अध्याय 11
Bg 11.1
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; मत्-अनुग्रहाय—मुझ पर अनुग्रह करने के लिए; परमम्—परम; गुह्यम्—गोपनीय; अध्यात्म—आध्यात्मिक; संज्ञितम्—विषय में; यत्—जो; त्वया—आपके द्वारा; उक्तम्—कहा गया; वचः—वचन; तेन—उससे; मोहः—मोह; अयम्—यह; विगतः—दूर हुआ; मम—मेरा।
अर्जुन ने कहा : आपने अत्यन्त कृपापूर्वक मुझे गोपनीय आध्यात्मिक विषयों का जो उपदेश दिया, उसे सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है।
यह अध्याय श्रीकृष्ण को समस्त कारणों के कारण के रूप में प्रकट करता है। वे महाविष्णु के भी कारण हैं, और उन्हीं से भौतिक ब्रह्माण्ड उद्भूत होते हैं। श्रीकृष्ण कोई अवतार नहीं हैं; वे समस्त अवतारों के उद्गम हैं। यह बात पिछले अध्याय में पूर्णतया समझाई जा चुकी है।
अब, जहाँ तक अर्जुन का सम्बन्ध है, वे कहते हैं कि उनका मोह दूर हो गया है। इसका अर्थ यह है कि अर्जुन अब श्रीकृष्ण को केवल एक मनुष्य अथवा अपना मित्र मात्र नहीं मानते, अपितु समस्त वस्तुओं का उद्गम मानते हैं। अर्जुन अत्यन्त प्रबुद्ध हैं और प्रसन्न हैं कि उन्हें श्रीकृष्ण जैसा महान् मित्र प्राप्त है; किन्तु अब वे यह विचार कर रहे हैं कि यद्यपि वे स्वयं श्रीकृष्ण को समस्त वस्तुओं का उद्गम स्वीकार कर लें, तथापि अन्य लोग ऐसा न करें। अतः सबके लिए श्रीकृष्ण की दिव्यता को प्रतिष्ठित करने हेतु, वे इस अध्याय में श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे अपना विश्वरूप दिखलाएँ। वस्तुतः जब कोई श्रीकृष्ण के विश्वरूप का दर्शन करता है, तो वह अर्जुन के समान भयभीत हो जाता है; किन्तु श्रीकृष्ण इतने कृपालु हैं कि उसे दिखलाने के पश्चात् वे पुनः अपने मूल रूप में प्रकट हो जाते हैं। अर्जुन कई बार श्रीकृष्ण की बात से सहमति प्रकट करते हैं। श्रीकृष्ण केवल उनके कल्याण के लिए ही उनसे बोल रहे हैं, और अर्जुन स्वीकार करते हैं कि यह सब उन्हें श्रीकृष्ण की कृपा से ही प्राप्त हो रहा है। अब उन्हें यह विश्वास हो चुका है कि श्रीकृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं और परमात्मा रूप में सबके हृदय में विद्यमान हैं।
Bg 11.10-11
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
अनेक—विविध; वक्त्र—मुख; नयनम्—नेत्र; अनेक—विविध; अद्भुत—आश्चर्यजनक; दर्शनम्—दृश्य; अनेक—अनेक; दिव्य—दिव्य; आभरणम्—आभूषण; दिव्य—दिव्य; अनेक—विविध; उद्यत—उठाए हुए; आयुधम्—आयुध; दिव्य—दिव्य; माल्य—मालाएँ; अम्बर-धरम्—वस्त्रों से युक्त; दिव्य—दिव्य; गन्ध—सुगन्ध; अनुलेपनम्—लेपित; सर्व—समस्त; अश्चर्यमयम्—आश्चर्यजनक; देवम्—देदीप्यमान; अनन्तम्—असीम; विश्वतः-मुखम्—सर्वव्यापी।
अर्जुन ने उस विश्वरूप में असीम मुख तथा असीम नेत्र देखे। वह सब कुछ आश्चर्यजनक था। वह रूप दिव्य, चकाचौंध करने वाले आभूषणों से सुसज्जित था और अनेक वस्त्रों से सुशोभित था। वे भव्य रूप से मालाओं से अलंकृत थे, और उनके शरीर पर अनेक सुगन्धियाँ लेपित थीं। सब कुछ अत्यन्त वैभवशाली, सर्वव्यापी तथा असीम था। यह सब अर्जुन ने देखा।
