अध्याय 10
Bg 10.1
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
श्री-भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; भूयः—पुनः; एव—निश्चय ही; महा-बाहो—हे महाबाहु; शृणु—सुनो; मे—मेरा; परमम्—परम; वचः—वचन; यत्—जो; ते—तुम्हें; अहम्—मैं; प्रीयमाणाय—तुम्हें अपना प्रिय मानते हुए; वक्ष्यामि—कहूँगा; हित-काम्यया—तुम्हारे हित हेतु।
श्रीभगवान् ने कहा: हे प्रिय मित्र महाबाहु अर्जुन! मेरे परम वचन को पुनः सुनो, जिसे मैं तुम्हारे हित हेतु तुम्हें प्रदान करूँगा और जो तुम्हें परम आनन्द देगा।
परमम् शब्द की व्याख्या पराशर मुनि इस प्रकार करते हैं: जो छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण है, जिसमें पूर्ण बल, पूर्ण यश, सम्पत्ति, ज्ञान, सौन्दर्य तथा वैराग्य विद्यमान हैं, वही परमम् अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् है। जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर विद्यमान थे, तब उन्होंने इन छहों ऐश्वर्यों को प्रकट किया। अतः पराशर मुनि जैसे महान् ऋषियों ने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रूप में स्वीकार किया है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने ऐश्वर्यों तथा अपने कार्यों के विषय में और अधिक गोपनीय ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं। इससे पूर्व, सातवें अध्याय से आरम्भ करके, भगवान् अपनी विभिन्न ऊर्जाओं तथा उनके क्रियाशील होने की रीति को पहले ही समझा चुके हैं। अब इस अध्याय में वे अर्जुन को अपने विशिष्ट ऐश्वर्यों का निरूपण करते हैं। पूर्व अध्याय में उन्होंने भक्ति को दृढ़ विश्वास में स्थापित करने हेतु अपनी विभिन्न ऊर्जाओं का स्पष्ट निरूपण किया है। इस अध्याय में पुनः वे अर्जुन को अपने प्राकट्यों तथा विविध ऐश्वर्यों के विषय में बताते हैं।
ज्यों-ज्यों मनुष्य परमेश्वर के विषय में अधिकाधिक श्रवण करता है, त्यों-त्यों वह भक्ति में और अधिक स्थिर होता जाता है। मनुष्य को सदा भक्तगण की संगति में भगवान् के विषय में श्रवण करना चाहिए; इससे उसकी भक्ति में अभिवृद्धि होगी। भक्त-समाज में ऐसे संवाद केवल उन्हीं के मध्य हो सकते हैं जो वस्तुतः कृष्णभावनामृत में रहने के लिए उत्सुक हैं। अन्य लोग ऐसे संवादों में भाग नहीं ले सकते। भगवान् अर्जुन को स्पष्ट रूप से बताते हैं कि चूँकि वह उन्हें अत्यन्त प्रिय है, अतः उसके हित हेतु ही ऐसे संवाद हो रहे हैं।
Bg 10.10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥
तेषाम्—उनको; सतत-युक्तानाम्—सदा संलग्न; भजताम्—भक्ति में; प्रीति-पूर्वकम्—प्रेम-आवेश में; ददामि—मैं देता हूँ; बुद्धि-योगम्—वास्तविक बुद्धि; तम्—वह; येन—जिससे; माम्—मुझको; उपयान्ति—आते हैं; ते—वे।
जो निरन्तर भक्ति में संलग्न रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी आराधना करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मुझ तक आ सकते हैं।
इस श्लोक में बुद्धि-योगम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हमें स्मरण होगा कि द्वितीय अध्याय में भगवान् ने, अर्जुन को उपदेश देते हुए, कहा था कि उन्होंने उससे अनेक विषयों की चर्चा की है और कि वे उसे बुद्धि-योग के मार्ग का उपदेश देंगे। अब बुद्धि-योग की व्याख्या की जा रही है। बुद्धि-योगम् स्वयं कृष्णभावनामृत में की गई क्रिया है; यही सर्वोच्च बुद्धि है। बुद्धि का अर्थ है बुद्धि, और योगम् का अर्थ है योग-क्रियाएँ अथवा योगमयी उन्नति। जब मनुष्य अपने धाम वापस, भगवद्धाम लौटने का प्रयत्न करता है और पूर्णतः भक्तिमय कृष्णभावनामृत को अपना लेता है, तब उसकी क्रिया बुद्धि-योगम् कहलाती है। दूसरे शब्दों में, बुद्धि-योगम् वह प्रक्रिया है जिससे मनुष्य इस भौतिक जगत् के बन्धन से मुक्त हो जाता है। उन्नति का अन्तिम लक्ष्य श्रीकृष्ण हैं। लोग इसे नहीं जानते; अतः भक्तगण की संगति तथा प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु महत्त्वपूर्ण हैं। मनुष्य को यह जानना चाहिए कि लक्ष्य श्रीकृष्ण हैं, और जब लक्ष्य निर्धारित हो जाता है, तब धीरे-धीरे किन्तु उत्तरोत्तर पथ तय किया जाता है, और अन्तिम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है।
जब कोई व्यक्ति जीवन के लक्ष्य को जानता है किन्तु कर्मफलों में आसक्त है, तब वह कर्म-योग में कार्य कर रहा होता है। जब वह जानता है कि लक्ष्य श्रीकृष्ण हैं, किन्तु श्रीकृष्ण को समझने हेतु मानसिक कल्पना में आनन्द लेता है, तब वह ज्ञान-योग में कार्य कर रहा होता है। और जब वह लक्ष्य को जानता है तथा कृष्णभावनामृत एवं भक्ति में पूर्णतः श्रीकृष्ण को खोजता है, तब वह भक्ति-योग, अर्थात् बुद्धि-योग, में कार्य कर रहा होता है, जो पूर्ण योग है। यह पूर्ण योग जीवन की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था है।
किसी व्यक्ति के पास प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु हो सकता है और वह किसी आध्यात्मिक संगठन से जुड़ा हो सकता है, किन्तु फिर भी, यदि वह उन्नति करने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान् नहीं है, तो श्रीकृष्ण भीतर से उसे निर्देश देते हैं ताकि वह अन्ततः बिना कठिनाई के उन तक आ सके। योग्यता यह है कि व्यक्ति सदा स्वयं को कृष्णभावनामृत में संलग्न रखे और प्रेम तथा भक्ति सहित सभी प्रकार की सेवाएँ करे। उसे श्रीकृष्ण के लिए किसी न किसी प्रकार का कार्य करना चाहिए, और वह कार्य प्रेमपूर्वक होना चाहिए। यदि कोई भक्त पर्याप्त बुद्धिमान् है, तो वह आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर उन्नति करेगा। यदि कोई भक्ति की क्रियाओं के प्रति निष्कपट तथा समर्पित है, तो भगवान् उसे उन्नति करने तथा अन्ततः उन तक पहुँचने का अवसर देते हैं।
Bg 10.11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥
तेषाम्—उनके लिए; एव—निश्चय ही; अनुकम्पा-अर्थम्—विशेष कृपा दर्शाने हेतु; अहम्—मैं; अज्ञान-जम्—अज्ञान के कारण; तमः—अन्धकार; नाशयामि—दूर करता हूँ; आत्म—भीतर; भाव-स्थः—उनके भीतर स्थित; ज्ञान—ज्ञान का; दीपेन—दीपक से; भास्वता—प्रकाशमान।
उन पर करुणावश, मैं उनके हृदयों में निवास करते हुए, ज्ञान के देदीप्यमान दीपक से अज्ञानजनित अन्धकार का नाश करता हूँ।
जब भगवान् चैतन्य काशी में हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के कीर्तन का प्रचार कर रहे थे, तब सहस्रों लोग उनका अनुगमन कर रहे थे। प्रकाशानन्द, जो उस समय काशी में एक अत्यन्त प्रभावशाली तथा विद्वान् पण्डित थे, भगवान् चैतन्य का भावुक होने के कारण उपहास करते थे। कभी-कभी दार्शनिक भक्तों की आलोचना करते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि अधिकांश भक्त अज्ञान के अन्धकार में हैं और दार्शनिक दृष्टि से भोले भावुक हैं। वस्तुतः यह तथ्य नहीं है। ऐसे अत्यन्त विद्वान् पण्डित हुए हैं जिन्होंने भक्ति के दर्शन को प्रस्तुत किया है, किन्तु यदि कोई भक्त उनके साहित्य का अथवा अपने आध्यात्मिक गुरु का लाभ न भी उठाए, तो भी यदि वह अपनी भक्ति में निष्कपट है, तो श्रीकृष्ण स्वयं उसके हृदय के भीतर से उसकी सहायता करते हैं। अतः कृष्णभावनामृत में संलग्न निष्कपट भक्त ज्ञान से रहित नहीं हो सकता। एकमात्र योग्यता यह है कि मनुष्य पूर्ण कृष्णभावनामृत में भक्ति का सम्पादन करे।
आधुनिक दार्शनिक सोचते हैं कि विवेक के बिना मनुष्य शुद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। उनके लिए परमेश्वर यह उत्तर देते हैं: जो शुद्ध भक्ति में संलग्न हैं, यद्यपि वे पर्याप्त शिक्षा से रहित हों और वैदिक सिद्धान्तों के पर्याप्त ज्ञान से भी रहित हों, तो भी परमेश्वर द्वारा उनकी सहायता की जाती है, जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है।
भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि मूलतः परम सत्य, परब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को केवल कल्पना द्वारा समझने की कोई सम्भावना नहीं है, क्योंकि परम सत्य इतने महान् हैं कि केवल मानसिक प्रयास से उन्हें समझना अथवा प्राप्त करना सम्भव नहीं है। मनुष्य कई लाख वर्षों तक कल्पना करता रह सकता है, और यदि वह भक्त नहीं है, यदि वह परम सत्य का प्रेमी नहीं है, तो वह श्रीकृष्ण अथवा परम सत्य को कभी नहीं समझ सकेगा। केवल भक्ति के द्वारा ही परम सत्य श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं, और अपनी अचिन्त्य ऊर्जा से वे स्वयं को शुद्ध भक्त के हृदय में प्रकट कर सकते हैं। शुद्ध भक्त के हृदय में सदा श्रीकृष्ण रहते हैं; अतः वह ठीक उस सूर्य के समान है जो अज्ञान के अन्धकार को विलीन कर देता है। यह श्रीकृष्ण द्वारा शुद्ध भक्त पर की गई विशेष कृपा है।
भौतिक संगति के कल्मष के कारण, अनेक-अनेक लाख जन्मों तक, मनुष्य का हृदय सदा भौतिकता की धूल से ढका रहता है; किन्तु जब मनुष्य भक्ति में संलग्न होता है और निरन्तर हरे कृष्ण का कीर्तन करता है, तब वह धूल शीघ्र ही हट जाती है, और मनुष्य शुद्ध ज्ञान के स्तर तक उन्नत हो जाता है। विष्णु का अन्तिम लक्ष्य केवल इसी कीर्तन तथा भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है, मानसिक कल्पना अथवा तर्क से नहीं। शुद्ध भक्त को जीवन की आवश्यकताओं की चिन्ता नहीं करनी पड़ती; उसे चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जब वह अपने हृदय से अन्धकार हटा देता है, तब सब कुछ परमेश्वर द्वारा स्वतः ही प्रदान कर दिया जाता है, क्योंकि वे भक्त की प्रेमाभक्ति से प्रसन्न होते हैं। यही गीता की शिक्षाओं का सार है। भगवद्गीता का अध्ययन करके मनुष्य परमेश्वर के प्रति पूर्णतः शरणागत आत्मा बन सकता है और स्वयं को शुद्ध भक्ति में संलग्न कर सकता है। ज्यों ही भगवान् भार सँभाल लेते हैं, त्यों ही मनुष्य सभी प्रकार के भौतिकतावादी प्रयासों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।
Bg 10.12-13
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; परम्—परम; ब्रह्म—सत्य; परम्—परम; धाम—आश्रय; पवित्रम्—परम पवित्र; परमम्—परम; भवान्—आप; पुरुषम्—पुरुष; शाश्वतम्—आदि; दिव्यम्—दिव्य; आदि-देवम्—आदि भगवान्; अजम्—अजन्मा; विभुम्—महानतम; आहुः—कहते हैं; त्वाम्—आपको; ऋषयः—ऋषिगण; सर्वे—समस्त; देवर्षिः—देवताओं में ऋषि; नारदः—नारद; तथा—भी; असितः—असित; देवलः—देवल; व्यासः—व्यास; स्वयम्—स्वयं; च—भी; एव—निश्चय ही; ब्रवीषि—समझा रहे हैं; मे—मुझे।
अर्जुन ने कहा: आप परब्रह्म, परम, परम आश्रय तथा परम पवित्रकर्ता, परम सत्य तथा नित्य दिव्य पुरुष हैं। आप आदि भगवान्, दिव्य तथा आदि हैं, और आप अजन्मा तथा सर्वव्यापी सौन्दर्य हैं। नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे समस्त महान् ऋषि आपके विषय में यही उद्घोषित करते हैं, और अब आप स्वयं मुझसे यह घोषित कर रहे हैं।
इन दो श्लोकों में परमेश्वर आधुनिक दार्शनिक को एक अवसर प्रदान करते हैं, क्योंकि यहाँ स्पष्ट है कि परम जीवात्मा से भिन्न हैं। अर्जुन, इस अध्याय में भगवद्गीता के सारभूत चार श्लोकों को सुनने के पश्चात्, समस्त सन्देहों से पूर्णतः मुक्त हो गया और उसने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रूप में स्वीकार कर लिया। वह तत्काल निर्भीकतापूर्वक उद्घोषित करता है, “आप परब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।” और इससे पूर्व श्रीकृष्ण यह कह चुके हैं कि वे प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक जीव के उद्गमकर्ता हैं। प्रत्येक देवता तथा प्रत्येक मनुष्य उन पर ही आश्रित है। मनुष्य तथा देवता, अज्ञानवश, सोचते हैं कि वे परम हैं तथा परमेश्वर श्रीकृष्ण से स्वतन्त्र हैं। वह अज्ञान भक्ति के सम्पादन से पूर्णतः दूर हो जाता है। इसकी व्याख्या पूर्व श्लोक में भगवान् पहले ही कर चुके हैं। अब उनकी कृपा से अर्जुन उन्हें परम सत्य रूप में, वैदिक विधान के अनुरूप, स्वीकार कर रहा है। ऐसा इसलिए नहीं है कि श्रीकृष्ण अर्जुन के घनिष्ठ मित्र हैं, अतः वह उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, परम सत्य कहकर उनकी चाटुकारिता कर रहा है। अर्जुन इन दो श्लोकों में जो कुछ कहता है, उसकी पुष्टि वैदिक सत्य द्वारा होती है। वैदिक विधान दृढ़ता से कहते हैं कि केवल वही, जो परमेश्वर की भक्ति को अपनाता है, उन्हें समझ सकता है, जबकि अन्य नहीं समझ सकते। अर्जुन द्वारा कहे गए इस श्लोक के प्रत्येक शब्द की पुष्टि वैदिक विधान द्वारा होती है।
