिंसा; अनपेक्ष्य—परिणामों पर विचार किए बिना; च—भी; पौरुषम्—दूसरों को कष्ट देने वाला; मोहात्—मोह के कारण; आरभ्यते—आरम्भ किया जाता है; कर्म—कर्म; यत्—जो; तत्—वह; तामसम्—तमोगुण में; उच्यते—कहा जाता है।
और जो कर्म अज्ञान तथा मोह में, भावी बन्धन अथवा परिणामों पर विचार किए बिना किया जाता है, जो हिंसा करता है और जो अव्यावहारिक है, उसे तमोगुणी कर्म कहा जाता है।
मनुष्य को अपने कर्मों का लेखा-जोखा राज्य के समक्ष अथवा परमेश्वर के यमदूत नामक प्रतिनिधियों के समक्ष देना होता है। उत्तरदायित्व रहित कर्म विक्षेप है, क्योंकि यह शास्त्रीय आदेश के नियामक सिद्धान्तों का विनाश करता है। यह प्रायः हिंसा पर आधारित होता है और अन्य जीवों को कष्ट देने वाला होता है। ऐसा उत्तरदायित्व रहित कर्म अपने व्यक्तिगत अनुभव के आलोक में किया जाता है। यही मोह कहलाता है। और ऐसा समस्त मोहयुक्त कर्म तमोगुण की उपज है।
Bg 18.26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥
मुक्त-संगः—समस्त भौतिक संग से मुक्त; अनहम्-वादी—मिथ्या अहंकार के बिना; धृति-उत्साह—महान् उत्साह सहित; समन्वितः—उस रूप में युक्त; सिद्धि—सिद्धि; असिद्ध्योः—असिद्धि; निर्विकारः—बिना परिवर्तन के; कर्ता—कर्ता; सात्त्विकः—सत्त्वगुण में; उच्यते—कहा जाता है।
जो कर्ता समस्त भौतिक आसक्तियों तथा मिथ्या अहंकार से मुक्त है, जो उत्साही एवं दृढ़संकल्प है, तथा जो सफलता अथवा असफलता के प्रति उदासीन है, वह सत्त्वगुणी कर्ता है।
कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति सदा प्रकृति के भौतिक गुणों से परे रहता है। अपने को सौंपे गए कर्म के फल की उसे कोई अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि वह मिथ्या अहंकार तथा दर्प से ऊपर है। फिर भी, ऐसे कर्म की पूर्ति तक वह सदा उत्साही रहता है। जो कष्ट उसने उठाया, उसकी वह चिन्ता नहीं करता; वह सदा उत्साही रहता है। उसे सफलता अथवा असफलता की परवाह नहीं होती; वह दुःख अथवा सुख दोनों में समान रहता है। ऐसा कर्ता सत्त्वगुण में स्थित होता है।
Bg 18.27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
रागी—अत्यन्त आसक्त; कर्म-फल—कर्म के फल के प्रति; प्रेप्सुः—इच्छा करने वाला; लुब्धः—लोभी; हिंसा-आत्मकः—तथा सदा ईर्ष्यालु; अशुचिः—अपवित्र; हर्ष-शोक-अन्वितः—हर्ष तथा शोक से ग्रस्त; कर्ता—ऐसा कर्ता; राजसः—रजोगुण में; परिकीर्तितः—घोषित किया जाता है।
किन्तु जो कर्ता अपने श्रम के फलों के प्रति आसक्त है और उनका भोग करने की प्रबल कामना रखता है, जो लोभी, ईर्ष्यालु तथा अपवित्र है और सुख-दुःख से विचलित होता है, वह रजोगुणी कर्ता है।
कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रकार के कर्म अथवा उसके फल के प्रति अत्यधिक आसक्त होता है, क्योंकि उसकी भौतिकता अथवा गृह तथा घर, पत्नी एवं सन्तान के प्रति अति आसक्ति होती है। ऐसे व्यक्ति को जीवन के उच्चतर उत्थान की कोई इच्छा नहीं होती। वह केवल इस संसार को यथासम्भव भौतिक दृष्टि से सुखमय बनाने में लगा रहता है। वह सामान्यतः अत्यन्त लोभी होता है, और सोचता है कि उसके द्वारा प्राप्त की गई प्रत्येक वस्तु स्थायी है और कभी नष्ट नहीं होगी। ऐसा व्यक्ति दूसरों से ईर्ष्या करता है और इन्द्रियतृप्ति हेतु कोई भी अनुचित कार्य करने को तत्पर रहता है। अतः ऐसा व्यक्ति अपवित्र होता है, और उसे इसकी परवाह नहीं होती कि उसकी कमाई पवित्र है अथवा अपवित्र। यदि उसका कर्म सफल हो तो वह अत्यन्त प्रसन्न होता है और यदि उसका कर्म सफल न हो तो अत्यन्त दुःखी होता है। ऐसा ही रजोगुणी मनुष्य होता है।
Bg 18.28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥
अयुक्तः—शास्त्रीय आदेशों के सन्दर्भ के बिना; प्राकृतः—भौतिकतावादी; स्तब्धः—हठी; शठः—कपटी; नैष्कृतिकः—दूसरों का अपमान करने में निपुण; अलसः—आलसी; विषादी—खिन्न; दीर्घ-सूत्री—विलम्ब करने वाला; च—भी; कर्ता—कर्ता; तामसः—तमोगुण में; उच्यते—कहा जाता है।
और जो कर्ता सदा शास्त्र के आदेश के विरुद्ध कर्म में संलग्न रहता है, जो भौतिकतावादी, हठी, छली तथा दूसरों का अपमान करने में निपुण है, जो आलसी, सदा खिन्न तथा विलम्ब करने वाला है, वह तमोगुणी कर्ता है।
शास्त्रीय आदेशों में हमें यह मिलता है कि किस प्रकार का कर्म करना चाहिए और किस प्रकार का कर्म नहीं करना चाहिए। जो लोग उन आदेशों की परवाह नहीं करते, वे न करने योग्य कर्म में संलग्न होते हैं, और ऐसे व्यक्ति सामान्यतः भौतिकतावादी होते हैं। वे शास्त्र के आदेशों के अनुसार नहीं, अपितु प्रकृति के गुणों के अनुसार कर्म करते हैं। ऐसे कर्ता अधिक सौम्य नहीं होते, और सामान्यतः सदा धूर्त तथा दूसरों का अपमान करने में निपुण रहते हैं। वे अत्यन्त आलसी होते हैं; यद्यपि उनका कोई कर्तव्य होता है, वे उसे ठीक से नहीं करते, और उसे बाद में करने के लिए टाल देते हैं। इसी कारण वे खिन्न प्रतीत होते हैं। वे विलम्ब करते हैं; जो कार्य एक घण्टे में किया जा सकता है, उसे वे वर्षों तक खींचते रहते हैं। ऐसे कर्ता तमोगुण में स्थित होते हैं।
Bg 18.29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ २९ ॥
बुद्धेः—बुद्धि के; भेदम्—भेद; धृतेः—धृति के; च—भी; एव—निश्चय ही; गुणतः—प्रकृति के गुणों के अनुसार; त्रि-विधम्—तीन प्रकार के; शृणु—सुनो; प्रोच्यमानम्—मेरे द्वारा वर्णित; अशेषेण—विस्तार से; पृथक्त्वेन—भिन्न-भिन्न रूप से; धनञ्जय—हे धनञ्जय।
हे धनञ्जय, अब सुनो, मैं तुम्हें प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार की बुद्धि तथा धृति का विस्तार से वर्णन करता हूँ।
अब प्रकृति के गुणों के अनुसार ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता को तीन विभिन्न विभागों में समझाने के पश्चात् भगवान् उसी प्रकार कर्ता की बुद्धि तथा धृति का वर्णन कर रहे हैं।
Bg 18.3
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
त्याज्यम्—त्याग देना चाहिए; दोषवत्—दोष के रूप में; इति—इस प्रकार; एके—एक वर्ग; कर्म—कर्म; प्राहुः—कहा; मनीषिणः—महान् विचारकों का; यज्ञ—यज्ञ; दान—दान; तपः—तप; कर्म—कर्म; न—कभी नहीं; त्याज्यम्—त्यागने योग्य है; इति—इस प्रकार; च—निश्चय ही; अपरे—अन्य जन।
कुछ विद्वज्जन घोषित करते हैं कि सभी प्रकार के सकाम कर्मों का त्याग कर देना चाहिए, किन्तु अन्य ऐसे ऋषि भी हैं जो यह मानते हैं कि यज्ञ, दान तथा तप के कर्म कभी त्यागे नहीं जाने चाहिए।
वैदिक साहित्य में अनेक ऐसे कर्म हैं जो विवाद के विषय हैं। उदाहरणार्थ, कहा जाता है कि यज्ञ में पशु का वध किया जा सकता है, तथापि कुछ लोग यह मानते हैं कि पशुवध पूर्णतया निन्दनीय है। यद्यपि वैदिक साहित्य में यज्ञ में पशुवध की अनुशंसा की गई है, किन्तु उस पशु को मरा हुआ नहीं माना जाता। यज्ञ का प्रयोजन उस पशु को नवीन जीवन प्रदान करना है। कभी-कभी यज्ञ में मारे जाने के पश्चात् पशु को नवीन पशु-जीवन प्राप्त होता है, और कभी-कभी उस पशु को तत्काल मनुष्य-योनि में उन्नत कर दिया जाता है। किन्तु ऋषियों में भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ कहते हैं कि पशुवध का सदा परिहार करना चाहिए, और अन्य कहते हैं कि किसी विशिष्ट यज्ञ हेतु वह उचित है। यज्ञ-कर्म विषयक इन समस्त भिन्न मतों को अब भगवान् स्वयं स्पष्ट कर रहे हैं।
Bg 18.30
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
प्रवृत्तिम्—करने योग्य; च—भी; निवृत्तिम्—न करने योग्य; कार्य—कर्म; अकार्ये—प्रतिक्रिया; भय—भय; अभये—अभय; बन्धम्—बन्धन; मोक्षम् च—तथा मुक्ति; या—जो; वेत्ति—जानती है; बुद्धिः—बुद्धि; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; सात्त्विकी—सत्त्वगुण में।
हे पृथापुत्र, जिस बुद्धि से मनुष्य जानता है कि क्या करना चाहिए तथा क्या नहीं करना चाहिए, किससे डरना चाहिए तथा किससे नहीं डरना चाहिए, क्या बन्धनकारी है तथा क्या मुक्तिदायक है, वह बुद्धि सत्त्वगुण में स्थित है।
शास्त्रों के निर्देशों के अनुसार जो कर्म किए जाते हैं, वे प्रवृत्ति अथवा करने योग्य कर्म कहलाते हैं, और जो कर्म इस प्रकार निर्दिष्ट नहीं हैं, वे न करने योग्य हैं। जो मनुष्य शास्त्रीय निर्देशों को नहीं जानता, वह कर्म की क्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं में उलझ जाता है। जो बुद्धि विवेक द्वारा विभेद करती है, वह सत्त्वगुण में स्थित है।
Bg 18.31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
यया—जिसके द्वारा; धर्मम्—धर्म; अधर्मम् च—तथा अधर्म; कार्यम्—कर्म; च—भी; अकार्यम्—न करने योग्य; एव—निश्चय ही; च—भी; अयथावत्—अपूर्ण रूप से; प्रजानाति—जानती है; बुद्धिः—बुद्धि; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; राजसी—रजोगुण में।
और जो बुद्धि धार्मिक जीवन-पद्धति तथा अधार्मिक जीवन-पद्धति में, करने योग्य कर्म तथा न करने योग्य कर्म में भेद नहीं कर पाती, हे पृथापुत्र, वह अपूर्ण बुद्धि रजोगुण में है।
रजोगुणी बुद्धि सदा विपरीत रूप से कार्य करती है। वह ऐसे धर्मों को स्वीकार करती है जो वस्तुतः धर्म नहीं हैं, और यथार्थ धर्म को अस्वीकार कर देती है। उसके समस्त विचार तथा क्रियाएँ दिग्भ्रमित होती हैं। रजोगुणी बुद्धि वाले मनुष्य किसी महान् आत्मा को साधारण मनुष्य समझते हैं और किसी साधारण मनुष्य को महान् आत्मा मान लेते हैं। वे सत्य को असत्य समझते हैं और असत्य को सत्य मान लेते हैं। समस्त क्रियाओं में वे केवल कुमार्ग ही ग्रहण करते हैं; इसी कारण उनकी बुद्धि रजोगुण में है।
Bg 18.32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥
अधर्मम्—अधर्म; धर्मम्—धर्म; इति—इस प्रकार; या—जो; मन्यते—मानती है; तमसा—मोह से; आवृता—आच्छादित; सर्व-अर्थान्—समस्त वस्तुओं को; विपरीतान्—विपरीत दिशा में; च—भी; बुद्धिः—बुद्धि; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; तामसी—तमोगुण में।
हे पार्थ, जो बुद्धि मोह तथा अन्धकार के वशीभूत होकर अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म मानती है, और सदा विपरीत दिशा में प्रयत्नशील रहती है, वह तमोगुण में है।
Bg 18.33
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
धृत्या—धृति; यया—जिसके द्वारा; धारयते—धारण की जाती है; मनः—मन; प्राण—प्राण; इन्द्रिय—इन्द्रियों की; क्रियाः—क्रियाएँ; योगेन—योगाभ्यास द्वारा; अव्यभिचारिण्या—बिना किसी विच्छेद के; धृतिः—ऐसी धृति; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; सात्त्विकी—सत्त्वगुण में।
हे पृथापुत्र, जो अटूट धृति योगाभ्यास द्वारा दृढ़ता से धारण की जाती है, और इस प्रकार मन, प्राण तथा इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखती है, वह सत्त्वगुण में है।
योग परमात्मा को समझने का साधन है। जो दृढ़तापूर्वक परमात्मा में स्थिर रहता है, अपने मन, प्राण तथा इन्द्रिय-क्रियाओं को परमेश्वर पर केन्द्रित करता है, वह कृष्णभावनामृत में संलग्न होता है। ऐसी धृति सत्त्वगुण में है। अव्यभिचारिण्या शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन व्यक्तियों की ओर संकेत करता है जो कृष्णभावनामृत में संलग्न रहते हैं और किसी अन्य क्रिया से कभी विचलित नहीं होते।
Bg 18.34
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
यया—जिसके द्वारा; तु—किन्तु; धर्म-काम-अर्थान्—धर्म तथा आर्थिक विकास हेतु; धृत्या—धृति द्वारा; धारयते—उन रूपों में; अर्जुन—हे अर्जुन; प्रसंगेन—उसके लिए; फल-आकाङ्क्षी—फल की कामना करने वाला; धृतिः—धृति; सा—वह; पार्थ—हे पृथापुत्र; राजसी—रजोगुण में।
और हे अर्जुन, जिस धृति से मनुष्य धर्म, आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति के फल को दृढ़ता से थामे रहता है, वह रजोगुणी स्वभाव की है।
जो व्यक्ति धार्मिक अथवा आर्थिक क्रियाओं में सदा फल की कामना करता है, जिसकी एकमात्र इच्छा इन्द्रियतृप्ति है, और जिसका मन, प्राण तथा इन्द्रियाँ इसी प्रकार संलग्न रहती हैं, वह रजोगुण में है।
Bg 18.35
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
yayā—जिससे; svapnam—स्वप्न; bhayam—भय; śokam—शोक; viṣādam—विषाद; madam—मोह; eva—निश्चय ही; ca—भी; na—कभी नहीं; vimuñcati—मुक्त होती है; durmedhāḥ—अल्पबुद्धि; dhṛtiḥ—धृति; sā—वह; pārtha—हे पृथापुत्र; tāmasī—तमोगुण में।
और जो धृति स्वप्न, भय, शोक, विषाद तथा मोह से परे नहीं जा पाती—वह अल्पबुद्धियुक्त धृति तमोगुण में है।
यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि सत्त्वगुण में स्थित व्यक्ति स्वप्न नहीं देखता। यहाँ स्वप्न का अर्थ अत्यधिक निद्रा है। स्वप्न तो सदा रहता है; सत्त्व, रज अथवा तमोगुण—किसी में भी स्वप्न एक स्वाभाविक घटना है। किन्तु जो अति-निद्रा से बच नहीं सकते, जो भौतिक वस्तुओं के भोग के गर्व से बच नहीं सकते, और जो सदा भौतिक जगत् पर स्वामित्व का स्वप्न देखते रहते हैं, जिनका जीवन, मन तथा इन्द्रियाँ इसी में संलग्न रहती हैं, वे तमोगुण में स्थित माने जाते हैं।
Bg 18.36-37
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