ये दो श्लोक यह संकेत करते हैं कि भगवान् के हाथों, मुखों, चरणों आदि का कोई अन्त नहीं है। ये प्रकटीकरण समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं और असीम हैं। भगवान् की कृपा से अर्जुन एक ही स्थान पर बैठे-बैठे इन्हें देख सके। यह श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्ति के कारण ही सम्भव हुआ।
Bg 11.12
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
दिवि—आकाश में; सूर्य—सूर्य; सहस्रस्य—सहस्रों के; भवेत्—वहाँ हों; युगपत्—एक साथ; उत्थिता—उदित; यदि—यदि; भाः—प्रकाश; सदृशी—उसके समान; सा—वह; स्यात्—हो; भासः—तेज; तस्य—वहाँ है; महात्मनः—महान् भगवान् का।
यदि आकाश में सहस्रों सूर्य एक साथ उदित हो उठें, तो उनका प्रकाश सम्भवतः उस विश्वरूप में परम पुरुष के तेज के समान हो।
अर्जुन ने जो देखा, वह अवर्णनीय था; तथापि सञ्जय धृतराष्ट्र के समक्ष उस महान् दर्शन का एक मानसिक चित्र प्रस्तुत करने का प्रयत्न कर रहे हैं। न तो सञ्जय वहाँ उपस्थित थे और न धृतराष्ट्र; किन्तु सञ्जय व्यास की कृपा से जो कुछ घटित हुआ, उसे देख सके। अतः अब वे उस परिस्थिति की तुलना, जहाँ तक उसे समझा जा सकता है, एक कल्पनीय घटना (अर्थात् सहस्रों सूर्य) से करते हैं।
Bg 11.13
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
तत्र—वहाँ; एकस्थम्—एक स्थान में; जगत्—ब्रह्माण्ड; कृत्स्नम्—पूर्णतया; प्रविभक्तम्—विभाजित; अनेकधा—अनेक प्रकार से; अपश्यत्—देख सके; देव-देवस्य—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के; शरीरे—विश्वरूप में; पाण्डवः—अर्जुन; तदा—उस समय।
उस समय अर्जुन भगवान् के विश्वरूप में ब्रह्माण्ड के असीम विस्तारों को एक ही स्थान में स्थित देख सके, यद्यपि वे अनेक-अनेक सहस्रों भागों में विभाजित थे।
“तत्र” (वहाँ) शब्द अत्यन्त सार्थक है। यह इंगित करता है कि जब अर्जुन ने विश्वरूप देखा, तब अर्जुन तथा श्रीकृष्ण दोनों रथ पर विराजमान थे। युद्धभूमि पर उपस्थित अन्य लोग इस रूप को नहीं देख सके, क्योंकि श्रीकृष्ण ने यह दृष्टि केवल अर्जुन को ही प्रदान की थी। अर्जुन श्रीकृष्ण के शरीर में अनेक सहस्रों ब्रह्माण्डों को देख सके। जैसा कि हम वैदिक शास्त्रों से जानते हैं, अनेक ब्रह्माण्ड तथा अनेक लोक हैं। उनमें से कुछ मिट्टी के बने हैं, कुछ स्वर्ण के, कुछ रत्नों के, कुछ अत्यन्त विशाल हैं, कुछ इतने विशाल नहीं हैं, इत्यादि। अपने रथ पर विराजमान अर्जुन इन समस्त ब्रह्माण्डों को देख सके। किन्तु अर्जुन तथा श्रीकृष्ण के बीच जो कुछ घटित हो रहा था, उसे कोई समझ नहीं सका।
Bg 11.14
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥
ततः—तत्पश्चात्; सः—वह; विस्मयाविष्टः—विस्मय से अभिभूत; हृष्ट-रोमा—अपने महान् भावावेश के कारण रोमांचित शरीर वाला; धनञ्जयः—अर्जुन; प्रणम्य—प्रणाम करते हुए; शिरसा—सिर के द्वारा; देवम्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को; कृताञ्जलिः—हाथ जोड़े हुए; अभाषत—कहने लगा।
तब विस्मित तथा चकित होकर, रोमांचित शरीर वाले अर्जुन हाथ जोड़कर परमेश्वर को प्रणाम करते हुए प्रार्थना करने लगे।
दिव्य दृष्टि के प्रकट होते ही श्रीकृष्ण तथा अर्जुन के बीच का सम्बन्ध तत्काल बदल जाता है। इससे पूर्व श्रीकृष्ण तथा अर्जुन का सम्बन्ध मैत्री पर आधारित था; किन्तु यहाँ, दर्शन के पश्चात्, अर्जुन अत्यन्त सम्मान के साथ प्रणाम कर रहे हैं और हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से प्रार्थना कर रहे हैं। वे विश्वरूप की स्तुति कर रहे हैं। इस प्रकार अर्जुन का सम्बन्ध मैत्री के स्थान पर विस्मय का सम्बन्ध बन जाता है। महान् भक्त श्रीकृष्ण को समस्त सम्बन्धों का आगार मानते हैं। शास्त्रों में बारह मूल प्रकार के सम्बन्धों का उल्लेख है, और वे सभी श्रीकृष्ण में विद्यमान हैं। कहा जाता है कि वे दो जीवों के बीच, देवताओं के बीच, अथवा परमेश्वर तथा उनके भक्तों के बीच आदान-प्रदान किए जाने वाले समस्त सम्बन्धों के सागर हैं।
कहा जाता है कि अर्जुन विस्मय के सम्बन्ध से प्रेरित हुए, और उस विस्मय में, यद्यपि वे स्वभाव से अत्यन्त धीर, शान्त तथा गम्भीर थे, फिर भी भावविभोर हो उठे, उनके रोम खड़े हो गए, और वे हाथ जोड़कर परमेश्वर को प्रणाम करने लगे। निस्सन्देह वे भयभीत नहीं थे। वे परमेश्वर के आश्चर्यों से प्रभावित थे। तात्कालिक प्रसंग विस्मय का है; उनकी स्वाभाविक प्रेममयी मैत्री विस्मय से अभिभूत हो गई, और अतः उन्होंने इस प्रकार प्रतिक्रिया की।
Bg 11.15
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; पश्यामि—मैं देखता हूँ; देवान्—समस्त देवताओं को; तव—आपके; देव—हे भगवन्; देहे—शरीर में; सर्वान्—समस्त; तथा—भी; भूत—जीव; विशेष-सङ्घान्—विशेष रूप से एकत्रित; ब्रह्माणम्—ब्रह्मा को; ईशम्—शिव को; कमल-आसन-स्थम्—कमल-पुष्प पर विराजमान; ऋषीन्—महान् ऋषियों को; च—भी; सर्वान्—समस्त; उरगान्—सर्पों को; च—भी; दिव्यान्—दिव्य।
अर्जुन ने कहा : हे प्रिय भगवान् श्रीकृष्ण, मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं तथा विविध अन्य जीवों को एकत्रित देख रहा हूँ। मैं कमल-पुष्प पर विराजमान ब्रह्मा को, तथा भगवान् शिव को, और अनेक ऋषियों तथा दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ।
अर्जुन ब्रह्माण्ड में सब कुछ देखते हैं; अतः वे ब्रह्मा को देखते हैं, जो ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव हैं, तथा उस दिव्य सर्प को भी, जिस पर ब्रह्माण्ड के अधोभाग में गर्भोदकशायी विष्णु शयन करते हैं। इस सर्प-शय्या को वासुकि कहा जाता है। वासुकि नाम के अन्य सर्प भी हैं। अर्जुन गर्भोदकशायी विष्णु से लेकर ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च भाग में स्थित उस कमल-पुष्प लोक तक देख सकते हैं, जहाँ ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव ब्रह्मा निवास करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आदि से अन्त तक सब कुछ अर्जुन एक ही स्थान पर अपने रथ पर बैठकर देख सके। यह परमेश्वर श्रीकृष्ण की कृपा से ही सम्भव हुआ।