केन उपनिषद् में कहा गया है कि परब्रह्म प्रत्येक वस्तु का आश्रय हैं, और श्रीकृष्ण पहले ही समझा चुके हैं कि सब कुछ उन्हीं पर आश्रित है। मुण्डक उपनिषद् पुष्टि करती है कि परमेश्वर, जिनमें सब कुछ आश्रित है, का साक्षात्कार केवल वे ही कर सकते हैं जो निरन्तर उनका चिन्तन करने में संलग्न रहते हैं। श्रीकृष्ण का यह निरन्तर चिन्तन स्मरणम् है, जो भक्ति की विधियों में से एक है। श्रीकृष्ण की भक्ति के द्वारा ही मनुष्य अपनी स्थिति को समझ सकता है तथा इस भौतिक शरीर से छुटकारा पा सकता है।
वेदों में परमेश्वर को पवित्रों में परम पवित्र रूप में स्वीकार किया गया है। जो यह समझता है कि श्रीकृष्ण पवित्रों में परम पवित्र हैं, वह समस्त पापकर्मों से पवित्र हो सकता है। मनुष्य तब तक पापकर्मों से विसंक्रमित नहीं हो सकता जब तक वह परमेश्वर के प्रति शरणागत न हो जाए। श्रीकृष्ण को परम पवित्र रूप में अर्जुन की स्वीकृति वैदिक साहित्य के विधानों के अनुरूप है। इसकी पुष्टि महान् पुरुषों द्वारा भी होती है, जिनमें नारद प्रमुख हैं।
श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और मनुष्य को सदा उनका ध्यान करना चाहिए तथा उनके साथ अपने दिव्य सम्बन्ध का आनन्द लेना चाहिए। वे परम अस्तित्व हैं। वे शारीरिक आवश्यकताओं, जन्म तथा मृत्यु से मुक्त हैं। न केवल अर्जुन इसकी पुष्टि करता है, अपितु समस्त वैदिक साहित्य, पुराण तथा इतिहास भी। समस्त वैदिक साहित्य में श्रीकृष्ण का इसी प्रकार वर्णन है, और परमेश्वर स्वयं भी चौथे अध्याय में कहते हैं, “यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, तथापि मैं धार्मिक सिद्धान्तों की स्थापना हेतु इस पृथ्वी पर प्रकट होता हूँ।” वे परम उद्गम हैं; उनका कोई कारण नहीं है, क्योंकि वे समस्त कारणों के कारण हैं, और प्रत्येक वस्तु उन्हीं से उद्भूत हो रही है। यह पूर्ण ज्ञान परमेश्वर की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है।
यहाँ अर्जुन श्रीकृष्ण की कृपा से अपने को अभिव्यक्त करता है। यदि हम भगवद्गीता को समझना चाहते हैं, तो हमें इन दो श्लोकों के कथनों को स्वीकार करना चाहिए। इसे परम्परा-पद्धति, अर्थात् गुरु-परम्परा की स्वीकृति, कहते हैं। जब तक मनुष्य गुरु-परम्परा में नहीं है, तब तक वह भगवद्गीता को नहीं समझ सकता। यह तथाकथित शैक्षणिक शिक्षा द्वारा सम्भव नहीं है। दुर्भाग्यवश, जो अपनी शैक्षणिक शिक्षा पर गर्व करते हैं, वे वैदिक साहित्य में इतने प्रमाण होते हुए भी, अपने इस हठीले विश्वास से चिपके रहते हैं कि श्रीकृष्ण एक साधारण व्यक्ति हैं।
Bg 10.14
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
सर्वम्—समस्त; एतत्—ये; ऋतम्—सत्य; मन्ये—स्वीकार करता हूँ; यत्—जो; माम्—मुझसे; वदसि—आप कहते हैं; केशव—हे श्रीकृष्ण; न—कभी नहीं; हि—निश्चय ही; ते—आपका; भगवन्—हे भगवन्; व्यक्तिम्—प्राकट्य; विदुः—जान सकते हैं; देवाः—देवता; न—न ही; दानवाः—असुर।
हे श्रीकृष्ण! जो कुछ आपने मुझसे कहा है, उस समस्त को मैं पूर्णतः सत्य रूप में स्वीकार करता हूँ। हे भगवन्! न तो देवता और न ही असुर आपके स्वरूप को जानते हैं।
अर्जुन यहाँ इसकी पुष्टि करता है कि श्रद्धाहीन तथा आसुरी प्रकृति के व्यक्ति श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकते। उन्हें तो देवता भी नहीं जानते, फिर इस आधुनिक संसार के तथाकथित विद्वानों की तो बात ही क्या? परमेश्वर की कृपा से अर्जुन ने समझ लिया है कि परम सत्य श्रीकृष्ण हैं और कि वे पूर्ण हैं। अतः मनुष्य को अर्जुन के मार्ग का अनुगमन करना चाहिए। उसे भगवद्गीता का अधिकार प्राप्त हुआ। जैसा कि चौथे अध्याय में वर्णित है, भगवद्गीता को समझने हेतु गुरु-परम्परा की परम्परा-पद्धति लुप्त हो गई थी, और इसीलिए श्रीकृष्ण ने उस गुरु-परम्परा को अर्जुन के साथ पुनः स्थापित किया, क्योंकि उन्होंने अर्जुन को अपना घनिष्ठ मित्र तथा महान् भक्त माना। अतः, जैसा कि हमारी गीतोपनिषद् की भूमिका में वर्णित है, भगवद्गीता को परम्परा-पद्धति में ही समझा जाना चाहिए। जब परम्परा-पद्धति लुप्त हो गई, तब अर्जुन को उसके पुनरुज्जीवन हेतु पुनः चुना गया। श्रीकृष्ण जो कुछ कहते हैं, उस समस्त की अर्जुन द्वारा स्वीकृति का अनुकरण किया जाना चाहिए; तभी हम भगवद्गीता के सार को समझ सकते हैं, और तभी हम समझ सकते हैं कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
Bg 10.15
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥
स्वयम्—व्यक्तित्व; एव—निश्चय ही; आत्मना—स्वयं अपने द्वारा; आत्मानम्—स्वयं को; वेत्थ—जानते हैं; त्वम्—आप; पुरुषोत्तम—हे समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ; भूत-भावन—हे समस्त के उद्गम; भूतेश—हे समस्त के स्वामी; देव-देव—हे समस्त देवताओं के स्वामी; जगत्-पते—हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी।
हे समस्त के उद्गम, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, हे देवों के देव, हे पुरुषोत्तम, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी! निश्चय ही आप अपनी ही शक्तियों से स्वयं अपने आपको जानते हैं।
परमेश्वर श्रीकृष्ण को वे ही व्यक्ति जान सकते हैं, जो अर्जुन तथा उनके उत्तराधिकारियों के समान भक्तियोग के अनुष्ठान द्वारा उनके साथ सम्बन्ध में रहते हैं। आसुरी अथवा नास्तिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति श्रीकृष्ण को नहीं जान सकते। जो मानसिक कल्पना मनुष्य को परमेश्वर से दूर ले जाती है, वह गम्भीर पाप है, और जो श्रीकृष्ण को नहीं जानता, उसे भगवद्गीता पर टीका करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। भगवद्गीता श्रीकृष्ण की वाणी है, और चूँकि यह श्रीकृष्ण का विज्ञान है, अतः इसे श्रीकृष्ण से ही उसी प्रकार समझना चाहिए जिस प्रकार अर्जुन ने इसे समझा। इसे नास्तिक व्यक्तियों से ग्रहण नहीं करना चाहिए।
परम सत्य की अनुभूति तीन रूपों में होती है—निराकार ब्रह्म के रूप में, स्थानिक परमात्मा के रूप में तथा अन्ततः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में। अतः परम सत्य को समझने की अन्तिम अवस्था में मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तक पहुँचता है। कोई मुक्त पुरुष तथा सामान्य मनुष्य भी निराकार ब्रह्म अथवा स्थानिक परमात्मा की अनुभूति कर सकता है, तथापि वह भगवद्गीता के श्लोकों से भगवान् के व्यक्तित्व को नहीं समझ पाता, जिन श्लोकों को यही व्यक्ति, श्रीकृष्ण, कह रहे हैं। कभी-कभी निर्विशेषवादी श्रीकृष्ण को भगवान् के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, अथवा उनके अधिकार को मान लेते हैं। तथापि अनेक मुक्त व्यक्ति श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम, परम पुरुष तथा समस्त जीवों के पिता के रूप में नहीं समझ पाते। इसी कारण अर्जुन उन्हें पुरुषोत्तम कहकर सम्बोधित करते हैं। और यदि कोई उन्हें समस्त जीवों के पिता के रूप में जान भी ले, तो भी संभव है कि वह उन्हें परम नियन्ता के रूप में न जाने; अतः यहाँ उन्हें भूतेश, अर्थात् सबका परम नियन्ता, कहकर सम्बोधित किया गया है। और यदि कोई श्रीकृष्ण को समस्त जीवों के परम नियन्ता के रूप में जान भी ले, तो भी संभव है कि वह यह न जाने कि वे समस्त देवताओं के उद्गम हैं; अतः यहाँ उन्हें देवदेव, अर्थात् समस्त देवताओं के पूज्य देव, कहकर सम्बोधित किया गया है। और यदि कोई उन्हें समस्त देवताओं के पूज्य देव के रूप में जान भी ले, तो भी संभव है कि वह यह न जाने कि वे समस्त वस्तुओं के परम स्वामी हैं; अतः उन्हें जगत्पति कहकर सम्बोधित किया गया है। इस प्रकार इस श्लोक में अर्जुन की अनुभूति द्वारा श्रीकृष्ण के विषय में सत्य स्थापित होता है, और श्रीकृष्ण को यथारूप समझने के लिए हमें अर्जुन के पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए।
Bg 10.16
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
वक्तुम्—कहने योग्य; अर्हसि—आप समर्थ हैं; अशेषेण—विस्तारपूर्वक; दिव्या—दिव्य; हि—निश्चय ही; आत्म—अपने; विभूतयः—ऐश्वर्य; याभिः—जिनसे; विभूतिभिः—ऐश्वर्यों से; लोकान्—समस्त लोकों में; इमान्—इन; त्वम्—आप; व्याप्य—व्याप्त होकर; तिष्ठसि—रहते हैं।
कृपया मुझे अपनी उन दिव्य विभूतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन करें, जिनके द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त होकर उनमें विराजमान रहते हैं।
इस श्लोक से प्रतीत होता है कि अर्जुन परमेश्वर श्रीकृष्ण के विषय में अपने ज्ञान से पहले ही सन्तुष्ट हैं। श्रीकृष्ण की कृपा से अर्जुन को व्यक्तिगत अनुभव, बुद्धि तथा ज्ञान प्राप्त है, और इन समस्त साधनों के माध्यम से जो कुछ भी किसी व्यक्ति को प्राप्त हो सकता है, वह सब उन्हें प्राप्त है, तथा उन्होंने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में समझ लिया है। उनके लिए कोई सन्देह नहीं है। तथापि वे श्रीकृष्ण से उनके सर्वव्यापी स्वरूप का वर्णन करने को कह रहे हैं, ताकि भविष्य में लोग, विशेषतः निर्विशेषवादी, यह समझ सकें कि वे अपनी विभिन्न शक्तियों के द्वारा अपने सर्वव्यापी पक्ष में किस प्रकार विद्यमान हैं। यह समझना चाहिए कि अर्जुन यह प्रश्न सामान्य जनों की ओर से पूछ रहे हैं।
Bg 10.17
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
कथम्—कैसे; विद्याम् अहम्—मैं जानूँ; योगिन्—हे परम योगी; त्वाम्—आपको; सदा—सदा; परिचिन्तयन्—चिन्तन करते हुए; केषु—किन; केषु—किन; च—भी; भावेषु—रूपों में; चिन्त्यः असि—आपका स्मरण किया जाता है; भगवन्—हे परमेश्वर; मया—मेरे द्वारा।
मैं आपका ध्यान कैसे करूँ? हे भगवन्, आपका चिन्तन किन-किन विविध रूपों में किया जाए?
जैसा कि पूर्ववर्ती अध्याय में कहा गया है, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनी योगमाया से आच्छादित हैं। केवल शरणागत आत्माएँ तथा भक्तगण ही उन्हें देख सकते हैं। अब अर्जुन को विश्वास हो गया है कि उनके मित्र, श्रीकृष्ण, पूर्ण भगवान् हैं, किन्तु वे उस सामान्य प्रक्रिया को जानना चाहते हैं जिसके द्वारा सर्वव्यापी भगवान् को सामान्य मनुष्य समझ सके। असुरों तथा नास्तिकों सहित कोई भी सामान्य मनुष्य श्रीकृष्ण को नहीं जान सकता, क्योंकि वे अपनी योगमाया शक्ति से सुरक्षित हैं। पुनः, अर्जुन ये प्रश्न उन्हीं के हित के लिए पूछ रहे हैं। श्रेष्ठ भक्त केवल अपने ही ज्ञान के लिए चिन्तित नहीं रहता, अपितु समस्त मानवजाति के ज्ञान के लिए भी। अपनी करुणा के कारण, क्योंकि वे वैष्णव अर्थात् भक्त हैं, अर्जुन परम के सर्वव्यापकत्व के विषय में सामान्य मनुष्य के लिए ज्ञान के द्वार खोल रहे हैं। वे श्रीकृष्ण को विशेष रूप से योगी कहकर सम्बोधित करते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण उस योगमाया शक्ति के स्वामी हैं, जिसके द्वारा वे सामान्य मनुष्य से आच्छादित तथा अनावृत होते हैं। जिस सामान्य मनुष्य को श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम नहीं है, वह सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन नहीं कर सकता; अतः उसे भौतिक रूप से सोचना पड़ता है। अर्जुन इस संसार के भौतिकतावादी व्यक्तियों की चिन्तन-पद्धति पर विचार कर रहे हैं। चूँकि भौतिकतावादी श्रीकृष्ण को आध्यात्मिक रूप से नहीं समझ सकते, अतः उन्हें परामर्श दिया जाता है कि वे मन को भौतिक वस्तुओं पर एकाग्र करें और यह देखने का प्रयत्न करें कि श्रीकृष्ण भौतिक प्रतिनिधित्वों के द्वारा किस प्रकार प्रकट होते हैं।
Bg 10.18
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥
विस्तरेण—वर्णन में; आत्मनः—अपने; योगम्—योगशक्ति; विभूतिम्—ऐश्वर्य; च—भी; जनार्दन—हे नास्तिकों के संहारक; भूयः—पुनः; कथय—वर्णन करें; तृप्तिः—तृप्ति; हि—निश्चय ही; शृण्वतः—सुनते हुए; न अस्ति—नहीं है; मे—मेरी; अमृतम्—अमृत।
हे जनार्दन [श्रीकृष्ण], मुझे पुनः अपनी प्रबल योगशक्तियों तथा महिमाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करें, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति कभी नहीं होती।
इसी प्रकार का कथन नैमिषारण्य के ऋषियों ने, जिनके अग्रणी शौनक थे, सूत गोस्वामी से कहा था। वह कथन इस प्रकार है:
vayaṁ tu na vitṛpyāma uttama-śloka-vikrame
yac chṛṇvatāṁ rasa-jñānāṁ svādu svādu pade pade.