sukham—सुख; tu—किन्तु; idānīm—अब; tri-vidham—तीन प्रकार का; śṛṇu—सुनो; me—मुझसे; bharatarṣabha—हे भरतश्रेष्ठ; abhyāsāt—अभ्यास से; ramate—भोग करता है; yatra—जहाँ; duḥkha—दुःख; antam—अन्त; ca—भी; nigacchati—प्राप्त करता है; yat—जो; tat—वह; agre—आरम्भ में; viṣam iva—विष के समान; pariṇāme—अन्त में; amṛta—अमृत; upamam—तुल्य; tat—वह; sukham—सुख; sāttvikam—सत्त्वगुण में; proktam—कहा गया है; ātma—आत्मा; buddhi—बुद्धि; prasāda-jam—सन्तोषजनक।
हे भरतश्रेष्ठ, अब तुम मुझसे उन तीन प्रकार के सुखों के विषय में सुनो जिनका भोग बद्धजीव करता है, और जिनके द्वारा वह कभी-कभी समस्त दुःखों के अन्त को प्राप्त होता है। जो आरम्भ में विष के समान प्रतीत होता है, किन्तु अन्त में अमृत के समान होता है, और जो मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार के प्रति जागृत करता है, वह सत्त्वगुण में स्थित सुख कहलाता है।
बद्धजीव बारम्बार भौतिक सुख का भोग करने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार वह चबाए हुए को ही चबाता रहता है, किन्तु कभी-कभी ऐसे भोग के क्रम में वह किसी महान् आत्मा के संग से भौतिक बन्धन से मुक्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, बद्धजीव सदा किसी-न-किसी प्रकार की इन्द्रियतृप्ति में संलग्न रहता है, किन्तु जब वह सत्संग के द्वारा यह समझ जाता है कि यह तो उसी वस्तु की मात्र पुनरावृत्ति है, और वह अपनी वास्तविक कृष्णभावनामृत के प्रति जागृत हो उठता है, तब वह कभी-कभी इस पुनरावृत्तिमूलक तथाकथित सुख से मुक्त हो जाता है।
आत्म-साक्षात्कार की खोज में मनुष्य को मन तथा इन्द्रियों को वश में करने और मन को आत्मा पर एकाग्र करने हेतु अनेक नियमों एवं विधियों का पालन करना पड़ता है। ये समस्त विधियाँ अत्यन्त कठिन हैं, विष के समान कटु हैं, किन्तु यदि कोई इन नियमों के पालन में सफल हो जाता है और दिव्य स्थिति को प्राप्त करता है, तो वह वास्तविक अमृत का पान आरम्भ कर देता है, और जीवन का आनन्द लेता है।
Bg 18.38
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥
viṣaya—इन्द्रिय-विषय; indriya—इन्द्रियाँ; saṁyogāt—संयोग से; yat—जो; tat—वह; agre—आरम्भ में; amṛta-upamam—अमृत के तुल्य; pariṇāme—अन्त में; viṣam iva—विष के समान; tat—वह; sukham—सुख; rājasam—रजोगुण में; smṛtam—माना जाता है।
जो सुख इन्द्रियों के अपने विषयों से सम्पर्क से उत्पन्न होता है, और जो आरम्भ में अमृत के समान किन्तु अन्त में विष के समान प्रतीत होता है, वह रजोगुण के स्वभाव वाला कहा जाता है।
एक युवक तथा एक युवती मिलते हैं, और इन्द्रियाँ उस युवक को प्रेरित करती हैं कि वह उसे देखे, उसका स्पर्श करे तथा उसके साथ संभोग करे। आरम्भ में यह इन्द्रियों को अत्यन्त सुखद प्रतीत हो सकता है, किन्तु अन्त में, अथवा कुछ काल पश्चात्, यह विष के समान बन जाता है। वे पृथक् हो जाते हैं अथवा विवाह-विच्छेद हो जाता है, शोक होता है, दुःख होता है, इत्यादि। ऐसा सुख सदा रजोगुण में होता है। इन्द्रियों तथा इन्द्रिय-विषयों के संयोग से उत्पन्न सुख सदा दुःख का कारण होता है, और इससे हर प्रकार से बचना चाहिए।
Bg 18.39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
yat—जो; agre—आरम्भ में; ca—भी; anubandhe—बन्धन से; ca—भी; sukham—सुख; mohanam—मोह; ātmanaḥ—आत्मा का; nidrā—निद्रा; ālasya—आलस्य; pramāda—प्रमाद; uttham—से उत्पन्न; tat—वह; tāmasam—तमोगुण में; udāhṛtam—कहा जाता है।
और जो सुख आत्म-साक्षात्कार के प्रति अन्धा है, जो आदि से अन्त तक भ्रम है, और जो निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तमोगुण के स्वभाव वाला कहा जाता है।
जो आलस्य तथा निद्रा में आनन्द लेता है, वह निश्चय ही तमोगुण में है, और जिसे यह ज्ञान नहीं कि कैसे कर्म करना चाहिए और कैसे नहीं, वह भी तमोगुण में है। तमोगुण में स्थित व्यक्ति के लिए सब कुछ भ्रम है। न आरम्भ में सुख है, न अन्त में। रजोगुण में स्थित व्यक्ति के लिए आरम्भ में कुछ क्षणिक सुख और अन्त में दुःख हो सकता है, किन्तु तमोगुण में स्थित व्यक्ति के लिए आदि तथा अन्त दोनों में केवल दुःख ही है।
Bg 18.4
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥
निश्चयम्—निश्चय ही; शृणु—सुनो; मे—मुझसे; तत्र—वहाँ; त्यागे—त्याग के विषय में; भरत-सत्तम—हे भरतश्रेष्ठ; त्यागः—त्याग; हि—निश्चय ही; पुरुष-व्याघ्र—हे मनुष्यों में व्याघ्र; त्रि-विधः—तीन प्रकार का; सम्प्रकीर्तितः—घोषित किया गया है।
हे भरतश्रेष्ठ, अब मुझसे त्याग के विषय में सुनो। हे मनुष्यों में व्याघ्र, शास्त्रों में तीन प्रकार के त्याग घोषित किए गए हैं।
यद्यपि त्याग के विषय में मतभेद हैं, यहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण अपना निर्णय देते हैं, जिसे अन्तिम मानना चाहिए। आख़िर वेद भगवान् द्वारा प्रदत्त विविध विधान ही तो हैं। यहाँ भगवान् स्वयं उपस्थित हैं, और उनके वचन को अन्तिम मानना चाहिए। भगवान् कहते हैं कि त्याग की प्रक्रिया पर उन भौतिक प्रकृति के गुणों के अनुसार विचार किया जाना चाहिए, जिनमें वह सम्पन्न की जाती है।
Bg 18.40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
na—नहीं; tat—वह; asti—है; pṛthivyām—पृथ्वी पर; vā—अथवा; divi—उच्च लोकों में; deveṣu—देवताओं में; vā—अथवा; punaḥ—फिर; sattvam—अस्तित्व; prakṛti-jaiḥ—भौतिक प्रकृति के प्रभाव से; muktam—मुक्त; yat—जो; ebhiḥ—इनसे; syāt—हो; tribhiḥ—तीन; guṇaiḥ—भौतिक प्रकृति के गुणों से।
न तो यहाँ और न ही उच्च लोकों में देवताओं के बीच ऐसा कोई प्राणी है जो भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से मुक्त हो।
भगवान् यहाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के समग्र प्रभाव का सारांश प्रस्तुत करते हैं।
Bg 18.41
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
brāhmaṇa—ब्राह्मण; kṣatriya—क्षत्रिय; viśām—वैश्य; śūdrāṇām—शूद्र; ca—तथा; parantapa—हे शत्रुओं का दमन करने वाले; karmāṇi—कर्म; pravibhaktāni—विभाजित हैं; svabhāva—अपना स्वभाव; prabhavaiḥ—से उत्पन्न; guṇaiḥ—भौतिक प्रकृति के गुणों के अनुसार।
हे शत्रुओं का दमन करने वाले, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र प्रकृति के गुणों के अनुसार अपने कर्म के गुणों से विभाजित किए गए हैं।
Bg 18.42
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥
śamaḥ—शान्ति; damaḥ—आत्म-संयम; tapaḥ—तपस्या; śaucam—पवित्रता; kṣāntiḥ—सहिष्णुता; ārjavam—सरलता; eva—निश्चय ही; ca—तथा; jñānam—प्रज्ञा; vijñānam—ज्ञान; āstikyam—धार्मिकता; brahma—ब्राह्मण का; karma—कर्तव्य; svabhāva-jam—अपने स्वभाव से उत्पन्न।
शान्ति, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता, सरलता, प्रज्ञा, ज्ञान तथा धार्मिकता—ये वे गुण हैं जिनसे ब्राह्मण कर्म करते हैं।
Bg 18.43
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
śauryam—शौर्य; tejaḥ—तेज; dhṛtiḥ—धृति; dākṣyam—दक्षता; yuddhe—युद्ध में; ca—तथा; api—भी; apalāyanam—पलायन न करना; dānam—दानशीलता; īśvara—नेतृत्व; bhāvaḥ—स्वभाव; ca—तथा; kṣātram—क्षत्रिय का; karma—कर्तव्य; svabhāva-jam—अपने स्वभाव से उत्पन्न।
शौर्य, तेज, धृति, दक्षता, युद्ध में साहस, दानशीलता तथा नेतृत्व—ये क्षत्रियों के कर्म के गुण हैं।
Bg 18.44
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
kṛṣi—कृषि; go—गौ; rakṣya—रक्षा; vāṇijyam—वाणिज्य; vaiśya—वैश्य; karma—कर्तव्य; svabhāva-jam—अपने स्वभाव से उत्पन्न; paricaryā—सेवा; ātmakam—स्वभाव; karma—कर्तव्य; śūdrasya—शूद्र का; api—भी; svabhāva-jam—अपने स्वभाव से उत्पन्न।
कृषि, गौ-रक्षा तथा वाणिज्य वैश्यों के कर्म के गुण हैं, और शूद्रों के लिए श्रम तथा दूसरों की सेवा है।
Bg 18.45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नर
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
sve—अपने; sve—अपने; karmaṇi—कर्म में; abhirataḥ—संलग्न; saṁsiddhim—सिद्धि; labhate—प्राप्त करता है; naraḥ—मनुष्य; sva-karma—अपने कर्तव्य से; nirataḥ—संलग्न; siddhim—सिद्धि; yathā—जैसे; vindati—प्राप्त करता है; tat—वह; śṛṇu—सुनो।
अपने कर्म के गुणों का अनुसरण करके प्रत्येक मनुष्य सिद्ध बन सकता है। अब तुम मुझसे यह सुनो कि यह कैसे किया जा सकता है।
Bg 18.46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥
yataḥ—जिससे; pravṛttiḥ—उद्भव; bhūtānām—समस्त जीवों का; yena—जिसके द्वारा; sarvam—समस्त; idam—यह; tatam—व्याप्त है; sva-karmaṇā—अपने कर्तव्यों से; tam—उनकी; abhyarcya—आराधना करके; siddhim—सिद्धि; vindati—प्राप्त करता है; mānavaḥ—मनुष्य।
समस्त प्राणियों के स्रोत तथा सर्वव्यापी भगवान् की आराधना के द्वारा मनुष्य अपने कर्तव्य के सम्पादन में सिद्धि को प्राप्त कर सकता है।
जैसा कि पंद्रहवें अध्याय में कहा गया है, समस्त जीव परमेश्वर के अंश-स्वरूप हैं। इस प्रकार परमेश्वर समस्त जीवों के आदि हैं। इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र में होती है—janmādy asya yataḥ। अतः परमेश्वर ही प्रत्येक जीव के जीवन के आदि हैं। और परमेश्वर अपनी दो शक्तियों—अपनी बहिरंगा शक्ति तथा अन्तरंगा शक्ति—से सर्वव्यापी हैं। अतएव मनुष्य को चाहिए कि वह परमेश्वर की उनकी शक्तियों सहित आराधना करे। सामान्यतः वैष्णव भक्तगण परमेश्वर की उनकी अन्तरंगा शक्ति सहित आराधना करते हैं। उनकी बहिरंगा शक्ति अन्तरंगा शक्ति का विकृत प्रतिबिम्ब है। बहिरंगा शक्ति एक पृष्ठभूमि है, किन्तु परमेश्वर अपने पूर्ण अंश परमात्मा के विस्तार द्वारा सर्वत्र स्थित हैं। वे समस्त देवताओं, समस्त मनुष्यों, समस्त पशुओं के—सर्वत्र के परमात्मा हैं। अतः मनुष्य को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के अंश-स्वरूप होने के कारण परम पुरुष की सेवा करना उसका कर्तव्य है। प्रत्येक को पूर्ण कृष्णभावनामृत में भगवान् की भक्ति में संलग्न होना चाहिए। इसी श्लोक में इसकी अनुशंसा की गई है।
प्रत्येक को यह सोचना चाहिए कि वह इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश द्वारा किसी विशेष प्रकार के व्यवसाय में लगाया गया है। और जिस कर्म में मनुष्य संलग्न है, उसके फल के द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करनी चाहिए। यदि मनुष्य सदा इसी प्रकार पूर्ण कृष्णभावनामृत में सोचता रहे, तो भगवान् की कृपा से वह सब कुछ का पूर्ण रूप से जानकार बन जाता है। यही जीवन की सिद्धि है। भगवान् भगवद्गीता में कहते हैं—teṣām ahaṁ samuddhartā। परमेश्वर स्वयं ऐसे भक्त के उद्धार का भार ग्रहण कर लेते हैं। यही जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है। मनुष्य चाहे किसी भी व्यवसाय में संलग्न क्यों न हो, यदि वह परमेश्वर की सेवा करता है, तो वह सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त करेगा।
Bg 18.47
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥
śreyān—श्रेष्ठतर; sva-dharmaḥ—अपना व्यवसाय; viguṇaḥ—अपूर्ण रूप से सम्पन्न; para-dharmāt—दूसरे के व्यवसाय की अपेक्षा; su-anuṣṭhitāt—भली-भाँति सम्पन्न; svabhāva-niyatam—अपने स्वभाव के अनुसार विहित कर्तव्य; karma—कर्म; kurvan—करता हुआ; na—कभी नहीं; āpnoti—प्राप्त करता है; kilbiṣam—पापमय प्रतिक्रियाएँ।
अपने व्यवसाय में संलग्न रहना श्रेष्ठतर है, भले ही मनुष्य उसे अपूर्ण रूप से सम्पन्न करे, अपेक्षाकृत इसके कि वह दूसरे के व्यवसाय को स्वीकार करे और उसे पूर्ण रूप से सम्पन्न करे। अपने स्वभाव के अनुसार विहित कर्तव्य कभी पापमय प्रतिक्रियाओं से प्रभावित नहीं होते।
मनुष्य के व्यावसायिक कर्तव्य का विधान भगवद्गीता में किया गया है। जैसा कि पूर्व श्लोकों में पहले ही विवेचन हो चुका है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कर्तव्य प्रकृति के विशिष्ट गुणों के अनुसार विहित हैं। मनुष्य को दूसरे के कर्तव्य का अनुकरण नहीं करना चाहिए। जो मनुष्य स्वभाव से शूद्रों द्वारा किए जाने वाले प्रकार के कर्म की ओर आकृष्ट है, उसे कृत्रिम रूप से स्वयं को ब्राह्मण घोषित नहीं करना चाहिए, भले ही उसका जन्म किसी ब्राह्मण-परिवार में हुआ हो। इस प्रकार मनुष्य को अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना चाहिए; यदि परमेश्वर की सेवा में सम्पन्न किया जाए तो कोई भी कर्म निन्द्य नहीं है। ब्राह्मण का व्यावसायिक कर्तव्य निश्चय ही सत्त्वगुण में है, किन्तु यदि कोई व्यक्ति स्वभाव से सत्त्वगुण में नहीं है, तो उसे ब्राह्मण के व्यावसायिक कर्तव्य का अनुकरण नहीं करना चाहिए। क्षत्रिय अथवा शासक के लिए अनेक निन्द्य बातें हैं; क्षत्रिय को अपने शत्रुओं का वध करने हेतु हिंसक होना पड़ता है, और कभी-कभी क्षत्रिय को कूटनीति के निमित्त असत्य भी बोलना पड़ता है। ऐसी हिंसा तथा कपट राजनीतिक मामलों के साथ चलते हैं, किन्तु क्षत्रिय से यह अपेक्षित नहीं कि वह अपने व्यावसायिक कर्तव्य का त्याग कर दे और ब्राह्मण के कर्तव्यों को सम्पन्न करने का प्रयत्न करे।