Bg 11.16
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥
अनेक—अनेक; बाहू—भुजाएँ; उदर—उदर; वक्त्र—मुख; नेत्रम्—नेत्र; पश्यामि—मैं देखता हूँ; त्वाम्—आपको; सर्वतः—सब ओर से; अनन्त-रूपम्—असीम रूप; न अन्तम्—कोई अन्त नहीं है; न मध्यम्—कोई मध्य नहीं है; न पुनः—न ही फिर; तव—आपका; आदिम्—आदि; पश्यामि—मैं देखता हूँ; विश्वेश्वर—हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; विश्व-रूप—ब्रह्माण्ड के रूप में।
हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, मैं आपके विश्व-शरीर में अनेक-अनेक रूपों—उदरों, मुखों, नेत्रों—को असीम रूप से विस्तृत देख रहा हूँ। इस सबका न कोई अन्त है, न कोई आदि है, और न ही कोई मध्य है।
श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और असीम हैं; अतः उनके माध्यम से सब कुछ देखा जा सकता है।
Bg 11.17
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥
किरीटिनम्—मुकुटों सहित; गदिनम्—गदाओं सहित; चक्रिणम्—चक्रों सहित; च—और; तेजोराशिम्—तेजःपुञ्ज; सर्वतः—सब ओर; दीप्तिमन्तम्—देदीप्यमान; पश्यामि—मैं देखता हूँ; त्वाम्—आपको; दुर्निरीक्ष्यम्—देखने में कठिन; समन्तात्—सर्वत्र फैला हुआ; दीप्त-अनल—प्रज्वलित अग्नि; अर्क—सूर्य; द्युतिम्—प्रकाश; अप्रमेयम्—अपरिमेय।
विविध मुकुटों, गदाओं तथा चक्रों से सुशोभित आपका रूप अपने प्रचण्ड तेज के कारण देखने में कठिन है, जो प्रज्वलित अग्नि तथा सूर्य के समान अपरिमेय है।
Bg 11.18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥
tvam—आप; akṣaram—अविनाशी; paramam—परम; veditavyam—जानने योग्य; tvam—आप; asya—इस; viśvasya—विश्व के; param—परम; nidhānam—आधार; tvam—आप ही हैं; avyayaḥ—अविनाशी; śāśvata-dharma-goptā—सनातन धर्म के रक्षक; sanātanaḥ—सनातन; tvam—आप; puruṣaḥ—परम पुरुष; mataḥ me—यही मेरा मत है।
आप ही परम आदि लक्ष्य हैं; आप ही समस्त विश्वों में श्रेष्ठ हैं; आप अविनाशी हैं और आप ही सर्वप्राचीन हैं; आप ही धर्म के रक्षक तथा सनातन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
Bg 11.19
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥
anādi—आदि रहित; madhya—मध्य रहित; antam—अन्त रहित; ananta—असीम; vīryam—महिमामय; ananta—असीम; bāhum—भुजाएँ; śaśi—चन्द्रमा; sūrya—सूर्य; netram—नेत्र; paśyāmi—मैं देखता हूँ; tvām—आपको; dīpta—प्रज्वलित; hutāśa-vaktram—आपके मुख से निकलती अग्नि; sva-tejasā—अपने तेज से; viśvam—इस विश्व को; idam—इस; tapantam—तपाते हुए।