“वैदिक स्तुतियों द्वारा गुणगान किए जाने वाले श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं को निरन्तर सुनते हुए भी मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो पाता। जिन्होंने श्रीकृष्ण के साथ दिव्य सम्बन्ध स्थापित किया है, वे भगवान् की लीलाओं के वर्णनों का पग-पग पर आस्वादन करते हैं।” इस प्रकार अर्जुन श्रीकृष्ण के विषय में सुनने के लिए उत्सुक हैं, विशेषतः यह कि वे सर्वव्यापी परमेश्वर के रूप में किस प्रकार विराजमान रहते हैं।
अब जहाँ तक अमृत का सम्बन्ध है, श्रीकृष्ण से सम्बन्धित कोई भी कथा अथवा कथन अमृत के ही समान है। और इस अमृत का अनुभव व्यावहारिक रूप से किया जा सकता है। आधुनिक कथाएँ, कल्पित आख्यान तथा इतिहास भगवान् की दिव्य लीलाओं से इस प्रकार भिन्न हैं कि मनुष्य लौकिक कथाओं को सुनते-सुनते थक जाएगा, किन्तु श्रीकृष्ण के विषय में सुनते हुए वह कभी नहीं थकता। केवल इसी कारण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का इतिहास भगवान् के अवतारों की लीलाओं के सन्दर्भों से परिपूर्ण है। उदाहरणार्थ, पुराण बीते हुए युगों के इतिहास हैं, जो भगवान् के विभिन्न अवतारों की लीलाओं का वर्णन करते हैं। इस प्रकार पठन-सामग्री बारम्बार पढ़े जाने पर भी सदा नवीन बनी रहती है।
Bg 10.19
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; हन्त—हाँ; ते—तुमसे; कथयिष्यामि—मैं कहूँगा; दिव्याः—दिव्य; हि—निश्चय ही; आत्म-विभूतयः—अपने ऐश्वर्य; प्राधान्यतः—प्रमुख रूप से; कुरुश्रेष्ठ—हे कुरुश्रेष्ठ; न अस्ति—नहीं है; अन्तः—सीमा; विस्तरस्य—विस्तार की; मे—मेरे।
श्रीभगवान् ने कहा: हाँ, मैं तुम्हें अपनी ऐश्वर्यमयी विभूतियों का वर्णन करूँगा, किन्तु केवल उन्हीं का जो प्रमुख हैं, हे अर्जुन, क्योंकि मेरा ऐश्वर्य असीम है।
श्रीकृष्ण की महानता तथा उनके ऐश्वर्यों को पूर्णतया समझ पाना संभव नहीं है। व्यष्टि आत्मा की इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं और उसे श्रीकृष्ण के समग्र कार्य-कलापों को समझने नहीं देतीं। फिर भी भक्तगण श्रीकृष्ण को समझने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु इस सिद्धान्त पर नहीं कि वे किसी विशिष्ट समय अथवा जीवन की किसी अवस्था में श्रीकृष्ण को पूर्णतया समझ सकेंगे। अपितु, श्रीकृष्ण से सम्बन्धित विषय ही इतने आस्वाद्य हैं कि वे उन्हें अमृत के समान प्रतीत होते हैं। इस प्रकार वे उनका आनन्द लेते हैं। श्रीकृष्ण के ऐश्वर्यों तथा उनकी विविध शक्तियों की चर्चा करते हुए शुद्ध भक्तगण दिव्य आनन्द प्राप्त करते हैं। अतः वे उन्हें सुनना तथा उनकी चर्चा करना चाहते हैं। श्रीकृष्ण जानते हैं कि जीव उनके ऐश्वर्यों के विस्तार को नहीं समझते; अतः वे अपनी विभिन्न शक्तियों के केवल प्रमुख प्रकटीकरणों को ही बताने के लिए सहमत होते हैं। प्राधान्यतः (प्रमुख रूप से) शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हम परमेश्वर के केवल कुछ ही प्रमुख विवरणों को समझ सकते हैं, क्योंकि उनकी विशेषताएँ असीम हैं। उन सबको समझ पाना संभव नहीं है। और इस श्लोक में प्रयुक्त विभूति शब्द उन ऐश्वर्यों की ओर संकेत करता है, जिनके द्वारा वे सम्पूर्ण प्रकटीकरण को नियन्त्रित करते हैं। अमरकोश शब्दकोश में कहा गया है कि विभूति किसी असाधारण ऐश्वर्य का सूचक है।
निर्विशेषवादी अथवा सर्वेश्वरवादी न तो परमेश्वर के असाधारण ऐश्वर्यों को समझ सकता है, और न ही उनकी दिव्य शक्ति के प्रकटीकरणों को। भौतिक जगत् में तथा आध्यात्मिक जगत् में—दोनों में उनकी शक्तियाँ प्रत्येक प्रकार के प्रकटीकरण में वितरित हैं। अब श्रीकृष्ण उसका वर्णन कर रहे हैं जिसे सामान्य मनुष्य प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकता है; इस प्रकार उनकी विविध शक्ति के एक अंश का वर्णन इस रीति से किया जा रहा है।
Bg 10.2
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥
न—कभी नहीं; मे—मेरा; विदुः—जानते हैं; सुर-गणाः—देवतागण; प्रभवम्—ऐश्वर्य; न—कभी नहीं; महर्षयः—महान् ऋषिगण; अहम्—मैं हूँ; आदिः—उद्गम; हि—निश्चय ही; देवानाम्—देवताओं का; महर्षीणाम्—महान् ऋषियों का; च—भी; सर्वशः—सब प्रकार से।
न तो देवताओं के समूह और न ही महान् ऋषिगण मेरे उद्गम को जानते हैं, क्योंकि सब प्रकार से मैं ही देवताओं तथा ऋषियों का स्रोत हूँ।
जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, भगवान् श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं। उनसे बढ़कर कोई नहीं है; वे समस्त कारणों के कारण हैं। यहाँ भगवान् स्वयं भी यह कहते हैं कि वे समस्त देवताओं तथा ऋषियों के कारण हैं। देवता तथा महान् ऋषि भी श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकते; वे न तो उनके नाम को और न उनके स्वरूप को जान सकते हैं, तो फिर इस क्षुद्र ग्रह के तथाकथित विद्वानों की क्या स्थिति है? कोई नहीं समझ सकता कि यह परमेश्वर एक साधारण मनुष्य रूप में पृथ्वी पर क्यों अवतरित होते हैं और ऐसे सामान्य प्रतीत होने वाले किन्तु अद्भुत कार्य क्यों सम्पन्न करते हैं। अतः मनुष्य को यह जानना चाहिए कि श्रीकृष्ण को समझने हेतु विद्वत्ता आवश्यक योग्यता नहीं है। देवताओं तथा महान् ऋषियों ने भी अपनी मानसिक कल्पना द्वारा श्रीकृष्ण को समझने का प्रयत्न किया है, और वे ऐसा करने में असफल रहे हैं। श्रीमद्भागवत में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महान् देवता भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को नहीं समझ पाते। वे अपनी अपूर्ण इन्द्रियों की सीमा तक कल्पना कर सकते हैं और निराकारवाद का विपरीत निष्कर्ष—अर्थात् भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से अप्रकट किसी वस्तु का—पा सकते हैं, अथवा वे मानसिक कल्पना से कुछ कल्पित कर सकते हैं, किन्तु ऐसी मूर्खतापूर्ण कल्पना से श्रीकृष्ण को समझना सम्भव नहीं है।
यहाँ भगवान् परोक्ष रूप से कहते हैं कि यदि कोई परम सत्य को जानना चाहता है, तो “यहाँ मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रूप में विद्यमान हूँ। मैं ही परमेश्वर हूँ।” मनुष्य को यह जानना चाहिए। यद्यपि कोई उन अचिन्त्य भगवान् को नहीं समझ सकता जो स्वयं विद्यमान हैं, तथापि वे विद्यमान हैं। हम भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत में उनके वचनों का अध्ययन मात्र करके श्रीकृष्ण को, जो नित्य, आनन्द तथा ज्ञान से परिपूर्ण हैं, वस्तुतः समझ सकते हैं। निराकार ब्रह्म की धारणा वे व्यक्ति कर सकते हैं जो पहले से ही भगवान् की अपरा ऊर्जा में स्थित हैं, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की धारणा तब तक नहीं की जा सकती जब तक मनुष्य दिव्य स्थिति में न हो।
चूँकि अधिकांश मनुष्य श्रीकृष्ण को उनकी वास्तविक स्थिति में नहीं समझ सकते, अतः अपनी अहैतुकी कृपावश वे ऐसे कल्पनावादियों पर अनुग्रह दर्शाने हेतु अवतरित होते हैं। फिर भी परमेश्वर के असाधारण कार्यों के होते हुए भी, भौतिक ऊर्जा में कल्मष के कारण, ये कल्पनावादी अब भी यही सोचते हैं कि निराकार ब्रह्म ही परम है। केवल वे भक्त जो परमेश्वर के प्रति पूर्णतः शरणागत हैं, पूर्ण पुरुषोत्तम की कृपा से यह समझ सकते हैं कि वे श्रीकृष्ण हैं। भगवान् के भक्तगण ईश्वर की निराकार ब्रह्म धारणा की चिन्ता नहीं करते; उनकी श्रद्धा तथा भक्ति उन्हें तत्काल परमेश्वर के प्रति शरणागत करा देती है, और श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा से वे श्रीकृष्ण को समझ सकते हैं। अन्य कोई उन्हें नहीं समझ सकता। अतः महान् ऋषि भी सहमत हैं: आत्मा क्या है, परम क्या है? वही हैं जिनकी हमें आराधना करनी है।
Bg 10.20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
अहम्—मैं; आत्मा—आत्मा; गुडाकेश—हे अर्जुन; सर्व-भूत—समस्त जीवों के; आशय-स्थितः—हृदय में स्थित; अहम्—मैं हूँ; आदिः—उद्गम; च—भी; मध्यम्—मध्य; च—भी; भूतानाम्—समस्त जीवों का; अन्तः—अन्त; एव—निश्चय ही; च—और।
हे गुडाकेश, मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही समस्त प्राणियों का आदि, मध्य तथा अन्त हूँ।
इस श्लोक में अर्जुन को गुडाकेश कहकर सम्बोधित किया गया है, जिसका अर्थ है—वह जिसने निद्रा के अन्धकार पर विजय प्राप्त कर ली है। जो लोग अज्ञान के अन्धकार में सो रहे हैं, उनके लिए यह समझ पाना संभव नहीं है कि भगवान् भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में स्वयं को किस प्रकार प्रकट करते हैं। अतः श्रीकृष्ण का अर्जुन को यह सम्बोधन सार्थक है। चूँकि अर्जुन ऐसे अन्धकार से ऊपर हैं, अतः भगवान् अपनी विभिन्न विभूतियों का वर्णन करने के लिए सहमत होते हैं।
श्रीकृष्ण सर्वप्रथम अर्जुन को बताते हैं कि वे अपने प्रमुख विस्तार के बल पर सम्पूर्ण विश्व-प्रकटीकरण की आत्मा अर्थात् जीव हैं। भौतिक सृष्टि से पूर्व परमेश्वर अपने पूर्ण विस्तार द्वारा पुरुष-अवतारों को स्वीकार करते हैं, और उन्हीं से समस्त वस्तुओं का आरम्भ होता है। अतः वे आत्मा हैं, अर्थात् महत्तत्व अथवा विश्व-तत्त्वों की आत्मा हैं। समग्र भौतिक शक्ति सृष्टि का कारण नहीं है, अपितु वास्तव में महाविष्णु महत्तत्व अर्थात् समग्र भौतिक शक्ति में प्रवेश करते हैं। वे ही आत्मा हैं। जब महाविष्णु प्रकटित ब्रह्माण्डों में प्रवेश करते हैं, तब वे प्रत्येक जीव में पुनः परमात्मा के रूप में स्वयं को प्रकट करते हैं। हमें यह अनुभव है कि जीव का व्यष्टि शरीर आध्यात्मिक स्फुलिंग की उपस्थिति के कारण विद्यमान रहता है। आध्यात्मिक स्फुलिंग के अस्तित्व के बिना शरीर का विकास नहीं हो सकता। इसी प्रकार, जब तक श्रीकृष्ण की परम आत्मा प्रवेश नहीं करती, तब तक भौतिक प्रकटीकरण का विकास नहीं हो सकता।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् समस्त प्रकटित ब्रह्माण्डों में परमात्मा के रूप में विद्यमान हैं। तीन पुरुषावतारों का वर्णन श्रीमद्भागवत में दिया गया है। “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् इस भौतिक प्रकटीकरण में तीन रूप प्रकट करते हैं—कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु तथा क्षीरोदकशायी विष्णु।” समस्त कारणों के कारण परमेश्वर श्रीकृष्ण महाविष्णु अथवा कारणोदकशायी विष्णु के रूप में विश्व-सागर में शयन करते हैं, अतः श्रीकृष्ण ही इस ब्रह्माण्ड के आदि हैं, विश्व-प्रकटीकरण के पालनकर्ता हैं, तथा समस्त शक्ति के अन्त हैं।
Bg 10.21
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
आदित्यानाम्—आदित्यों में; अहम्—मैं हूँ; विष्णुः—परमेश्वर; ज्योतिषाम्—समस्त ज्योतियों में; रविः—सूर्य; अंशुमान्—देदीप्यमान; मरीचिः—मरीचि; मरुताम्—मरुतों में; अस्मि—मैं हूँ; नक्षत्राणाम्—नक्षत्रों में; अहम्—मैं हूँ; शशी—चन्द्रमा।
आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, ज्योतियों में मैं देदीप्यमान सूर्य हूँ, मरुतों में मैं मरीचि हूँ, तथा नक्षत्रों में मैं चन्द्रमा हूँ।
बारह आदित्य हैं, जिनमें श्रीकृष्ण प्रमुख हैं। और आकाश में टिमटिमाती समस्त ज्योतियों में सूर्य प्रधान है, तथा ब्रह्मसंहिता में सूर्य को परमेश्वर का देदीप्यमान तेज स्वीकार किया गया है और उन्हीं के नेत्रों में से एक माना गया है। मरीचि स्वर्गीय अन्तरिक्षों के अधिष्ठाता देवता हैं। नक्षत्रों में चन्द्रमा रात्रि में सबसे अधिक प्रमुख है, अतः चन्द्रमा श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है।
Bg 10.22
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
वेदानाम्—समस्त वेदों में; साम-वेदः—सामवेद; अस्मि—मैं हूँ; देवानाम्—समस्त देवताओं में; अस्मि—मैं हूँ; वासवः—स्वर्ग का राजा; इन्द्रियाणाम्—समस्त इन्द्रियों में; मनः—मन; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; भूतानाम्—समस्त जीवों में; अस्मि—मैं हूँ; चेतना—जीवनी शक्ति।
वेदों में मैं सामवेद हूँ; देवताओं में मैं इन्द्र हूँ; इन्द्रियों में मैं मन हूँ, तथा जीवों में मैं जीवनी शक्ति [चेतना] हूँ।
