अध्याय 5
Bg 5.1
अर्जुन उवाच
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; सन्न्यासम्—त्याग; कर्मणाम्—समस्त कर्मों का; कृष्ण—हे कृष्ण; पुनः—फिर; योगम्—भक्ति; च—भी; शंससि—आप प्रशंसा करते हैं; यत्—जो; श्रेयः—कल्याणकारी है; एतयोः—इन दोनों में से; एकम्—एक; तत्—वह; मे—मुझसे; ब्रूहि—कृपया कहिए; सुनिश्चितम्—निश्चित रूप से।
अर्जुन ने कहा : हे कृष्ण, पहले तो आप मुझे कर्म त्यागने को कहते हैं, और फिर भक्ति-सहित कर्म की अनुशंसा करते हैं। अब कृपया मुझे निश्चित रूप से बताइए कि इन दोनों में से कौन-सा अधिक कल्याणकारी है?
भगवद्गीता के इस पाँचवें अध्याय में भगवान् कहते हैं कि भक्तिमय कर्म शुष्क मानसिक कल्पना से श्रेष्ठ है। भक्ति इस कल्पना की अपेक्षा सुगम है, क्योंकि दिव्य प्रकृति की होने के कारण वह मनुष्य को कर्मफल से मुक्त कर देती है। दूसरे अध्याय में आत्मा तथा उसके भौतिक देह में बन्धन का प्रारम्भिक ज्ञान समझाया गया था। उसी में यह भी समझाया गया था कि बुद्धियोग अर्थात् भक्ति के द्वारा इस भौतिक बन्धन से किस प्रकार निकला जाए। तीसरे अध्याय में यह समझाया गया कि जो व्यक्ति ज्ञान के स्तर पर स्थित है, उसका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। और चौथे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन से कहा कि सभी प्रकार के यज्ञ-कर्म ज्ञान में पर्यवसित होते हैं। तथापि चौथे अध्याय के अन्त में भगवान् ने अर्जुन को पूर्ण ज्ञान में स्थित होकर जाग्रत हो युद्ध करने का परामर्श दिया। अतः भक्तिमय कर्म तथा ज्ञान में अकर्म—दोनों के महत्त्व पर एक साथ बल देकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विमूढ़ कर दिया और उसके निश्चय को डाँवाँडोल कर दिया। अर्जुन समझता है कि ज्ञान में त्याग का अर्थ है इन्द्रिय-व्यापार के रूप में किए जाने वाले समस्त कर्मों की समाप्ति। किन्तु यदि कोई भक्तिमय कर्म करे, तो कर्म कैसे रुकता है? दूसरे शब्दों में, वह सोचता है कि संन्यास अर्थात् ज्ञान में त्याग सर्वथा समस्त प्रकार के कर्म से रहित होना चाहिए, क्योंकि कर्म और त्याग उसे परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वह यह नहीं समझ पाया कि पूर्ण ज्ञान में किया गया कर्म प्रतिक्रिया-रहित होता है और इसीलिए वह अकर्म के समान ही है। अतः वह पूछता है कि उसे कर्म पूर्णतः बन्द कर देना चाहिए, अथवा पूर्ण ज्ञान-सहित कर्म करना चाहिए।
Bg 5.10
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥
ब्रह्मणि—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को; आधाय—अर्पित करके; कर्माणि—समस्त कर्म; सङ्गम्—आसक्ति; त्यक्त्वा—त्यागकर; करोति—करता है; यः—जो; लिप्यते—प्रभावित होता है; न—कभी नहीं; सः—वह; पापेन—पाप से; पद्म-पत्रम्—कमल का पत्ता; इव—के समान; अम्भसा—जल में।
जो अपना कर्तव्य आसक्ति-रहित होकर, फल को परमेश्वर को अर्पित करते हुए करता है, वह पापमय कर्म से उसी प्रकार प्रभावित नहीं होता, जिस प्रकार कमल का पत्ता जल से अछूता रहता है।
यहाँ ब्रह्मणि का अर्थ है कृष्णभावनामृत में। भौतिक जगत् भौतिक प्रकृति के तीन गुणों का समष्टि-प्रकटीकरण है, जिसे तकनीकी रूप से प्रधान कहते हैं। वैदिक मन्त्र—sarvam etad brahma, tasmād etad brahma nāma-rūpam annaṁ ca jāyate, तथा भगवद्गीता में mama yonir mahad brahma—यह संकेत करते हैं कि भौतिक जगत् में सब कुछ ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है; और यद्यपि कार्य भिन्न-भिन्न रूप में प्रकट होते हैं, फिर भी वे कारण से अभिन्न हैं। ईशोपनिषद् में कहा गया है कि सब कुछ परब्रह्म अर्थात् श्रीकृष्ण से सम्बन्धित है, और इस प्रकार सब कुछ केवल उन्हीं का है। जो भली-भाँति जानता है कि सब कुछ श्रीकृष्ण का है, कि वे सब कुछ के स्वामी हैं और इसलिए सब कुछ भगवान् की सेवा में संलग्न है, उसका स्वभावतः अपने कर्मफलों से कोई सरोकार नहीं रहता, चाहे वे पुण्यमय हों या पापमय। यहाँ तक कि मनुष्य का भौतिक शरीर भी, जो किसी विशिष्ट प्रकार के कर्म को सम्पन्न करने हेतु भगवान् का उपहार है, कृष्णभावनामृत में संलग्न किया जा सकता है। वह पापमय प्रतिक्रियाओं के संदूषण से परे रहता है, ठीक उसी प्रकार जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी भीगता नहीं। भगवान् गीता में यह भी कहते हैं : mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasya: “समस्त कर्म मुझे [श्रीकृष्ण को] अर्पित कर दो।” निष्कर्ष यह है कि कृष्णभावनामृत-रहित व्यक्ति भौतिक शरीर तथा इन्द्रियों की धारणा के अनुसार कर्म करता है, किन्तु कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति इस ज्ञान के अनुसार कर्म करता है कि शरीर श्रीकृष्ण की सम्पत्ति है और इसलिए उसे श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न किया जाना चाहिए।
Bg 5.11
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११ ॥
कायेन—शरीर से; मनसा—मन से; बुद्ध्या—बुद्धि से; केवलैः—शुद्ध; इन्द्रियैः—इन्द्रियों से; अपि—यहाँ तक कि; योगिनः—कृष्णभावनाभावित व्यक्ति; कर्म—कर्म; कुर्वन्ति—वे करते हैं; सङ्गम्—आसक्ति; त्यक्त्वा—त्यागकर; आत्म—आत्मा; शुद्धये—शुद्धि के प्रयोजन से।
योगीगण आसक्ति त्यागकर, केवल शुद्धि के प्रयोजन से ही शरीर, मन, बुद्धि तथा यहाँ तक कि इन्द्रियों से कर्म करते हैं।
श्रीकृष्ण की इन्द्रियों की तृप्ति हेतु कृष्णभावनामृत में कर्म करने से कोई भी कर्म—चाहे वह शरीर का हो, मन का, बुद्धि का अथवा इन्द्रियों का—भौतिक संदूषण से शुद्ध हो जाता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के कर्मों से कोई भौतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं होती। अतएव शुद्ध कर्म, जिन्हें सामान्यतः सदाचार कहते हैं, कृष्णभावनामृत में कर्म करने से सरलता से सम्पन्न किए जा सकते हैं। श्री रूप गोस्वामी अपने भक्ति-रसामृत-सिन्धु में इसका वर्णन इस प्रकार करते हैं :
īhā yasya harer dāsye karmaṇā manasā girā
nikhilāsv apy avasthāsu jīvanmuktaḥ sa ucyate
जो व्यक्ति अपने शरीर, मन, बुद्धि तथा वाणी से कृष्णभावनामृत में (अर्थात् दूसरे शब्दों में, श्रीकृष्ण की सेवा में) कर्म करता है, वह इस भौतिक जगत् में रहते हुए भी मुक्त है, यद्यपि वह अनेक तथाकथित भौतिक कर्मों में संलग्न प्रतीत हो। उसमें कोई मिथ्या अहंकार नहीं होता, न ही वह यह विश्वास करता है कि वह यह भौतिक शरीर है, अथवा कि शरीर उसका है। वह जानता है कि वह यह शरीर नहीं है और यह शरीर उसका नहीं है। वह स्वयं श्रीकृष्ण का है, और शरीर भी श्रीकृष्ण का है। जब वह शरीर, मन, बुद्धि, वाणी, जीवन, धन इत्यादि से उत्पन्न प्रत्येक वस्तु को—जो कुछ भी उसके अधिकार में हो—श्रीकृष्ण की सेवा में लगा देता है, तब वह तत्क्षण श्रीकृष्ण से युक्त हो जाता है। वह श्रीकृष्ण के साथ एक हो जाता है और उस मिथ्या अहंकार से रहित हो जाता है, जो मनुष्य को यह विश्वास कराता है कि वह शरीर इत्यादि है। यही कृष्णभावनामृत की पूर्ण अवस्था है।
Bg 5.12
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥
युक्तः—जो भक्ति में संलग्न है; कर्म-फलम्—समस्त कर्मों के फल; त्यक्त्वा—त्यागकर; शान्तिम्—पूर्ण शान्ति; आप्नोति—प्राप्त करता है; नैष्ठिकीम्—अविचल; अयुक्तः—जो कृष्णभावनामृत में नहीं है; काम-कारेण—कर्मफल का भोग करने हेतु; फले—फल में; सक्तः—आसक्त; निबध्यते—बँध जाता है।
दृढ़तापूर्वक भक्ति में संलग्न आत्मा अनन्य शान्ति प्राप्त करती है, क्योंकि वह समस्त कर्मों के फल मुझे अर्पित कर देती है; जबकि जो व्यक्ति भगवान् से युक्त नहीं है, जो अपने श्रम के फलों का लोभी है, वह बँध जाता है।
कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति तथा देहचेतना में स्थित व्यक्ति में यह भेद है कि पहला श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त है, जबकि दूसरा अपने कर्मफलों के प्रति आसक्त है। जो व्यक्ति श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त है और केवल उन्हीं के लिए कर्म करता है, वह निश्चित रूप से मुक्त व्यक्ति है, और वह सकाम पुरस्कारों के लिए व्याकुल नहीं रहता। भागवत में कर्मफल को लेकर व्याकुलता का कारण यह बताया गया है कि मनुष्य द्वैत की धारणा में कार्य करता है, अर्थात् परम सत्य के ज्ञान के बिना कार्य करता है। श्रीकृष्ण परम पूर्ण सत्य हैं, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। कृष्णभावनामृत में कोई द्वैत नहीं है। जो कुछ भी विद्यमान है वह श्रीकृष्ण की ऊर्जा का ही उत्पाद है, और श्रीकृष्ण सर्वमंगलमय हैं। अतएव कृष्णभावनामृत में किए गए कर्म परम स्तर पर हैं; वे दिव्य हैं और उनका कोई भौतिक प्रभाव नहीं होता। अतः मनुष्य कृष्णभावनामृत में शान्ति से परिपूर्ण रहता है। किन्तु जो इन्द्रियतृप्ति हेतु लाभ की गणना में बँधा रहता है, वह उस शान्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। कृष्णभावनामृत का यही रहस्य है—यह अनुभूति कि श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई अस्तित्व नहीं है, ही शान्ति तथा अभय का स्तर है।
Bg 5.13
सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
सर्व—समस्त; कर्माणि—कर्म; मनसा—मन से; सन्न्यस्य—त्यागकर; आस्ते—रहता है; सुखम्—सुखपूर्वक; वशी—जो संयमी है; नव-द्वारे—जहाँ नौ द्वार हैं उस स्थान में; पुरे—नगरी में; देही—देहधारी आत्मा; न—कभी नहीं; एव—निश्चय ही; कुर्वन्—कुछ करते हुए; न—न; कारयन्—करवाते हुए।
जब देहधारी जीव अपने स्वभाव को वश में कर लेता है और मन से समस्त कर्मों का त्याग कर देता है, तब वह नौ द्वारों वाली नगरी (भौतिक शरीर) में सुखपूर्वक निवास करता है, न तो कर्म करता हुआ और न कर्म करवाता हुआ।
देहधारी आत्मा नौ द्वारों वाली नगरी में निवास करता है। शरीर के, अथवा शरीर रूपी आलंकारिक नगरी के कार्य प्रकृति के विशिष्ट गुणों द्वारा स्वतः ही संचालित होते हैं। आत्मा, यद्यपि स्वयं को शरीर की परिस्थितियों के अधीन कर देता है, फिर भी यदि वह चाहे तो उन परिस्थितियों से परे रह सकता है। केवल अपने श्रेष्ठ स्वरूप की विस्मृति के कारण ही वह स्वयं को भौतिक शरीर के साथ तादात्म्य कर लेता है, और इसलिए कष्ट भोगता है। कृष्णभावनामृत के द्वारा वह अपनी वास्तविक स्थिति को पुनः जाग्रत कर सकता है और इस प्रकार अपने देहबन्धन से निकल सकता है। अतएव जब मनुष्य कृष्णभावनामृत ग्रहण करता है, तब वह तत्क्षण शारीरिक कार्यों से पूर्णतः पृथक् हो जाता है। ऐसे संयमित जीवन में, जिसमें उसके विचार बदल जाते हैं, वह नौ द्वारों वाली नगरी के भीतर सुखपूर्वक निवास करता है। नौ द्वारों का वर्णन इस प्रकार किया गया है :
nava-dvāre pure dehī haṁso lelāyate bahiḥ
vaśī sarvasya lokasya sthāvarasya carasya ca.
“पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो जीव के शरीर के भीतर निवास करते हैं, समग्र ब्रह्माण्ड में समस्त जीवों के नियन्ता हैं। शरीर में नौ द्वार हैं : दो नेत्र, दो नासाछिद्र, दो कान, एक मुख, गुदा तथा जननेन्द्रिय। जीव अपनी बद्ध अवस्था में स्वयं को शरीर के साथ तादात्म्य कर लेता है, किन्तु जब वह स्वयं को अपने भीतर स्थित भगवान् के साथ तादात्म्य करता है, तब वह शरीर में रहते हुए भी भगवान् के समान ही मुक्त हो जाता है।” (श्वेत. 3.18)
अतएव कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भौतिक शरीर के बाह्य तथा आन्तरिक—दोनों प्रकार के कार्यों से मुक्त रहता है।
Bg 5.14
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
न—कभी नहीं; कर्तृत्वम्—स्वामित्व; न—न ही; कर्माणि—कर्म; लोकस्य—लोगों का; सृजति—रचता है; प्रभुः—शरीर रूपी नगरी का स्वामी; न—न ही; कर्म-फल—कर्मों के फल; संयोगम्—सम्बन्ध; स्वभावः—भौतिक प्रकृति के गुण; तु—किन्तु; प्रवर्तते—कार्य करते हैं।
देहधारी आत्मा, अपने शरीर रूपी नगरी का स्वामी, न तो कर्मों की रचना करता है, न लोगों को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, और न कर्म के फलों की रचना करता है। यह सब भौतिक प्रकृति के गुणों द्वारा सम्पादित होता है।
जीव, जैसा कि सातवें अध्याय में समझाया जाएगा, स्वभाव से परमेश्वर के साथ एक है, और पदार्थ से भिन्न है, जो भगवान् की एक अन्य प्रकृति है—जिसे अपरा कहते हैं। किसी प्रकार, श्रेष्ठ प्रकृति अर्थात् जीव अनादि काल से भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में रहा है। जो क्षणभंगुर शरीर अथवा भौतिक निवास-स्थान उसे प्राप्त होता है, वही नाना प्रकार के कर्मों तथा उनकी परिणामी प्रतिक्रियाओं का कारण है। ऐसे बद्ध वातावरण में रहते हुए मनुष्य स्वयं को (अज्ञानवश) शरीर के साथ तादात्म्य करके शरीर के कर्मों के फल भोगता है। अनादि काल से प्राप्त यही अज्ञान शारीरिक कष्ट तथा दुःख का कारण है। ज्यों ही जीव शरीर के कर्मों से पृथक् हो जाता है, त्यों ही वह प्रतिक्रियाओं से भी मुक्त हो जाता है। जब तक वह शरीर रूपी नगरी में रहता है, तब तक वह उसका स्वामी प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में वह न तो उसका स्वामी है और न उसके कर्मों एवं प्रतिक्रियाओं का नियन्ता। वह तो केवल भौतिक सागर के मध्य अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। सागर की लहरें उसे उछाल रही हैं, और उन पर उसका कोई नियन्त्रण नहीं है। उसका सर्वोत्तम समाधान यह है कि वह दिव्य कृष्णभावनामृत के द्वारा जल से बाहर निकल आए। केवल वही उसे समस्त उथल-पुथल से बचाएगा।
Bg 5.15
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥
न—कभी नहीं; आदत्ते—ग्रहण करता है; कस्यचित्—किसी का; पापम्—पाप; न—न; च—भी; एव—निश्चय ही; सुकृतम्—पुण्य कर्म; विभुः—परमेश्वर; अज्ञानेन—अज्ञान से; आवृतम्—आच्छादित; ज्ञानम्—ज्ञान; तेन—उससे; मुह्यन्ति—मोहित होते हैं; जन्तवः—जीव।
परम चेतन परमात्मा न तो किसी के पापमय कर्मों को ग्रहण करते हैं, न पुण्य कर्मों को। तथापि देहधारी जीव मोहित रहते हैं, क्योंकि अज्ञान उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित कर देता है।
संस्कृत शब्द विभुः का अर्थ है परमेश्वर, जो असीम ज्ञान, ऐश्वर्य, बल, यश, सौन्दर्य तथा वैराग्य से परिपूर्ण हैं। वे सदा स्वयं में सन्तुष्ट रहते हैं, पापमय अथवा पुण्यमय कर्मों से अविचलित रहते हैं। वे किसी जीव के लिए कोई विशेष परिस्थिति नहीं रचते, अपितु जीव, अज्ञान से मोहित होकर, स्वयं को जीवन की कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में डाले जाने की इच्छा करता है, और इस प्रकार उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया की शृंखला आरम्भ हो जाती है। जीव श्रेष्ठ प्रकृति का होने के कारण ज्ञान से परिपूर्ण है। फिर भी, अपनी सीमित शक्ति के कारण वह अज्ञान से प्रभावित होने की प्रवृत्ति रखता है। भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, किन्तु जीव नहीं। भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ हैं, किन्तु जीव अणु अर्थात् अणुरूप है। चूँकि वह चेतन आत्मा है, अतः उसमें अपनी स्वतन्त्र इच्छा से कामना करने की क्षमता है। ऐसी कामना केवल सर्वशक्तिमान् भगवान् द्वारा ही पूर्ण की जाती है। और इस प्रकार, जब जीव अपनी कामनाओं में मोहित हो जाता है, तब भगवान् उसे उन कामनाओं को पूर्ण करने देते हैं, किन्तु जिस विशिष्ट परिस्थिति की कामना की जाए, उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया के लिए भगवान् कभी उत्तरदायी नहीं होते। अतएव मोहित अवस्था में होने के कारण देहधारी आत्मा स्वयं को परिस्थितिजन्य भौतिक शरीर के साथ तादात्म्य कर लेता है और जीवन के क्षणभंगुर दुःख एवं सुख के अधीन हो जाता है। भगवान् परमात्मा अर्थात् अन्तर्यामी के रूप में जीव के नित्य संगी हैं, और इसलिए वे व्यष्टि आत्मा की कामनाओं को समझ सकते हैं, जैसे कोई फूल के निकट रहकर उसकी सुगन्ध को सूँघ सकता है। कामना जीव की बद्धता का एक सूक्ष्म रूप है। भगवान् उसकी कामना को उसकी पात्रता के अनुसार पूर्ण करते हैं : मनुष्य प्रस्ताव करता है, और भगवान् निर्णय करते हैं। अतः व्यष्टि अपनी कामनाओं को पूर्ण करने में सर्वशक्तिमान् नहीं है। तथापि भगवान् समस्त कामनाएँ पूर्ण कर सकते हैं, और भगवान्, सबके प्रति तटस्थ होने के कारण, सूक्ष्म स्वतन्त्र जीवों की कामनाओं में हस्तक्षेप नहीं करते। किन्तु जब कोई श्रीकृष्ण की कामना करता है, तब भगवान् विशेष ध्यान रखते हैं और उसे इस प्रकार कामना करने को प्रोत्साहित करते हैं कि वह उन्हें प्राप्त कर सके और नित्य सुखी हो सके। अतः वैदिक मन्त्र घोषणा करता है :
eṣa u hy eva sādhu karma kārayati taṁ yamebhyo lokebhya unninīṣate
eṣa u evāsādhu karma kārayati yamadho ninīṣate.
ajño jantur anīso ‘yam ātmanaḥ sukha-duḥkhayoḥ
īśvara-prerito gacchet svargaṁ vāśvabhram eva ca.