आप ही आदि, मध्य तथा अन्त से रहित उद्गम हैं। आपकी असंख्य भुजाएँ हैं, और सूर्य तथा चन्द्रमा आपके महान् असीम नेत्रों में सम्मिलित हैं। अपने तेज से आप इस समस्त विश्व को तपा रहे हैं।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के छह ऐश्वर्यों की विस्तृति की कोई सीमा नहीं है। यहाँ तथा अन्य अनेक स्थलों पर पुनरावृत्ति है, किन्तु शास्त्रों के अनुसार श्रीकृष्ण की महिमा की पुनरावृत्ति कोई साहित्यिक दुर्बलता नहीं है। कहा जाता है कि विमोह, विस्मय अथवा महान् भावावेश के समय कथन बारम्बार दोहराए जाते हैं। यह कोई दोष नहीं है।
Bg 11.2
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
भव—प्राकट्य; अप्ययौ—अप्राकट्य; हि—निश्चय ही; भूतानाम्—समस्त जीवों के; श्रुतौ—सुने गए हैं; विस्तरशः—विस्तारपूर्वक; मया—मेरे द्वारा; त्वत्तः—आपसे; कमल-पत्राक्ष—हे कमलनयन; माहात्म्यम्—महिमा; अपि—भी; च—और; अव्ययम्—अक्षय।
हे कमलनयन, मैंने आपसे प्रत्येक जीव के प्राकट्य तथा अप्राकट्य के विषय में विस्तारपूर्वक सुना है, जिसका अनुभव मुझे आपकी अक्षय महिमा के द्वारा हुआ है।
अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को अपने हर्ष के कारण “कमलनयन” कहकर सम्बोधित करते हैं (श्रीकृष्ण के नेत्र ठीक कमल-पुष्प की पंखुड़ियों के समान प्रतीत होते हैं), क्योंकि पिछले अध्याय के अन्तिम श्लोक में श्रीकृष्ण ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे अपने एक अंशमात्र से समस्त ब्रह्माण्ड को धारण किए हुए हैं। इस भौतिक प्रकटीकरण में जो कुछ है, उसके वे उद्गम हैं, और अर्जुन ने यह बात भगवान् से विस्तारपूर्वक सुनी है। अर्जुन यह भी जानते हैं कि समस्त प्राकट्य तथा अप्राकट्य के उद्गम होते हुए भी वे उनसे पृथक् रहते हैं। यद्यपि वे सर्वव्यापी हैं, तथापि उनका व्यक्तित्व लुप्त नहीं होता। यही श्रीकृष्ण का अचिन्त्य ऐश्वर्य है, जिसे भली-भाँति समझ लेने की बात अर्जुन स्वीकार करते हैं।
Bg 11.20
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
dyau—अन्तरिक्ष में; āpṛthivyoḥ—पृथ्वी का; idam—यह; antaram—मध्य में; hi—निश्चय ही; vyāptam—व्याप्त; tvayā—आपके द्वारा; ekena—एक के द्वारा; diśaḥ—दिशाएँ; ca—तथा; sarvāḥ—समस्त; dṛṣṭvā—देखकर; adbhutam—अद्भुत; rūpam—रूप; ugram—भयानक; tava—आपका; idam—यह; loka—लोक; trayam—तीन; pravyathitam—विचलित; mahātman—हे महान्।
यद्यपि आप एक हैं, तथापि आप समस्त आकाश, समस्त लोकों तथा उनके मध्य के समूचे अवकाश में व्याप्त हैं। हे महान्, आपके इस भयानक रूप को देखकर मैं देखता हूँ कि समस्त लोक विचलित हो रहे हैं।
इस श्लोक में dyāv āpṛthivyoḥ (स्वर्ग तथा पृथ्वी के मध्य का अवकाश) तथा loka-trayam (तीनों लोक) महत्त्वपूर्ण शब्द हैं, क्योंकि इससे प्रतीत होता है कि भगवान् के इस विश्वरूप को केवल अर्जुन ने ही नहीं देखा, अपितु अन्य लोकों के अन्य प्राणियों ने भी इसे देखा। यह दर्शन कोई स्वप्न नहीं था। दिव्य दृष्टि से युक्त जो भी आध्यात्मिक रूप से जाग्रत थे, उन सबने इसे देखा।