मनुष्य को परमेश्वर की प्रसन्नता हेतु कर्म करना चाहिए। उदाहरणार्थ, अर्जुन एक क्षत्रिय था। वह दूसरे पक्ष से युद्ध करने में हिचक रहा था। किन्तु यदि ऐसा युद्ध पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के निमित्त सम्पन्न किया जाए, तो पतन का कोई भय नहीं रहता। वाणिज्य के क्षेत्र में भी, कभी-कभी व्यापारी को लाभ कमाने हेतु अनेक असत्य बोलने पड़ते हैं। यदि वह ऐसा न करे, तो कोई लाभ नहीं हो सकता। कभी-कभी व्यापारी कहता है, “हे मेरे प्रिय ग्राहक, तुम्हारे लिए मैं कोई लाभ नहीं ले रहा,” किन्तु यह जान लेना चाहिए कि लाभ के बिना व्यापारी का अस्तित्व ही नहीं रह सकता। अतएव यदि कोई व्यापारी कहे कि वह लाभ नहीं ले रहा, तो इसे एक सरल असत्य मान लेना चाहिए। किन्तु व्यापारी को यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि वह ऐसे व्यवसाय में संलग्न है जिसमें असत्य बोलना अनिवार्य है, अतः उसे अपना व्यवसाय त्यागकर ब्राह्मण का व्यवसाय अपनाना चाहिए। इसकी अनुशंसा नहीं की जाती। कोई क्षत्रिय हो, वैश्य हो अथवा शूद्र, इससे अन्तर नहीं पड़ता, यदि वह अपने कर्म से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करता है। ब्राह्मणगण तक, जो विविध प्रकार के यज्ञ सम्पन्न करते हैं, कभी-कभी पशुओं का वध करते हैं, क्योंकि ऐसे अनुष्ठानों में कभी-कभी पशुओं का बलिदान किया जाता है। इसी प्रकार, यदि अपने व्यवसाय में संलग्न क्षत्रिय किसी शत्रु का वध कर देता है, तो उसे कोई पाप नहीं लगता। तीसरे अध्याय में इन विषयों की स्पष्ट तथा विस्तृत व्याख्या की गई है; प्रत्येक मनुष्य को यज्ञ के निमित्त, अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के निमित्त कर्म करना चाहिए। व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति के लिए किया गया कोई भी कर्म बन्धन का कारण है। निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक को उस विशिष्ट प्रकृति-गुण के अनुसार संलग्न होना चाहिए जिसे उसने अर्जित किया है, और उसे केवल परमेश्वर के परम प्रयोजन की सेवा हेतु ही कर्म करने का निश्चय करना चाहिए।
Bg 18.48
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥
saha-jam—साथ-साथ उत्पन्न; karma—कर्म; kaunteya—हे कुन्तीपुत्र; sa-doṣam—दोष सहित; api—यद्यपि; na—कभी नहीं; tyajet—त्यागना चाहिए; sarva-ārambhāḥ—समस्त प्रयास; hi—निश्चय ही; doṣeṇa—दोष से; dhūmena—धूम से; agniḥ—अग्नि; iva—जैसे; āvṛtāḥ—आवृत।
प्रत्येक प्रयास किसी-न-किसी प्रकार के दोष से आवृत होता है, ठीक जैसे अग्नि धूम से आवृत होती है। अतः मनुष्य को अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, हे कुन्तीपुत्र, भले ही ऐसा कर्म दोष से पूर्ण हो।
बद्ध जीवन में समस्त कर्म प्रकृति के भौतिक गुणों से दूषित रहता है। यदि कोई ब्राह्मण भी हो, तो उसे ऐसे यज्ञ सम्पन्न करने पड़ते हैं जिनमें पशु-वध आवश्यक है। इसी प्रकार, क्षत्रिय चाहे कितना ही धर्मनिष्ठ क्यों न हो, उसे शत्रुओं से युद्ध करना पड़ता है। वह इससे बच नहीं सकता। इसी प्रकार, व्यापारी चाहे कितना ही धर्मनिष्ठ क्यों न हो, उसे व्यापार में बने रहने हेतु कभी-कभी अपना लाभ छिपाना पड़ता है, अथवा कभी-कभी उसे चोरबाज़ार में व्यापार करना पड़ता है। ये बातें आवश्यक हैं; मनुष्य इनसे बच नहीं सकता। इसी प्रकार, यद्यपि कोई मनुष्य किसी दुष्ट स्वामी की सेवा करने वाला शूद्र है, फिर भी उसे स्वामी की आज्ञा का पालन करना पड़ता है, भले ही वह करणीय न हो। इन दोषों के होते हुए भी, मनुष्य को अपने विहित कर्तव्यों का निर्वाह करते रहना चाहिए, क्योंकि वे उसके अपने स्वभाव से उत्पन्न हैं।
यहाँ एक अति उत्तम उदाहरण दिया गया है। यद्यपि अग्नि शुद्ध है, फिर भी धूम रहता है। तथापि धूम अग्नि को अशुद्ध नहीं बनाता। अग्नि में धूम होते हुए भी, अग्नि समस्त तत्त्वों में सर्वाधिक शुद्ध मानी जाती है। यदि कोई क्षत्रिय के कर्म को त्यागकर ब्राह्मण का व्यवसाय अपनाना चाहे, तो यह सुनिश्चित नहीं है कि ब्राह्मण के व्यवसाय में कोई अप्रिय कर्तव्य नहीं हैं। तब मनुष्य यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि भौतिक जगत् में कोई भी भौतिक प्रकृति के दूषण से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकता। अग्नि तथा धूम का यह उदाहरण इस सन्दर्भ में अत्यन्त उपयुक्त है। शीतकाल में जब कोई अग्नि में से पत्थर निकालता है, तो कभी-कभी धूम नेत्रों तथा शरीर के अन्य अंगों को कष्ट पहुँचाता है, फिर भी मनुष्य को कष्टप्रद परिस्थितियों के होते हुए भी अग्नि का उपयोग करना पड़ता है। इसी प्रकार, मनुष्य को अपने स्वाभाविक व्यवसाय का त्याग केवल इसलिए नहीं करना चाहिए कि उसमें कुछ कष्टप्रद तत्त्व हैं। अपितु, मनुष्य को कृष्णभावनामृत में अपने व्यावसायिक कर्तव्य के द्वारा परमेश्वर की सेवा करने का दृढ़ निश्चय करना चाहिए। यही सिद्धि का बिन्दु है। जब कोई विशिष्ट प्रकार का व्यवसाय परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए सम्पन्न किया जाता है, तब उस विशिष्ट व्यवसाय के समस्त दोष शुद्ध हो जाते हैं। जब कर्म के फल शुद्ध हो जाते हैं, जब वे भक्ति से जुड़ जाते हैं, तब मनुष्य अपने भीतर आत्मा का दर्शन करने में सिद्ध हो जाता है, और यही आत्म-साक्षात्कार है।
Bg 18.49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
asakta-buddhiḥ—अनासक्त बुद्धि; sarvatra—सर्वत्र; jita-ātmā—मन पर संयम; vigata-spṛhaḥ—भौतिक इच्छाओं से रहित; naiṣkarmya-siddhim—निष्क्रियता की सिद्धि; paramām—परम; sannyāsena—संन्यास आश्रम के द्वारा; adhigacchati—प्राप्त करता है।
आत्म-संयम के द्वारा तथा भौतिक वस्तुओं से अनासक्त होकर और भौतिक भोगों की उपेक्षा करके मनुष्य त्याग के फलों को प्राप्त कर सकता है। यही त्याग की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था है।
वास्तविक त्याग का अर्थ यह है कि मनुष्य को सदा स्वयं को परमेश्वर का अंश-स्वरूप मानना चाहिए। अतः उसे अपने कर्म के फलों का भोग करने का कोई अधिकार नहीं है। चूँकि वह परमेश्वर का अंश-स्वरूप है, अतएव उसके कर्म के फलों का भोग परमेश्वर द्वारा ही होना चाहिए। वस्तुतः यही कृष्णभावनामृत है। कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला व्यक्ति वास्तव में संन्यासी है, अर्थात् संन्यास आश्रम में स्थित है। ऐसी मनोवृत्ति से मनुष्य सन्तुष्ट रहता है, क्योंकि वह वास्तव में परम पुरुष के लिए कर्म कर रहा है। इस प्रकार वह किसी भी भौतिक वस्तु में आसक्त नहीं रहता; वह भगवान् की सेवा से प्राप्त दिव्य आनन्द से परे किसी वस्तु में आनन्द न लेने का अभ्यस्त हो जाता है। संन्यासी से यह अपेक्षित है कि वह अपने अतीत के कर्मों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो, किन्तु जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में है, वह तथाकथित संन्यास आश्रम को स्वीकार किए बिना ही स्वतः इस सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। मन की इस अवस्था को योगारूढ़, अर्थात् योग की सिद्ध अवस्था कहते हैं, जैसा कि तीसरे अध्याय में पुष्टि की गई है—yas tv ātma-ratir eva syāt। जो स्वयं में सन्तुष्ट है, उसे अपने कर्म से किसी प्रकार की प्रतिक्रिया का कोई भय नहीं रहता।
Bg 18.5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
यज्ञ—यज्ञ; दान—दान; तपः—तप; कर्म—कर्म; न—कभी नहीं; त्याज्यम्—त्यागने योग्य; कार्यम्—करना ही चाहिए; एव—निश्चय ही; तत्—वह; यज्ञः—यज्ञ; दानम्—दान; तपः—तप; च—भी; एव—निश्चय ही; पावनानि—पवित्र करने वाले; मनीषिणाम्—महान् आत्माओं को भी।
यज्ञ, दान तथा तप के कर्म त्यागे नहीं जाने चाहिए, अपितु सम्पन्न किए जाने चाहिए। निस्सन्देह यज्ञ, दान तथा तप महान् आत्माओं को भी पवित्र कर देते हैं।
योगियों को मानव-समाज की उन्नति हेतु कर्म करने चाहिए। मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन की ओर उन्नत करने हेतु अनेक शुद्धिकरण-प्रक्रियाएँ हैं। उदाहरणार्थ, विवाह-संस्कार को इन्हीं यज्ञों में से एक माना जाता है। इसे विवाह-यज्ञ कहते हैं। क्या किसी संन्यासी को, जो संन्यास-आश्रम में स्थित है और जिसने अपने पारिवारिक सम्बन्धों का त्याग कर दिया है, विवाह-संस्कार को प्रोत्साहित करना चाहिए? भगवान् यहाँ कहते हैं कि जो भी यज्ञ मानव-कल्याण हेतु है, उसका कभी त्याग नहीं किया जाना चाहिए। विवाह-यज्ञ, अर्थात् विवाह-संस्कार, का प्रयोजन मानव-मन को नियमित करके उसे आध्यात्मिक उन्नति हेतु शान्त बनाना है। अधिकांश मनुष्यों के लिए इस विवाह-यज्ञ को संन्यास-आश्रम में स्थित व्यक्तियों द्वारा भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। संन्यासियों को स्त्रियों के साथ कभी संग नहीं करना चाहिए, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि जो जीवन के निम्नतर सोपानों में है, अर्थात् कोई युवक, उसे विवाह-संस्कार में पत्नी स्वीकार नहीं करनी चाहिए। समस्त विहित यज्ञों का प्रयोजन परमेश्वर की प्राप्ति है। अतः निम्नतर सोपानों में उनका त्याग नहीं किया जाना चाहिए। इसी प्रकार दान हृदय की शुद्धि के लिए है। यदि दान उपयुक्त व्यक्तियों को दिया जाए, जैसा कि पूर्व में वर्णित किया गया, तो वह मनुष्य को उन्नत आध्यात्मिक जीवन की ओर ले जाता है।
Bg 18.50
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥
siddhim—सिद्धि; prāptaḥ—प्राप्त करके; yathā—जैसे; brahma—परम; tathā—वैसे; āpnoti—प्राप्त करता है; nibodha—समझने का प्रयत्न करो; me—मुझसे; samāsena—संक्षेप में; eva—निश्चय ही; kaunteya—हे कुन्तीपुत्र; niṣṭhā—अवस्था; jñānasya—ज्ञान की; yā—जो; parā—दिव्य।
हे कुन्तीपुत्र, मुझसे संक्षेप में सीखो कि मनुष्य उस परम सिद्ध अवस्था, ब्रह्म को, उस विधि से कैसे प्राप्त कर सकता है जिसका मैं अब सारांश प्रस्तुत करूँगा।
भगवान् अर्जुन के लिए वर्णन करते हैं कि मनुष्य केवल अपने व्यावसायिक कर्तव्य में संलग्न रहकर, और उस कर्तव्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लिए सम्पन्न करके, कैसे सर्वोच्च सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर सकता है। मनुष्य केवल परमेश्वर की प्रसन्नता हेतु अपने कर्म के फल का त्याग करके ब्रह्म की परम अवस्था को प्राप्त करता है। यही आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है। ज्ञान की वास्तविक सिद्धि शुद्ध कृष्णभावनामृत की प्राप्ति में है; इसका वर्णन निम्नलिखित श्लोकों में किया गया है।
Bg 18.51-53
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥
buddhyā—बुद्धि से; viśuddhayā—पूर्णतः शुद्ध; yuktaḥ—संलग्न; dhṛtyā—धृति से; ātmānam—आत्मा को; niyamya—नियमित करके; ca—भी; śabdādīn—शब्द आदि इन्द्रिय-विषय; viṣayān—इन्द्रिय-विषय; tyaktvā—त्यागकर; rāga—आसक्ति; dveṣau—द्वेष; vyudasya—त्यागकर; ca—भी; vivikta-sevī—एकान्त स्थान में निवास करता हुआ; laghu-āśī—अल्प भोजन करता हुआ; yata-vāk—वाणी का संयम; kāya—शरीर; mānasaḥ—मन का संयम; dhyāna-yoga-paraḥ—सदा समाधि में लीन; nityam—चौबीसों घंटे; vairāgyam—वैराग्य; samupāśritaḥ—आश्रय लिए हुए; ahaṅkāram—मिथ्या अहंकार; balam—मिथ्या बल; darpam—मिथ्या दर्प; kāmam—काम; krodham—क्रोध; parigraham—भौतिक वस्तुओं का परिग्रह; vimucya—मुक्त होकर; nirmamaḥ—ममत्व से रहित; śāntaḥ—शान्त; brahma-bhūyāya—आत्म-साक्षात्कार हेतु; kalpate—योग्य हो जाता है।
जो अपनी बुद्धि से शुद्ध होकर तथा धृति से मन को संयमित करते हुए, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का त्यागकर, आसक्ति तथा द्वेष से मुक्त होकर, एकान्त स्थान में निवास करता है, जो अल्प भोजन करता है और जो शरीर तथा वाणी पर संयम रखता है, और जो सदा समाधि में रहता है तथा विरक्त है, जो मिथ्या अहंकार, मिथ्या बल, मिथ्या दर्प, काम, क्रोध से रहित है, और जो भौतिक वस्तुओं को स्वीकार नहीं करता—ऐसा व्यक्ति निश्चय ही आत्म-साक्षात्कार की अवस्था तक उन्नत होता है।
जब मनुष्य ज्ञान से शुद्ध हो जाता है, तब वह स्वयं को सत्त्वगुण में स्थित रखता है। इस प्रकार वह मन का नियन्ता बन जाता है और सदा समाधि में रहता है। चूँकि वह इन्द्रियतृप्ति के विषयों में आसक्त नहीं है, अतः वह अपनी आवश्यकता से अधिक भोजन नहीं करता, और वह अपने शरीर तथा मन की क्रियाओं पर संयम रखता है। उसमें मिथ्या अहंकार नहीं रहता, क्योंकि वह शरीर को आत्मा के रूप में स्वीकार नहीं करता। न ही उसमें अनेक भौतिक वस्तुओं को स्वीकार करके शरीर को पुष्ट तथा बलवान् बनाने की इच्छा रहती है। चूँकि उसमें जीवन की देहात्म-बुद्धि नहीं है, अतएव वह मिथ्या दर्प से युक्त नहीं होता। भगवान् की कृपा से जो कुछ उसे अर्पित होता है, उसी से वह सन्तुष्ट रहता है, और इन्द्रियतृप्ति के अभाव में वह कभी क्रोधित नहीं होता। न ही वह इन्द्रिय-विषयों को अर्जित करने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार जब वह मिथ्या अहंकार से पूर्णतः मुक्त हो जाता है, तब वह समस्त भौतिक वस्तुओं के प्रति अनासक्त हो जाता है, और यही ब्रह्म के आत्म-साक्षात्कार की अवस्था है। उस अवस्था को ब्रह्म-भूत अवस्था कहते हैं। जब मनुष्य जीवन की भौतिक धारणा से मुक्त हो जाता है, तब वह शान्त हो जाता है और विचलित नहीं किया जा सकता।
Bg 18.54
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥
brahma-bhūtaḥ—परम सत्य के साथ एकीभूत; prasanna-ātmā—पूर्णतः आनन्दित; na—कभी नहीं; śocati—शोक करता है; na—कभी नहीं; kāṅkṣati—इच्छा करता है; samaḥ—समभाव; sarveṣu—समस्त; bhūteṣu—जीवों के प्रति; mat-bhaktim—मेरी भक्ति; labhate—प्राप्त करता है; parām—दिव्य।