“भगवान् जीव को पुण्य कर्मों में संलग्न करते हैं, जिससे वह उन्नत हो सके। भगवान् उसे पापमय कर्मों में संलग्न करते हैं, जिससे वह नरक जाए। जीव अपने दुःख तथा सुख में पूर्णतः परतन्त्र है। परमेश्वर की इच्छा से वह स्वर्ग अथवा नरक जा सकता है, जैसे बादल वायु द्वारा प्रेरित होता है।”
अतएव देहधारी आत्मा, कृष्णभावनामृत से बचने की अपनी अनादि कामना के कारण, अपने मोह को स्वयं उत्पन्न करता है। फलस्वरूप, यद्यपि वह स्वरूपतः नित्य, आनन्दमय तथा ज्ञानमय है, फिर भी अपने अस्तित्व की लघुता के कारण वह भगवान् की सेवा की अपनी स्वरूपगत स्थिति को भूल जाता है और इस प्रकार अविद्या में फँस जाता है। और अज्ञान के वशीभूत होकर जीव यह दावा करता है कि उसके बद्ध अस्तित्व के लिए भगवान् उत्तरदायी हैं। वेदान्त-सूत्र भी इसकी पुष्टि करते हैं :
vaiṣamya-nairghṛṇye na sāpekṣatvāt tathā hi darśayati.
“भगवान् न किसी से घृणा करते हैं और न किसी से प्रेम, यद्यपि वे ऐसा करते प्रतीत होते हैं।“
Bg 5.16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
ज्ञानेन—ज्ञान से; तु—किन्तु; तत्—वह; अज्ञानम्—अविद्या; येषाम्—जिनकी; नाशितम्—नष्ट हो जाती है; आत्मनः—जीव की; तेषाम्—उनका; आदित्यवत्—उदित सूर्य के समान; ज्ञानम्—ज्ञान; प्रकाशयति—प्रकट करता है; तत् परम्—कृष्णभावनामृत में।
किन्तु जब मनुष्य उस ज्ञान से प्रबुद्ध हो जाता है, जिससे अविद्या नष्ट हो जाती है, तब उसका ज्ञान सब कुछ उसी प्रकार प्रकट कर देता है, जिस प्रकार सूर्य दिन में सब कुछ प्रकाशित कर देता है।
जो श्रीकृष्ण को भूल चुके हैं, वे निश्चय ही मोहग्रस्त रहते हैं; किन्तु जो कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, वे तनिक भी मोहित नहीं होते। भगवद्गीता में कहा गया है—“सर्वं ज्ञान-प्लवेन”, “ज्ञानाग्निः सर्व-कर्माणि” तथा “न हि ज्ञानेन सदृशम्”। ज्ञान सदा अत्यन्त समादृत है। और वह ज्ञान क्या है? पूर्ण ज्ञान तभी प्राप्त होता है, जब मनुष्य श्रीकृष्ण की शरण में जाता है, जैसा कि सातवें अध्याय के उन्नीसवें श्लोक में कहा गया है—बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। अनेकानेक जन्मों से गुज़रने के पश्चात्, जब ज्ञान में परिपूर्ण मनुष्य श्रीकृष्ण की शरण में आता है, अथवा जब वह कृष्णभावनामृत प्राप्त करता है, तब उसके समक्ष सब कुछ उसी प्रकार प्रकट हो जाता है, जिस प्रकार सूर्य दिन में सब कुछ प्रकाशित कर देता है। जीव अनेक प्रकारों से मोहग्रस्त रहता है। उदाहरणार्थ, जब वह बिना किसी आधार के स्वयं को ईश्वर मान बैठता है, तब वस्तुतः वह अविद्या के अन्तिम जाल में जा गिरता है। यदि जीव ही ईश्वर हो, तो वह अविद्या से मोहित कैसे हो सकता है? क्या ईश्वर अविद्या से मोहित होते हैं? यदि ऐसा हो, तो अविद्या अथवा शैतान ईश्वर से बड़ा हो जाएगा। वास्तविक ज्ञान उसी व्यक्ति से प्राप्त किया जा सकता है, जो पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित है। अतः मनुष्य को ऐसे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को खोजना चाहिए और उनके सान्निध्य में यह सीखना चाहिए कि कृष्णभावनामृत क्या है। आध्यात्मिक गुरु समस्त अविद्या को उसी प्रकार दूर कर सकते हैं, जिस प्रकार सूर्य अन्धकार को दूर कर देता है। यद्यपि कोई व्यक्ति इस पूर्ण ज्ञान में स्थित हो सकता है कि वह यह शरीर नहीं, अपितु शरीर से परे दिव्य आत्मा है, तथापि वह आत्मा और परमात्मा में विभेद करने में समर्थ नहीं हो पाता। फिर भी, यदि वह प्रामाणिक, पूर्ण कृष्णभावनाभावित आध्यात्मिक गुरु की शरण लेने की चिन्ता करे, तो वह सब कुछ भली-भाँति जान सकता है। मनुष्य ईश्वर को तथा ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को तभी जान सकता है, जब वह वस्तुतः ईश्वर के प्रतिनिधि से मिलता है। ईश्वर का प्रतिनिधि कभी यह दावा नहीं करता कि वह ईश्वर है, यद्यपि उसे वह समस्त सम्मान दिया जाता है जो सामान्यतः ईश्वर को दिया जाता है, क्योंकि उसे ईश्वर का ज्ञान है। मनुष्य को ईश्वर और जीव के बीच का भेद सीखना होता है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय (2.12) में कहा कि प्रत्येक जीव व्यष्टि है तथा भगवान् भी व्यष्टि हैं। वे सभी अतीत में व्यष्टि थे, वर्तमान में व्यष्टि हैं, और भविष्य में, मुक्ति के पश्चात् भी, व्यष्टि बने रहेंगे। रात्रि में हम अन्धकार में सब कुछ एक-सा देखते हैं, किन्तु दिन में जब सूर्य उदित होता है, तब हम सब कुछ उसकी वास्तविक पहचान में देखते हैं। आध्यात्मिक जीवन में व्यष्टित्व सहित यह पहचान ही वास्तविक ज्ञान है।
Bg 5.17
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥
तद्-बुद्धयः—जिसकी बुद्धि सदा परम में स्थित रहती है; तद्-आत्मानः—जिसका मन सदा परम में स्थित रहता है; तत्-निष्ठाः—जिसका मन केवल परम के लिए ही है; तत्-परायणाः—जिसने पूर्णतः उनकी शरण ले ली है; गच्छन्ति—जाते हैं; अपुनः-आवृत्तिम्—मुक्ति; ज्ञान—ज्ञान; निर्धूत—धो डालता है; कल्मषाः—शंकाएँ।
जब मनुष्य की बुद्धि, मन, श्रद्धा और आश्रय—ये सब परम में स्थिर हो जाते हैं, तब वह पूर्ण ज्ञान के द्वारा समस्त शंकाओं से भली-भाँति शुद्ध हो जाता है और इस प्रकार मुक्ति के मार्ग पर सीधा अग्रसर होता है।
परम दिव्य सत्य भगवान् श्रीकृष्ण हैं। समूची भगवद्गीता इस घोषणा के चारों ओर केन्द्रित है कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। समस्त वैदिक साहित्य का यही कथन है। परतत्त्व का अर्थ है वह परम सत्य, जिसे परम के ज्ञाता ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् के रूप में समझते हैं। भगवान्, अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, परम तत्त्व में अन्तिम शब्द हैं। इससे परे कुछ भी नहीं है। भगवान् कहते हैं—मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। निराकार ब्रह्म को भी श्रीकृष्ण ही आधार प्रदान करते हैं—ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्। अतएव सभी प्रकार से श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं। जिसका मन, बुद्धि, श्रद्धा और आश्रय सदा श्रीकृष्ण में स्थित रहते हैं, अथवा दूसरे शब्दों में, जो पूर्णतः कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह निःसन्देह समस्त शंकाओं से धुलकर स्वच्छ हो जाता है और दिव्यता से सम्बन्धित प्रत्येक विषय में पूर्ण ज्ञान में स्थित रहता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भली-भाँति समझ सकता है कि श्रीकृष्ण में द्वैत (एक साथ अभिन्नता और व्यष्टित्व) विद्यमान है, और ऐसे दिव्य ज्ञान से सुसज्जित होकर मनुष्य मुक्ति के मार्ग पर स्थिर प्रगति कर सकता है।
Bg 5.18
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
विद्या—शिक्षा; विनय—विनम्रता; सम्पन्ने—से पूर्णतः युक्त; ब्राह्मणे—ब्राह्मण में; गवि—गौ में; हस्तिनि—हाथी में; शुनि—कुत्ते में; च—तथा; एव—निश्चय ही; श्व-पाके—कुत्ता खाने वाले (चाण्डाल) में; च—क्रमशः; पण्डिताः—जो ऐसे विद्वान् हैं; सम-दर्शिनः—समान दृष्टि से देखते हैं।
विनम्र साधु, सच्चे ज्ञान के बल पर, विद्वान् एवं विनम्र ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ते और कुत्ता खाने वाले [चाण्डाल] को समान दृष्टि से देखता है।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जाति अथवा वर्ण में कोई भेद नहीं करता। ब्राह्मण और चाण्डाल सामाजिक दृष्टि से भिन्न हो सकते हैं, अथवा कुत्ता, गौ या हाथी जाति की दृष्टि से भिन्न हो सकते हैं, किन्तु विद्वान् दिव्यवादी की दृष्टि से शरीर के ये भेद निरर्थक हैं। इसका कारण परम के साथ उनका सम्बन्ध है, क्योंकि परमेश्वर अपने पूर्ण अंश परमात्मा के रूप में सबके हृदय में विद्यमान हैं। परम का ऐसा बोध ही वास्तविक ज्ञान है। जहाँ तक भिन्न वर्णों अथवा भिन्न योनियों के शरीरों का प्रश्न है, भगवान् सबके प्रति समान रूप से दयालु हैं, क्योंकि वे प्रत्येक जीव को मित्र मानते हैं और जीवों की परिस्थितियों की परवाह किए बिना स्वयं को परमात्मा के रूप में बनाए रखते हैं। भगवान् परमात्मा के रूप में चाण्डाल में भी विद्यमान हैं और ब्राह्मण में भी, यद्यपि ब्राह्मण का शरीर और चाण्डाल का शरीर एक-समान नहीं हैं। शरीर प्रकृति के भिन्न-भिन्न गुणों की भौतिक उपज हैं, किन्तु शरीर के भीतर स्थित आत्मा और परमात्मा एक ही आध्यात्मिक गुणवाले हैं। तथापि आत्मा और परमात्मा की गुणगत समानता उन्हें परिमाण में समान नहीं बना देती, क्योंकि व्यष्टि आत्मा केवल उसी विशेष शरीर में विद्यमान रहती है, जबकि परमात्मा प्रत्येक शरीर में विद्यमान रहते हैं। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को इसका पूर्ण ज्ञान होता है, अतः वह वस्तुतः विद्वान् है और समान दृष्टिवाला है। आत्मा और परमात्मा के समान लक्षण यह हैं कि वे दोनों चेतन, नित्य और आनन्दमय हैं। किन्तु भेद यह है कि व्यष्टि आत्मा शरीर के सीमित क्षेत्र के भीतर चेतन रहती है, जबकि परमात्मा समस्त शरीरों के प्रति चेतन रहते हैं। परमात्मा बिना किसी भेद के समस्त शरीरों में विद्यमान हैं।
Bg 5.19
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥
इह—इस जीवन में; एव—निश्चय ही; तैः—उनके द्वारा; जितः—जीत लिया गया; सर्गः—जन्म और मृत्यु; येषाम्—जिनका; साम्ये—समभाव में; स्थितम्—स्थित; मनः—मन; निर्दोषम्—निर्दोष; हि—निश्चय ही; समम्—समभाव में; ब्रह्म—परम; तस्मात्—अतः; ब्रह्मणि—परम में; ते—वे; स्थिताः—स्थित हैं।
जिनका मन समता एवं समभाव में स्थित है, उन्होंने जन्म और मृत्यु की अवस्थाओं को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं, और इस प्रकार वे पहले से ही ब्रह्म में स्थित हैं।
जैसा कि ऊपर कहा गया, मन की समता आत्म-साक्षात्कार का चिह्न है। जिन्होंने वस्तुतः ऐसी अवस्था प्राप्त कर ली है, उन्हें भौतिक अवस्थाओं को—विशेषतः जन्म और मृत्यु को—जीत चुका मानना चाहिए। जब तक मनुष्य इस शरीर के साथ अपनी पहचान करता है, तब तक उसे बद्धजीव माना जाता है; किन्तु ज्यों ही वह आत्म-साक्षात्कार के द्वारा समता की अवस्था तक उन्नत होता है, त्यों ही वह बद्ध जीवन से मुक्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, वह अब भौतिक जगत् में जन्म लेने के अधीन नहीं रहता, अपितु अपनी मृत्यु के पश्चात् आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश कर सकता है। भगवान् निर्दोष हैं, क्योंकि वे राग और द्वेष से रहित हैं। इसी प्रकार, जब जीव राग और द्वेष से रहित हो जाता है, तब वह भी निर्दोष तथा आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश के योग्य बन जाता है। ऐसे व्यक्तियों को पहले से ही मुक्त मानना चाहिए, और उनके लक्षणों का वर्णन आगे किया गया है।
Bg 5.2
श्रीभगवानुवाच
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥
श्रीभगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; सन्न्यासः—कर्म का त्याग; कर्म-योगः—भक्तिमय कर्म; च—भी; निःश्रेयस-करौ—दोनों मुक्ति के पथ की ओर ले जाने वाले; उभौ—दोनों; तयोः—इन दोनों में से; तु—किन्तु; कर्म-सन्न्यासात्—सकाम कर्म के त्याग की तुलना में; कर्म-योगः—भक्तिमय कर्म; विशिष्यते—श्रेष्ठ है।
श्रीभगवान् ने कहा : कर्म का त्याग तथा भक्तिमय कर्म—दोनों मुक्ति के लिए श्रेयस्कर हैं। किन्तु इन दोनों में से कर्म-त्याग की अपेक्षा भक्तिमय कर्म श्रेष्ठ है।
सकाम कर्म (इन्द्रियतृप्ति की खोज) भौतिक बन्धन का कारण है। जब तक मनुष्य देहसुख के स्तर को सुधारने हेतु कर्मों में संलग्न रहता है, तब तक उसे निश्चित रूप से नाना प्रकार के शरीरों में देहान्तरण करना पड़ता है, और इस प्रकार भौतिक बन्धन निरन्तर चलता रहता है। श्रीमद्भागवत इसकी पुष्टि इस प्रकार करता है :
nūnaṁ pramattaḥ kurute vikarma yad indriya-prītaya āpṛṇoti
na sādhu manye yata ātmano ‘yam asann api kleśada āsa dehaḥ
parābhavas tāvad abodha-jāto yāvanna jijñāsata ātma-tattvam
yāvat kriyās tāvad idaṁ mano vai karmātmakaṁ yena śarīra-bandhaḥ
evaṁ manaḥ karma-vaśaṁ prayuṅkte avidyayātmany upadhīyamāne
prītir na yāvan mayi vāsudeve na mucyate deha-yogena tāvat
“लोग इन्द्रियतृप्ति के पीछे उन्मत्त हैं, और वे यह नहीं जानते कि दुःखों से परिपूर्ण यह वर्तमान शरीर भूतकाल के सकाम कर्मों का ही फल है। यद्यपि यह शरीर क्षणभंगुर है, फिर भी यह सदा अनेक प्रकार से कष्ट देता रहता है। अतः इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करना उचित नहीं है। जब तक मनुष्य सकाम कर्म के स्वरूप के विषय में कोई जिज्ञासा नहीं करता, तब तक उसे जीवन में असफल माना जाता है; क्योंकि जब तक मनुष्य इन्द्रियतृप्ति की चेतना में लीन रहता है, तब तक उसे एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करना पड़ता है। यद्यपि मन सकाम कर्मों में लीन हो और अज्ञान से प्रभावित हो, फिर भी मनुष्य को भगवान् वासुदेव की भक्ति के प्रति प्रेम विकसित करना चाहिए। केवल तभी उसे भौतिक अस्तित्व के बन्धन से निकलने का अवसर प्राप्त हो सकता है।” (भा. 5.5.4-6)
अतः मुक्ति के लिए केवल ज्ञान (अर्थात् यह ज्ञान कि मैं यह भौतिक शरीर नहीं, अपितु आत्मा हूँ) पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को आत्मा के स्तर पर कर्म करना होता है, अन्यथा भौतिक बन्धन से कोई छुटकारा नहीं है। किन्तु कृष्णभावनामृत में किया गया कर्म सकाम स्तर का कर्म नहीं है। पूर्ण ज्ञान में सम्पन्न किए गए कर्म वास्तविक ज्ञान में मनुष्य की उन्नति को सुदृढ़ करते हैं। कृष्णभावनामृत के बिना केवल सकाम कर्मों के त्याग से बद्धजीव का हृदय वास्तव में शुद्ध नहीं होता। जब तक हृदय शुद्ध नहीं होता, तब तक मनुष्य को सकाम स्तर पर कर्म करना पड़ता है। किन्तु कृष्णभावनामृत में किया गया कर्म मनुष्य को स्वतः ही सकाम कर्म के फल से बचने में सहायता करता है, जिससे उसे भौतिक स्तर पर उतरने की आवश्यकता नहीं रहती। अतएव कृष्णभावनामृत में कर्म सदैव त्याग से श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग में सदा पतन का भय रहता है। कृष्णभावनामृत के बिना त्याग अपूर्ण है, जैसा कि श्रील रूप गोस्वामी अपने भक्ति-रसामृत-सिन्धु में पुष्टि करते हैं।
prāpañcikatayā buddhyā hari-sambandhi-vastunaḥ
mumukṣubhiḥ parityāgo vairāgyaṁ phalgu kathyate.
“मुक्ति की कामना करने वाले व्यक्तियों के द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से सम्बन्धित वस्तुओं का त्याग, भले ही वे भौतिक हों, अपूर्ण त्याग कहलाता है।” त्याग तब पूर्ण होता है जब वह इस ज्ञान में हो कि अस्तित्व में जो कुछ है वह भगवान् का है और किसी को भी किसी वस्तु पर स्वामित्व का दावा नहीं करना चाहिए। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वस्तुतः कोई भी वस्तु किसी की नहीं है। तब त्याग का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है? जो जानता है कि सब कुछ श्रीकृष्ण की सम्पत्ति है, वह सदैव त्याग में स्थित रहता है। चूँकि सब कुछ श्रीकृष्ण का है, अतः सब कुछ श्रीकृष्ण की सेवा में लगाया जाना चाहिए। कृष्णभावनामृत में कर्म का यह पूर्ण रूप मायावादी सम्प्रदाय के किसी संन्यासी के कृत्रिम त्याग से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
Bg 5.20
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
न—कभी नहीं; प्रहृष्येत्—हर्षित होता है; प्रियम्—सुखद; प्राप्य—प्राप्त करके; न—नहीं; उद्विजेत्—विचलित होता है; प्राप्य—प्राप्त करके; च—भी; अप्रियम्—अप्रिय; स्थिर-बुद्धिः—स्थिर-बुद्धिवाला; असम्मूढः—मोहरहित; ब्रह्म-वित्—जो परम को पूर्णतः जानता है; ब्रह्मणि—दिव्यता में; स्थितः—स्थित।
जो व्यक्ति न तो कोई सुखद वस्तु प्राप्त करके हर्षित होता है और न ही कोई अप्रिय वस्तु प्राप्त करके शोक करता है, जो स्थिर-बुद्धि एवं मोहरहित है, और जो ईश्वर के विज्ञान को जानता है, उसे पहले से ही दिव्यता में स्थित समझना चाहिए।
आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति के लक्षण यहाँ दिए गए हैं। प्रथम लक्षण यह है कि वह शरीर की अपने सच्चे स्वरूप के साथ की मिथ्या पहचान से भ्रमित नहीं होता। वह भली-भाँति जानता है कि वह यह शरीर नहीं, अपितु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का अंशस्वरूप है। अतः वह न तो कोई वस्तु प्राप्त करके हर्षित होता है, और न ही अपने शरीर से सम्बन्धित किसी वस्तु को खोकर शोक करता है। मन की यह स्थिरता स्थिर-बुद्धि अथवा आत्म-बुद्धि कहलाती है। अतएव वह स्थूल शरीर को आत्मा समझ बैठने के कारण कभी मोहित नहीं होता, और न ही शरीर को नित्य मानकर आत्मा के अस्तित्व की उपेक्षा करता है। यह ज्ञान उसे परम सत्य के सम्पूर्ण विज्ञान—अर्थात् ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—को जानने की अवस्था तक उन्नत कर देता है। इस प्रकार वह सभी प्रकार से परम के साथ एक होने का मिथ्या प्रयास किए बिना, अपनी स्वरूपगत स्थिति को भली-भाँति जान लेता है। यही ब्रह्म-साक्षात्कार अथवा आत्म-साक्षात्कार कहलाता है। ऐसी स्थिर चेतना कृष्णभावनामृत कहलाती है।
Bg 5.21
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
बाह्य-स्पर्शेषु—बाह्य इन्द्रिय-सुख में; असक्त-आत्मा—जो आसक्त नहीं है; विन्दति—भोगता है; आत्मनि—आत्मा में; यत्—जो; सुखम्—सुख; सः—वह; ब्रह्म-योग—ब्रह्म में एकाग्र; युक्त-आत्मा—आत्मा से संयुक्त; सुखम्—सुख; अक्षयम्—असीम; अश्नुते—भोगता है।
ऐसा मुक्त व्यक्ति भौतिक इन्द्रिय-सुख अथवा बाह्य वस्तुओं की ओर आकृष्ट नहीं होता, अपितु सदा समाधि में रहता हुआ अपने भीतर के सुख का भोग करता है। इस प्रकार आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति असीम सुख का भोग करता है, क्योंकि वह परम पर एकाग्र रहता है।
कृष्णभावनामृत में स्थित महान् भक्त श्री यामुनाचार्य ने कहा है—
yadāvadhi mama cetaḥ kṛṣṇa-padāravinde
nava-nava-rasa-dhāmanudyata rantum āsīt
tadāvadhi bata nārī-saṅgame smaryamāne
bhavati mukha-vikāraḥ suṣṭu niṣṭhīvanaṁ ca