Bg 11.21
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
amī—वे सब; hi—निश्चय ही; tvām—आपमें; sura-saṅghāḥ—देवताओं के समूह; viśanti—प्रवेश कर रहे हैं; kecit—उनमें से कुछ; bhītāḥ—भयवश; prāñjalayaḥ—हाथ जोड़े हुए; gṛṇanti—प्रार्थना करते हुए; svasti—सर्वमंगल; iti—इस प्रकार; uktvā—ऐसा कहते हुए; maharṣi—महर्षि; siddha-saṅghāḥ—सिद्ध ऋषिगण; stuvanti—स्तुति-गान करते हुए; tvām—आपकी; stutibhiḥ—प्रार्थनाओं से; puṣkalābhiḥ—वैदिक स्तोत्रों से।
समस्त देवता आपकी शरण ले रहे हैं तथा आपमें प्रवेश कर रहे हैं। वे अत्यन्त भयभीत हैं, और हाथ जोड़े हुए वैदिक स्तोत्रों का गान कर रहे हैं।
समस्त लोकों के देवता विश्वरूप के इस भयंकर प्राकट्य तथा उसके देदीप्यमान तेज से भयभीत हो उठे, अतः उन्होंने रक्षा हेतु प्रार्थना की।
Bg 11.22
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
rudra—भगवान् शिव के प्राकट्य; ādityāḥ—आदित्यगण; vasavaḥ—वसुगण; ye—वे सब; ca—तथा; sādhyāḥ—साध्यगण; viśve—विश्वदेवगण; aśvinau—अश्विनीकुमार; marutaḥ—मरुद्गण; ca—तथा; uṣmapāḥ—पितृगण; ca—तथा; gandharva—गन्धर्वगण; yakṣa—यक्षगण; asura-siddha—असुर तथा सिद्ध देवगण; saṅghāḥ—समूह; vīkṣante—देख रहे हैं; tvām—आपको; vismitāḥ—विस्मयपूर्वक; ca—भी; eva—निश्चय ही; sarve—सब।
भगवान् शिव के विविध प्राकट्य, आदित्यगण, वसुगण, साध्यगण, विश्वदेवगण, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण, पितृगण तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर एवं समस्त सिद्ध देवगण आपको विस्मयपूर्वक निहार रहे हैं।
Bg 11.23
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥
rūpam—रूप; mahat—अति विशाल; te—आपका; bahu—अनेक; vaktra—मुख; netram—नेत्र; mahā-bāho—हे महाबाहो; bahu—अनेक; bāhu—भुजाएँ; ūru—जंघाएँ; pādam—पैर; bahu-udaram—अनेक उदर; bahu-daṁṣṭrā—अनेक दाँत; karālam—विकराल; dṛṣṭvā—देखकर; lokāḥ—समस्त लोक; pravyathitāḥ—विचलित; tathā—उसी प्रकार; aham—मैं।
हे महाबाहो, समस्त लोक अपने देवताओं सहित आपके अनेक मुखों, नेत्रों, भुजाओं, उदरों तथा पैरों एवं आपके विकराल दाँतों को देखकर विचलित हैं, और जैसे वे विचलित हैं, वैसे ही मैं भी हूँ।
Bg 11.24
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥
daṁṣṭrā—दाँत; karālāni—उस प्रकार; ca—भी; te—आपके; mukhāni—मुख; dṛṣṭvā—देखकर; eva—इस प्रकार; kālānala—मृत्यु की अग्नि; sannibhāni—मानो प्रज्वलित; diśaḥ—दिशाएँ; na jāne—नहीं जानता; na labhe—न ही पाता; ca śarma—तथा कृपा; prasīda—प्रसन्न हों; deveśa—हे समस्त ईश्वरों के ईश्वर; jagat-nivāsa—लोकों के आश्रय।