जो इस प्रकार दिव्य रूप से स्थित है, वह तुरन्त परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह न तो कभी शोक करता है, न ही किसी वस्तु की इच्छा करता है; वह समस्त जीवों के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है।
निर्विशेषवादी के लिए ब्रह्म-भूत अवस्था को प्राप्त करना, अर्थात् परम सत्य के साथ एकीभूत हो जाना, अन्तिम लक्ष्य है। किन्तु साकारवादी, अर्थात् शुद्ध भक्त के लिए, मनुष्य को शुद्ध भक्ति में संलग्न होने हेतु और भी आगे जाना पड़ता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति परमेश्वर की शुद्ध भक्ति में संलग्न है, वह पहले से ही मुक्ति की अवस्था में है, जिसे ब्रह्म-भूत, अर्थात् परम सत्य के साथ एकत्व कहते हैं। परम सत्य के साथ एकीभूत हुए बिना मनुष्य उनकी सेवा नहीं कर सकता। परम धारणा में सेव्य तथा सेवक में कोई भेद नहीं है; फिर भी उच्चतर आध्यात्मिक अर्थ में वह भेद विद्यमान है।
जीवन की भौतिक धारणा में, जब मनुष्य इन्द्रियतृप्ति हेतु कर्म करता है, तब दुःख होता है, किन्तु परम जगत् में, जब मनुष्य शुद्ध भक्ति में संलग्न रहता है, तब कोई दुःख नहीं होता। कृष्णभावनामृत में स्थित भक्त के पास न शोक करने को कुछ है, न इच्छा करने को। चूँकि ईश्वर पूर्ण हैं, अतः जो जीव ईश्वर की सेवा में, कृष्णभावनामृत में संलग्न है, वह भी स्वयं में पूर्ण हो जाता है। वह उस नदी के समान है जो समस्त मलिन जल से स्वच्छ कर दी गई हो। चूँकि शुद्ध भक्त के मन में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई विचार नहीं रहता, अतएव वह स्वाभाविक रूप से सदा आनन्दित रहता है। वह किसी भौतिक हानि अथवा लाभ हेतु शोक नहीं करता, क्योंकि वह भगवान् की सेवा में पूर्ण है। उसे भौतिक भोग की कोई इच्छा नहीं रहती, क्योंकि वह जानता है कि प्रत्येक जीव परमेश्वर का अंश-स्वरूप है और अतएव नित्य सेवक है। वह भौतिक जगत् में किसी को उच्च तथा किसी को निम्न नहीं देखता; उच्च तथा निम्न पद क्षणिक हैं, और भक्त का क्षणिक उद्भव अथवा विनाश से कोई सरोकार नहीं रहता। उसके लिए पत्थर तथा स्वर्ण का समान मूल्य है। यही ब्रह्म-भूत अवस्था है, और यह अवस्था शुद्ध भक्त के द्वारा अत्यन्त सरलता से प्राप्त की जाती है। अस्तित्व की उस अवस्था में, परब्रह्म के साथ एकीभूत होकर अपनी व्यष्टि का विनाश कर देने का विचार नारकीय प्रतीत होने लगता है, और स्वर्गलोक की प्राप्ति का विचार मायाजाल प्रतीत होने लगता है, और इन्द्रियाँ टूटे हुए सर्पों के दाँतों के समान हो जाती हैं। जैसे टूटे दाँतों वाले सर्प का कोई भय नहीं रहता, वैसे ही जब इन्द्रियाँ स्वतः वश में हो जाती हैं, तब उनसे कोई भय नहीं रहता। भौतिक रूप से संक्रमित व्यक्ति के लिए यह संसार दुःखमय है, किन्तु भक्त के लिए सम्पूर्ण संसार वैकुण्ठ, अर्थात् आध्यात्मिक आकाश के समान ही है। इस भौतिक ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च व्यक्ति भी भक्त के लिए एक चींटी से अधिक महत्त्व नहीं रखता। ऐसी अवस्था भगवान् चैतन्य की कृपा से प्राप्त की जा सकती है, जिन्होंने इस युग में शुद्ध भक्ति का प्रचार किया।
Bg 18.55
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥
भक्त्या—शुद्ध भक्ति से; माम्—मुझे; अभिजानाति—मनुष्य जान सकता है; यावान्—जितना; यः च अस्मि—जैसा मैं हूँ; तत्त्वतः—यथार्थ रूप में; ततः—तदुपरान्त; माम्—मुझे; तत्त्वतः—सत्यतः; ज्ञात्वा—जानकर; विशते—प्रवेश करता है; तत्—तत्पश्चात्; अनन्तरम्—बाद में
पूर्ण पुरुषोत्तम को उनके यथार्थ रूप में केवल भक्ति के द्वारा ही समझा जा सकता है। और जब मनुष्य ऐसी भक्ति के द्वारा परमेश्वर के प्रति पूर्ण भावना से युक्त हो जाता है, तब वह भगवान् के राज्य में प्रवेश कर सकता है।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके पूर्ण अंशों को न तो मानसिक कल्पना से और न ही अभक्तों के द्वारा समझा जा सकता है। यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझना चाहता है, तो उसे किसी शुद्ध भक्त के मार्गदर्शन में शुद्ध भक्ति का आश्रय लेना होगा। अन्यथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का सत्य सदा गुप्त ही रहेगा। यह पहले ही कहा जा चुका है (नाहं प्रकाशः) कि वे सबके समक्ष प्रकट नहीं होते। केवल पाण्डित्यपूर्ण विद्वत्ता अथवा मानसिक कल्पना से प्रत्येक व्यक्ति भगवान् को नहीं समझ सकता। केवल वही, जो वास्तव में कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में संलग्न है, यह समझ सकता है कि श्रीकृष्ण क्या हैं। विश्वविद्यालय की उपाधियाँ इसमें सहायक नहीं होतीं।
जो कृष्ण-विज्ञान में पूर्णतया पारंगत हो जाता है, वह आध्यात्मिक राज्य अर्थात् श्रीकृष्ण के धाम में प्रवेश करने का अधिकारी बन जाता है। ब्रह्म बनने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपनी पहचान खो देता है। वहाँ भक्ति विद्यमान रहती है, और जब तक भक्ति विद्यमान है, तब तक भगवान्, भक्त तथा भक्ति की प्रक्रिया—तीनों का होना अनिवार्य है। ऐसा ज्ञान मुक्ति के पश्चात् भी कभी नष्ट नहीं होता। मुक्ति का अर्थ है भौतिक जीवन की धारणा से मुक्त हो जाना; आध्यात्मिक जीवन में वही विभेद रहता है, वही व्यक्तित्व रहता है, किन्तु शुद्ध कृष्णभावनामृत में। मनुष्य को यह भ्रम नहीं करना चाहिए कि “विशते” शब्द, अर्थात् “मुझमें प्रवेश करता है”, उस अद्वैतवादी मत का समर्थन करता है जिसके अनुसार मनुष्य निराकार ब्रह्म के साथ एकरूप हो जाता है। ऐसा नहीं है। विशते का अर्थ है कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व सहित परमेश्वर के धाम में प्रवेश कर सकता है, जिससे वह उनकी संगति में रहकर उनकी सेवा कर सके। उदाहरणार्थ, एक हरा पक्षी किसी हरे वृक्ष में वृक्ष के साथ एक होने के लिए नहीं, अपितु उस वृक्ष के फलों का आनन्द लेने के लिए प्रवेश करता है। निर्विशेषवादी प्रायः नदी का उदाहरण देते हैं, जो समुद्र में प्रवाहित होकर उसमें विलीन हो जाती है। यह निर्विशेषवादी के लिए सुख का स्रोत हो सकता है, किन्तु साकारवादी समुद्र में रहने वाले किसी जलचर की भाँति अपना व्यक्तिगत व्यक्तित्व बनाए रखता है। यदि हम गहराई में जाएँ, तो समुद्र के भीतर हमें अनेकानेक जीव मिलते हैं। समुद्र से ऊपरी परिचय पर्याप्त नहीं है; समुद्र की गहराइयों में रहने वाले जलचरों का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।
अपनी शुद्ध भक्ति के कारण भक्त परमेश्वर के दिव्य गुणों तथा ऐश्वर्यों को यथार्थ रूप में समझ सकता है। जैसा कि ग्यारहवें अध्याय में कहा गया है, केवल भक्ति के द्वारा ही मनुष्य समझ सकता है। यहाँ भी इसी की पुष्टि होती है; मनुष्य भक्ति के द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझ सकता है और उनके राज्य में प्रवेश कर सकता है।
भौतिक धारणाओं से मुक्ति की ब्रह्मभूत अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् भक्ति का आरम्भ भगवान् के विषय में श्रवण से होता है। जब मनुष्य परमेश्वर के विषय में श्रवण करता है, तब स्वतः ही ब्रह्मभूत अवस्था विकसित होती है, और भौतिक कल्मष—विषय-भोग के प्रति लोभ तथा काम—विलुप्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों भक्त के हृदय से काम तथा वासनाएँ विलीन होती हैं, त्यों-त्यों वह भगवान् की सेवा के प्रति अधिकाधिक आसक्त होता जाता है, और इसी आसक्ति के द्वारा वह भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है। जीवन की उसी अवस्था में वह परमेश्वर को समझ सकता है। यह श्रीमद्भागवत का भी कथन है। मुक्ति के पश्चात् भी भक्ति अथवा दिव्य सेवा की प्रक्रिया चलती रहती है। वेदान्त-सूत्र इसकी पुष्टि करता है: आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्। इसका अर्थ है कि मुक्ति के पश्चात् भी भक्ति की प्रक्रिया चलती रहती है। श्रीमद्भागवत में वास्तविक भक्तिमयी मुक्ति की परिभाषा जीव की अपनी पहचान, अपनी स्वरूपगत स्थिति में पुनःस्थापना के रूप में की गई है। स्वरूपगत स्थिति की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है: प्रत्येक जीव परमेश्वर का अभिन्न अंशभूत खण्ड है। अतः उसकी स्वरूपगत स्थिति सेवा करना है। मुक्ति के पश्चात् यह सेवा कभी नहीं रुकती। वास्तविक मुक्ति का अर्थ है जीवन की मिथ्या धारणाओं से मुक्त हो जाना।
Bg 18.56
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥
सर्व—समस्त; कर्माणि—कर्म; अपि—यद्यपि; सदा—सदैव; कुर्वाणः—करते हुए; मत्—मेरी; व्यपाश्रयः—शरण में; मत्—मेरी; प्रसादात्—कृपा से; अवाप्नोति—प्राप्त करता है; शाश्वतम्—नित्य; पदम्—धाम; अव्ययम्—अविनाशी।
यद्यपि मेरा भक्त सब प्रकार के कर्मों में संलग्न रहता है, फिर भी मेरी शरण में रहकर वह मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त करता है।
मद्-व्यपाश्रयः शब्द का अर्थ है परमेश्वर की शरण में। भौतिक कल्मष से मुक्त होने के लिए शुद्ध भक्त परमेश्वर अथवा उनके प्रतिनिधि, आध्यात्मिक गुरु, के निर्देशन में कर्म करता है। शुद्ध भक्त के लिए कोई समय-सीमा नहीं होती। वह सदा, चौबीसों घण्टे, शत-प्रतिशत परमेश्वर के निर्देशन में कर्मों में संलग्न रहता है। जो भक्त इस प्रकार कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है, उस पर भगवान् अत्यन्त, अत्यन्त कृपालु रहते हैं। समस्त कठिनाइयों के होते हुए भी, वह अन्ततः दिव्य धाम अर्थात् कृष्णलोक में स्थापित हो जाता है। वहाँ उसका प्रवेश सुनिश्चित है; इसमें कोई सन्देह नहीं। उस परम धाम में कोई परिवर्तन नहीं होता; वहाँ सब कुछ नित्य, अविनाशी तथा ज्ञान से परिपूर्ण है।
Bg 18.57
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥
चेतसा—बुद्धि से; सर्व-कर्माणि—सब प्रकार के कर्म; मयि—मुझमें; सन्न्यस्य—त्याग कर; मत्-परः—मेरी शरण में; बुद्धि-योगम्—भक्तिमय कर्म; उपाश्रित्य—आश्रय लेकर; मत्-चित्तः—भावना में; सततम्—चौबीसों घण्टे; भव—हो जाओ।
समस्त कर्मों में केवल मुझ पर आश्रित रहो और सदा मेरी शरण में कर्म करो। ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो।
जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तब वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता। एक सेवक की भाँति मनुष्य को पूर्णतया परमेश्वर के निर्देशन में कर्म करना चाहिए। सेवक की कोई व्यक्तिगत स्वतन्त्रता नहीं होती। वह केवल स्वामी के आदेश पर कर्म करता है। परम स्वामी की ओर से कर्म करने वाला सेवक लाभ-हानि से कोई मोह नहीं रखता। वह तो केवल भगवान् के आदेश के अनुरूप अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक निभाता है। अब कोई यह तर्क कर सकता है कि अर्जुन तो श्रीकृष्ण के साक्षात् निर्देशन में कर्म कर रहा था, किन्तु जब श्रीकृष्ण उपस्थित न हों, तब मनुष्य को किस प्रकार कर्म करना चाहिए? यदि मनुष्य इस ग्रन्थ में दिए गए श्रीकृष्ण के निर्देश के अनुसार तथा श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि के मार्गदर्शन में कर्म करे, तो परिणाम वही होगा। इस श्लोक में संस्कृत शब्द मत्-परः अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह इंगित करता है कि मनुष्य के जीवन में, केवल श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने हेतु कृष्णभावनामृत में कर्म करने के अतिरिक्त, और कोई लक्ष्य नहीं होता। और इस प्रकार कर्म करते समय मनुष्य को केवल श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करना चाहिए: “मुझे यह विशेष कर्तव्य निभाने के लिए श्रीकृष्ण ने नियुक्त किया है।” इस प्रकार कर्म करते हुए मनुष्य को स्वभावतः श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करना पड़ता है। यही पूर्ण कृष्णभावनामृत है। किन्तु मनुष्य को यह ध्यान रखना चाहिए कि स्वेच्छाचारितापूर्वक कुछ करने के पश्चात् उसे उसका फल परमेश्वर को अर्पित नहीं करना चाहिए। ऐसा कर्तव्य कृष्णभावनामृत की भक्ति में नहीं आता। मनुष्य को श्रीकृष्ण के आदेश के अनुसार कर्म करना चाहिए। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बिन्दु है। श्रीकृष्ण का वह आदेश प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से गुरु-परम्परा के माध्यम से आता है। अतः आध्यात्मिक गुरु के आदेश को जीवन का प्रमुख कर्तव्य मानना चाहिए। यदि मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु प्राप्त हो जाए और वह उनके निर्देशन के अनुसार कर्म करे, तो कृष्णभावनामृत में उसके जीवन की सिद्धि सुनिश्चित है।
Bg 18.58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥
मत्—मेरी; चित्तः—भावना में; सर्व—समस्त; दुर्गाणि—बाधाएँ; मत्—मेरी; प्रसादात्—कृपा से; तरिष्यसि—तुम पार कर जाओगे; अथ—इसलिए; चेत्—यदि; त्वम्—तुम; अहङ्कारात्—मिथ्या अहंकार से; न—नहीं; श्रोष्यसि—श्रवण नहीं करते; विनङ्क्ष्यसि—तब तुम विनष्ट हो जाओगे।
यदि तुम मेरे प्रति सचेत हो जाओ, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन की समस्त बाधाओं को पार कर जाओगे। किन्तु यदि तुम ऐसी भावना में कर्म न करके मिथ्या अहंकार के द्वारा कर्म करो और मेरा श्रवण न करो, तो तुम विनष्ट हो जाओगे।
पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति अपने अस्तित्व के कर्तव्यों के निर्वाह को लेकर अनुचित रूप से चिन्तित नहीं रहता। मूर्ख जन समस्त चिन्ता से इस महान् मुक्ति को नहीं समझ सकते। जो कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं। वे सदा अपने मित्र की सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं, और उस मित्र को अपने आप को अर्पित कर देते हैं, जो भगवान् को प्रसन्न करने हेतु चौबीसों घण्टे इतनी भक्तिपूर्वक कर्म में संलग्न रहता है। अतः किसी को भी जीवन की देहात्म-बुद्धि के मिथ्या अहंकार में नहीं बह जाना चाहिए। मनुष्य को स्वयं को भौतिक प्रकृति के नियमों से स्वतन्त्र अथवा कर्म करने हेतु मुक्त नहीं मानना चाहिए। वह तो पहले से ही कठोर भौतिक नियमों के अधीन है। किन्तु ज्यों ही वह कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, त्यों ही वह मुक्त हो जाता है, भौतिक उलझनों से रहित हो जाता है। मनुष्य को अत्यन्त सावधानीपूर्वक यह ध्यान रखना चाहिए कि जो कृष्णभावनामृत में सक्रिय नहीं है, वह भौतिक भँवर में, जन्म-मृत्यु के सागर में स्वयं को खोता जा रहा है। कोई भी बद्धजीव वास्तव में यह नहीं जानता कि क्या करना है और क्या नहीं करना, किन्तु जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, वह कर्म करने हेतु स्वतन्त्र है, क्योंकि सब कुछ अन्तःकरण से श्रीकृष्ण द्वारा प्रेरित होता है तथा आध्यात्मिक गुरु द्वारा पुष्ट होता है।
Bg 18.59
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
यत्—इसलिए; अहङ्कारम्—मिथ्या अहंकार; आश्रित्य—शरण लेकर; न—नहीं; योत्स्य—युद्ध करूँगा; इति—इस प्रकार; मन्यसे—सोचते हो; मिथ्या एषः—यह सब मिथ्या है; व्यवसायः ते—तुम्हारा संकल्प; प्रकृतिः—भौतिक प्रकृति; त्वाम्—तुम्हें; नियोक्ष्यति—प्रवृत्त करेगी।
यदि तुम मेरे निर्देश के अनुसार कर्म न करो और युद्ध न करो, तो तुम मिथ्या मार्ग पर चले जाओगे। अपने स्वभाव के कारण तुम्हें युद्ध में प्रवृत्त होना ही पड़ेगा।
अर्जुन एक सैनिक था, और क्षत्रिय स्वभाव में जन्मा था। अतः उसका स्वाभाविक कर्तव्य युद्ध करना था। किन्तु मिथ्या अहंकार के कारण वह भयभीत था कि अपने गुरु, पितामह तथा मित्रों का वध करने से पापपूर्ण प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होंगी। वस्तुतः वह स्वयं को अपने कर्मों का स्वामी मान रहा था, मानो ऐसे कर्म के शुभ तथा अशुभ फलों का निर्देशन वही कर रहा हो। वह यह भूल गया कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वहाँ उपस्थित होकर उसे युद्ध करने का उपदेश दे रहे थे। यही बद्धजीव की विस्मृति है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् यह निर्देश देते हैं कि क्या शुभ है और क्या अशुभ, और मनुष्य को जीवन की सिद्धि प्राप्त करने हेतु केवल कृष्णभावनामृत में कर्म करना होता है। जिस प्रकार परमेश्वर मनुष्य की नियति का निश्चय कर सकते हैं, उस प्रकार कोई अन्य नहीं कर सकता; अतः सर्वोत्तम मार्ग यही है कि मनुष्य परमेश्वर से निर्देश लेकर कर्म करे। किसी को भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश अथवा भगवान् के प्रतिनिधि उस आध्यात्मिक गुरु के आदेश की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मनुष्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश के पालन हेतु बिना किसी हिचकिचाहट के कर्म करना चाहिए—यही उसे समस्त परिस्थितियों में सुरक्षित रखेगा।
Bg 18.6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
एतानि—ये सब; अपि—निश्चय ही; तु—अवश्य; कर्माणि—कर्म; सङ्गम्—संग; त्यक्त्वा—त्यागकर; फलानि—फल; च—भी; कर्तव्यानि—कर्तव्य के रूप में; इति—इस प्रकार; मे—मेरा; पार्थ—हे पृथापुत्र; निश्चितम्—निश्चित; मतम्—मत; उत्तमम्—श्रेष्ठ।
ये समस्त कर्म फल की किसी भी अपेक्षा के बिना सम्पन्न किए जाने चाहिए। हे पृथापुत्र, इन्हें कर्तव्य के रूप में सम्पन्न किया जाना चाहिए। यही मेरा अन्तिम मत है।
यद्यपि समस्त यज्ञ पवित्र करने वाले हैं, तथापि मनुष्य को ऐसे अनुष्ठानों से किसी फल की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, जो यज्ञ जीवन में भौतिक उन्नति हेतु हैं, उनका त्याग कर देना चाहिए, किन्तु जो यज्ञ मनुष्य के अस्तित्व को शुद्ध करते हैं और उसे आध्यात्मिक स्तर तक उठाते हैं, उन्हें बन्द नहीं किया जाना चाहिए। जो कुछ भी कृष्णभावनामृत की ओर ले जाता है, उसे प्रोत्साहित करना चाहिए। श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है कि जो भी कर्म भगवान् की भक्ति की ओर ले जाए, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। यही धर्म की सर्वोच्च कसौटी है। भगवान् के भक्त को किसी भी प्रकार का वह कर्म, यज्ञ अथवा दान स्वीकार करना चाहिए जो भगवान् की भक्ति के सम्पादन में उसकी सहायता करे।
Bg 18.60
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥
स्व-भाव-जेन—अपने ही स्वभाव से; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; निबद्धः—बद्ध; स्वेन—अपने ही; कर्मणा—कर्मों से; कर्तुम्—करने के लिए; न—नहीं; इच्छसि—चाहते; यत्—जो; मोहात्—मोह से; करिष्यसि—तुम करोगे; अवशः—विवशतापूर्वक; अपि—भी; तत्—वह।
हे कुन्तीपुत्र, मोह के वशीभूत होकर तुम इस समय मेरे निर्देश के अनुसार कर्म करने से विमुख हो रहे हो। किन्तु अपने ही स्वभाव से विवश होकर तुम वही कर्म करोगे।
यदि मनुष्य परमेश्वर के निर्देशन में कर्म करने से इन्कार करता है, तो वह उन गुणों के द्वारा कर्म करने को विवश हो जाता है, जिनमें वह स्थित है। प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के किसी विशेष संयोग के वशीभूत होकर उसी रीति से कर्म कर रहा है। किन्तु जो कोई स्वेच्छा से परमेश्वर के निर्देशन में स्वयं को संलग्न करता है, वह महिमामय बन जाता है।
Bg 18.61
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥
ईश्वरः—परमेश्वर; सर्व-भूतानाम्—समस्त जीवों के; हृद्-देशे—हृदय के स्थान में; अर्जुन—हे अर्जुन; तिष्ठति—निवास करते हैं; भ्रामयन्—भ्रमण कराते हुए; सर्व-भूतानि—समस्त जीवों को; यन्त्र—यन्त्र; आरूढानि—उस पर स्थित; मायया—भौतिक ऊर्जा के वशीभूत।
हे अर्जुन, परमेश्वर सबके हृदय में स्थित हैं, और समस्त जीवों के भ्रमण का निर्देशन कर रहे हैं, जो भौतिक ऊर्जा से बने एक यन्त्र पर मानो आरूढ़ हैं।
अर्जुन परम ज्ञाता नहीं था, और युद्ध करने अथवा न करने का उसका निर्णय उसकी सीमित विवेक-बुद्धि तक ही सीमित था। भगवान् श्रीकृष्ण ने उपदेश दिया कि व्यक्ति ही सर्वस्व नहीं है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, अथवा स्वयं श्रीकृष्ण, स्थानिक परमात्मा के रूप में, हृदय में स्थित रहकर जीव का निर्देशन करते हैं। शरीर बदलने के पश्चात् जीव अपने पूर्व कर्मों को भूल जाता है, किन्तु परमात्मा, भूत, वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञाता के रूप में, उसके समस्त कर्मों के साक्षी बने रहते हैं। अतः जीवों के समस्त कर्मों का निर्देशन इन्हीं परमात्मा के द्वारा होता है। जीव वह प्राप्त करता है जिसका वह अधिकारी है, और परमात्मा के निर्देशन में भौतिक ऊर्जा में रचित भौतिक शरीर के द्वारा वहन किया जाता है। ज्यों ही जीव किसी विशेष प्रकार के शरीर में स्थापित होता है, त्यों ही उसे उस शारीरिक स्थिति के वशीभूत होकर कर्म करना पड़ता है। तीव्र गति की मोटरकार में बैठा व्यक्ति धीमी कार में बैठे व्यक्ति की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से जाता है, यद्यपि चालक, अर्थात् जीव, समान ही हो सकते हैं। इसी प्रकार, परमात्मा के आदेश से भौतिक प्रकृति किसी विशेष प्रकार के जीव को, उसकी पूर्व वासनाओं के अनुरूप कर्म करने हेतु, किसी विशेष प्रकार का शरीर गढ़ती है। जीव स्वतन्त्र नहीं है। मनुष्य को स्वयं को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से स्वतन्त्र नहीं मानना चाहिए। व्यक्ति सदा उनके नियन्त्रण में रहता है। अतः उसका कर्तव्य है शरणागति, और यही अगले श्लोक का आदेश है।
Bg 18.62
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥
तम्—उनकी; एव—निश्चय ही; शरणम्—शरण; गच्छ—जाओ; सर्व-भावेन—सब प्रकार से; भारत—हे भरतपुत्र; तत्-प्रसादात्—उनकी कृपा से; पराम्—दिव्य; शान्तिम्—शान्ति; स्थानम्—धाम; प्राप्स्यसि—तुम प्राप्त करोगे; शाश्वतम्—नित्य।
हे भरतवंशी, सर्वथा उनकी शरण में जाओ। उनकी कृपा से तुम दिव्य शान्ति तथा परम एवं नित्य धाम को प्राप्त करोगे।
अतः जीव को सबके हृदय में स्थित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण में जाना चाहिए, और इससे वह इस भौतिक अस्तित्व के सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हो जाएगा। ऐसी शरणागति के द्वारा वह न केवल इस जीवन के समस्त दुःखों से मुक्त होगा, अपितु अन्त में परमेश्वर तक भी पहुँच जाएगा। दिव्य जगत् का वर्णन वैदिक साहित्य में तद् विष्णोः परमं पदम् के रूप में किया गया है। चूँकि समस्त सृष्टि भगवान् का राज्य है, अतः समस्त भौतिक वस्तु वस्तुतः आध्यात्मिक है, किन्तु परमं पदम् विशेष रूप से उस नित्य धाम को इंगित करता है, जिसे आध्यात्मिक आकाश अथवा वैकुण्ठ कहा जाता है।
भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है: “सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः।” भगवान् सबके हृदय में स्थित हैं, अतः यह संस्तुति कि मनुष्य को अन्तर में स्थित परमात्मा की शरण में जाना चाहिए, इसका अर्थ है कि मनुष्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जाना चाहिए। अर्जुन तो श्रीकृष्ण को पहले ही परमेश्वर के रूप में स्वीकार कर चुका है। दसवें अध्याय में उन्हें परं ब्रह्म परं धाम के रूप में स्वीकार किया गया था। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तथा समस्त जीवों के परम धाम के रूप में केवल अपने व्यक्तिगत अनुभव के कारण ही नहीं, अपितु नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे महान् प्रामाणिक पुरुषों के प्रमाणों के कारण भी स्वीकार किया है।
Bg 18.63
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥
इति—इस प्रकार; ते—तुम्हें; ज्ञानम्—ज्ञान; आख्यातम्—वर्णन किया; गुह्यात्—गोपनीय; गुह्यतरम्—और भी अधिक गोपनीय; मया—मेरे द्वारा; विमृश्य—विचार करके; एतत्—उस पर; अशेषेण—पूर्णतया; यथा—जैसा तुम; इच्छसि—चाहो; तथा—वैसा; कुरु—करो।
इस प्रकार मैंने तुम्हें समस्त ज्ञानों में सर्वाधिक गोपनीय ज्ञान का वर्णन किया है। इस पर पूर्णतया विचार करो, और तत्पश्चात् जो चाहो वही करो।
भगवान् पहले ही अर्जुन को ब्रह्मभूत का ज्ञान समझा चुके हैं। जो ब्रह्मभूत अवस्था में है, वह आनन्दमय रहता है; वह न तो कभी शोक करता है, न ही किसी वस्तु की कामना करता है। यह गोपनीय ज्ञान के कारण है। श्रीकृष्ण परमात्मा का ज्ञान भी प्रकट करते हैं। यह भी ब्रह्म-ज्ञान है, ब्रह्म का ज्ञान है, किन्तु यह श्रेष्ठतर है।
यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह जैसा चाहे वैसा कर सकता है। भगवान् जीव की उस अल्प स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करते। भगवद्गीता में भगवान् ने सब प्रकार से यह समझाया है कि मनुष्य अपनी जीवन-दशा को किस प्रकार उन्नत कर सकता है। अर्जुन को दिया गया सर्वोत्तम परामर्श यही है कि वह अपने हृदय में स्थित परमात्मा की शरण में जाए। सम्यक् विवेक के द्वारा मनुष्य को परमात्मा के आदेश के अनुसार कर्म करने हेतु सहमत होना चाहिए। इससे मनुष्य को कृष्णभावनामृत में, अर्थात् मानव-जीवन की सर्वोच्च सिद्धि-अवस्था में, निरन्तर स्थित रहने में सहायता मिलेगी। अर्जुन को साक्षात् भगवान् के द्वारा युद्ध करने का आदेश दिया जा रहा है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरणागति जीवों के सर्वोत्तम हित में है। यह परमेश्वर के हित में नहीं है। शरणागति से पूर्व मनुष्य जहाँ तक उसकी बुद्धि जाती है, इस विषय पर विचार करने के लिए स्वतन्त्र है; यही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के उपदेश को स्वीकार करने का सर्वोत्तम मार्ग है। ऐसा उपदेश श्रीकृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधि, आध्यात्मिक गुरु, के माध्यम से भी आता है।
Bg 18.64
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥
सर्व-गुह्यतमम्—सर्वाधिक गोपनीय; भूयः—पुनः; शृणु—सुनो; मे—मुझसे; परमम्—परम; वचः—उपदेश; इष्टः असि—तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो; दृढम्—अत्यन्त; इति—इस प्रकार; ततः—इसलिए; वक्ष्यामि—कहता हूँ; ते—तुम्हारे; हितम्—हित।
चूँकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो, अतः मैं तुम्हें ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश कह रहा हूँ। इसे मुझसे सुनो, क्योंकि यह तुम्हारे हित के लिए है।
भगवान् ने अर्जुन को सबके हृदय में स्थित परमात्मा का गोपनीय ज्ञान दिया है, और अब वे इस ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश दे रहे हैं: केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण में जाओ। नवें अध्याय के अन्त में उन्होंने कहा है, “केवल सदा मेरा ही चिन्तन करो।” वही उपदेश यहाँ भगवद्गीता की शिक्षाओं के सार पर बल देने हेतु दोहराया गया है। यह सार किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा नहीं समझा जाता, अपितु उसके द्वारा समझा जाता है जो वास्तव में श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है, श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त है। यह समस्त वैदिक साहित्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपदेश है। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण जो कह रहे हैं, वह ज्ञान का सर्वाधिक सारभूत अंश है, और इसका पालन केवल अर्जुन के द्वारा ही नहीं, अपितु समस्त जीवों के द्वारा किया जाना चाहिए।