भौतिक पदार्थ तथा आत्मा में अन्तर यह है कि जीव के समान भौतिक पदार्थ में चेतना नहीं होती; अतः यह चेतना परम तथा शाश्वत है। चेतना भौतिक पदार्थों के संयोग से उत्पन्न नहीं की जा सकती।
Bg 10.23
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
रुद्राणाम्—समस्त रुद्रों में; शङ्करः—शिवजी; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; वित्तेशः—कोश का स्वामी; यक्ष-रक्षसाम्—यक्षों तथा राक्षसों में; वसूनाम्—वसुओं में; पावकः—अग्नि; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; मेरुः—मेरु; शिखरिणाम्—समस्त पर्वतों में; अहम्—मैं हूँ।
समस्त रुद्रों में मैं शिवजी हूँ; यक्षों तथा राक्षसों में मैं धन का स्वामी [कुबेर] हूँ; वसुओं में मैं अग्नि हूँ, तथा पर्वतों में मैं मेरु हूँ।
ग्यारह रुद्र हैं, जिनमें शङ्कर अर्थात् शिवजी प्रमुख हैं। वे ब्रह्माण्ड में तमोगुण के अधिष्ठाता परमेश्वर के अवतार हैं। देवताओं में कुबेर प्रधान कोषाध्यक्ष हैं, और वे परमेश्वर के प्रतिनिधि हैं। मेरु एक पर्वत है, जो अपने समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है।
Bg 10.24
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
पुरोधसाम्—समस्त पुरोहितों में; च—भी; मुख्यम्—प्रमुख; माम्—मुझे; विद्धि—जानो; पार्थ—हे पृथापुत्र; बृहस्पतिम्—बृहस्पति; सेनानीनाम्—समस्त सेनापतियों में; अहम्—मैं हूँ; स्कन्दः—कार्तिकेय; सरसाम्—समस्त जलाशयों में; अस्मि—मैं हूँ; सागरः—समुद्र।
हे अर्जुन, पुरोहितों में मुझे प्रमुख बृहस्पति जानो, जो भक्ति के स्वामी हैं। सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ, जो युद्ध के स्वामी हैं; तथा जलाशयों में मैं समुद्र हूँ।
इन्द्र स्वर्गलोकों के प्रमुख देवता हैं और स्वर्ग के राजा के रूप में जाने जाते हैं। जिस लोक पर वे शासन करते हैं, वह इन्द्रलोक कहलाता है। बृहस्पति इन्द्र के पुरोहित हैं, और चूँकि इन्द्र समस्त राजाओं में प्रमुख हैं, अतः बृहस्पति समस्त पुरोहितों में प्रमुख हैं। और जिस प्रकार इन्द्र समस्त राजाओं में प्रमुख हैं, उसी प्रकार पार्वती तथा शिवजी के पुत्र स्कन्द समस्त सेनापतियों में प्रमुख हैं। और समस्त जलाशयों में समुद्र सबसे विशाल है। श्रीकृष्ण के ये प्रतिनिधित्व उनकी महानता के केवल संकेत ही देते हैं।
Bg 10.25
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
महर्षीणाम्—महान् ऋषियों में; भृगुः—भृगु; अहम्—मैं हूँ; गिराम्—ध्वनि-कम्पनों में; अस्मि—मैं हूँ; एकम् अक्षरम्—प्रणव; यज्ञानाम्—यज्ञों में; जप-यज्ञः—जप; अस्मि—मैं हूँ; स्थावराणाम्—अचल वस्तुओं में; हिमालयः—हिमालय पर्वत।
महान् ऋषियों में मैं भृगु हूँ; ध्वनि-कम्पनों में मैं दिव्य ओंकार हूँ। यज्ञों में मैं पवित्र नामों का जप [जप-यज्ञ] हूँ, तथा अचल वस्तुओं में मैं हिमालय हूँ।
ब्रह्मा, जो ब्रह्माण्ड के भीतर सर्वप्रथम जीव हैं, ने विभिन्न प्रकार की जातियों के प्रसार के लिए अनेक पुत्र उत्पन्न किए। उनके पुत्रों में सर्वाधिक शक्तिशाली भृगु हैं, जो सबसे महान् ऋषि भी हैं। समस्त दिव्य ध्वनि-कम्पनों में “ओम्” (ओंकार) परम का प्रतिनिधित्व करता है। समस्त यज्ञों में हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप श्रीकृष्ण का सर्वाधिक शुद्ध प्रतिनिधित्व है। कभी-कभी पशु-यज्ञों की अनुशंसा की जाती है, किन्तु हरे कृष्ण, हरे कृष्ण के यज्ञ में हिंसा का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह सरलतम तथा शुद्धतम है। संसार में जो कुछ भी उदात्त है, वह श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व है। अतः हिमालय, जो संसार के सबसे विशाल पर्वत हैं, भी उन्हीं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मेरु नामक पर्वत का उल्लेख एक पूर्ववर्ती श्लोक में हुआ था, किन्तु मेरु कभी-कभी चल भी होता है, जबकि हिमालय कभी चल नहीं होता। इस प्रकार हिमालय मेरु से भी श्रेष्ठ है।
Bg 10.26
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥
अश्वत्थः—वटवृक्ष; सर्व-वृक्षाणाम्—समस्त वृक्षों में; देवर्षीणाम्—देवताओं में जो ऋषि हैं उनमें; च—और; नारदः—नारद; गन्धर्वाणाम्—गन्धर्वलोक के निवासियों में; चित्ररथः—चित्ररथ; सिद्धानाम्—समस्त सिद्धों में; कपिलः मुनिः—कपिल मुनि।
समस्त वृक्षों में मैं पवित्र अश्वत्थ वृक्ष हूँ, तथा ऋषियों एवं देवताओं में मैं नारद हूँ। देवताओं के गायकों [गन्धर्वों] में मैं चित्ररथ हूँ, तथा सिद्धों में मैं कपिल मुनि हूँ।
अश्वत्थ वृक्ष सबसे सुन्दर तथा ऊँचे वृक्षों में से एक है, और भारत में लोग प्रायः अपने नित्य प्रातःकालीन अनुष्ठानों में से एक के रूप में इसकी पूजा करते हैं। देवताओं में वे नारद की भी पूजा करते हैं, जो ब्रह्माण्ड में सबसे महान् भक्त माने जाते हैं। इस प्रकार वे भक्त के रूप में श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं। गन्धर्वलोक ऐसे जीवों से परिपूर्ण है जो सुन्दर गायन करते हैं, और उनमें सबसे उत्तम गायक चित्ररथ हैं। नित्य रहने वाले जीवों में कपिल को श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है, और उनके दर्शन का उल्लेख श्रीमद्भागवत में हुआ है। कालान्तर में एक अन्य कपिल प्रसिद्ध हुए, किन्तु उनका दर्शन नास्तिक था। अतः उन दोनों में महान् अन्तर है।
Bg 10.27
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥
उच्चैःश्रवसम्—उच्चैःश्रवा; अश्वानाम्—घोड़ों में; विद्धि—जानो; माम्—मुझे; अमृत-उद्भवम्—समुद्र-मन्थन से उत्पन्न; ऐरावतम्—ऐरावत; गजेन्द्राणाम्—हाथियों में; नराणाम्—मनुष्यों में; च—और; नराधिपम्—राजा।
घोड़ों में मुझे उच्चैःश्रवा जानो, जो समुद्र से अमृत के मन्थन से उत्पन्न हुआ था; गजश्रेष्ठों में मैं ऐरावत हूँ, तथा मनुष्यों में मैं राजा हूँ।
भक्त देवताओं तथा असुरों ने एक बार समुद्र-यात्रा की। इस यात्रा में अमृत तथा विष उत्पन्न हुए, और शिवजी ने विष पी लिया। अमृत से अनेक जीव उत्पन्न हुए, जिनमें उच्चैःश्रवा नामक एक अश्व था। अमृत से उत्पन्न एक अन्य पशु ऐरावत नामक एक हाथी था। चूँकि ये दोनों पशु अमृत से उत्पन्न हुए थे, अतः उनका विशेष महत्त्व है, और वे श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं।
मनुष्यों में राजा श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि है, क्योंकि श्रीकृष्ण ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता हैं, और जो राजा अपने ईश्वरीय गुणों के कारण नियुक्त किए जाते हैं, वे अपने राज्यों के पालनकर्ता होते हैं। महाराज युधिष्ठिर, महाराज परीक्षित तथा भगवान् राम जैसे राजा सभी अत्यन्त धर्मनिष्ठ राजा थे, जो सदा प्रजा के कल्याण का विचार करते थे। वैदिक साहित्य में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। किन्तु इस युग में धर्म के सिद्धान्तों के भ्रष्ट होने के साथ राजतन्त्र का ह्रास हुआ और अब अन्ततः उसका उन्मूलन हो गया है। यह समझना चाहिए कि अतीत में, तथापि, धर्मनिष्ठ राजाओं के अधीन लोग अधिक सुखी थे।
Bg 10.28
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥
आयुधानाम्—समस्त अस्त्रों में; अहम्—मैं हूँ; वज्रम्—वज्र; धेनूनाम्—गौओं में; अस्मि—मैं हूँ; कामधुक्—सुरभि गौएँ; प्रजनः—सन्तानोत्पत्ति हेतु; च—और; अस्मि—मैं हूँ; कन्दर्पः—कामदेव; सर्पाणाम्—समस्त सर्पों में; अस्मि—मैं हूँ; वासुकिः—वासुकि।
अस्त्रों में मैं वज्र हूँ; गौओं में मैं प्रचुर दुग्ध देने वाली सुरभि हूँ। सन्तानोत्पादकों में मैं कन्दर्प, प्रेम का देवता, हूँ, तथा सर्पों में मैं प्रमुख वासुकि हूँ।
वज्र, जो वस्तुतः एक प्रबल अस्त्र है, श्रीकृष्ण की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। आध्यात्मिक आकाश में स्थित कृष्णलोक में ऐसी गौएँ हैं, जिनका दुग्ध किसी भी समय दुहा जा सकता है, और वे जितना चाहो उतना दुग्ध देती हैं। निश्चय ही ऐसी गौएँ इस भौतिक जगत् में नहीं हैं, किन्तु कृष्णलोक में उनका उल्लेख है। भगवान् ऐसी अनेक गौएँ रखते हैं, जो सुरभि कहलाती हैं। कहा गया है कि भगवान् सुरभि गौओं को चराने में संलग्न रहते हैं। कन्दर्प उत्तम पुत्रों की प्राप्ति हेतु काम-वासना है; अतः कन्दर्प श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि है। कभी-कभी काम केवल इन्द्रियतृप्ति हेतु ही किया जाता है; ऐसा काम श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व नहीं करता। किन्तु उत्तम सन्तानों की उत्पत्ति हेतु किया गया काम कन्दर्प कहलाता है और श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है।
Bg 10.29
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
अनन्तः—अनन्त; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; नागानाम्—समस्त सर्पों में; वरुणः—जल को नियन्त्रित करने वाले देवता; यादसाम्—समस्त जलचरों में; अहम्—मैं हूँ; पितॄणाम्—पितरों में; अर्यमा—अर्यमा; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; यमः—मृत्यु के नियन्ता; संयमताम्—समस्त नियामकों में; अहम्—मैं हूँ।
दिव्य नाग सर्पों में मैं अनन्त हूँ; जलचर देवताओं में मैं वरुण हूँ। दिवंगत पितरों में मैं अर्यमा हूँ, तथा विधि-व्यवस्था करने वालों में मैं मृत्यु के स्वामी यम हूँ।
अनेक दिव्य नाग सर्पों में अनन्त सबसे महान् हैं, जैसे जलचरों में वरुण। वे दोनों श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक वृक्षों का लोक भी है, जिसके अधिष्ठाता अर्यमा हैं, जो श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं। अनेक जीव हैं जो दुष्टों को दण्ड देते हैं, और उनमें यम प्रमुख हैं। यम इस पार्थिव लोक के निकट एक लोक में स्थित हैं, और मृत्यु के पश्चात् जो अत्यन्त पापी होते हैं, उन्हें वहाँ ले जाया जाता है, और यम उनके लिए विभिन्न प्रकार के दण्डों की व्यवस्था करते हैं।
Bg 10.3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
यः—जो कोई; माम्—मुझको; अजम्—अजन्मा; अनादिम्—अनादि; च—भी; वेत्ति—जानता है; लोक—लोकों का; महेश्वरम्—परम स्वामी; असम्मूढः—सन्देह रहित; सः—वह; मर्त्येषु—मृत्यु के अधीन प्राणियों में; सर्व-पापैः—समस्त पापकर्मों से; प्रमुच्यते—मुक्त हो जाता है।
जो मुझे अजन्मा, अनादि तथा समस्त लोकों का परमेश्वर रूप में जानता है—वही मनुष्यों में मोहरहित होकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
जैसा कि सातवें अध्याय में कहा गया है, जो स्वयं को आध्यात्मिक अनुभूति के स्तर तक ऊपर उठाने का प्रयत्न कर रहे हैं, वे साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे उन करोड़ों-करोड़ों साधारण मनुष्यों से श्रेष्ठ हैं जिन्हें आध्यात्मिक अनुभूति का कोई ज्ञान नहीं है; किन्तु जो वस्तुतः अपनी आध्यात्मिक स्थिति को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं, उनमें से जो इस समझ तक पहुँच सकता है कि श्रीकृष्ण ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, समस्त वस्तुओं के स्वामी तथा अजन्मा हैं, वही आध्यात्मिक रूप से सर्वाधिक सफल अनुभूत पुरुष है। केवल उसी अवस्था में, जब मनुष्य श्रीकृष्ण की परम स्थिति को भली-भाँति समझ लेता है, तभी वह समस्त पापकर्मों से पूर्णतः मुक्त हो सकता है।
यहाँ अजम् शब्द, जिसका अर्थ है अजन्मा, जीवों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए, जिन्हें द्वितीय अध्याय में अजम् कहा गया है। भगवान् उन जीवों से भिन्न हैं जो भौतिक आसक्ति के कारण जन्म लेते तथा मरते हैं। बद्ध आत्माएँ अपने शरीर बदलती रहती हैं, किन्तु उनका शरीर परिवर्तनशील नहीं है। जब वे इस भौतिक जगत् में अवतरित भी होते हैं, तब भी वे उसी अजन्मा रूप में आते हैं; अतः चौथे अध्याय में कहा गया है कि भगवान् अपनी अन्तरंगा शक्ति के द्वारा अपरा भौतिक ऊर्जा के अधीन नहीं हैं, अपितु सदा परा ऊर्जा में स्थित रहते हैं।
वे सृष्टि से पूर्व विद्यमान थे, और वे अपनी सृष्टि से भिन्न हैं। समस्त देवता इस भौतिक जगत् के भीतर सृजित हुए थे, किन्तु जहाँ तक श्रीकृष्ण का प्रश्न है, यह कहा गया है कि वे सृजित नहीं हैं; अतः श्रीकृष्ण ब्रह्मा तथा शिव जैसे महान् देवताओं से भी भिन्न हैं। और चूँकि वे ब्रह्मा, शिव तथा अन्य समस्त देवताओं के स्रष्टा हैं, अतः वे समस्त लोकों के परम पुरुष हैं।