“जब से मैं श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न हुआ हूँ, और उनमें सदा नवीन आनन्द का अनुभव करता हूँ, तब से जब कभी मैं विषय-सुख का स्मरण करता हूँ, तो उस विचार पर थूकता हूँ और मेरे ओष्ठ घृणा से सिकुड़ जाते हैं।” ब्रह्म-योग अथवा कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति भगवान् की प्रेममयी सेवा में इतना तल्लीन रहता है कि वह भौतिक इन्द्रिय-सुख के प्रति अपनी रुचि पूर्णतः खो देता है। पदार्थ की दृष्टि से सर्वोच्च सुख विषय-सुख है। समूचा संसार इसके वशीभूत होकर चल रहा है, और एक भौतिकतावादी इस प्रेरणा के बिना तनिक भी कार्य नहीं कर सकता। किन्तु कृष्णभावनामृत में संलग्न व्यक्ति, जिस विषय-सुख से वह बचता है, उसके बिना ही अधिक उत्साह से कार्य कर सकता है। आध्यात्मिक साक्षात्कार में यही कसौटी है। आध्यात्मिक साक्षात्कार और विषय-सुख एक साथ नहीं रहते। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति मुक्त आत्मा होने के कारण किसी भी प्रकार के इन्द्रिय-सुख की ओर आकृष्ट नहीं होता।
Bg 5.22
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
ये—वे; हि—निश्चय ही; संस्पर्श-जाः—भौतिक इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न; भोगाः—भोग; दुःख—दुःख; योनयः—के स्रोत; एव—निश्चय ही; ते—वे हैं; आदि—आरम्भ में; अन्तवन्तः—के अधीन; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; न—कभी नहीं; तेषु—उनमें; रमते—आनन्द लेता है; बुधः—बुद्धिमान्।
बुद्धिमान् व्यक्ति उन दुःख के स्रोतों में भाग नहीं लेता, जो भौतिक इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न होते हैं। हे कुन्तीपुत्र! ऐसे भोगों का आदि और अन्त होता है, अतः बुद्धिमान् व्यक्ति उनमें आनन्द नहीं लेता।
भौतिक इन्द्रिय-सुख भौतिक इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न होते हैं, जो सभी क्षणिक हैं, क्योंकि शरीर स्वयं ही क्षणिक है। मुक्त आत्मा किसी भी क्षणिक वस्तु में रुचि नहीं रखती। दिव्य सुखों के आनन्द को भली-भाँति जानते हुए, मुक्त आत्मा मिथ्या सुख भोगने को कैसे सहमत हो सकती है? पद्म पुराण में कहा गया है—
ramante yogino ‘nante satyānanda-cid-ātmani
iti rāma-padenāsau paraṁ brahmābhidhīyate
“योगीजन परम सत्य से असीम दिव्य सुख प्राप्त करते हैं, अतएव परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, राम के नाम से भी जाने जाते हैं।”
श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है—
nāyaṁ deho deha-bhājāṁ nṛ-loke
kaṣṭān kāmān arhate viḍ-bhajāṁ ye
tapo divyaṁ putrakā yena sattvaṁ
śuddhyed yasmād brahma-saukhyaṁ tv anantam.
“हे मेरे प्रिय पुत्रो! जीवन के इस मानव रूप में इन्द्रिय-सुख के लिए अत्यन्त कठोर परिश्रम करने का कोई कारण नहीं है; ऐसे सुख तो विष्ठा खाने वालों [शूकरों] को भी सुलभ हैं। इसके स्थान पर, तुम्हें इस जीवन में ऐसी तपस्या करनी चाहिए, जिससे तुम्हारा अस्तित्व शुद्ध हो जाए, और फलस्वरूप तुम असीम दिव्य आनन्द का भोग कर सकोगे।” (भा. 5.5.1)
अतएव जो सच्चे योगी अथवा विद्वान् दिव्यवादी हैं, वे इन्द्रिय-सुखों की ओर आकृष्ट नहीं होते, जो निरन्तर भौतिक अस्तित्व के कारण हैं। मनुष्य जितना अधिक भौतिक सुखों का व्यसनी होता है, उतना ही अधिक वह भौतिक दुःखों में फँस जाता है।
Bg 5.23
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
शक्नोति—समर्थ है; इह एव—इसी शरीर में; यः—जो; सोढुम्—सहन करने में; प्राक्—पूर्व; शरीर—शरीर; विमोक्षणात्—त्यागने से; काम—इच्छा; क्रोध—क्रोध; उद्भवम्—से उत्पन्न; वेगम्—वेग; सः—वह; युक्तः—समाधि में; सः—वह; सुखी—सुखी; नरः—मनुष्य।
इस वर्तमान शरीर को त्यागने से पूर्व, यदि कोई भौतिक इन्द्रियों के वेगों को सहन करने तथा इच्छा और क्रोध के बल को रोकने में समर्थ है, तो वह योगी है और इस संसार में सुखी है।
यदि कोई आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर स्थिर प्रगति करना चाहता है, तो उसे भौतिक इन्द्रियों के वेगों को नियन्त्रित करने का प्रयत्न करना चाहिए। वाणी के वेग, क्रोध के वेग, मन के वेग, उदर के वेग, जननेन्द्रिय के वेग तथा जिह्वा के वेग होते हैं। जो इन समस्त भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के तथा मन के वेगों को नियन्त्रित करने में समर्थ है, वह गोस्वामी अथवा स्वामी कहलाता है। ऐसे गोस्वामीगण कठोरतापूर्वक नियन्त्रित जीवन जीते हैं और इन्द्रियों के वेगों का पूर्णतः परित्याग कर देते हैं। भौतिक इच्छाएँ, जब अतृप्त रहती हैं, तब क्रोध उत्पन्न करती हैं, और इस प्रकार मन, नेत्र तथा वक्ष विचलित हो जाते हैं। अतः मनुष्य को इस भौतिक शरीर को त्यागने से पूर्व उन्हें नियन्त्रित करने का अभ्यास करना चाहिए। जो ऐसा कर सकता है, उसे आत्म-साक्षात्कारी समझा जाता है और इस प्रकार वह आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में सुखी रहता है। इच्छा और क्रोध को नियन्त्रित करने का प्रयत्नपूर्वक प्रयास करना दिव्यवादी का कर्तव्य है।
Bg 5.24
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥
यः—जो; अन्तः-सुखः—भीतर से सुखी; अन्तः-आरामः—भीतर सक्रिय; तथा—साथ ही; अन्तः-ज्योतिः—भीतर लक्ष्य रखने वाला; एव—निश्चय ही; यः—जो कोई; सः—वह; योगी—योगी; ब्रह्म-निर्वाणम्—परम में मुक्त; ब्रह्म-भूतः—आत्म-साक्षात्कारी; अधिगच्छति—प्राप्त करता है।
जिसका सुख भीतर है, जो भीतर सक्रिय है, जो भीतर ही आनन्दित होता है और जो भीतर ही प्रकाशित है, वही वस्तुतः पूर्ण योगी है। वह परम में मुक्त है, और अन्ततः वह परम को प्राप्त करता है।
जब तक मनुष्य भीतर से सुख का आस्वादन करने में समर्थ नहीं होता, तब तक वह उन बाह्य कार्यों से कैसे निवृत्त हो सकता है, जो सतही सुख प्राप्त करने हेतु किए जाते हैं? मुक्त व्यक्ति वास्तविक अनुभव से सुख का भोग करता है। अतः वह किसी भी स्थान पर मौन बैठकर भीतर से जीवन के कार्यों का आनन्द ले सकता है। ऐसा मुक्त व्यक्ति अब बाह्य भौतिक सुख की इच्छा नहीं करता। यह अवस्था ब्रह्म-भूत कहलाती है, जिसे प्राप्त करने पर मनुष्य को भगवद्धाम वापस, अपने घर वापस लौटने का आश्वासन मिल जाता है।
Bg 5.25
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥
लभन्ते—प्राप्त करते हैं; ब्रह्म-निर्वाणम्—परम में मुक्ति; ऋषयः—जो भीतर सक्रिय हैं; क्षीण-कल्मषाः—जो समस्त पापों से रहित हैं; छिन्न—छिन्न; द्वैधाः—द्वैत; यत-आत्मानः—आत्म-साक्षात्कार में संलग्न; सर्व-भूत—समस्त जीवों के; हिते—कल्याण-कार्य में; रताः—संलग्न।
जो द्वैत और सन्देह से परे है, जिसका मन भीतर संलग्न है, जो समस्त चेतन प्राणियों के कल्याण के लिए सदा कार्यरत है, और जो समस्त पापों से मुक्त है, वह परम में मुक्ति प्राप्त करता है।
केवल वही व्यक्ति, जो पूर्णतः कृष्णभावनामृत में स्थित है, समस्त जीवों के कल्याण-कार्य में संलग्न कहा जा सकता है। जब कोई व्यक्ति वस्तुतः इस ज्ञान में स्थित होता है कि श्रीकृष्ण ही सबके उद्गम-स्रोत हैं, तब वह उसी भाव से कार्य करते हुए सबके लिए कार्य करता है। मानवता के कष्ट इसी कारण हैं कि वह श्रीकृष्ण को परम भोक्ता, परम स्वामी तथा परम मित्र के रूप में भूल जाती है। अतः समूचे मानव समाज के भीतर इस चेतना को पुनर्जीवित करने हेतु कार्य करना ही सर्वोच्च कल्याण-कार्य है। परम में मुक्त हुए बिना कोई प्रथम-श्रेणी के कल्याण-कार्य में संलग्न नहीं हो सकता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को श्रीकृष्ण की सर्वोच्चता में कोई सन्देह नहीं होता। उसे सन्देह नहीं होता, क्योंकि वह समस्त पापों से पूर्णतः मुक्त है। यही दिव्य प्रेम की अवस्था है।
जो व्यक्ति केवल मानव समाज के शारीरिक कल्याण की सेवा में संलग्न है, वह वस्तुतः किसी की सहायता नहीं कर सकता। बाह्य शरीर और मन को क्षणिक राहत देना सन्तोषजनक नहीं है। जीवन के कठोर संघर्ष में मनुष्य की कठिनाइयों का वास्तविक कारण परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की विस्मृति में पाया जा सकता है। जब मनुष्य श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध के प्रति पूर्णतः सचेत होता है, तब वह वस्तुतः मुक्त आत्मा है, भले ही वह भौतिक शरीर रूपी आवरण में रहे।
Bg 5.26
कामक्रोधविमुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥
काम—इच्छाएँ; क्रोध—क्रोध; विमुक्तानाम्—जो इस प्रकार मुक्त हैं उनकी; यतीनाम्—साधु व्यक्तियों की; यत-चेतसाम्—जिनका मन पर पूर्ण नियन्त्रण है उनकी; अभितः—निकट भविष्य में सुनिश्चित; ब्रह्म-निर्वाणम्—परम में मुक्ति; वर्तते—है; विदित-आत्मनाम्—जो आत्म-साक्षात्कारी हैं उनकी।
जो क्रोध और समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं, जो आत्म-साक्षात्कारी, आत्म-संयमी और पूर्णता के लिए निरन्तर प्रयत्नशील हैं, उन्हें अति निकट भविष्य में ही परम में मुक्ति का आश्वासन प्राप्त है।
जो साधु व्यक्ति मुक्ति की ओर निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं, उनमें से जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, वही सबमें श्रेष्ठ है। भागवत इस तथ्य की पुष्टि इस प्रकार करता है—
yat-pāda-paṅkaja-palāśa-vilāsa-bhaktyā
karmāśayaṁ grathitam udgrathayanti santaḥ
tadvan na rikta-matayo yatayo ‘pi ruddha-
srotogaṇās tam araṇaṁ bhaja vāsudevam.