Bg 18.65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥
मत्-मनाः—मेरा चिन्तन करने वाले; भव—हो जाओ; मत्-भक्तः—मेरे भक्त; मत्-याजी—मेरे उपासक; माम्—मुझे; नमस्कुरु—नमस्कार करो; माम्—मुझे; एव—निश्चय ही; एष्यसि—आओगे; सत्यम्—सत्य रूप में; ते—तुमसे; प्रतिजाने—मैं प्रतिज्ञा करता हूँ; प्रियः—प्रिय; असि—तुम हो; मे—मेरे।
सदा मेरा चिन्तन करो और मेरे भक्त बन जाओ। मेरी आराधना करो और मुझे प्रणाम अर्पित करो। इस प्रकार तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त करोगे। मैं तुमसे यह प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो।
ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश यही है कि मनुष्य को श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त बन जाना चाहिए, सदा उनका चिन्तन करना चाहिए तथा उनके लिए कर्म करना चाहिए। मनुष्य को औपचारिक ध्यानी नहीं बन जाना चाहिए। जीवन को ऐसा गढ़ा जाना चाहिए कि मनुष्य को सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करने का अवसर मिलता रहे। मनुष्य को सदा ऐसी रीति से कर्म करना चाहिए कि उसके समस्त दैनिक कर्म श्रीकृष्ण के साथ सम्बद्ध रहें। उसे अपने जीवन को ऐसी रीति से व्यवस्थित करना चाहिए कि चौबीसों घण्टों में वह श्रीकृष्ण के चिन्तन के बिना रह ही न सके। और भगवान् की प्रतिज्ञा यह है कि जो कोई ऐसे शुद्ध कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह निश्चय ही श्रीकृष्ण के धाम को लौटेगा, जहाँ वह श्रीकृष्ण की आमने-सामने की संगति में संलग्न रहेगा। ज्ञान का यह सर्वाधिक गोपनीय अंश अर्जुन से इसलिए कहा गया, क्योंकि वह श्रीकृष्ण का प्रिय मित्र है। जो कोई अर्जुन के मार्ग का अनुसरण करता है, वह श्रीकृष्ण का प्रिय मित्र बन सकता है और अर्जुन के समान ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
ये शब्द इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य को अपना मन श्रीकृष्ण पर एकाग्र करना चाहिए—वही दो भुजाओं वाला, बाँसुरी धारण किए, सुन्दर मुख तथा केशों में मयूरपंख धारण किए नीलवर्ण बालक। ब्रह्म-संहिता तथा अन्य ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के वर्णन मिलते हैं। मनुष्य को अपना मन भगवान् के इसी आदि रूप, श्रीकृष्ण, पर स्थिर करना चाहिए। उसे अपना ध्यान भगवान् के अन्य रूपों की ओर भी विचलित नहीं करना चाहिए। भगवान् के अनेक रूप हैं, यथा विष्णु, नारायण, राम, वराह आदि, किन्तु भक्त को अपना मन उस रूप पर एकाग्र करना चाहिए जो अर्जुन के समक्ष उपस्थित था। श्रीकृष्ण के रूप पर मन की एकाग्रता ही ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश है, और यह अर्जुन के समक्ष इसलिए प्रकट किया गया है, क्योंकि अर्जुन श्रीकृष्ण का सर्वाधिक प्रिय मित्र है।
Bg 18.66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥
सर्व-धर्मान्—सब प्रकार के धर्म; परित्यज्य—त्याग कर; माम्—मेरी; एकम्—केवल; शरणम्—शरण; व्रज—जाओ; अहम्—मैं; त्वाम्—तुम्हें; सर्व—समस्त; पापेभ्यः—पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से; मोक्षयिष्यामि—मुक्त कर दूँगा; मा—मत; शुचः—चिन्ता करो।
सब प्रकार के धर्मों को त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूँगा। भयभीत मत होओ।
भगवान् ने विविध प्रकार के ज्ञानों, धर्म की प्रक्रियाओं, परब्रह्म के ज्ञान, परमात्मा के ज्ञान, सामाजिक जीवन के विभिन्न प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों के ज्ञान, संन्यास-आश्रम के ज्ञान, अनासक्ति के ज्ञान, इन्द्रिय तथा मन के संयम, ध्यान आदि का वर्णन किया है। उन्होंने इतने प्रकारों से विभिन्न प्रकार के धर्मों का वर्णन किया है। अब, भगवद्गीता का उपसंहार करते हुए, भगवान् कहते हैं कि अर्जुन को उन समस्त प्रक्रियाओं को त्याग देना चाहिए जो उसे समझाई गई हैं; उसे केवल श्रीकृष्ण की शरण में जाना चाहिए। वह शरणागति उसे सब प्रकार की पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से बचाएगी, क्योंकि भगवान् स्वयं उसकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा करते हैं।
आठवें अध्याय में कहा गया था कि केवल वही, जो समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो चुका है, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना का आश्रय ले सकता है। अतः कोई यह सोच सकता है कि जब तक वह समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक वह शरणागति की प्रक्रिया का आश्रय नहीं ले सकता। ऐसे सन्देहों के विषय में यहाँ कहा गया है कि यदि मनुष्य समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त नहीं भी है, तो भी केवल श्रीकृष्ण की शरण में जाने की प्रक्रिया से वह स्वतः मुक्त हो जाता है। पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से स्वयं को मुक्त करने हेतु श्रमसाध्य प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य को बिना किसी हिचकिचाहट के श्रीकृष्ण को समस्त जीवों के परम उद्धारक के रूप में स्वीकार करना चाहिए। श्रद्धा तथा प्रेम सहित उसे उनकी शरण में जाना चाहिए।
भक्ति की प्रक्रिया के अनुसार मनुष्य को केवल ऐसे धार्मिक सिद्धान्तों को स्वीकार करना चाहिए जो अन्ततः भगवान् की भक्ति की ओर ले जाएँ। मनुष्य सामाजिक व्यवस्था में अपनी स्थिति के अनुसार कोई विशेष व्यावसायिक कर्तव्य निभा सकता है, किन्तु यदि अपना कर्तव्य निभाते हुए वह कृष्णभावनामृत के बिन्दु तक नहीं पहुँचता, तो उसके समस्त कर्म व्यर्थ हैं।
जो कुछ कृष्णभावनामृत की सिद्धि-अवस्था की ओर न ले जाए, उसका त्याग कर देना चाहिए। मनुष्य को विश्वास रखना चाहिए कि समस्त परिस्थितियों में श्रीकृष्ण उसे सब प्रकार की कठिनाइयों से रक्षा करेंगे। यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि मनुष्य अपने शरीर तथा आत्मा को किस प्रकार साथ-साथ बनाए रखे। इसकी देखभाल श्रीकृष्ण करेंगे। मनुष्य को सदा स्वयं को असहाय मानना चाहिए और श्रीकृष्ण को ही अपने जीवन की प्रगति का एकमात्र आधार मानना चाहिए। ज्यों ही मनुष्य पूर्ण कृष्णभावनामृत में भगवान् की भक्ति में गम्भीरतापूर्वक संलग्न होता है, त्यों ही वह भौतिक प्रकृति के समस्त कल्मष से मुक्त हो जाता है। धर्म की तथा ज्ञान के अनुशीलन, योगपद्धति में योगाभ्यासमय ध्यान आदि के द्वारा शुद्धिकरण की विभिन्न प्रक्रियाएँ हैं, किन्तु जो श्रीकृष्ण की शरण में जाता है, उसे इतनी सारी विधियों का पालन नहीं करना पड़ता। श्रीकृष्ण की वह सरल शरणागति उसे अनावश्यक रूप से समय गँवाने से बचा लेगी। इस प्रकार मनुष्य एक ही साथ समस्त प्रगति कर सकता है और समस्त पापपूर्ण प्रतिक्रिया से मुक्त हो सकता है।
मनुष्य को श्रीकृष्ण की सुन्दर छवि से आकृष्ट होना चाहिए। उनका नाम श्रीकृष्ण इसलिए है, क्योंकि वे सर्व-आकर्षक हैं। जो श्रीकृष्ण की सुन्दर, सर्व-शक्तिमान, सर्वसमर्थ छवि से आकृष्ट हो जाता है, वह सौभाग्यशाली है। दिव्यवादी विभिन्न प्रकार के होते हैं—उनमें से कुछ निराकार ब्रह्म की छवि के प्रति आसक्त रहते हैं, कुछ परमात्मा-पक्ष से आकृष्ट रहते हैं, आदि, किन्तु जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साकार पक्ष से आकृष्ट होता है, और सबसे बढ़कर, जो स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से आकृष्ट होता है, वही सर्वाधिक पूर्ण दिव्यवादी है। दूसरे शब्दों में, पूर्ण भावना में श्रीकृष्ण की भक्ति ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश है, और यही समूची भगवद्गीता का सार है। कर्मयोगी, अनुभववादी दार्शनिक, योगी तथा भक्त—ये सभी दिव्यवादी कहलाते हैं, किन्तु जो शुद्ध भक्त है, वह इन सबमें श्रेष्ठ है। यहाँ प्रयुक्त विशिष्ट शब्द मा शुचः, अर्थात् “मत डरो, मत हिचकिचाओ, मत चिन्ता करो”, अत्यन्त सार्थक हैं। मनुष्य इस विषय में उलझन में पड़ सकता है कि वह सब प्रकार के धार्मिक रूपों को त्याग कर केवल श्रीकृष्ण की शरण में किस प्रकार जा सकता है, किन्तु ऐसी चिन्ता व्यर्थ है।
Bg 18.67
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
इदम्—यह; ते—तुम्हें; न—कभी नहीं; अतपस्काय—जो तपस्वी नहीं है; न—कभी नहीं; अभक्ताय—जो भक्त नहीं है; कदाचन—किसी भी समय; न—कभी नहीं; च—भी; अशुश्रूषवे—जो भक्ति में संलग्न नहीं है; वाच्यम्—कहा जाना चाहिए; न—कभी नहीं; च—भी; माम्—मुझसे; यः—जो कोई; अभ्यसूयति—ईर्ष्या करता है।
यह गोपनीय ज्ञान उन्हें कभी नहीं समझाया जाना चाहिए जो न तो तपस्वी हैं, न भक्त हैं, और न ही भक्ति में संलग्न हैं, और न ही उसे जो मुझसे ईर्ष्या करता है।
जिन व्यक्तियों ने धर्म की प्रक्रिया की तपस्याएँ नहीं की हैं, जिन्होंने कभी कृष्णभावनामृत में भक्ति का प्रयत्न नहीं किया है, जिन्होंने किसी शुद्ध भक्त की सेवा-शुश्रूषा नहीं की है, और विशेष रूप से वे जो श्रीकृष्ण को एक ऐतिहासिक पुरुष के रूप में मानते हैं अथवा श्रीकृष्ण की महानता से ईर्ष्या करते हैं, उन्हें ज्ञान का यह सर्वाधिक गोपनीय अंश नहीं बताया जाना चाहिए। किन्तु यह यदा-कदा देखा जाता है कि श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करने वाले आसुरिक व्यक्ति भी, जो श्रीकृष्ण की एक भिन्न रीति से उपासना करते हैं, व्यवसाय करने हेतु भगवद्गीता की एक भिन्न रीति से व्याख्या करने का पेशा अपना लेते हैं, किन्तु जो वास्तव में श्रीकृष्ण को समझना चाहता है, उसे भगवद्गीता पर ऐसी टीकाओं से बचना चाहिए। वस्तुतः भगवद्गीता का प्रयोजन उनके लिए बोधगम्य नहीं है, जो विषयासक्त हैं—यदि कोई विषयासक्त न भी हो किन्तु वैदिक शास्त्र में विहित अनुशासनों का कठोरता से पालन करता हो, तो भी यदि वह भक्त नहीं है, तो वह श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकता। जब कोई स्वयं को श्रीकृष्ण का भक्त भी प्रदर्शित करे, किन्तु कृष्णभावनामय कर्मों में संलग्न न हो, तो वह भी श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकता। ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करते हैं, क्योंकि उन्होंने भगवद्गीता में यह समझाया है कि वे ही परमेश्वर हैं और उनसे ऊपर अथवा उनके समान कुछ भी नहीं है। ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को भगवद्गीता नहीं बतानी चाहिए, क्योंकि वे उसे नहीं समझ सकते। श्रद्धाहीन व्यक्तियों के द्वारा भगवद्गीता तथा श्रीकृष्ण को समझे जाने की कोई सम्भावना नहीं है। किसी शुद्ध भक्त के अधिकार से श्रीकृष्ण को समझे बिना मनुष्य को भगवद्गीता पर टीका करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।
Bg 18.68
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥
यः—जो कोई; इदम्—यह; परमम्—परम; गुह्यम्—गोपनीय; मत्—मेरे; भक्तेषु—भक्तों में; अभिधास्यति—समझाता है; भक्तिम्—भक्ति; मयि—मुझमें; पराम्—दिव्य; कृत्वा—करके; माम्—मुझे; एव—निश्चय ही; एष्यति—प्राप्त करता है; असंशयः—सन्देह रहित।
जो इस परम रहस्य को भक्तों के समक्ष समझाता है, उसकी भक्ति सुनिश्चित हो जाती है, और अन्त में वह मेरे पास लौट आएगा।
सामान्यतः यह परामर्श दिया जाता है कि भगवद्गीता की चर्चा केवल भक्तों के मध्य ही की जाए, क्योंकि जो भक्त नहीं हैं, वे न तो श्रीकृष्ण को समझेंगे और न ही भगवद्गीता को। जो श्रीकृष्ण को उनके यथार्थ रूप में तथा भगवद्गीता को उसके यथार्थ रूप में स्वीकार नहीं करते, उन्हें भगवद्गीता की स्वेच्छाचारितापूर्वक व्याख्या करके अपराधी नहीं बनना चाहिए। भगवद्गीता उन व्यक्तियों को समझाई जानी चाहिए जो श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार करने हेतु तैयार हैं। यह केवल भक्तों के लिए विषय है, दार्शनिक कल्पनावादियों के लिए नहीं। किन्तु जो कोई भगवद्गीता को उसके यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने का निष्ठापूर्वक प्रयत्न करता है, वह भक्तिमय कर्मों में उन्नत होगा और जीवन की शुद्ध भक्ति-अवस्था को प्राप्त करेगा। ऐसी शुद्ध भक्ति के फलस्वरूप वह निश्चय ही भगवद्धाम को, भगवान् के पास, लौटेगा।
Bg 18.69
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥
न—कभी नहीं; च—और; तस्मात्—इसलिए; मनुष्येषु—मनुष्यों में; कश्चित्—कोई; मे—मेरा; प्रिय-कृत्तमः—अधिक प्रिय; भविता—होगा; न—नहीं; च—और; मे—मुझे; तस्मात्—उससे; अन्यः—अन्य; प्रियतरः—अधिक प्रिय; भुवि—इस संसार में।
इस संसार में उससे अधिक प्रिय मेरा कोई सेवक नहीं है, और न ही कभी उससे अधिक प्रिय कोई होगा।
Bg 18.7
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
नियतस्य—विहित कर्तव्यों का; तु—किन्तु; संन्यासः—संन्यास; कर्मणः—कर्मों का; न—कभी नहीं; उपपद्यते—उचित है; मोहात्—मोह के कारण; तस्य—जिसका; परित्यागः—त्याग; तामसः—तमोगुण में; परिकीर्तितः—घोषित।