इस प्रकार श्रीकृष्ण उस प्रत्येक वस्तु से भिन्न हैं जो सृजित है, और जो कोई उन्हें इस रूप में जानता है, वह तत्काल समस्त पापकर्मों से मुक्त हो जाता है। परमेश्वर के ज्ञान में स्थित होने हेतु मनुष्य का समस्त पापकर्मों से मुक्त होना आवश्यक है। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, केवल भक्ति के द्वारा ही उन्हें जाना जा सकता है, अन्य किसी साधन से नहीं।
मनुष्य को श्रीकृष्ण को एक मनुष्य रूप में समझने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। जैसा कि पहले कहा गया है, केवल मूर्ख व्यक्ति ही उन्हें मनुष्य मानता है। यही बात यहाँ पुनः भिन्न रीति से व्यक्त की गई है। जो मनुष्य मूर्ख नहीं है, जो भगवान् की स्वरूपगत स्थिति को समझने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान् है, वह सदा समस्त पापकर्मों से मुक्त रहता है।
यदि श्रीकृष्ण देवकी के पुत्र रूप में जाने जाते हैं, तो फिर वे अजन्मा कैसे हो सकते हैं? इसकी भी व्याख्या श्रीमद्भागवत में की गई है: जब वे देवकी तथा वसुदेव के समक्ष प्रकट हुए, तब वे एक साधारण शिशु रूप में जन्मे नहीं थे; वे अपने आदि रूप में प्रकट हुए, और तत्पश्चात् उन्होंने स्वयं को एक साधारण शिशु में रूपान्तरित कर लिया।
श्रीकृष्ण के निर्देशन में किया गया प्रत्येक कार्य दिव्य है। यह भौतिक प्रतिक्रियाओं से, जो शुभ अथवा अशुभ हो सकती हैं, कलुषित नहीं हो सकता। यह धारणा कि भौतिक जगत् में शुभ तथा अशुभ वस्तुएँ हैं, कमोबेश एक मानसिक कल्पना है, क्योंकि भौतिक जगत् में कुछ भी शुभ नहीं है। सब कुछ अशुभ है, क्योंकि भौतिक आवरण स्वयं ही अशुभ है। हम केवल इसे शुभ कल्पित कर लेते हैं। वास्तविक मांगल्य पूर्ण भक्ति तथा सेवा सहित कृष्णभावनामृत में की गई क्रियाओं पर निर्भर करता है। अतः यदि हम चाहते हैं कि हमारी क्रियाएँ किसी भी प्रकार शुभ हों, तो हमें परमेश्वर के निर्देशन में कार्य करना चाहिए। ऐसे निर्देश श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता जैसे प्रामाणिक शास्त्रों में, अथवा किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से प्राप्त होते हैं। चूँकि आध्यात्मिक गुरु परमेश्वर के प्रतिनिधि हैं, अतः उनका निर्देश साक्षात् परमेश्वर का ही निर्देश है। आध्यात्मिक गुरु, सन्तजन तथा शास्त्र एक ही प्रकार से निर्देश देते हैं। इन तीनों स्रोतों में कोई विरोध नहीं है। ऐसे निर्देशन में किए गए समस्त कार्य इस भौतिक जगत् के पुण्य अथवा पाप कर्मों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त रहते हैं। क्रियाओं के सम्पादन में भक्त की दिव्य मनोवृत्ति वस्तुतः वैराग्य की होती है, और इसे ही संन्यास कहते हैं। जो कोई परमेश्वर के निर्देशन में कार्य करता है, वह वस्तुतः संन्यासी तथा योगी है, न कि वह मनुष्य जिसने केवल संन्यासी का वेश धारण कर लिया है, अथवा कोई कूट योगी।
Bg 10.30
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥
प्रह्लादः—प्रह्लाद; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; दैत्यानाम्—असुरों में; कालः—समय; कलयताम्—दमन करने वालों में; अहम्—मैं हूँ; मृगाणाम्—पशुओं में; च—और; मृगेन्द्रः—सिंह; अहम्—मैं हूँ; वैनतेयः—गरुड़; च—भी; पक्षिणाम्—पक्षियों में।
दैत्य असुरों में मैं भक्त प्रह्लाद हूँ; दमन करने वालों में मैं समय हूँ; पशुओं में मैं सिंह हूँ, तथा पक्षियों में मैं विष्णु के पंखयुक्त वाहन गरुड़ हूँ।
दिति तथा अदिति दो बहनें हैं। अदिति के पुत्र आदित्य कहलाते हैं, और दिति के पुत्र दैत्य कहलाते हैं। समस्त आदित्य भगवान् के भक्त हैं, और समस्त दैत्य नास्तिक हैं। यद्यपि प्रह्लाद का जन्म दैत्यों के कुल में हुआ था, तथापि वे बाल्यकाल से ही महान् भक्त थे। अपनी भक्ति तथा ईश्वरीय स्वभाव के कारण वे श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि माने जाते हैं।
दमन के अनेक सिद्धान्त हैं, किन्तु समय भौतिक ब्रह्माण्ड की समस्त वस्तुओं को क्षीण कर देता है और इस प्रकार श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है। अनेक पशुओं में सिंह सबसे शक्तिशाली तथा क्रूर है, और पक्षियों की लाखों जातियों में भगवान् विष्णु के वाहक गरुड़ सबसे महान् हैं।
Bg 10.31
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥
पवनः—वायु; पवताम्—समस्त पवित्र करने वालों में; अस्मि—मैं हूँ; रामः—राम; शस्त्र-भृताम्—शस्त्रधारियों में; अहम्—मैं हूँ; झषाणाम्—समस्त जलचरों में; मकरः—मगर; च अस्मि—मैं भी हूँ; स्रोतसाम्—प्रवाहित नदियों में; अस्मि—मैं हूँ; जाह्नवी—गंगा नदी।
पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ; शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ; मछलियों में मैं मगर हूँ, और प्रवाहित नदियों में मैं गंगा हूँ।
समस्त जलचरों में मगर सबसे बड़े जीवों में से एक है, और मनुष्य के लिए निश्चय ही सर्वाधिक घातक है। अतः मगर श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है। और नदियों में भारत की सबसे महान् नदी माता गंगा हैं। रामायण के भगवान् श्रीरामचन्द्र, जो श्रीकृष्ण के अवतार हैं, योद्धाओं में सर्वाधिक पराक्रमी हैं।
Bg 10.32
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥
सर्गाणाम्—समस्त सृष्टियों में; आदिः—आदि; अन्तः—अन्त; च—और; मध्यम्—मध्य; च—भी; एव—निश्चय ही; अहम्—मैं हूँ; अर्जुन—हे अर्जुन; अध्यात्म-विद्या—आध्यात्मिक ज्ञान; विद्यानाम्—समस्त विद्याओं में; वादः—स्वाभाविक निष्कर्ष; प्रवदताम्—तर्कों में; अहम्—मैं हूँ।
समस्त सृष्टियों में मैं आदि, अन्त तथा मध्य भी हूँ, हे अर्जुन! समस्त विद्याओं में मैं आत्मा का आध्यात्मिक विज्ञान हूँ, और तार्किकों में मैं निर्णायक सत्य हूँ।
सृष्ट प्रकटीकरणों में समस्त भौतिक तत्त्व सर्वप्रथम महाविष्णु द्वारा सृजित किए जाते हैं और भगवान् शिव द्वारा संहृत किए जाते हैं। ब्रह्मा गौण स्रष्टा हैं। ये समस्त सृष्ट तत्त्व परमेश्वर के भौतिक गुणों के विभिन्न अवतार हैं; अतः वे ही समस्त सृष्टि के आदि, मध्य तथा अन्त हैं।
आत्मा के आध्यात्मिक विज्ञान के विषय में अनेक ग्रन्थ हैं, जैसे चार वेद, वेदान्त-सूत्र तथा पुराण, श्रीमद्भागवत एवं गीता। ये सब श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं। तार्किकों में तर्क की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। प्रमाण की प्रस्तुति जप कहलाती है। एक-दूसरे को पराजित करने का प्रयास वितण्डा कहलाता है, और अन्तिम निष्कर्ष वाद कहलाता है। निर्णायक सत्य, अर्थात् समस्त तर्क-प्रक्रियाओं का अन्त, श्रीकृष्ण हैं।
Bg 10.33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥
अक्षराणाम्—अक्षरों में; अकारः—प्रथम अक्षर; अस्मि—मैं हूँ; द्वन्द्वः—द्वन्द्व; सामासिकस्य—समासों में; च—और; अहम्—मैं हूँ; एव—निश्चय ही; अक्षयः—नित्य; कालः—काल; धाता—स्रष्टा; अहम्—मैं हूँ; विश्वतो-मुखः—ब्रह्मा।
अक्षरों में मैं ‘अ’ अक्षर हूँ, और समासों में मैं द्वन्द्व समास हूँ। मैं अक्षय काल भी हूँ, और स्रष्टाओं में मैं ब्रह्मा हूँ, जिनके अनेक मुख सर्वत्र अभिमुख हैं।
अकार, संस्कृत वर्णमाला का प्रथम अक्षर, वैदिक साहित्य का आरम्भ है। अकार के बिना किसी ध्वनि का उच्चारण नहीं हो सकता; अतः वही ध्वनि का आरम्भ है। संस्कृत में अनेक समस्त पद भी होते हैं, जिनमें राम-कृष्ण जैसा द्वन्द्व पद द्वन्द्वः कहलाता है। उदाहरणार्थ, राम तथा कृष्ण की लय एक समान है, इसलिए वे द्वन्द्व कहलाते हैं।
समस्त प्रकार के संहारकों में काल परम है, क्योंकि काल प्रत्येक वस्तु का संहार करता है। काल श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि है, क्योंकि नियत समय आने पर एक महान् अग्नि प्रकट होगी और सब कुछ संहृत हो जाएगा।
स्रष्टाओं तथा जीवों में ब्रह्मा प्रमुख हैं। विभिन्न ब्रह्मा तदनुसार चार, आठ, सोलह आदि मुख प्रकट करते हैं, और वे अपने-अपने ब्रह्माण्डों में प्रमुख स्रष्टा हैं। ब्रह्मा श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं।
Bg 10.34
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥
मृत्युः—मृत्यु; सर्व-हरः—सर्वग्रासी; च—भी; अहम्—मैं हूँ; उद्भवः—उत्पत्ति; च—भी; भविष्यताम्—भविष्य की; कीर्तिः—कीर्ति; श्रीः वाक्—सुन्दर वाणी; च—भी; नारीणाम्—स्त्रियों में; स्मृतिः—स्मृति; मेधा—बुद्धि; धृतिः—निष्ठा; क्षमा—क्षमा।
मैं सर्वग्रासी मृत्यु हूँ, और मैं उन समस्त वस्तुओं का उत्पादक हूँ जो भविष्य में होंगी। स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, बुद्धि, निष्ठा तथा क्षमा हूँ।
ज्यों ही मनुष्य जन्म लेता है, वह प्रत्येक क्षण मरता रहता है। इस प्रकार मृत्यु प्रत्येक क्षण प्रत्येक जीव को ग्रस रही है, किन्तु अन्तिम प्रहार ही मृत्यु कहलाता है। वही मृत्यु श्रीकृष्ण हैं। समस्त जीव-योनियाँ छह मूल परिवर्तनों से गुजरती हैं। वे जन्म लेती हैं, बढ़ती हैं, कुछ काल स्थित रहती हैं, प्रजनन करती हैं, क्षीण होती हैं, और अन्ततः विलुप्त हो जाती हैं। इन परिवर्तनों में प्रथम है गर्भ से छुटकारा, और वही श्रीकृष्ण है। प्रथम उत्पत्ति समस्त भावी क्रियाओं का आरम्भ है।
जो छह ऐश्वर्य गिनाए गए हैं, वे स्त्रीसुलभ माने जाते हैं। यदि किसी स्त्री में ये सब अथवा इनमें से कुछ हों, तो वह यशस्विनी हो जाती है। संस्कृत एक पूर्ण भाषा है, और इसीलिए अत्यन्त गौरवशाली है। अध्ययन के पश्चात् यदि कोई विषय-वस्तु को स्मरण रख सके, तो वह उत्तम स्मृति से सम्पन्न होता है, अर्थात् स्मृति। मनुष्य को विभिन्न विषयों पर अनेक ग्रन्थ पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती; कुछ को स्मरण रखने तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उद्धृत करने की क्षमता भी एक अन्य ऐश्वर्य है।
Bg 10.35
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
बृहत्-साम—बृहत्-साम; तथा—भी; साम्नाम्—साम-वेद के गीतों में; गायत्री—गायत्री छन्द; छन्दसाम्—समस्त छन्दों में; अहम्—मैं हूँ; मासानाम्—महीनों में; मार्ग-शीर्षः अहम्—नवम्बर-दिसम्बर का मास; अहम्—मैं हूँ; ऋतूनाम्—समस्त ऋतुओं में; कुसुमाकरः—वसन्त।
स्तोत्रों में मैं बृहत्-साम हूँ, जो भगवान् इन्द्र की स्तुति में गाया जाता है, और काव्य में मैं गायत्री छन्द हूँ, जिसका प्रतिदिन ब्राह्मणगण गान करते हैं। महीनों में मैं नवम्बर तथा दिसम्बर हूँ, और ऋतुओं में मैं पुष्पों से युक्त वसन्त हूँ।
भगवान् पहले ही समझा चुके हैं कि समस्त वेदों में साम-वेद विभिन्न देवताओं द्वारा गाए जाने वाले सुन्दर गीतों से समृद्ध है।
इन्हीं गीतों में से एक बृहत्-साम है, जिसकी मनोहर रागिनी है और जो मध्यरात्रि में गाया जाता है।
संस्कृत में कुछ निश्चित नियम हैं जो काव्य का नियमन करते हैं; तुक तथा छन्द स्वेच्छाचारी रूप से नहीं रचे जाते, जैसा कि अधिकांश आधुनिक काव्य में होता है। नियमित काव्य में गायत्री मन्त्र, जिसका जप विधिवत् योग्य ब्राह्मणगण करते हैं, सर्वाधिक प्रमुख है। गायत्री मन्त्र का उल्लेख श्रीमद्भागवत में हुआ है। चूँकि गायत्री मन्त्र विशेष रूप से ईश्वर-साक्षात्कार हेतु है, अतः वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। यह मन्त्र आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्तियों के लिए है, और जब कोई इसके जप में सफलता प्राप्त कर लेता है, तब वह भगवान् की दिव्य स्थिति में प्रवेश कर सकता है। गायत्री मन्त्र का जप करने के लिए मनुष्य को पहले पूर्णतः स्थित व्यक्ति के गुण, अर्थात् भौतिक प्रकृति के नियमों के अनुसार सत्त्वगुण के गुण, अर्जित करने चाहिए। गायत्री मन्त्र वैदिक सभ्यता में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और ब्रह्म का ध्वनि-अवतार माना जाता है। ब्रह्मा इसके दीक्षाकर्ता हैं, और यह उनसे गुरु-परम्परा में अवतरित होता आया है।