“भक्ति में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वासुदेव की आराधना करने का ही प्रयास करो। भगवान् के चरणकमलों की सेवा द्वारा दिव्य आनन्द में संलग्न व्यक्तियों के समान, महान् ऋषि भी इन्द्रियों के वेगों को इतने प्रभावी ढंग से नियन्त्रित नहीं कर पाते, जो सकाम कर्मों की गहराई से जड़ जमाई इच्छा को उखाड़ फेंकते हैं।” (भा. 4.22.39)
बद्धजीव में कर्म के सकाम फलों को भोगने की इच्छा इतनी गहराई से जड़ जमाई हुई है कि महान् ऋषियों के लिए भी, महान् प्रयासों के बावजूद, ऐसी इच्छाओं को नियन्त्रित करना अत्यन्त कठिन है। भगवान् का भक्त, जो कृष्णभावनामृत में भक्ति में निरन्तर संलग्न रहता है और आत्म-साक्षात्कार में परिपूर्ण है, अति शीघ्र परम में मुक्ति प्राप्त कर लेता है। आत्म-साक्षात्कार में अपने पूर्ण ज्ञान के कारण वह सदा समाधि में स्थित रहता है। इसका एक सादृश्यपूर्ण उदाहरण इस प्रकार है—
darśana-dhyāna-saṁsparśair matsya-kūrma-vihaṅgamāḥ
svānya patyāni puṣṇanti tathāham api padmaja.
“दर्शन से, ध्यान से और केवल स्पर्श से मछली, कछुआ और पक्षी अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। हे पद्मज! उसी प्रकार मैं भी करता हूँ।”
मछली अपने बच्चों का पालन-पोषण केवल उन्हें देखकर ही करती है। कछुआ अपने बच्चों का पालन-पोषण केवल ध्यान द्वारा करता है। कछुए के अण्डे थल पर रखे जाते हैं, और कछुआ जल में रहते हुए उन अण्डों पर ध्यान करता है। इसी प्रकार, कृष्णभावनामृत में स्थित भक्त, यद्यपि भगवद्धाम से बहुत दूर है, तथापि निरन्तर उनका स्मरण करके—कृष्णभावनामृत में संलग्न रहकर—स्वयं को उस धाम तक उन्नत कर सकता है। वह भौतिक दुःखों की पीड़ा का अनुभव नहीं करता; जीवन की यह अवस्था ब्रह्म-निर्वाण कहलाती है, अर्थात् परम में निरन्तर निमग्न रहने के कारण भौतिक दुःखों का अभाव।
Bg 5.27-28
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥
स्पर्शान्—बाह्य इन्द्रिय-विषय, जैसे ध्वनि आदि; कृत्वा—ऐसा करके; बहिः—बाहर; बाह्यान्—अनावश्यक; चक्षुः—नेत्र; च—भी; एव—निश्चय ही; अन्तरे—भीतर; भ्रुवोः—भौंहों के; प्राण-अपानौ—ऊपर और नीचे जाने वाली वायु; समौ—निरुद्ध; कृत्वा—ऐसा करके; नासा-अभ्यन्तर—नासिका के भीतर; चारिणौ—बहने वाली; यत—नियन्त्रित; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; मनः—मन; बुद्धिः—बुद्धि; मुनिः—दिव्यवादी; मोक्ष—मुक्ति; परायणः—इस प्रकार लक्षित; विगत—त्यागी हुई; इच्छा—इच्छाएँ; भय—भय; क्रोधः—क्रोध; यः—जो; सदा—सदा; मुक्तः—मुक्त; एव—निश्चय ही; सः—वह है।
समस्त बाह्य इन्द्रिय-विषयों को बाहर रखकर, नेत्रों और दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच एकाग्र करके, नासिका के भीतर भीतरी और बाहरी श्वासों को निरुद्ध करके—इस प्रकार मन, इन्द्रियों और बुद्धि को नियन्त्रित करते हुए, दिव्यवादी इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है। जो सदा इस अवस्था में रहता है, वह निश्चय ही मुक्त है।
कृष्णभावनामृत में संलग्न रहकर मनुष्य तत्काल अपनी आध्यात्मिक पहचान को समझ सकता है, और तब वह भक्ति के माध्यम से परमेश्वर को समझ सकता है। जब वह भक्ति में भली-भाँति स्थित हो जाता है, तब वह उस दिव्य अवस्था तक पहुँचता है, जो उसे अपने कार्यक्षेत्र में भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करने योग्य बना देती है। यह विशेष अवस्था परम में मुक्ति कहलाती है।
परम में मुक्ति के उपर्युक्त सिद्धान्तों को समझाने के पश्चात्, भगवान् अर्जुन को यह निर्देश देते हैं कि मनुष्य योग अथवा अष्टांग-योग नामक रहस्यवाद के अभ्यास द्वारा उस अवस्था तक किस प्रकार पहुँच सकता है, जो आठ अंगों वाली विधि में विभाजित है—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। छठे अध्याय में योग का विषय स्पष्ट रूप से विस्तार से वर्णित है, और पाँचवें के अन्त में इसे केवल प्रारम्भिक रूप से समझाया गया है। मनुष्य को योग में प्रत्याहार (श्वास) विधि द्वारा ध्वनि, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध जैसे इन्द्रिय-विषयों को निकाल बाहर करना होता है, और तत्पश्चात् नेत्रों की दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच रखकर अधखुली पलकों से नासिका के अग्रभाग पर एकाग्र होना होता है। नेत्रों को पूर्णतः बन्द कर लेने में कोई लाभ नहीं है, क्योंकि तब निद्रा में जा गिरने की पूर्ण सम्भावना रहती है। और न ही नेत्रों को पूर्णतः खोल देने में कोई लाभ है, क्योंकि तब इन्द्रिय-विषयों की ओर आकृष्ट हो जाने का संकट रहता है। श्वास की गति शरीर के भीतर ऊपर और नीचे जाने वाली वायु को निरुद्ध करके नासिका के भीतर ही रोकी जाती है। ऐसे योग के अभ्यास द्वारा मनुष्य इन्द्रियों पर नियन्त्रण प्राप्त करने, बाह्य इन्द्रिय-विषयों से निवृत्त रहने और इस प्रकार स्वयं को परम में मुक्ति हेतु तैयार करने में समर्थ हो जाता है।
यह योग-विधि मनुष्य को सभी प्रकार के भय और क्रोध से मुक्त होने में सहायता करती है, और इस प्रकार उस दिव्य अवस्था में परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव कराती है। दूसरे शब्दों में, कृष्णभावनामृत योग-सिद्धान्तों को सम्पन्न करने की सबसे सरल विधि है। इसे अगले अध्याय में विस्तार से समझाया जाएगा। तथापि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति, सदा भक्ति में संलग्न रहने के कारण, अपनी इन्द्रियों को किसी अन्य कार्य में खोने का जोखिम नहीं उठाता। यह इन्द्रियों को नियन्त्रित करने की अष्टांग-योग की अपेक्षा एक श्रेष्ठतर विधि है।
Bg 5.29
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥
भोक्तारम्—भोक्ता; यज्ञ—यज्ञ; तपसाम्—तप एवं तपस्याओं का; सर्व-लोक—समस्त लोक तथा उनके देवता; महेश्वरम्—परमेश्वर; सुहृदम्—हितकारी; सर्व—समस्त; भूतानाम्—जीवों का; ज्ञात्वा—इस प्रकार जानकर; माम्—मुझे (भगवान् श्रीकृष्ण को); शान्तिम्—भौतिक पीड़ाओं से राहत; ऋच्छति—प्राप्त करता है।
ऋषिगण मुझे समस्त यज्ञों एवं तपस्याओं का परम प्रयोजन, समस्त लोकों एवं देवताओं का परमेश्वर तथा समस्त जीवों का हितकारी एवं शुभचिन्तक जानकर भौतिक दुःखों की पीड़ाओं से शान्ति प्राप्त करते हैं।
माया-शक्ति के पंजे में बँधे बद्धजीव सभी भौतिक जगत् में शान्ति प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहते हैं। किन्तु वे शान्ति का सूत्र नहीं जानते, जिसे भगवद्गीता के इस अंश में समझाया गया है। शान्ति का सर्वोत्तम सूत्र मात्र यह है—भगवान् श्रीकृष्ण समस्त मानवीय कार्यों के भोक्ता हैं। मनुष्यों को सब कुछ भगवान् की दिव्य सेवा में अर्पित कर देना चाहिए, क्योंकि वे समस्त लोकों तथा उनमें स्थित देवताओं के स्वामी हैं। उनसे बड़ा कोई नहीं है। वे देवताओं में महानतम भगवान् शिव तथा भगवान् ब्रह्मा से भी महान् हैं। वेदों में परमेश्वर का वर्णन इस प्रकार है—तमीश्वराणां परमं महेश्वरम्। माया के वशीभूत होकर जीव उन सब वस्तुओं के स्वामी बनने का प्रयास कर रहे हैं, जिन्हें वे देखते हैं, किन्तु वस्तुतः वे भगवान् की भौतिक शक्ति के अधीन हैं। भगवान् भौतिक प्रकृति के स्वामी हैं, और बद्धजीव भौतिक प्रकृति के कठोर नियमों के अधीन हैं। जब तक मनुष्य इन सीधे-सादे तथ्यों को नहीं समझता, तब तक संसार में व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से शान्ति प्राप्त करना सम्भव नहीं है। कृष्णभावनामृत का यही अभिप्राय है—भगवान् श्रीकृष्ण परम अधीश्वर हैं, और महान् देवताओं सहित समस्त जीव उनके अधीनस्थ हैं। मनुष्य पूर्ण कृष्णभावनामृत में ही पूर्ण शान्ति प्राप्त कर सकता है।