विहित कर्तव्यों का कभी त्याग नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई मोहवश अपने विहित कर्तव्यों का त्याग कर देता है, तो ऐसा त्याग तमोगुणी कहा जाता है।
भौतिक तृप्ति हेतु किए जाने वाले कर्म का त्याग कर देना चाहिए, किन्तु जो कर्म मनुष्य को आध्यात्मिक कर्म की ओर अग्रसर करते हैं—जैसे परमेश्वर के लिए भोजन पकाना तथा वह भोजन भगवान् को अर्पित करके फिर ग्रहण करना—उनकी अनुशंसा की जाती है। कहा जाता है कि संन्यास-आश्रम में स्थित व्यक्ति को अपने लिए भोजन नहीं पकाना चाहिए। अपने लिए भोजन पकाना निषिद्ध है, किन्तु परमेश्वर के लिए भोजन पकाना निषिद्ध नहीं है। इसी प्रकार, कोई संन्यासी अपने शिष्य को कृष्णभावनामृत में उन्नति हेतु सहायता देने के लिए विवाह-संस्कार सम्पन्न करा सकता है। यदि कोई ऐसे कर्मों का त्याग करता है, तो यह समझना चाहिए कि वह तमोगुण में कर्म कर रहा है।
Bg 18.70
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥
अध्येष्यते—अध्ययन करेगा; च—भी; यः—जो; इमम्—इस; धर्म्यम्—पवित्र; संवादम्—संवाद का; आवयोः—हम दोनों के; ज्ञान—ज्ञान; यज्ञेन—यज्ञ से; तेन—उसके द्वारा; अहम्—मैं; इष्टः—पूजित; स्याम्—होऊँगा; इति—इस प्रकार; मे—मेरा; मतिः—मत।
और मैं घोषित करता हूँ कि जो इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि के द्वारा मेरी आराधना करता है।
Bg 18.71
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥
श्रद्धावान्—श्रद्धालु; अनसूयः च—तथा ईर्ष्यारहित; शृणुयात्—सुनता है; अपि—निश्चय ही; यः—जो; नरः—मनुष्य; सः अपि—वह भी; मुक्तः—मुक्त होकर; शुभान्—शुभ; लोकान्—लोकों को; प्राप्नुयात्—प्राप्त करता है; पुण्य-कर्मणाम्—पुण्यकर्मियों के।
और जो श्रद्धा से तथा ईर्ष्यारहित होकर सुनता है, वह पापमय प्रतिक्रिया से मुक्त हो जाता है और उन लोकों को प्राप्त करता है, जहाँ पुण्यात्मा निवास करते हैं।
इस अध्याय के सत्तरवें श्लोक में भगवान् ने स्पष्ट रूप से उन व्यक्तियों को गीता सुनाने का निषेध किया, जो भगवान् से ईर्ष्या करते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवद्गीता केवल भक्तों के लिए है, किन्तु ऐसा होता है कि कभी-कभी भगवान् का कोई भक्त खुली कक्षा आयोजित करता है, और उस कक्षा में सभी विद्यार्थियों से भक्त होने की अपेक्षा नहीं की जाती। ऐसे व्यक्ति खुली कक्षा क्यों आयोजित करते हैं? यहाँ यह समझाया गया है कि यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति भक्त नहीं होता, तथापि ऐसे अनेक मनुष्य हैं जो श्रीकृष्ण से ईर्ष्या नहीं करते। उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में उन पर श्रद्धा होती है। यदि ऐसे व्यक्ति किसी प्रामाणिक भक्त से भगवान् के विषय में सुनें, तो इसका परिणाम यह होता है कि वे तत्काल समस्त पापमय प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाते हैं, और तत्पश्चात् उस लोक-व्यवस्था को प्राप्त करते हैं, जहाँ समस्त धर्मात्मा व्यक्ति स्थित हैं। अतः केवल भगवद्गीता सुनने मात्र से ही, वह व्यक्ति भी जो शुद्ध भक्त बनने का प्रयत्न नहीं करता, धर्ममय कर्मों का फल प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार भगवान् का शुद्ध भक्त प्रत्येक व्यक्ति को समस्त पापमय प्रतिक्रियाओं से मुक्त होने तथा भगवान् का भक्त बनने का अवसर प्रदान करता है।
सामान्यतः जो पापमय प्रतिक्रिया से मुक्त होते हैं, वे धर्मात्मा होते हैं। ऐसे व्यक्ति अत्यन्त सरलता से कृष्णभावनामृत को ग्रहण कर लेते हैं। यहाँ पुण्य-कर्मणाम् शब्द अत्यन्त सार्थक है। यह महान् यज्ञ के सम्पादन की ओर संकेत करता है। जो भक्ति के सम्पादन में धर्मात्मा हैं, किन्तु शुद्ध नहीं हैं, वे ध्रुवतारा अर्थात् ध्रुवलोक की लोक-व्यवस्था को प्राप्त कर सकते हैं, जहाँ ध्रुव महाराज अध्यक्ष हैं। वे भगवान् के एक महान् भक्त हैं, और उनका एक विशेष लोक है, जिसे ध्रुवतारा कहा जाता है।
Bg 18.72
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रणष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥
कच्चित्—क्या; एतत्—यह; श्रुतम्—सुना गया; पार्थ—हे पृथापुत्र; त्वया—तुम्हारे द्वारा; एकाग्रेण—पूर्ण ध्यान से; चेतसा—मन से; कच्चित्—क्या; अज्ञान—अज्ञान; सम्मोहः—मोह; प्रणष्टः—दूर हुआ; ते—तुम्हारा; धनञ्जय—हे धनञ्जय (अर्जुन)।
हे धनञ्जय अर्जुन, क्या तुमने इसे अपने मन से एकाग्र होकर सुना? और क्या अब तुम्हारे मोह तथा अज्ञान दूर हो गए?
भगवान् अर्जुन के आध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य कर रहे थे। अतः अर्जुन से यह पूछना उनका कर्तव्य था कि क्या उसने समूची भगवद्गीता को उसके यथार्थ परिप्रेक्ष्य में समझा। यदि नहीं, तो भगवान् किसी भी बिन्दु को, अथवा आवश्यकता पड़ने पर समूची भगवद्गीता को, पुनः समझाने के लिए तत्पर थे। वस्तुतः जो कोई श्रीकृष्ण अथवा उनके प्रतिनिधि जैसे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से भगवद्गीता सुनता है, वह पाएगा कि उसका समस्त अज्ञान दूर हो जाता है। भगवद्गीता किसी कवि अथवा कथा-लेखक द्वारा लिखी गई कोई साधारण पुस्तक नहीं है; इसे साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कहते हैं। कोई भी व्यक्ति, यदि वह इतना सौभाग्यशाली हो कि इन शिक्षाओं को श्रीकृष्ण से अथवा उनके प्रामाणिक आध्यात्मिक प्रतिनिधि से सुने, तो वह निश्चय ही मुक्त पुरुष बन जाता है और अज्ञान के अन्धकार से बाहर निकल आता है।
Bg 18.73
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; नष्टः—दूर हुआ; मोहः—मोह; स्मृतिः—स्मृति; लब्धा—पुनः प्राप्त की; त्वत्-प्रसादात्—आपकी कृपा से; मया—मेरे द्वारा; अच्युत—हे अच्युत श्रीकृष्ण; स्थितः—स्थित; अस्मि—हूँ; गत—दूर हुए; सन्देहः—समस्त सन्देह; करिष्ये—मैं सम्पन्न करूँगा; वचनम्—आज्ञा; तव—आपकी।
अर्जुन ने कहा : हे प्रिय श्रीकृष्ण, हे अच्युत, अब मेरा मोह दूर हो गया है। आपकी कृपा से मैंने अपनी स्मृति पुनः प्राप्त कर ली है, और अब मैं दृढ़ तथा सन्देहरहित हूँ और आपके निर्देशों के अनुसार कार्य करने के लिए तत्पर हूँ।
अर्जुन द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए जीव की स्वरूपगत स्थिति यह है कि उसे परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार कार्य करना होता है। वह आत्मानुशासन के लिए बना है। श्रीचैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि जीव की वास्तविक स्थिति परमेश्वर के नित्य सेवक की है। इस सिद्धान्त को भुलाकर जीव भौतिक प्रकृति से बद्ध हो जाता है, किन्तु परमेश्वर की सेवा करते हुए वह भगवान् का मुक्त सेवक बन जाता है। जीव की स्वरूपगत स्थिति सेवक की है; उसे या तो मायारूपी भ्रम की सेवा करनी है, या परमेश्वर की। यदि वह परमेश्वर की सेवा करता है, तो वह अपनी स्वाभाविक अवस्था में है, किन्तु यदि वह मायारूपी बहिरंगा शक्ति की सेवा करना पसन्द करता है, तो निश्चय ही वह बन्धन में रहेगा। मोह में जीव इस भौतिक जगत् में सेवा कर रहा है। वह अपने काम तथा इच्छाओं से बँधा है, फिर भी अपने को जगत् का स्वामी मानता है। इसी को मोह कहते हैं। जब कोई व्यक्ति मुक्त होता है, तब उसका मोह समाप्त हो जाता है, और वह स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति आत्मसमर्पण कर देता है ताकि उनकी इच्छानुसार कार्य कर सके। अन्तिम मोह, जीव को फँसाने का मायारूपी अन्तिम जाल, यह प्रस्ताव है कि वह स्वयं ईश्वर है। जीव सोचता है कि वह अब बद्ध आत्मा नहीं, अपितु ईश्वर है। वह इतना अल्पबुद्धि है कि यह नहीं सोचता कि यदि वह ईश्वर होता, तो वह सन्देह में कैसे रहता? इस पर वह विचार नहीं करता। अतः यही मोह का अन्तिम जाल है। वस्तुतः मायारूपी शक्ति से मुक्त होने का अर्थ है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को समझना तथा उनकी आज्ञानुसार कार्य करने के लिए सहमत होना। इस श्लोक में मोहः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मोहः उसकी ओर संकेत करता है, जो ज्ञान के विपरीत है। वास्तव में वास्तविक ज्ञान यह बोध है कि प्रत्येक जीव नित्य रूप से भगवान् का सेवक है, किन्तु अपने को उस स्थिति में मानने के बजाय जीव यह सोचता है कि वह सेवक नहीं, अपितु इस भौतिक जगत् का स्वामी है, क्योंकि वह भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाना चाहता है। यही उसका मोह है। यह मोह भगवान् की कृपा से अथवा किसी शुद्ध भक्त की कृपा से दूर किया जा सकता है। जब वह मोह समाप्त हो जाता है, तब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कार्य करने के लिए सहमत हो जाता है।
कृष्णभावनामृत श्रीकृष्ण की आज्ञा के अनुसार कार्य करना है। पदार्थ की बहिरंगा शक्ति से मोहित बद्ध आत्मा यह नहीं जानती कि परमेश्वर वह स्वामी हैं जो ज्ञान से परिपूर्ण हैं और जो सबके स्वामी हैं। वे जो भी चाहें, अपने भक्तों को प्रदान कर सकते हैं; वे सबके मित्र हैं, और अपने भक्त के प्रति विशेष रूप से अनुरक्त हैं। वे इस भौतिक प्रकृति तथा समस्त जीवों के नियन्ता हैं। वे अक्षय काल के भी नियन्ता हैं, और समस्त ऐश्वर्यों तथा समस्त शक्तियों से परिपूर्ण हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् भक्त को स्वयं अपने आप को भी प्रदान कर सकते हैं। जो उन्हें नहीं जानता, वह मोह के वशीभूत है; वह भक्त नहीं, अपितु माया का सेवक बन जाता है। किन्तु अर्जुन, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से भगवद्गीता सुनने के पश्चात्, समस्त मोह से मुक्त हो गया। वह समझ सका कि श्रीकृष्ण केवल उसके मित्र ही नहीं, अपितु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। और उसने श्रीकृष्ण को यथार्थ रूप में समझ लिया। अतः भगवद्गीता का अध्ययन करना श्रीकृष्ण को यथार्थ रूप में समझना है। जब कोई व्यक्ति पूर्ण ज्ञान में होता है, तब वह स्वाभाविक रूप से श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण कर देता है। जब अर्जुन यह समझ गया कि जनसंख्या की अनावश्यक वृद्धि को घटाना श्रीकृष्ण की योजना है, तब वह श्रीकृष्ण की इच्छानुसार युद्ध करने के लिए सहमत हो गया। उसने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की आज्ञा के अधीन युद्ध करने हेतु पुनः अपने अस्त्र—अपने बाण तथा धनुष—उठा लिए।
Bg 18.74
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
सञ्जयः उवाच—सञ्जय ने कहा; इति—इस प्रकार; अहम्—मैंने; वासुदेवस्य—श्रीकृष्ण के; पार्थस्य—अर्जुन के; च—भी; महात्मनः—दो महान् आत्माओं के; संवादम्—संवाद को; इमम्—इस; अश्रौषम्—सुना; अद्भुतम्—आश्चर्य; रोमहर्षणम्—रोमांचकारी।
सञ्जय ने कहा : इस प्रकार मैंने दो महान् आत्माओं, श्रीकृष्ण तथा अर्जुन का संवाद सुना। और वह सन्देश इतना अद्भुत है कि मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
भगवद्गीता के आरम्भ में धृतराष्ट्र ने अपने सचिव सञ्जय से पूछा, “कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में क्या हुआ?” समूचा वृत्तान्त सञ्जय के आध्यात्मिक गुरु व्यास की कृपा से उसके हृदय में संप्रेषित हुआ। इस प्रकार उसने युद्धक्षेत्र के विषय की व्याख्या की। यह संवाद अद्भुत था, क्योंकि दो महान् आत्माओं के बीच ऐसा महत्त्वपूर्ण संवाद न तो पहले कभी हुआ और न ही पुनः कभी होगा। यह इसलिए अद्भुत है, क्योंकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जीव अर्जुन को, जो भगवान् का एक महान् भक्त है, अपने तथा अपनी शक्तियों के विषय में बता रहे हैं। यदि हम श्रीकृष्ण को समझने हेतु अर्जुन के पदचिह्नों का अनुसरण करें, तो हमारा जीवन सुखमय तथा सफल होगा। सञ्जय ने इसका अनुभव किया, और ज्यों-ज्यों वह इसे समझने लगा, उसने धृतराष्ट्र को यह संवाद सुनाया। अब यह निष्कर्ष निकलता है कि जहाँ श्रीकृष्ण तथा अर्जुन हैं, वहाँ विजय है।
Bg 18.75
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥
व्यास-प्रसादात्—व्यासदेव की कृपा से; श्रुतवान्—सुना; एतत्—यह; गुह्यम्—गोपनीय; अहम्—मैंने; परम्—परम; योगम्—योग; योगेश्वरात्—समस्त योग के स्वामी से; कृष्णात्—श्रीकृष्ण से; साक्षात्—साक्षात्; कथयतः—कहते हुए; स्वयम्—स्वयं।
व्यास की कृपा से मैंने ये परम गोपनीय वार्ताएँ साक्षात् समस्त योग के स्वामी श्रीकृष्ण से सुनीं, जो स्वयं अर्जुन से बात कर रहे थे।
व्यास सञ्जय के आध्यात्मिक गुरु थे, और सञ्जय स्वीकार करता है कि उन्हीं की कृपा से वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझ सका। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से नहीं, अपितु आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से समझना होता है। आध्यात्मिक गुरु पारदर्शी माध्यम हैं, यद्यपि यह सत्य है कि अनुभव प्रत्यक्ष होता है। गुरु-परम्परा का यही रहस्य है। जब आध्यात्मिक गुरु प्रामाणिक होते हैं, तब मनुष्य भगवद्गीता को प्रत्यक्ष रूप से सुन सकता है, जैसे अर्जुन ने सुना। समूचे संसार में अनेक योगी तथा योगाभ्यासी हैं, किन्तु श्रीकृष्ण समस्त योग-पद्धतियों के स्वामी हैं। श्रीकृष्ण का निर्देश भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है—श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण करो। जो ऐसा करता है, वही सर्वोच्च योगी है। इसकी पुष्टि छठे अध्याय के अन्तिम श्लोक में होती है—योगिनाम् अपि सर्वेषाम्।