नवम्बर तथा दिसम्बर के महीने समस्त महीनों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं, क्योंकि भारत में इसी समय खेतों से अन्न एकत्र किया जाता है, और लोग अत्यन्त प्रसन्न हो जाते हैं। वसन्त तो स्वभावतः सर्वत्र प्रिय ऋतु है, क्योंकि वह न तो अधिक गरम होती है, न अधिक शीतल, और पुष्प तथा वृक्ष पुष्पित एवं समृद्ध होते हैं। वसन्त में श्रीकृष्ण की लीलाओं के स्मरणार्थ अनेक उत्सव भी होते हैं; अतः यह समस्त ऋतुओं में सर्वाधिक आनन्दमयी मानी जाती है, और यह परमेश्वर श्रीकृष्ण की प्रतिनिधि है।
Bg 10.36
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥
द्यूतम्—द्यूत; छलयताम्—समस्त छलियों में; अस्मि—मैं हूँ; तेजः—तेज; तेजस्विनाम्—समस्त तेजस्वी वस्तुओं में; अहम्—मैं हूँ; जयः—विजय; अस्मि—मैं हूँ; व्यवसायः—साहसिक उद्यम; अस्मि—मैं हूँ; सत्त्वम्—बल; सत्त्ववताम्—समस्त बलवानों में; अहम्—मैं हूँ।
मैं छलियों का द्यूत भी हूँ, और तेजस्वियों में मैं तेज हूँ। मैं विजय हूँ, मैं साहसिक उद्यम हूँ, और मैं बलवानों का बल हूँ।
समस्त ब्रह्माण्ड में अनेक प्रकार के छली होते हैं। समस्त छल-प्रक्रियाओं में द्यूत सर्वोपरि है, अतः वह श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है। परम होने के कारण, श्रीकृष्ण किसी भी सामान्य मनुष्य से अधिक छली हो सकते हैं। यदि श्रीकृष्ण किसी व्यक्ति को छलने का निश्चय करें, तो उनके छल में कोई उनसे आगे नहीं बढ़ सकता। उनकी महानता केवल एकपक्षीय नहीं है—वह सर्वपक्षीय है।
विजयियों में वे विजय हैं। वे तेजस्वियों के तेज हैं। उद्यमशील उद्योगपतियों में वे सर्वाधिक उद्यमशील हैं। साहसी पुरुषों में वे सर्वाधिक साहसी हैं, और बलवानों में वे सर्वाधिक बलवान् हैं। जब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर उपस्थित थे, तब बल में कोई उनसे आगे नहीं बढ़ सका। बाल्यावस्था में भी उन्होंने गोवर्धन पर्वत उठा लिया था। छल में कोई उनसे आगे नहीं बढ़ सकता, तेज में कोई उनसे आगे नहीं बढ़ सकता, विजय में कोई उनसे आगे नहीं बढ़ सकता, उद्यम में कोई उनसे आगे नहीं बढ़ सकता, और बल में कोई उनसे आगे नहीं बढ़ सकता।
Bg 10.37
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
वृष्णीनाम्—वृष्णिवंशियों में; वासुदेवः—द्वारका में श्रीकृष्ण; अस्मि—मैं हूँ; पाण्डवानाम्—पाण्डवों में; धनञ्जयः—अर्जुन; मुनीनाम्—मुनियों में; अपि—भी; अहम्—मैं हूँ; व्यासः—समस्त वैदिक साहित्य के संकलनकर्ता व्यास; कवीनाम्—समस्त महान् विचारकों में; उशना—उशना; कविः—विचारक।
वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ, और पाण्डवों में मैं अर्जुन हूँ। मुनियों में मैं व्यास हूँ, और महान् विचारकों में मैं उशना हूँ।
श्रीकृष्ण आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और वासुदेव श्रीकृष्ण के अव्यवहित विस्तार हैं। भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलदेव दोनों ही वसुदेव के पुत्रों के रूप में प्रकट होते हैं। पाण्डु के पुत्रों में अर्जुन प्रसिद्ध तथा शूरवीर हैं। वस्तुतः वे श्रेष्ठ पुरुष हैं, अतः वे श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुनियों, अर्थात् वैदिक ज्ञान में पारंगत विद्वानों में व्यास सबसे महान् हैं, क्योंकि उन्होंने इस कलियुग में जनसामान्य की समझ के लिए वैदिक ज्ञान को अनेक भिन्न-भिन्न प्रकारों से समझाया। और व्यास श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में भी ज्ञात हैं; अतः व्यास भी श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवि वे हैं जो किसी भी विषय पर भली-भाँति विचार करने में समर्थ होते हैं। कवियों में उशना असुरों के गुरु थे; वे अत्यन्त बुद्धिमान्, दूरदर्शी, तथा प्रत्येक दृष्टि से राजनैतिक एवं आध्यात्मिक थे। अतः उशना श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य के एक अन्य प्रतिनिधि हैं।
Bg 10.38
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
दण्डः—दण्ड; दमयताम्—समस्त दमन करने वालों में; अस्मि—मैं हूँ; नीतिः—नीति; अस्मि—मैं हूँ; जिगीषताम्—विजय के अभिलाषियों में; मौनम्—मौन; च—और; एव—भी; अस्मि—मैं हूँ; गुह्यानाम्—गोपनीय वस्तुओं में; ज्ञानम्—ज्ञान; ज्ञानवताम्—बुद्धिमानों में; अहम्—मैं हूँ।
दण्डों में मैं दण्ड-दण्ड हूँ, और विजय के अभिलाषियों में मैं नीति हूँ। गोपनीय वस्तुओं में मैं मौन हूँ, और बुद्धिमानों में मैं ज्ञान हूँ।
अनेक दमनकारी साधन हैं, जिनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वे हैं जो दुष्टों का दमन करते हैं। जब दुष्टों को दण्डित किया जाता है, तब दण्ड श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है। जो किसी कर्म-क्षेत्र में विजय प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, उनमें सर्वाधिक विजयी तत्त्व नीति है। श्रवण, मनन तथा ध्यान की गोपनीय क्रियाओं में मौन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मौन से मनुष्य अत्यन्त शीघ्र उन्नति कर सकता है। बुद्धिमान् वह है जो पदार्थ तथा आत्मा के बीच, ईश्वर की परा तथा अपरा प्रकृति के बीच भेद कर सके। ऐसा ज्ञान स्वयं श्रीकृष्ण हैं।
Bg 10.39
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥
यत्—जो कुछ; च—भी; अपि—हो सकता है; सर्व-भूतानाम्—समस्त सृष्टियों का; बीजम्—बीज; तत्—वह; अहम्—मैं हूँ; अर्जुन—हे अर्जुन; न—नहीं; तत्—वह; अस्ति—है; विना—बिना; यत्—जो; स्यात्—विद्यमान रहे; मया—मेरे द्वारा; भूतम्—सृजित; चराचरम्—चर तथा अचर।
इसके अतिरिक्त, हे अर्जुन! मैं समस्त अस्तित्वों का उत्पादक बीज हूँ। ऐसा कोई प्राणी नहीं—चर अथवा अचर—जो मेरे बिना अस्तित्व में रह सके।
प्रत्येक वस्तु का कोई कारण होता है, और वह कारण अथवा प्रकटीकरण का बीज श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्ण की ऊर्जा के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता; अतः वे सर्वशक्तिमान् कहलाते हैं। उनकी सामर्थ्य के बिना न तो चर वस्तु अस्तित्व में रह सकती है, न अचर। जो भी अस्तित्व श्रीकृष्ण की ऊर्जा पर आधारित नहीं है, वह माया कहलाता है, अर्थात् जो नहीं है।
Bg 10.4-5
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥
बुद्धिः—बुद्धि; ज्ञानम्—ज्ञान; असम्मोहः—सन्देह से मुक्ति; क्षमा—क्षमा; सत्यम्—सत्यता; दमः—इन्द्रियों का संयम; शमः—मन का संयम; सुखम्—सुख; दुःखम्—दुःख; भवः—जन्म; अभावः—मृत्यु; भयम्—भय; च—भी; अभयम्—भयरहित; एव—भी; च—तथा; अहिंसा—अहिंसा; समता—समता; तुष्टिः—सन्तोष; तपः—तपस्या; दानम्—दान; यशः—यश; अयशः—अपयश; भवन्ति—होते हैं; भावाः—स्वभाव; भूतानाम्—जीवों के; मत्तः—मुझसे; एव—निश्चय ही; पृथक्-विधाः—भिन्न-भिन्न प्रकार से व्यवस्थित।
बुद्धि, ज्ञान, सन्देह तथा मोह से मुक्ति, क्षमा, सत्यता, आत्मसंयम तथा शान्ति, सुख तथा दुःख, जन्म, मृत्यु, भय, अभय, अहिंसा, समता, सन्तोष, तपस्या, दान, यश तथा अपयश—ये सब केवल मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
जीवों के विभिन्न गुण, चाहे वे अच्छे हों या बुरे, सब श्रीकृष्ण द्वारा सृजित हैं, और उनका वर्णन यहाँ किया गया है।
बुद्धि का अर्थ है वस्तुओं का यथोचित परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करने की शक्ति, और ज्ञान का अर्थ है यह समझना कि आत्मा क्या है तथा पदार्थ क्या है। विश्वविद्यालयीय शिक्षा द्वारा प्राप्त साधारण ज्ञान केवल पदार्थ से सम्बन्ध रखता है, और उसे यहाँ ज्ञान रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। ज्ञान का अर्थ है आत्मा तथा पदार्थ के भेद को जानना। आधुनिक शिक्षा में आत्मा के विषय में कोई ज्ञान नहीं है; वे केवल भौतिक तत्त्वों तथा शारीरिक आवश्यकताओं की चिन्ता करते हैं। अतः शैक्षणिक ज्ञान पूर्ण नहीं है।
असम्मोहः, अर्थात् सन्देह तथा मोह से मुक्ति, तब प्राप्त की जा सकती है जब मनुष्य संशयरहित हो और जब वह दिव्य दर्शन को समझ ले। धीरे-धीरे, किन्तु निश्चित रूप से, वह मोह से मुक्त हो जाता है। किसी वस्तु को अन्धानुकरण से स्वीकार नहीं करना चाहिए; प्रत्येक वस्तु को सावधानी तथा सतर्कता से स्वीकार करना चाहिए। क्षमा का अभ्यास करना चाहिए, और मनुष्य को दूसरों के छोटे अपराधों को क्षमा कर देना चाहिए। सत्यम्, अर्थात् सत्यता, का अर्थ है कि दूसरों के हित हेतु तथ्यों को जैसे वे हैं वैसे ही प्रस्तुत करना चाहिए। तथ्यों को विकृत नहीं करना चाहिए। सामाजिक रूढ़ियों के अनुसार कहा जाता है कि मनुष्य सत्य तभी बोल सकता है जब वह दूसरों को रुचिकर हो। किन्तु यह सत्यता नहीं है। सत्य को सीधे तथा स्पष्ट रूप से बोलना चाहिए, ताकि दूसरे वस्तुतः यह समझ सकें कि तथ्य क्या हैं। यदि कोई मनुष्य चोर है और यदि लोगों को सावधान किया जाए कि वह चोर है, तो यही सत्य है। यद्यपि कभी-कभी सत्य अरुचिकर होता है, तथापि मनुष्य को उसे बोलने से नहीं चूकना चाहिए। सत्यता की माँग है कि तथ्यों को दूसरों के हित हेतु जैसे वे हैं वैसे ही प्रस्तुत किया जाए। यही सत्य की परिभाषा है।
आत्मसंयम का अर्थ है कि इन्द्रियों का प्रयोग अनावश्यक व्यक्तिगत भोग हेतु नहीं किया जाना चाहिए। इन्द्रियों की उचित आवश्यकताओं की पूर्ति का कोई निषेध नहीं है, किन्तु अनावश्यक इन्द्रियभोग आध्यात्मिक उन्नति के लिए हानिकारक है। अतः इन्द्रियों को अनावश्यक प्रयोग से रोकना चाहिए। इसी प्रकार, मन को अनावश्यक विचारों में लिप्त नहीं होना चाहिए; इसे ही शमः अर्थात् शान्ति कहते हैं। न ही मनुष्य को अपना समय धन कमाने पर मनन करते हुए बिताना चाहिए। यह विचार-शक्ति का दुरुपयोग है। मन का प्रयोग मनुष्यों की प्रमुख आवश्यकता को समझने हेतु होना चाहिए, और उसे प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। विचार-शक्ति का विकास उन व्यक्तियों की संगति में किया जाना चाहिए जो शास्त्रों के प्रमाणस्वरूप हैं, अर्थात् सन्तजन, आध्यात्मिक गुरुजन तथा वे जिनका चिन्तन अत्यन्त विकसित है। सुखम्, अर्थात् सुख या आनन्द, सदा उसी में होना चाहिए जो कृष्णभावनामृत के आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन के अनुकूल हो। और इसी प्रकार, जो कष्टकर है अथवा जो दुःख का कारण बनता है, वह वही है जो कृष्णभावनामृत के अनुशीलन के प्रतिकूल है। कृष्णभावनामृत के विकास के लिए जो कुछ अनुकूल हो उसे स्वीकार करना चाहिए, और जो कुछ प्रतिकूल हो उसे त्याग देना चाहिए।
भवः, अर्थात् जन्म, को शरीर के सन्दर्भ में समझा जाना चाहिए। जहाँ तक आत्मा का प्रश्न है, उसका न तो जन्म है और न मृत्यु; इसकी चर्चा हम भगवद्गीता के आरम्भ में कर चुके हैं। जन्म तथा मृत्यु मनुष्य के भौतिक जगत् में देहधारण पर लागू होते हैं। भय भविष्य की चिन्ता के कारण होता है। कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति को कोई भय नहीं होता, क्योंकि अपनी क्रियाओं के कारण वह निश्चित रूप से आध्यात्मिक आकाश में, अपने धाम वापस, भगवद्धाम लौट जाएगा। अतः उसका भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल है। किन्तु अन्य लोग नहीं जानते कि उनका भविष्य क्या है; उन्हें कोई ज्ञान नहीं कि अगला जीवन क्या लाएगा। अतः वे निरन्तर चिन्ता में रहते हैं। यदि हम चिन्ता से मुक्त होना चाहते हैं, तो सर्वोत्तम मार्ग यही है कि श्रीकृष्ण को समझें और सदा कृष्णभावनामृत में स्थित रहें। इस प्रकार हम समस्त भय से मुक्त हो जाएँगे। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भय हमारे माया-ऊर्जा में लीन होने के कारण उत्पन्न होता है; किन्तु जो मायारूपी ऊर्जा से मुक्त हैं, जो इस विषय में आश्वस्त हैं कि वे भौतिक शरीर नहीं हैं, अपितु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आध्यात्मिक अंश हैं और इसीलिए परम भगवान् की दिव्य सेवा में संलग्न हैं, उन्हें भयभीत होने का कुछ नहीं है। उनका भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल है। यह भय उन व्यक्तियों की दशा है जो कृष्णभावनामृत में नहीं हैं। भयम्, अर्थात् अभय, केवल कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति के लिए ही सम्भव है।