यह पाँचवाँ अध्याय कृष्णभावनामृत का, जो सामान्यतः कर्म-योग के नाम से जाना जाता है, एक व्यावहारिक विवेचन है। कर्म-योग किस प्रकार मुक्ति प्रदान कर सकता है, इस विषय में मानसिक कल्पना के प्रश्न का यहाँ उत्तर दिया गया है। कृष्णभावनामृत में कार्य करना भगवान् को अधीश्वर मानने के पूर्ण ज्ञान सहित कार्य करना है। ऐसा कार्य दिव्य ज्ञान से भिन्न नहीं है। प्रत्यक्ष कृष्णभावनामृत भक्तियोग है, और ज्ञानयोग भक्तियोग की ओर ले जाने वाला मार्ग है। कृष्णभावनामृत का अर्थ है परम परब्रह्म के साथ अपने सम्बन्ध के पूर्ण ज्ञान सहित कार्य करना, और इस चेतना की पूर्णता श्रीकृष्ण अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का पूर्ण ज्ञान है। शुद्ध आत्मा ईश्वर के अंशस्वरूप के रूप में उनकी नित्य सेविका है। वह माया (भ्रम) के संपर्क में माया पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा के कारण आती है, और यही उसके अनेक कष्टों का कारण है। जब तक वह पदार्थ के संपर्क में है, तब तक उसे भौतिक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करना पड़ता है। तथापि कृष्णभावनामृत मनुष्य को पदार्थ के अधिकार-क्षेत्र के भीतर रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन में ले आता है, क्योंकि यह भौतिक जगत् में अभ्यास द्वारा आध्यात्मिक अस्तित्व का जागरण है। मनुष्य जितना अधिक उन्नत होता है, उतना ही अधिक वह पदार्थ के पंजे से मुक्त होता है। भगवान् किसी के प्रति पक्षपाती नहीं हैं। सब कुछ इन्द्रियों को नियन्त्रित करने तथा इच्छा और क्रोध के प्रभाव को जीतने के प्रयास में मनुष्य के कर्तव्यों के व्यावहारिक निष्पादन पर निर्भर करता है। और उपर्युक्त वासनाओं को नियन्त्रित करके कृष्णभावनामृत प्राप्त करते हुए, मनुष्य वस्तुतः दिव्य अवस्था में, अर्थात् ब्रह्म-निर्वाण में स्थित रहता है। कृष्णभावनामृत में अष्टांग-योग का रहस्यवाद स्वतः ही अभ्यस्त हो जाता है, क्योंकि परम प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, प्राणायाम और समाधि के अभ्यास में उन्नति की क्रमिक प्रक्रिया है। किन्तु ये केवल उस पूर्णता की भूमिका मात्र हैं, जो भक्ति द्वारा प्राप्त होती है, और जो अकेले ही मनुष्य को शान्ति प्रदान कर सकती है। यही जीवन की सर्वोच्च पूर्णता है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय “कर्म-योग अथवा कृष्णभावनामृत में कर्म” पर भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं।
Bg 5.3
ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
ज्ञेयः—जानना चाहिए; सः—वह; नित्य—सदा; सन्न्यासी—त्यागी; यः—जो; न—कभी नहीं; द्वेष्टि—घृणा करता है; न—न ही; काङ्क्षति—इच्छा करता है; निर्द्वन्द्वः—समस्त द्वन्द्वों से मुक्त; हि—निश्चय ही; महा-बाहो—हे महाबाहु; सुखम्—सुखपूर्वक; बन्धात्—बन्धन से; प्रमुच्यते—पूर्णतः मुक्त हो जाता है।
जो न तो अपने कर्मफलों से घृणा करता है और न उनकी इच्छा करता है, वह सदा त्यागी जाना जाता है। ऐसा व्यक्ति समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर भौतिक बन्धन को सरलता से पार कर लेता है और पूर्णतः मुक्त हो जाता है, हे महाबाहु अर्जुन!
जो पूर्णतः कृष्णभावनामृत में है वह सदैव त्यागी है, क्योंकि वह अपने कर्मफलों के प्रति न घृणा अनुभव करता है और न इच्छा। ऐसा त्यागी, जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में समर्पित है, ज्ञान में पूर्णतः योग्य होता है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध में अपनी स्वरूपगत स्थिति को जानता है। वह भली-भाँति जानता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण हैं और वह स्वयं श्रीकृष्ण का अंश है। ऐसा ज्ञान पूर्ण है, क्योंकि वह गुणतः तथा परिमाणतः सही है। श्रीकृष्ण के साथ एकता की धारणा गलत है, क्योंकि अंश पूर्ण के समान नहीं हो सकता। यह ज्ञान कि मनुष्य गुण में एक है किन्तु परिमाण में भिन्न है, सही दिव्य ज्ञान है, जो मनुष्य को आत्मतृप्त बना देता है, जिसके पास न कुछ पाने की आकांक्षा रहती है और न किसी बात का शोक। उसके मन में कोई द्वन्द्व नहीं है, क्योंकि वह जो कुछ भी करता है, श्रीकृष्ण के लिए करता है। इस प्रकार द्वन्द्वों के स्तर से मुक्त होकर वह इस भौतिक जगत् में रहते हुए भी मुक्त है।
Bg 5.4
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥
साङ्ख्य—भौतिक जगत् का विश्लेषणात्मक अध्ययन; योगौ—भक्तिमय कर्म; पृथक्—भिन्न; बालाः—अल्पबुद्धि वाले; प्रवदन्ति—कहते हैं; न—कभी नहीं; पण्डिताः—विद्वान्; एकम्—एक में; अपि—यद्यपि; आस्थितः—स्थित होकर; सम्यक्—पूर्ण; उभयोः—दोनों का; विन्दते—भोगता है; फलम्—फल।
केवल अज्ञानी ही कर्मयोग तथा भक्ति को भौतिक जगत् के विश्लेषणात्मक अध्ययन (सांख्य) से भिन्न बताते हैं। जो वास्तव में विद्वान् हैं वे कहते हैं कि जो इन दोनों मार्गों में से किसी एक का भली-भाँति अनुसरण करता है, वह दोनों के फल प्राप्त कर लेता है।
भौतिक जगत् के विश्लेषणात्मक अध्ययन का उद्देश्य अस्तित्व की आत्मा को ढूँढ़ना है। भौतिक जगत् की आत्मा विष्णु अर्थात् परमात्मा हैं। भगवान् की भक्ति में परमात्मा की सेवा निहित है। एक प्रक्रिया वृक्ष की जड़ को ढूँढ़ना है, और तत्पश्चात् उस जड़ को सींचना है। सांख्य-दर्शन का वास्तविक विद्यार्थी भौतिक जगत् की जड़ विष्णु को ढूँढ़ लेता है, और फिर पूर्ण ज्ञान में भगवान् की सेवा में स्वयं को संलग्न कर देता है। अतः तत्त्वतः इन दोनों में कोई भेद नहीं है, क्योंकि दोनों का लक्ष्य विष्णु ही हैं। जो परम लक्ष्य को नहीं जानते वे कहते हैं कि सांख्य तथा कर्मयोग के प्रयोजन एक नहीं हैं, किन्तु जो विद्वान् है वह इन भिन्न प्रक्रियाओं में एकीकृत लक्ष्य को जानता है।
Bg 5.5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥
यत्—जो; साङ्ख्यैः—सांख्य-दर्शन के द्वारा; प्राप्यते—प्राप्त होता है; स्थानम्—स्थान; तत्—वह; योगैः—भक्ति के द्वारा; अपि—भी; गम्यते—प्राप्त किया जा सकता है; एकम्—एक; साङ्ख्यम्—विश्लेषणात्मक अध्ययन; च—और; योगम्—भक्तिमय कर्म; च—और; यः—जो; पश्यति—देखता है; सः—वह; पश्यति—वास्तव में देखता है।
जो जानता है कि त्याग के द्वारा प्राप्त की जाने वाली स्थिति भक्तिमय कर्म के द्वारा भी प्राप्त की जा सकती है, और जो इसलिए यह देखता है कि कर्म का मार्ग तथा त्याग का मार्ग एक ही हैं, वही वस्तुओं को यथारूप देखता है।
दार्शनिक अन्वेषण का वास्तविक प्रयोजन जीवन के परम लक्ष्य को ढूँढ़ना है। चूँकि जीवन का परम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार है, अतः इन दोनों प्रक्रियाओं से प्राप्त निष्कर्षों में कोई भेद नहीं है। सांख्य-दार्शनिक अन्वेषण द्वारा मनुष्य इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि जीव भौतिक जगत् का अंश नहीं, अपितु परम चेतन पूर्ण का अंश है। फलस्वरूप आत्मा का भौतिक जगत् से कोई सरोकार नहीं है; उसके कर्म किसी-न-किसी रूप में परमेश्वर से सम्बन्धित होने चाहिए। जब वह कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तब वह वास्तव में अपनी स्वरूपगत स्थिति में रहता है। सांख्य की प्रथम प्रक्रिया में मनुष्य को पदार्थ से विरक्त होना पड़ता है, और भक्तियोग की प्रक्रिया में मनुष्य को स्वयं को श्रीकृष्ण के कार्य में आसक्त करना पड़ता है। वस्तुतः दोनों प्रक्रियाएँ एक ही हैं, यद्यपि ऊपरी तौर पर एक प्रक्रिया विरक्ति से युक्त और दूसरी आसक्ति से युक्त प्रतीत होती है। तथापि पदार्थ से विरक्ति तथा श्रीकृष्ण के प्रति आसक्ति एक ही हैं। जो इसे देख सकता है, वही वस्तुओं को यथारूप देखता है।
Bg 5.6
सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥
सन्न्यासः—संन्यास आश्रम; तु—किन्तु; महा-बाहो—हे महाबाहु; दुःखम्—दुःख; आप्तुम्—से पीड़ित होना; अयोगतः—भक्ति के बिना; योग-युक्तः—भक्ति में संलग्न; मुनिः—मननशील व्यक्ति; ब्रह्म—परम; न—बिना; चिरेण—विलम्ब; अधिगच्छति—प्राप्त करता है।
जब तक मनुष्य भगवान् की भक्ति में संलग्न नहीं होता, तब तक केवल कर्मों का त्याग उसे सुखी नहीं बना सकता। भक्तिमय कर्मों से शुद्ध हुए मुनिगण विलम्ब किए बिना परम को प्राप्त कर लेते हैं।