नारद श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्य तथा व्यास के आध्यात्मिक गुरु हैं। अतः व्यास उतने ही प्रामाणिक हैं जितना अर्जुन, क्योंकि वे गुरु-परम्परा में आते हैं, और सञ्जय व्यास का प्रत्यक्ष शिष्य है। अतएव व्यास की कृपा से उसकी इन्द्रियाँ शुद्ध हो गईं, और वह श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से देख तथा सुन सका। जो श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से सुनता है, वह इस गोपनीय ज्ञान को समझ सकता है। यदि कोई गुरु-परम्परा में नहीं आता, तो वह श्रीकृष्ण को नहीं सुन सकता; फलतः उसका ज्ञान सदैव अपूर्ण रहता है, कम-से-कम भगवद्गीता की समझ के सम्बन्ध में।
भगवद्गीता में समस्त योग-पद्धतियाँ—कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग—समझाई गई हैं। श्रीकृष्ण ऐसे समस्त योग के स्वामी हैं। किन्तु यह समझना चाहिए कि जैसे अर्जुन इतना सौभाग्यशाली था कि उसने श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से समझा, उसी प्रकार व्यास की कृपा से सञ्जय भी श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से सुनने में समर्थ हुआ। वास्तव में श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष रूप से सुनने में अथवा व्यास जैसे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से सुनने में कोई अन्तर नहीं है। आध्यात्मिक गुरु व्यासदेव के भी प्रतिनिधि हैं। वैदिक पद्धति के अनुसार, आध्यात्मिक गुरु के जन्मदिवस पर शिष्य व्यास-पूजा नामक समारोह सम्पन्न करते हैं।
Bg 18.76
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥
राजन्—हे राजन्; संस्मृत्य—स्मरण करके; संस्मृत्य—स्मरण करके; संवादम्—संवाद को; इमम्—इस; अद्भुतम्—अद्भुत; केशव—भगवान् श्रीकृष्ण; अर्जुनयोः—तथा अर्जुन का; पुण्यम्—पवित्र; हृष्यामि—आनन्द लेता हूँ; च—भी; मुहुः मुहुः—बारम्बार, पुनः-पुनः।
हे राजन्, जैसे-जैसे मैं श्रीकृष्ण तथा अर्जुन के इस अद्भुत तथा पवित्र संवाद का बारम्बार स्मरण करता हूँ, वैसे-वैसे मैं प्रति क्षण रोमांचित होकर आनन्द का अनुभव करता हूँ।
भगवद्गीता की समझ इतनी दिव्य है कि जो कोई अर्जुन तथा श्रीकृष्ण के विषयों से सुपरिचित हो जाता है, वह धर्मात्मा बन जाता है, और वह ऐसी वार्ताओं को कभी नहीं भुला सकता। यही आध्यात्मिक जीवन की दिव्य स्थिति है। दूसरे शब्दों में, जो गीता को सही स्रोत से, साक्षात् श्रीकृष्ण से सुनता है, वह पूर्ण कृष्णभावनामृत प्राप्त कर लेता है। कृष्णभावनामृत का परिणाम यह है कि मनुष्य उत्तरोत्तर प्रबुद्ध होता जाता है, और वह जीवन का आनन्द रोमांच के साथ लेता है, केवल कुछ समय के लिए ही नहीं, अपितु प्रति क्षण।
Bg 18.77
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान्राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥
तत्—उस; च—भी; संस्मृत्य—स्मरण करके; संस्मृत्य—स्मरण करके; रूपम्—रूप को; अति—अत्यन्त; अद्भुतम्—अद्भुत; हरेः—भगवान् श्रीकृष्ण के; विस्मयः—आश्चर्य; मे—मेरा; महान्—महान्; राजन्—हे राजन्; हृष्यामि—आनन्द लेता हूँ; च—भी; पुनः पुनः—बारम्बार।
हे राजन्, जब मैं भगवान् श्रीकृष्ण के उस अद्भुत रूप का स्मरण करता हूँ, तब मैं और भी अधिक आश्चर्य से अभिभूत हो जाता हूँ, और बारम्बार आनन्दित होता हूँ।
ऐसा प्रतीत होता है कि सञ्जय भी, व्यास की कृपा से, श्रीकृष्ण के उस विश्वरूप को देख सका, जो अर्जुन को दिखाया गया था। निःसन्देह यह कहा जाता है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने ऐसा रूप पहले कभी प्रकट नहीं किया था। यह केवल अर्जुन को प्रकट किया गया था, फिर भी कुछ महान् भक्त भी श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देख सके, जब यह अर्जुन को दिखाया गया, और व्यास उनमें से एक थे। वे भगवान् के महान् भक्तों में से एक हैं, और उन्हें श्रीकृष्ण का एक सामर्थ्यवान् अवतार माना जाता है। व्यास ने इसे अपने शिष्य सञ्जय को प्रकट किया, जिसने श्रीकृष्ण के उस अद्भुत रूप का स्मरण किया, जो अर्जुन को दिखाया गया था, और उसका बारम्बार आनन्द लिया।
Bg 18.78
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥
यत्र—जहाँ; योगेश्वरः—योग के स्वामी; कृष्णः—भगवान् श्रीकृष्ण; यत्र—जहाँ; पार्थः—पृथापुत्र; धनुर्-धरः—धनुष-बाण धारण करने वाला; तत्र—वहाँ; श्रीः—ऐश्वर्य; विजयः—विजय; भूतिः—असाधारण शक्ति; ध्रुवा—निश्चय ही; नीतिः—नीति; मतिः मम—मेरा मत है।
जहाँ समस्त योगियों के स्वामी श्रीकृष्ण हैं, और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन है, वहाँ निश्चय ही ऐश्वर्य, विजय, असाधारण शक्ति तथा नीति भी होगी। यही मेरा मत है।
भगवद्गीता का आरम्भ धृतराष्ट्र की एक जिज्ञासा से हुआ। वह भीष्म, द्रोण तथा कर्ण जैसे महान् योद्धाओं द्वारा सहायता प्राप्त अपने पुत्रों की विजय की आशा कर रहा था। उसे आशा थी कि विजय उसी के पक्ष में होगी। किन्तु युद्धक्षेत्र के दृश्य का वर्णन करने के पश्चात् सञ्जय ने राजा से कहा, “आप विजय का विचार कर रहे हैं, किन्तु मेरा मत यह है कि जहाँ श्रीकृष्ण तथा अर्जुन उपस्थित हैं, वहाँ समस्त सौभाग्य रहेगा।” उसने स्पष्ट रूप से इसकी पुष्टि की कि धृतराष्ट्र अपने पक्ष की विजय की अपेक्षा नहीं कर सकता। अर्जुन के पक्ष की विजय निश्चित थी, क्योंकि वहाँ श्रीकृष्ण विद्यमान थे। श्रीकृष्ण का अर्जुन के सारथि का पद ग्रहण करना एक अन्य ऐश्वर्य का प्रदर्शन था। श्रीकृष्ण समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, और त्याग उनमें से एक है। ऐसे त्याग के अनेक उदाहरण हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण त्याग के भी स्वामी हैं।
वास्तव में युद्ध दुर्योधन तथा युधिष्ठिर के बीच था। अर्जुन अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की ओर से युद्ध कर रहा था। चूँकि श्रीकृष्ण तथा अर्जुन युधिष्ठिर के पक्ष में थे, अतः युधिष्ठिर की विजय निश्चित थी। यह युद्ध इस बात का निर्णय करने वाला था कि जगत् पर कौन शासन करेगा, और सञ्जय ने भविष्यवाणी की कि सत्ता युधिष्ठिर को हस्तान्तरित होगी। यहाँ यह भी भविष्यवाणी की गई है कि युधिष्ठिर, इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात्, उत्तरोत्तर समृद्ध होगा, क्योंकि वह केवल धर्मात्मा तथा पवित्र ही नहीं, अपितु एक कठोर नीतिवान् भी था। उसने अपने जीवन में कभी असत्य नहीं कहा।
ऐसे अनेक अल्पबुद्धि व्यक्ति हैं जो भगवद्गीता को युद्धक्षेत्र में दो मित्रों के बीच के विषयों की चर्चा मात्र मानते हैं। किन्तु ऐसी पुस्तक शास्त्र नहीं हो सकती। कुछ लोग यह आपत्ति कर सकते हैं कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए उकसाया, जो अनैतिक है, किन्तु स्थिति की वास्तविकता स्पष्ट रूप से कही गई है—भगवद्गीता नीति का परम निर्देश है। नीति का परम निर्देश नवें अध्याय के चौंतीसवें श्लोक में कहा गया है—मन्मना भव मद्भक्तः। मनुष्य को श्रीकृष्ण का भक्त बनना चाहिए, और समस्त धर्म का सार श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण करना है, जैसा कि कहा गया है—सर्व-धर्मान्। भगवद्गीता के निर्देश धर्म तथा नीति की परम प्रक्रिया का निर्माण करते हैं। अन्य समस्त प्रक्रियाएँ शुद्ध करने वाली हो सकती हैं और इस प्रक्रिया की ओर ले जा सकती हैं, किन्तु गीता का अन्तिम निर्देश समस्त नीति तथा धर्म का अन्तिम शब्द है—श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण। यही अठारहवें अध्याय का निर्णय है।
भगवद्गीता से हम समझ सकते हैं कि दार्शनिक चिन्तन तथा ध्यान द्वारा आत्म-साक्षात्कार करना एक प्रक्रिया है, किन्तु श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण करना सर्वोच्च सिद्धि है। यही भगवद्गीता की शिक्षाओं का सार है। सामाजिक जीवन की व्यवस्थाओं के अनुसार तथा धर्म के विभिन्न मार्गों के अनुसार विधि-नियमों का मार्ग ज्ञान का एक गोपनीय मार्ग हो सकता है, जहाँ तक धर्म के कर्मकाण्ड गोपनीय हैं, किन्तु तब भी मनुष्य ध्यान तथा ज्ञान-अनुशीलन में संलग्न रहता है। पूर्ण कृष्णभावनामृत में भक्ति के द्वारा श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण ही सर्वाधिक गोपनीय निर्देश है और अठारहवें अध्याय का सार है।
भगवद्गीता की एक अन्य विशेषता यह है कि वास्तविक सत्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं। परम सत्य की अनुभूति तीन रूपों में होती है—निराकार ब्रह्म, स्थानिक परमात्मा तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण। परम सत्य का पूर्ण ज्ञान श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान है। यदि कोई श्रीकृष्ण को समझ ले, तो ज्ञान के समस्त विभाग उस समझ के अभिन्न अंग हैं। श्रीकृष्ण दिव्य हैं, क्योंकि वे सदैव अपनी नित्य अन्तरंगा शक्ति में स्थित रहते हैं। जीव प्रकट हैं और दो श्रेणियों में विभाजित हैं—नित्य बद्ध तथा नित्य मुक्त। ऐसे जीव असंख्य हैं, और उन्हें श्रीकृष्ण के मूलभूत अंश माना जाता है। भौतिक शक्ति चौबीस विभागों में प्रकट होती है। सृष्टि नित्य काल द्वारा सम्पन्न होती है, और इसकी रचना तथा संहार बहिरंगा शक्ति द्वारा होते हैं। विश्व-जगत् का यह प्रकटीकरण बारम्बार दृश्य तथा अदृश्य होता रहता है।
भगवद्गीता में पाँच प्रमुख विषयों की विवेचना की गई है—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, भौतिक प्रकृति, जीव, नित्य काल तथा समस्त प्रकार के कर्म। ये सभी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण पर आश्रित हैं। परम सत्य की समस्त धारणाएँ, अर्थात् निराकार ब्रह्म, स्थानिक परमात्मा, अथवा कोई अन्य दिव्य धारणा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझने की श्रेणी के भीतर ही विद्यमान हैं। यद्यपि ऊपरी दृष्टि से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जीव, भौतिक प्रकृति तथा काल भिन्न प्रतीत होते हैं, तथापि कोई भी परमेश्वर से भिन्न नहीं है। किन्तु परमेश्वर सदैव सबसे भिन्न हैं। भगवान् चैतन्य का दर्शन “अचिन्त्य एकता तथा भेद” का है। दर्शन की यह पद्धति परम सत्य के पूर्ण ज्ञान का निर्माण करती है।
जीव अपनी मूल स्थिति में शुद्ध आत्मा है। वह परमात्मा के एक आणविक कण के समान है। किन्तु बद्ध जीव भगवान् की तटस्थ शक्ति है; उसकी प्रवृत्ति भौतिक शक्ति तथा आध्यात्मिक शक्ति दोनों के सम्पर्क में रहने की होती है। दूसरे शब्दों में, जीव भगवान् की दो शक्तियों के मध्य स्थित है, और चूँकि वह भगवान् की परा शक्ति से सम्बन्ध रखता है, अतः उसमें स्वतन्त्रता का एक अंश है। उस स्वतन्त्रता के समुचित प्रयोग द्वारा वह श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष निर्देश के अधीन आ जाता है। इस प्रकार वह आह्लाददायिनी शक्ति में अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त करता है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय “उपसंहार—संन्यास की पूर्णता” पर भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं, और इसके साथ ही सम्पूर्ण भगवद्गीता का समापन होता है।
Bg 18.8
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥
दुःखम्—दुःखमय; इति—इस प्रकार; एव—निश्चय ही; यत्—जो; कर्म—कर्म; काय—शरीर; क्लेश—कष्टप्रद; भयात्—भय के कारण; त्यजेत्—त्याग दे; सः—वह; कृत्वा—करके; राजसम्—रजोगुण में; त्यागम्—त्याग; न एव—निश्चय ही नहीं; त्याग—त्याग के; फलम्—फल; लभेत्—प्राप्त करता है।
जो कोई विहित कर्तव्यों को कष्टप्रद समझकर अथवा भय के कारण त्याग देता है, वह रजोगुणी कहा जाता है। ऐसा कर्म कभी भी त्याग की उन्नति की ओर नहीं ले जाता।
जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, उसे इस भय से धन कमाना नहीं छोड़ना चाहिए कि वह सकाम कर्म कर रहा है। यदि कोई कर्म करके अपने धन को कृष्णभावनामृत में लगा सकता है, अथवा प्रातःकाल जल्दी उठकर अपनी दिव्य कृष्णभावनामृत में उन्नति कर सकता है, तो उसे भय के कारण अथवा इसलिए कि ऐसे कर्म कष्टप्रद माने जाते हैं, उनसे विरत नहीं होना चाहिए। ऐसा त्याग रजोगुण में होता है। राजसी कर्म का फल सदा दुःखमय होता है। यदि कोई व्यक्ति उसी भाव से कर्म का त्याग कर देता है, तो उसे त्याग का फल कभी नहीं मिलता।
Bg 18.9
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
कार्यम्—करना ही चाहिए; इति—इस प्रकार; एव—निश्चय ही; यत्—जो; कर्म—कर्म; नियतम्—विहित; क्रियते—किया जाता है; अर्जुन—हे अर्जुन; सङ्गम्—संग; त्यक्त्वा—त्यागकर; फलम्—फल; च—भी; एव—निश्चय ही; सः—वह; त्यागः—त्याग; सात्त्विकः—सतोगुण में; मतः—मेरे मत में।
किन्तु जो अपने विहित कर्तव्य को केवल इसलिए सम्पन्न करता है कि वह करने योग्य है, और फल के प्रति समस्त आसक्ति का त्याग कर देता है, हे अर्जुन, उसका त्याग सतोगुणी प्रकृति का है।
विहित कर्तव्य इसी मनोवृत्ति से सम्पन्न किए जाने चाहिए। मनुष्य को फल के प्रति आसक्ति के बिना कर्म करना चाहिए; उसे कर्म के गुणों से विरक्त रहना चाहिए। कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला कोई व्यक्ति किसी कारखाने में कार्य करते हुए न तो कारखाने के कार्य से स्वयं को जोड़ता है, न ही कारखाने के श्रमिकों से। वह केवल श्रीकृष्ण के लिए कर्म करता है। और जब वह फल को श्रीकृष्ण के लिए त्याग देता है, तो वह दिव्य रूप से कर्म कर रहा होता है।