अहिंसा का अर्थ है कि मनुष्य को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जो दूसरों को दुःख अथवा संभ्रम में डाले। इतने सारे राजनीतिज्ञों, समाजशास्त्रियों, परोपकारियों आदि द्वारा वचनबद्ध भौतिक क्रियाएँ बहुत अच्छे परिणाम नहीं देतीं, क्योंकि राजनीतिज्ञों तथा परोपकारियों के पास दिव्य दृष्टि नहीं है; वे नहीं जानते कि मानव-समाज के लिए वस्तुतः क्या हितकर है। अहिंसा का अर्थ है कि लोगों को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि मानव-शरीर का पूर्ण सदुपयोग प्राप्त किया जा सके। मानव-शरीर आध्यात्मिक अनुभूति हेतु है, अतः कोई भी आन्दोलन अथवा कोई भी आयोग जो उस लक्ष्य को आगे नहीं बढ़ाता, वह मानव-शरीर पर हिंसा करता है। जो सामान्य जनता के भावी आध्यात्मिक सुख को आगे बढ़ाता है, उसे ही अहिंसा कहते हैं।
समता, अर्थात् समता, राग तथा द्वेष से मुक्ति का बोधक है। अत्यधिक आसक्त होना अथवा अत्यधिक विरक्त होना सर्वोत्तम नहीं है। इस भौतिक जगत् को राग अथवा द्वेष के बिना स्वीकार करना चाहिए। इसी प्रकार, जो कृष्णभावनामृत के अनुशीलन के अनुकूल हो उसे स्वीकार करना चाहिए; जो प्रतिकूल हो उसे त्याग देना चाहिए। इसी को समता कहते हैं। कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति के पास त्यागने अथवा स्वीकार करने योग्य कुछ नहीं रहता, सिवाय उसके जो कृष्णभावनामृत के अनुशीलन में उपयोगी हो।
तुष्टिः, अर्थात् सन्तोष, का अर्थ है कि मनुष्य को अनावश्यक क्रिया द्वारा अधिकाधिक भौतिक वस्तुएँ संग्रह करने के लिए उत्सुक नहीं होना चाहिए। मनुष्य को जो कुछ परमेश्वर की कृपा से प्राप्त हो उसी में सन्तुष्ट रहना चाहिए; इसी को सन्तोष कहते हैं। तपः का अर्थ है तपस्या अथवा तप। वेदों में अनेक नियम तथा परिभाषाएँ हैं जो यहाँ लागू होती हैं, जैसे प्रातःकाल जल्दी उठना तथा स्नान करना। कभी-कभी प्रातःकाल जल्दी उठना अत्यन्त कष्टकर होता है, किन्तु इस प्रकार मनुष्य जो भी स्वैच्छिक कष्ट सहता है, उसे तप कहते हैं। इसी प्रकार, मास के कुछ निश्चित दिनों में उपवास के विधान हैं। मनुष्य का ऐसे उपवास का अभ्यास करने की प्रवृत्ति न हो, किन्तु कृष्णभावनामृत के विज्ञान में उन्नति करने के अपने संकल्प के कारण, उसे ऐसे शारीरिक कष्ट स्वीकार करने चाहिए जिनकी अनुशंसा की गई है। किन्तु मनुष्य को अनावश्यक रूप से अथवा वैदिक विधानों के विरुद्ध उपवास नहीं करना चाहिए। मनुष्य को किसी राजनीतिक प्रयोजन हेतु उपवास नहीं करना चाहिए; भगवद्गीता में इसे तमोगुणी उपवास कहा गया है, और तमोगुण अथवा रजोगुण में किया गया कोई भी कार्य आध्यात्मिक उन्नति की ओर नहीं ले जाता। किन्तु सत्त्वगुण में किया गया प्रत्येक कार्य मनुष्य को उन्नत करता है, और वैदिक विधानों के अनुसार किया गया उपवास मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान में समृद्ध करता है।
जहाँ तक दान का प्रश्न है, मनुष्य को अपनी आय का पचास प्रतिशत किसी सत्कार्य हेतु देना चाहिए। और सत्कार्य क्या है? वह जो कृष्णभावनामृत के अनुसार संचालित होता है। यह न केवल सत्कार्य है, अपितु सर्वोत्तम कार्य है। चूँकि श्रीकृष्ण मंगलमय हैं, अतः उनका कार्य भी मंगलमय है। इस प्रकार दान उस व्यक्ति को देना चाहिए जो कृष्णभावनामृत में संलग्न है। वैदिक साहित्य के अनुसार यह आदेश है कि दान ब्राह्मणों को देना चाहिए। यह प्रथा आज भी प्रचलित है, यद्यपि वैदिक विधान के अनुसार ठीक रीति से नहीं। किन्तु फिर भी विधान यही है कि दान ब्राह्मणों को देना चाहिए। क्यों? क्योंकि वे आध्यात्मिक ज्ञान के उच्चतर अनुशीलन में संलग्न रहते हैं। ब्राह्मण से अपेक्षा की जाती है कि वह अपना समूचा जीवन ब्रह्म को समझने में अर्पित करे। ब्रह्म-जान वह है जो ब्रह्म को जानता है; उसे ब्राह्मण कहते हैं। इस प्रकार दान ब्राह्मणों को अर्पित किया जाता है, क्योंकि वे सदा उच्चतर आध्यात्मिक सेवा में संलग्न रहते हैं, अतः उनके पास अपनी जीविका कमाने का समय नहीं रहता। वैदिक साहित्य में, दान जीवन के त्यागी, अर्थात् संन्यासी, को भी दिया जाना चाहिए। संन्यासी द्वार-द्वार भिक्षा माँगते हैं, धन के लिए नहीं अपितु प्रचार-प्रयोजनों हेतु। पद्धति यह है कि वे द्वार-द्वार जाकर गृहस्थों को अज्ञान की निद्रा से जगाते हैं। चूँकि गृहस्थ पारिवारिक कार्यों में संलग्न रहते हैं और अपने जीवन के वास्तविक प्रयोजन—अर्थात् अपने कृष्णभावनामृत को जगाने—को भूल चुके हैं, अतः संन्यासियों का यह कर्तव्य है कि वे भिक्षुक रूप में गृहस्थों के पास जाएँ और उन्हें कृष्णभावनाभावित होने के लिए प्रोत्साहित करें। जैसा कि वेदों में कहा गया है, मनुष्य को जागना चाहिए और इस मानव-जीवन में जो उसका प्राप्तव्य है उसे प्राप्त करना चाहिए। यह ज्ञान तथा विधि संन्यासियों द्वारा वितरित की जाती है; अतः दान जीवन के त्यागी को, ब्राह्मणों को तथा वैसे ही सत्कार्यों को दिया जाना चाहिए, न कि किसी मनमाने कार्य को।
यशः, अर्थात् यश, भगवान् चैतन्य के अनुसार होना चाहिए, जिन्होंने कहा कि मनुष्य तब यशस्वी होता है जब वह एक महान् भक्त रूप में जाना जाता है। यही वास्तविक यश है। यदि कोई कृष्णभावनामृत में महापुरुष बन गया है और यह विदित है, तो वह वस्तुतः यशस्वी है। जिसके पास ऐसा यश नहीं है, वह अपयशी है।
ये समस्त गुण समूचे ब्रह्माण्ड में मानव-समाज में तथा देवताओं के समाज में प्रकट हैं। अन्य लोकों में मानवता के अनेक रूप हैं, और ये गुण वहाँ भी विद्यमान हैं। अब, जो कृष्णभावनामृत में उन्नति करना चाहता है, उसके लिए श्रीकृष्ण ये समस्त गुण सृजित करते हैं, किन्तु व्यक्ति उन्हें स्वयं भीतर से विकसित करता है। जो परमेश्वर की भक्ति में संलग्न होता है, वह परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित रीति से समस्त सद्गुणों को विकसित करता है।
जो कुछ हमें मिलता है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, उसका उद्गम श्रीकृष्ण हैं। इस भौतिक जगत् में ऐसा कुछ भी प्रकट नहीं हो सकता जो श्रीकृष्ण में न हो। यही ज्ञान है; यद्यपि हम जानते हैं कि वस्तुएँ भिन्न-भिन्न रूप से स्थित हैं, तथापि हमें यह अनुभव करना चाहिए कि सब कुछ श्रीकृष्ण से ही प्रवाहित होता है।
Bg 10.40
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥
न—न तो; अन्तः—सीमा; अस्ति—है; मम—मेरी; दिव्यानाम्—दिव्य; विभूतीनाम्—विभूतियों की; परन्तप—हे शत्रुओं के विजेता; एषः—यह सब; तु—वह; उद्देशतः—उदाहरण; प्रोक्तः—कहा गया; विभूतेः—विभूतियों का; विस्तरः—विस्तार; मया—मेरे द्वारा।
हे शत्रुओं के पराक्रमी विजेता! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। मैंने तुमसे जो कहा है, वह तो मेरी अनन्त विभूतियों का केवल एक संकेत मात्र है।
जैसा कि वैदिक साहित्य में कहा गया है, यद्यपि परम की विभूतियाँ तथा ऊर्जाएँ विभिन्न प्रकारों से समझी जाती हैं, तथापि ऐसी विभूतियों की कोई सीमा नहीं है; अतः समस्त विभूतियों तथा ऊर्जाओं की व्याख्या नहीं की जा सकती। अर्जुन की जिज्ञासा को शान्त करने हेतु उन्हें केवल कुछ उदाहरण ही बताए जा रहे हैं।
Bg 10.41
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
यत् यत्—जो जो; विभूति—विभूतियों से; मत्—युक्त; सत्त्वम्—अस्तित्व; श्रीमत्—सुन्दर; ऊर्जितम्—गौरवशाली; एव—निश्चय ही; वा—अथवा; तत् तत्—वे सब; एव—निश्चय ही; अवगच्छ—तुम जान लो; त्वम्—तुम; मम—मेरे; तेजः—तेज; अंश—अंशमात्र; सम्भवम्—से उत्पन्न।
जान लो कि समस्त सुन्दर, गौरवशाली तथा सामर्थ्यवान् सृष्टियाँ मेरे तेज की केवल एक चिनगारी से उत्पन्न होती हैं।
किसी भी गौरवशाली अथवा सुन्दर अस्तित्व को श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य का केवल एक अंशमात्र प्रकटीकरण समझना चाहिए, चाहे वह आध्यात्मिक जगत् में हो अथवा भौतिक जगत् में। किसी भी असाधारण रूप से ऐश्वर्ययुक्त वस्तु को श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य का प्रतिनिधि मानना चाहिए।
Bg 10.42
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
अथवा—अथवा; बहुना—बहुत; एतेन—इस प्रकार के; किम्—क्या; ज्ञातेन—जानकर; तव—तुम्हें; अर्जुन—हे अर्जुन; विष्टभ्य—सम्पूर्ण; अहम्—मैं; इदम्—इस; कृत्स्नम्—समस्त प्रकटीकरणों को; एक—एक; अंशेन—अंश से; स्थितः—स्थित; जगत्—ब्रह्माण्ड में।
किन्तु हे अर्जुन! इस समस्त विस्तृत ज्ञान की क्या आवश्यकता है? मैं अपने एक अंशमात्र से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर इसे धारण करता हूँ।
परमेश्वर समस्त भौतिक ब्रह्माण्डों में परमात्मा के रूप में समस्त वस्तुओं में प्रवेश करके प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान् यहाँ अर्जुन से कहते हैं कि यह जानने का कोई प्रयोजन नहीं कि वस्तुएँ अपने पृथक् ऐश्वर्य तथा वैभव में किस प्रकार विद्यमान हैं। उसे यह जान लेना चाहिए कि समस्त वस्तुएँ इसी कारण विद्यमान हैं कि श्रीकृष्ण ने परमात्मा के रूप में उनमें प्रवेश किया है। ब्रह्मा, जो सबसे विशाल सत्ता हैं, से लेकर सबसे छोटी चींटी तक, सब इसीलिए विद्यमान हैं कि भगवान् ने प्रत्येक तथा समस्त में प्रवेश किया है और उन्हें धारण किए हुए हैं।
यहाँ देवताओं की आराधना को निरुत्साहित किया गया है, क्योंकि ब्रह्मा तथा शिव जैसे महानतम देवता भी परमेश्वर के ऐश्वर्य के केवल अंशमात्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे ही प्रत्येक जन्म लेने वाले के उद्गम हैं, और कोई उनसे महान् नहीं है। वे समता हैं, अर्थात् कोई उनसे श्रेष्ठ नहीं है और कोई उनके समान नहीं है। विष्णु-मन्त्र में कहा गया है कि जो परमेश्वर श्रीकृष्ण को देवताओं के—चाहे वे ब्रह्मा हों अथवा शिव—समान श्रेणी में मानता है, वह तत्क्षण नास्तिक हो जाता है। किन्तु यदि कोई श्रीकृष्ण की ऊर्जा के ऐश्वर्यों तथा विस्तारों के विभिन्न वर्णनों का भली-भाँति अध्ययन करे, तो वह बिना किसी सन्देह के भगवान् श्रीकृष्ण की स्थिति को समझ सकता है और बिना विचलित हुए अपने मन को श्रीकृष्ण की आराधना में स्थिर कर सकता है। भगवान् अपने अंशमात्र प्रतिनिधि परमात्मा के विस्तार द्वारा सर्वव्यापी हैं, जो प्रत्येक विद्यमान वस्तु में प्रवेश करते हैं। अतः शुद्ध भक्तगण पूर्ण भक्ति में अपने मन को कृष्णभावनामृत में केन्द्रित करते हैं; अतएव वे सदा दिव्य स्थिति में स्थित रहते हैं। इस अध्याय में आठवें से ग्यारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण की भक्ति तथा आराधना का अत्यन्त स्पष्ट निर्देश है। यही शुद्ध भक्ति का मार्ग है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की संगति की उच्चतम भक्तिमयी सिद्धि किस प्रकार प्राप्त की जाए, इसे इस अध्याय में भली-भाँति समझाया गया है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय “परम के ऐश्वर्य” विषयक भक्तिवेदान्त तात्पर्यों की समाप्ति होती है।
Bg 10.6
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥
महर्षयः—महान् ऋषि; सप्त—सात; पूर्वे—पूर्व; चत्वारः—चार; मनवः—मनु; तथा—भी; मत्-भावाः—मुझसे उत्पन्न; मानसाः—मन से; जाताः—उत्पन्न; येषाम्—उनके; लोके—लोकों में; इमाः—यह सब; प्रजाः—जनसंख्या।
सात महान् ऋषि और उनसे पूर्व चार अन्य महान् ऋषि तथा मनु [मानव-जाति के जनक] मेरे मन से उत्पन्न होते हैं, और इन लोकों के समस्त प्राणी उन्हीं से उद्भूत होते हैं।