संन्यासी अर्थात् संन्यास आश्रम में स्थित व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। मायावादी संन्यासी सांख्य-दर्शन के अध्ययन में संलग्न रहते हैं, जबकि वैष्णव संन्यासी भागवत-दर्शन के अध्ययन में संलग्न रहते हैं, जो वेदान्त-सूत्रों पर उचित भाष्य प्रस्तुत करता है। मायावादी संन्यासी भी वेदान्त-सूत्रों का अध्ययन करते हैं, किन्तु अपने ही भाष्य का प्रयोग करते हैं, जिसे शारीरक-भाष्य कहते हैं, जिसकी रचना शंकराचार्य ने की थी। भागवत सम्प्रदाय के विद्यार्थी पाञ्चरात्रिकी विधियों के अनुसार भगवान् की भक्ति में संलग्न रहते हैं, और इसलिए वैष्णव संन्यासियों के पास भगवान् की दिव्य सेवा में अनेक प्रकार के कार्य होते हैं। वैष्णव संन्यासियों का भौतिक कर्मों से कोई सरोकार नहीं होता, फिर भी वे भगवान् की अपनी भक्ति में नाना प्रकार के कार्य सम्पन्न करते हैं। किन्तु सांख्य तथा वेदान्त के अध्ययन एवं कल्पना में लगे मायावादी संन्यासी भगवान् की दिव्य सेवा का आस्वादन नहीं कर सकते। चूँकि उनका अध्ययन अत्यन्त नीरस हो जाता है, अतः वे कभी-कभी ब्रह्म-कल्पना से ऊब जाते हैं, और इस प्रकार उचित समझ के बिना भागवत की शरण लेते हैं। परिणामस्वरूप श्रीमद्भागवत का उनका अध्ययन कष्टप्रद बन जाता है। मायावादी संन्यासियों के लिए शुष्क कल्पनाएँ तथा कृत्रिम साधनों द्वारा की गई निर्विशेष व्याख्याएँ सर्वथा निरर्थक हैं। भक्ति में संलग्न वैष्णव संन्यासी अपने दिव्य कर्तव्यों के निर्वाह में सुखी रहते हैं, और उन्हें भगवद्धाम में अन्ततः प्रवेश की निश्चितता रहती है। मायावादी संन्यासी कभी-कभी आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से पतित हो जाते हैं और पुनः लोक-कल्याणकारी एवं परोपकारी प्रकार के भौतिक कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं, जो भौतिक व्यापार के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। अतएव निष्कर्ष यह है कि जो कृष्णभावनामृत में संलग्न हैं, वे केवल ब्रह्म-कल्पना में लगे संन्यासियों की अपेक्षा अधिक उत्तम स्थिति में हैं, यद्यपि वे भी अनेक जन्मों के पश्चात् कृष्णभावनामृत को प्राप्त होते हैं।
Bg 5.7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
योग-युक्तः—भक्ति में संलग्न; विशुद्ध-आत्मा—शुद्ध आत्मा; विजित-आत्मा—आत्म-संयमी; जित-इन्द्रियः—जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है; सर्वभूत-आत्मभूत-आत्मा—समस्त जीवों के प्रति करुणामय; कुर्वन् अपि—यद्यपि कर्म में संलग्न; न—कभी नहीं; लिप्यते—बँधता है।
जो भक्ति में कर्म करता है, जो शुद्ध आत्मा है, और जो अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखता है, वह सबको प्रिय होता है और सब उसे प्रिय होते हैं। सदा कर्म करते हुए भी ऐसा व्यक्ति कभी नहीं बँधता।
जो कृष्णभावनामृत द्वारा मुक्ति के मार्ग पर है, वह प्रत्येक जीव को अत्यन्त प्रिय होता है, और प्रत्येक जीव उसे प्रिय होता है। यह उसके कृष्णभावनामृत के कारण होता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी जीव को श्रीकृष्ण से पृथक् नहीं सोच सकता, जिस प्रकार वृक्ष के पत्ते तथा शाखाएँ वृक्ष से पृथक् नहीं होतीं। वह भली-भाँति जानता है कि वृक्ष की जड़ पर जल डालने से वह जल समस्त पत्तों तथा शाखाओं तक वितरित हो जाएगा, अथवा पेट को भोजन देने से ऊर्जा स्वतः ही समूचे शरीर में वितरित हो जाती है। चूँकि जो कृष्णभावनामृत में कर्म करता है वह सबका सेवक है, अतः वह सबको अत्यन्त प्रिय होता है। और चूँकि उसके कर्म से सब सन्तुष्ट रहते हैं, अतः वह चेतना में शुद्ध रहता है। चूँकि वह चेतना में शुद्ध है, अतः उसका मन पूर्णतः वश में रहता है। और चूँकि उसका मन वश में है, अतः उसकी इन्द्रियाँ भी वश में रहती हैं। चूँकि उसका मन सदा श्रीकृष्ण पर स्थिर रहता है, अतः उसके श्रीकृष्ण से विचलित होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। न ही इसकी कोई सम्भावना है कि वह अपनी इन्द्रियों को भगवान् की सेवा के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य में लगाए। वह श्रीकृष्ण से सम्बन्धित विषयों के अतिरिक्त कुछ भी सुनना पसन्द नहीं करता; वह कोई भी ऐसी वस्तु खाना पसन्द नहीं करता जो श्रीकृष्ण को अर्पित न हो; और यदि श्रीकृष्ण का सम्बन्ध न हो तो वह कहीं जाना नहीं चाहता। अतः उसकी इन्द्रियाँ वश में रहती हैं। संयमित इन्द्रियों वाला व्यक्ति किसी के प्रति आक्रामक नहीं हो सकता। कोई पूछ सकता है, “तो फिर अर्जुन ने (युद्ध में) दूसरों के प्रति आक्रामकता क्यों दिखाई? क्या वह कृष्णभावनामृत में नहीं था?” अर्जुन केवल ऊपरी तौर पर आक्रामक था, क्योंकि (जैसा कि दूसरे अध्याय में पहले ही समझाया जा चुका है) युद्धभूमि में एकत्र सभी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से जीवित रहते, क्योंकि आत्मा का वध नहीं किया जा सकता। अतः आध्यात्मिक दृष्टि से कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में किसी का वध नहीं हुआ। श्रीकृष्ण के आदेश से, जो स्वयं वहाँ उपस्थित थे, केवल उनके वस्त्र बदले गए। अतएव कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में युद्ध करते समय अर्जुन वास्तव में युद्ध कर ही नहीं रहा था; वह तो पूर्ण कृष्णभावनामृत में केवल श्रीकृष्ण के आदेशों का पालन कर रहा था। ऐसा व्यक्ति कर्म की प्रतिक्रियाओं में कभी नहीं बँधता।
Bg 5.8-9
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
न—कभी नहीं; एव—निश्चय ही; किञ्चित्—कुछ भी; करोमि—मैं करता हूँ; इति—इस प्रकार; युक्तः—दिव्य चेतना में संलग्न; मन्येत—सोचता है; तत्त्ववित्—जो सत्य को जानता है; पश्यन्—देखते हुए; शृण्वन्—सुनते हुए; स्पृशन्—स्पर्श करते हुए; जिघ्रन्—सूँघते हुए; अश्नन्—खाते हुए; गच्छन्—जाते हुए; स्वपन्—स्वप्न देखते हुए; श्वसन्—श्वास लेते हुए; प्रलपन्—बोलते हुए; विसृजन्—त्यागते हुए; गृह्णन्—ग्रहण करते हुए; उन्मिषन्—खोलते हुए; निमिषन्—बन्द करते हुए; अपि—होने पर भी; इन्द्रियाणि—इन्द्रियाँ; इन्द्रिय-अर्थेषु—इन्द्रियतृप्ति में; वर्तन्ते—वे इस प्रकार संलग्न रहें; इति—इस प्रकार; धारयन्—विचार करते हुए।
दिव्य चेतना में स्थित व्यक्ति, यद्यपि देखने, सुनने, स्पर्श करने, सूँघने, खाने, चलने-फिरने, सोने तथा श्वास लेने में संलग्न रहता है, फिर भी वह अपने भीतर सदा जानता है कि वस्तुतः वह कुछ भी नहीं करता। क्योंकि बोलते, मल त्यागते, ग्रहण करते, अपनी आँखें खोलते अथवा बन्द करते हुए वह सदा जानता है कि केवल भौतिक इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में संलग्न हैं और वह उनसे पृथक् है।
कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति अपने अस्तित्व में शुद्ध होता है, और फलस्वरूप उसका ऐसे किसी कर्म से सरोकार नहीं रहता जो पाँच निकट तथा दूर के कारणों पर निर्भर हो : कर्ता, कर्म, परिस्थिति, प्रयास तथा भाग्य। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में संलग्न रहता है। यद्यपि वह अपने शरीर तथा इन्द्रियों से कर्म करता प्रतीत होता है, फिर भी वह सदा अपनी वास्तविक स्थिति के प्रति सचेत रहता है, जो आध्यात्मिक प्रवृत्ति है। भौतिक चेतना में इन्द्रियाँ इन्द्रियतृप्ति में संलग्न रहती हैं, किन्तु कृष्णभावनामृत में इन्द्रियाँ श्रीकृष्ण की इन्द्रियों की तृप्ति में संलग्न रहती हैं। अतएव कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सदा मुक्त रहता है, यद्यपि वह इन्द्रिय-विषयों में संलग्न प्रतीत होता है। देखना, सुनना, बोलना, मल त्यागना इत्यादि क्रियाएँ कर्म के लिए इन्द्रियों के व्यापार हैं। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति इन्द्रियों की क्रियाओं से कभी प्रभावित नहीं होता। वह भगवान् की सेवा के अतिरिक्त कोई कर्म कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह जानता है कि वह भगवान् का नित्य सेवक है।