भगवान् ब्रह्माण्ड की जनसंख्या का एक वंशावली-सारांश दे रहे हैं। ब्रह्मा वह आदि प्राणी हैं जो परमेश्वर की उस ऊर्जा से उत्पन्न हुए जिसे हिरण्यगर्भ कहते हैं। और ब्रह्मा से समस्त सात महान् ऋषि, तथा उनसे पूर्व चार अन्य महान् ऋषि—जिनके नाम सनक, सनन्द, सनातन तथा सनत्कुमार हैं—एवं चौदह मनु प्रकट होते हैं। ये समस्त पच्चीस महान् ऋषि समूचे ब्रह्माण्ड में जीवों के पितामह रूप में जाने जाते हैं। असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के भीतर असंख्य लोक हैं, और प्रत्येक लोक विभिन्न प्रकार की जनसंख्या से परिपूर्ण है। ये सभी इन्हीं पच्चीस पितामहों से उत्पन्न हैं। ब्रह्मा ने यह जानने से पूर्व कि सृष्टि कैसे करनी है, देवताओं के एक सहस्र वर्ष तक तपस्या की, और तब श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें यह बोध हुआ। तत्पश्चात् ब्रह्मा से सनक, सनन्द, सनातन तथा सनत्कुमार प्रकट हुए, फिर रुद्र, और तत्पश्चात् सात ऋषि; और इस प्रकार समस्त ब्राह्मण तथा क्षत्रिय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की ऊर्जा से उत्पन्न हुए। ब्रह्मा पितामह, अर्थात् बाबा, रूप में जाने जाते हैं, और श्रीकृष्ण प्रपितामह, अर्थात् पितामह के पिता, रूप में जाने जाते हैं। इसका कथन भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में है। (गीता 11.39)
Bg 10.7
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
एताम्—यह सब; विभूतिम्—ऐश्वर्य; योगम् च—तथा योगशक्ति; मम—मेरी; यः—जो कोई; वेत्ति—जानता है; तत्त्वतः—तथ्यतः; सः—वह; अविकम्पेन—अविचलित; योगेन—भक्ति में; युज्यते—संलग्न होता है; न—कभी नहीं; अत्र—यहाँ; संशयः—सन्देह।
जो मेरे इस वैभव तथा शक्ति को वस्तुतः जानता है, वह अनन्य भक्ति में संलग्न होता है; इसमें कोई सन्देह नहीं है।
आध्यात्मिक सिद्धि का सर्वोच्च शिखर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का ज्ञान है। जब तक मनुष्य परमेश्वर के विभिन्न ऐश्वर्यों के विषय में दृढ़ रूप से आश्वस्त नहीं होता, तब तक वह भक्ति में संलग्न नहीं हो सकता। सामान्यतः लोग जानते हैं कि ईश्वर महान् हैं, किन्तु वे विस्तार से नहीं जानते कि ईश्वर कैसे महान् हैं। यहाँ वह विस्तार दिया गया है। यदि मनुष्य तथ्यतः जान ले कि ईश्वर कैसे महान् हैं, तो स्वभावतः वह शरणागत आत्मा बन जाता है और स्वयं को भगवान् की भक्ति में संलग्न कर लेता है। जब मनुष्य परमेश्वर के ऐश्वर्यों को तथ्यतः जान लेता है, तब उनके प्रति शरणागत होने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता। यह तथ्यपरक ज्ञान श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता एवं वैसे ही ग्रन्थों के वर्णनों से जाना जा सकता है।
इस ब्रह्माण्ड के संचालन में अनेक देवता ग्रह-व्यवस्था में वितरित हैं, और उनमें प्रमुख हैं ब्रह्मा, भगवान् शिव तथा चार महान् कुमार एवं अन्य पितामह। ब्रह्माण्ड की जनसंख्या के अनेक पूर्वज हैं, और वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण से उत्पन्न हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण समस्त पूर्वजों के आदि पूर्वज हैं।
ये परमेश्वर के कुछ ऐश्वर्य हैं। जब मनुष्य इनके विषय में दृढ़ रूप से आश्वस्त हो जाता है, तब वह श्रीकृष्ण को महान् श्रद्धा सहित तथा बिना किसी सन्देह के स्वीकार कर लेता है, और भक्ति में संलग्न हो जाता है। यह समस्त विशिष्ट ज्ञान इसलिए आवश्यक है ताकि भगवान् की प्रेमाभक्ति में मनुष्य की रुचि बढ़े। मनुष्य को यह भली-भाँति समझने की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि श्रीकृष्ण कितने महान् हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण की महत्ता को जानकर मनुष्य निष्कपट भक्ति में स्थिर हो सकेगा।
Bg 10.8
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥
अहम्—मैं; सर्वस्य—समस्त का; प्रभवः—उत्पत्ति का स्रोत; मत्तः—मुझसे; सर्वम्—सब कुछ; प्रवर्तते—उद्भूत होता है; इति—इस प्रकार; मत्वा—जानकर; भजन्ते—भक्त बन जाते हैं; माम्—मुझको; बुधाः—विद्वान्; भाव-समन्विताः—महान् भाव सहित।
मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का स्रोत हूँ। सब कुछ मुझसे ही उद्भूत होता है। जो विद्वान् इसे भली-भाँति जानते हैं, वे मेरी भक्ति में संलग्न होते हैं और सम्पूर्ण हृदय से मेरी आराधना करते हैं।
जिस विद्वान् पण्डित ने वेदों का भली-भाँति अध्ययन किया है और जिसे भगवान् चैतन्य जैसे प्रामाणिक पुरुषों से ज्ञान प्राप्त है और जो जानता है कि इन शिक्षाओं को कैसे लागू किया जाए, वह समझ सकता है कि श्रीकृष्ण भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों जगतों में प्रत्येक वस्तु का उद्गम हैं, और चूँकि वह इसे भली-भाँति जानता है, अतः वह परमेश्वर की भक्ति में दृढ़ रूप से स्थिर हो जाता है। उसे चाहे जितनी भी निरर्थक टीकाओं अथवा मूर्खों द्वारा कभी विचलित नहीं किया जा सकता। समस्त वैदिक साहित्य इस बात पर सहमत है कि श्रीकृष्ण ब्रह्मा, शिव तथा अन्य समस्त देवताओं के स्रोत हैं। अथर्ववेद में कहा गया है, “यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च गापयति स्म कृष्णः।” “वे श्रीकृष्ण ही थे जिन्होंने आदि में ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान का उपदेश दिया और जिन्होंने भूतकाल में वैदिक ज्ञान का प्रसार किया।” फिर पुनः कहा गया है, “अथ पुरुषो ह वै नारायणो ऽकामयत प्रजाः सृजेय इत्युपक्रम्य।” “तब परम पुरुष नारायण ने जीवों को सृजित करने की इच्छा की।” पुनः कहा गया है:
नारायणाद् ब्रह्मा जायते, नारायणाद् प्रजापतिः प्रजायते, नारायणाद् इन्द्रो जायते, नारायणाद् अष्टौ वसवो जायन्ते, नारायणाद् एकादश रुद्रा जायन्ते, नारायणाद् द्वादशादित्याः।
“नारायण से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, और नारायण से पितामह भी उत्पन्न होते हैं। नारायण से इन्द्र उत्पन्न होते हैं, नारायण से आठ वसु उत्पन्न होते हैं, नारायण से ग्यारह रुद्र उत्पन्न होते हैं, नारायण से बारह आदित्य उत्पन्न होते हैं।”
उन्हीं वेदों में कहा गया है: ब्रह्मण्यो देवकी-पुत्रः, “देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण परम पुरुष हैं।” तत्पश्चात् कहा गया है:
एको वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्नि समौ नेमे
द्याव-आपृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यः स एकाकी न रमते तस्य
ध्यानान्तः स्थस्य यत्र छान्दोगैः क्रियमाणाष्टकादि-संज्ञका
स्तुति-स्तोमः स्तोममुच्यते।
“सृष्टि के आरम्भ में केवल परम पुरुष नारायण थे। न ब्रह्मा थे, न शिव, न अग्नि, न चन्द्रमा, न आकाश में तारे, न सूर्य। केवल श्रीकृष्ण थे, जो सबका सृजन करते हैं तथा सबका भोग करते हैं।”
अनेक पुराणों में कहा गया है कि भगवान् शिव परम से, अर्थात् परमेश्वर श्रीकृष्ण से, उत्पन्न हुए, और वेद कहते हैं कि वही परमेश्वर, ब्रह्मा तथा शिव के स्रष्टा, आराधनीय हैं। मोक्ष-धर्म में श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं, प्रजापतिं च रुद्रं चाप्यहमेव सृजामि वै तौ हि मां न विजानीतो मम माया-विमोहितौ। “पितामह, शिव तथा अन्य मेरे द्वारा सृजित हैं, यद्यपि वे नहीं जानते कि वे मेरे द्वारा सृजित हैं, क्योंकि वे मेरी मायारूपी ऊर्जा से मोहित हैं।” वराह पुराण में यह भी कहा गया है, नारायणः परो देवस्तस्माज्जातश्चतुर्मुखः तस्माद् रुद्रो ऽभवद् देवः स च सर्वज्ञतां गतः। “नारायण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और उनसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनसे शिव उत्पन्न हुए।”
भगवान् श्रीकृष्ण समस्त उत्पत्तियों के स्रोत हैं, और वे प्रत्येक वस्तु के सर्वाधिक सक्षम कारण कहे जाते हैं। वे कहते हैं कि चूँकि “सब कुछ मुझसे उत्पन्न होता है, अतः मैं सबका आदि स्रोत हूँ। सब कुछ मेरे अधीन है; कोई भी मुझसे ऊपर नहीं है।” श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई परम नियन्ता नहीं है। जो श्रीकृष्ण को इस प्रकार किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से तथा वैदिक साहित्य से समझता है, जो अपनी समूची ऊर्जा को कृष्णभावनामृत में संलग्न करता है, वह वस्तुतः विद्वान् मनुष्य बन जाता है। उसकी तुलना में अन्य समस्त, जो श्रीकृष्ण को ठीक से नहीं जानते, मूर्ख ही हैं। केवल मूर्ख ही श्रीकृष्ण को एक साधारण मनुष्य मानेगा। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को मूर्खों से मोहित नहीं होना चाहिए; उसे भगवद्गीता पर समस्त अप्रामाणिक टीकाओं तथा व्याख्याओं से बचना चाहिए और संकल्प तथा दृढ़ता सहित कृष्णभावनामृत में अग्रसर होना चाहिए।
Bg 10.9
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥
मत्-चित्ताः—मन में पूर्णतः मुझमें संलग्न; मत्-गत-प्राणाः—श्रीकृष्ण की सेवा में अर्पित जीवन वाले; बोधयन्तः—प्रचार करते हुए; परस्परम्—आपस में; कथयन्तः च—बातें भी करते हुए; माम्—मेरे विषय में; नित्यम्—निरन्तर; तुष्यन्ति—प्रसन्न होते हैं; च—भी; रमन्ति—दिव्य आनन्द भोगते हैं; च—भी।
मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमें ही निवास करते हैं, उनके जीवन मुझे समर्पित रहते हैं, और वे एक-दूसरे को प्रबुद्ध करते हुए तथा मेरे विषय में वार्तालाप करते हुए महान् सन्तोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं।
शुद्ध भक्त, जिनके लक्षण यहाँ वर्णित हैं, स्वयं को भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में पूर्णतः संलग्न कर लेते हैं। उनका मन श्रीकृष्ण के चरणकमलों से विचलित नहीं हो सकता। उनकी बातें मात्र दिव्य विषयों पर होती हैं। शुद्ध भक्तों के लक्षण इस श्लोक में विशेष रूप से वर्णित हैं। परमेश्वर के भक्तगण चौबीसों घण्टे परमेश्वर की लीलाओं का गुणगान करने में संलग्न रहते हैं। उनके हृदय तथा आत्मा निरन्तर श्रीकृष्ण में निमग्न रहते हैं, और वे अन्य भक्तों के साथ उनकी चर्चा करने में आनन्द लेते हैं।
भक्ति की प्रारम्भिक अवस्था में वे सेवा से ही दिव्य आनन्द का आस्वादन करते हैं, और परिपक्व अवस्था में वे वस्तुतः ईश्वर-प्रेम में स्थित हो जाते हैं। उस दिव्य स्थिति में स्थित होने पर, वे उस सर्वोच्च सिद्धि का आस्वादन कर सकते हैं जिसे भगवान् अपने धाम में प्रकट करते हैं। भगवान् चैतन्य दिव्य भक्ति की तुलना जीव के हृदय में एक बीज बोने से करते हैं। ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों में भ्रमण करते हुए असंख्य जीव हैं, और उनमें से कुछ ही इतने भाग्यशाली होते हैं कि किसी शुद्ध भक्त से मिलें और भक्ति को समझने का अवसर पाएँ। यह भक्ति ठीक एक बीज के समान है, और यदि वह जीव के हृदय में बोया जाए, और यदि वह हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का श्रवण तथा कीर्तन करता रहे, तो वह बीज फलित होता है, ठीक जैसे वृक्ष का बीज नियमित जल-सिंचन से फलित होता है। भक्तिरूपी आध्यात्मिक पौधा धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, यहाँ तक कि वह भौतिक ब्रह्माण्ड के आवरण को भेदकर आध्यात्मिक आकाश में ब्रह्मज्योति तेज में प्रवेश कर जाता है। आध्यात्मिक आकाश में भी वह पौधा और अधिक बढ़ता जाता है, यहाँ तक कि वह उस सर्वोच्च लोक तक पहुँच जाता है जिसे गोलोक वृन्दावन, श्रीकृष्ण का परम लोक, कहते हैं। अन्ततः वह पौधा श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण लेता है और वहीं विश्राम करता है। धीरे-धीरे, जैसे एक पौधा फल तथा पुष्प उत्पन्न करता है, वैसे ही वह भक्तिरूपी पौधा भी फल उत्पन्न करता है, और कीर्तन तथा श्रवण के रूप में जल-सिंचन की प्रक्रिया चलती रहती है। इस भक्तिरूपी पौधे का पूर्ण वर्णन चैतन्य-चरितामृत में किया गया है। वहाँ यह समझाया गया है कि जब सम्पूर्ण पौधा परमेश्वर के चरणकमलों की शरण ले लेता है, तब मनुष्य ईश्वर-प्रेम में पूर्णतः निमग्न हो जाता है; तब वह परमेश्वर के सम्पर्क के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता, ठीक जैसे मछली जल के बिना नहीं रह सकती। ऐसी अवस्था में भक्त परमेश्वर के सम्पर्क में वस्तुतः दिव्य गुणों को प्राप्त कर लेता है।
श्रीमद्भागवत भी परमेश्वर तथा उनके भक्तों के बीच के सम्बन्ध के ऐसे वर्णन से परिपूर्ण है; अतः श्रीमद्भागवत भक्तगण को अत्यन्त प्रिय है। इस वर्णन में भौतिक क्रियाओं, इन्द्रियतृप्ति अथवा मुक्ति के विषय में कुछ नहीं है। श्रीमद्भागवत ही एकमात्र ऐसा वर्णन है जिसमें परमेश्वर तथा उनके भक्तों के दिव्य स्वरूप का पूर्ण वर्णन है। इस प्रकार कृष्णभावनामृत में स्थित अनुभूत आत्माएँ ऐसे दिव्य साहित्य के श्रवण में निरन्तर आनन्द लेती हैं, ठीक जैसे एक युवक तथा युवती संगति में आनन्द लेते हैं।