हे ईश्वरों के ईश्वर, हे लोकों के आश्रय, मुझ पर कृपालु हों। आपके इन प्रज्वलित मृत्यु-सदृश मुखों तथा भयानक दाँतों को इस प्रकार देखकर मैं अपना सन्तुलन नहीं रख पा रहा। समस्त दिशाओं में मैं विमोहित हूँ।
Bg 11.25
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥२५॥
daṁṣṭrā—दाँत; karālāni—उस प्रकार; ca—भी; te—आपके; mukhāni—मुख; dṛṣṭvā—देखकर; eva—इस प्रकार; kālānala—मृत्यु की अग्नि; sannibhāni—मानो प्रज्वलित; diśaḥ—दिशाएँ; na jāne—नहीं जानता; na labhe—न ही पाता; ca śarma—तथा कृपा; prasīda—प्रसन्न हों; deveśa—हे समस्त ईश्वरों के ईश्वर; jagat-nivāsa—लोकों के आश्रय।
हे ईश्वरों के ईश्वर, हे लोकों के आश्रय, मुझ पर कृपालु हों। आपके इन प्रज्वलित मृत्यु-सदृश मुखों तथा भयानक दाँतों को इस प्रकार देखकर मैं अपना सन्तुलन नहीं रख पा रहा। समस्त दिशाओं में मैं विमोहित हूँ।
Bg 11.26-27
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥
amī—वे सब; ca—भी; tvām—आपमें; dhṛtarāṣṭasya—धृतराष्ट्र के; putrāḥ—पुत्र; sarva—समस्त; saha eva—सहित; avanipāla—योद्धा राजा; saṅghaiḥ—समूहों के साथ; bhīṣmaḥ—भीष्मदेव; droṇaḥ—द्रोणाचार्य; sūta-putraḥ—कर्ण; tathā—भी; asau—वह; saha—साथ; asmadīyaiḥ—हमारे; api—भी; yodha-mukhyaiḥ—योद्धाओं में प्रमुख; vaktrāṇi—मुखों में; te—आपके; tvaramāṇāḥ—वेग से; viśanti—प्रवेश कर रहे हैं; daṁṣṭrā—दाँत; karālāni—विकराल; bhayānakāni—अत्यन्त भयानक; kecit—उनमें से कुछ; vilagnāḥ—फँसे हुए; daśanāntareṣu—दाँतों के बीच; sandṛśyante—दिखाई दे रहे हैं; cūrṇitaiḥ—चूर्ण हुए; uttama-aṅgaiḥ—सिरों सहित।
धृतराष्ट्र के समस्त पुत्र अपने सहयोगी राजाओं सहित, तथा भीष्म, द्रोण और कर्ण एवं हमारे समस्त सैनिक आपके मुखों में वेग से प्रवेश कर रहे हैं, और उनके सिर आपके भयानक दाँतों से चूर्ण हो रहे हैं। मैं देख रहा हूँ कि कुछ आपके दाँतों के बीच भी पिस रहे हैं।
किसी पूर्व श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को वे वस्तुएँ दिखाने का वचन दिया था जिन्हें देखने में वह अत्यन्त रुचि रखता था। अब अर्जुन देखता है कि विपक्षी दल के नायक (भीष्म, द्रोण, कर्ण तथा धृतराष्ट्र के समस्त पुत्र) तथा उनके सैनिक एवं अर्जुन के अपने सैनिक — सभी का संहार हो रहा है। यह इस बात का संकेत है कि दोनों पक्षों की भारी क्षति के उपरान्त भी अर्जुन युद्ध में विजयी होगा। यहाँ यह भी उल्लिखित है कि भीष्म, जिन्हें अजेय माना जाता है, वे भी चूर्ण किए जाएँगे। इसी प्रकार कर्ण भी। विपक्षी दल के भीष्म जैसे महान् योद्धा तो चूर्ण होंगे ही, अपितु अर्जुन के पक्ष के कुछ महान् योद्धा भी।
Bg 11.28
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥
yathā—जैसे; nadīnām—नदियों की; bahavaḥ—अनेक; ambu-vegāḥ—जल की तरंगें; samudram—समुद्र; eva—निश्चय ही; abhimukhāḥ—की ओर; dravanti—बहती हैं; tathā—उसी प्रकार; tava—आपके; amī—वे सब; nara-loka-vīrāḥ—मानव समाज के राजा; viśanti—प्रवेश कर रहे हैं; vaktrāṇi—मुखों में; abhivijvalanti—प्रज्वलित।
जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में जा मिलती हैं, उसी प्रकार ये समस्त महान् योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर विनष्ट हो रहे हैं।
Bg 11.29
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥
yathā—जैसे; pradīptam—प्रज्वलित; jvalanam—अग्नि; pataṅgāḥ—पतंगे; viśanti—प्रवेश करते हैं; nāśāya—विनाश हेतु; samṛddha—पूर्ण; vegāḥ—वेग; tathā eva—उसी प्रकार; nāśāya—विनाश हेतु; viśanti—प्रवेश कर रहे; lokāḥ—समस्त लोग; tava—आपमें; api—भी; vaktrāṇi—मुखों में; samṛddha-vegāḥ—पूर्ण वेग से।
मैं देख रहा हूँ कि समस्त लोग पूर्ण वेग से आपके मुखों में उसी प्रकार दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं, जैसे पतंगे प्रज्वलित अग्नि में जा गिरते हैं।
Bg 11.3
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
एवम्—वह; एतत्—यह; यथात्थ—जैसा है; त्वम्—आप; आत्मानम्—आत्मा को; परमेश्वर—हे परमेश्वर; द्रष्टुम्—देखने के लिए; इच्छामि—मैं चाहता हूँ; ते—आपके; रूपम्—रूप को; ऐश्वरम्—दिव्य; पुरुषोत्तम—हे श्रेष्ठ पुरुष।
हे समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ, हे परम रूप, यद्यपि मैं आपकी वास्तविक स्थिति यहाँ अपने समक्ष देख रहा हूँ, तथापि मैं यह देखना चाहता हूँ कि आप इस विश्व-प्रकटीकरण में किस प्रकार प्रविष्ट हुए हैं। मैं आपके उस रूप का दर्शन करना चाहता हूँ।
भगवान् ने कहा था कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व के द्वारा भौतिक ब्रह्माण्ड में प्रवेश किया, जिससे विश्व-प्रकटीकरण सम्भव हुआ और चल रहा है। अब, जहाँ तक अर्जुन का सम्बन्ध है, वे श्रीकृष्ण के कथनों से प्रेरित हैं; किन्तु भविष्य में जो लोग यह सोच सकते हैं कि श्रीकृष्ण एक साधारण पुरुष हैं, उन्हें विश्वास दिलाने के लिए वे श्रीकृष्ण को साक्षात् उनके विश्वरूप में देखना चाहते हैं, ताकि वे यह देख सकें कि वे ब्रह्माण्ड से पृथक् रहते हुए भी उसके भीतर किस प्रकार क्रियाशील हैं। अर्जुन का भगवान् से अनुमति माँगना भी सार्थक है। चूँकि भगवान् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, वे स्वयं अर्जुन के भीतर विद्यमान हैं; अतः वे अर्जुन की इच्छा को जानते हैं और समझ सकते हैं कि अर्जुन को उन्हें विश्वरूप में देखने की कोई विशेष अभिलाषा नहीं है, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के अपने व्यक्तिगत रूप में उन्हें देखकर पूर्णतया सन्तुष्ट हैं। किन्तु वे यह भी समझ सकते हैं कि अर्जुन अन्य लोगों को विश्वास दिलाने के लिए विश्वरूप देखना चाहते हैं। अर्जुन को स्वयं पुष्टि की कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं थी। श्रीकृष्ण यह भी समझते हैं कि अर्जुन एक मानदण्ड स्थापित करने हेतु विश्वरूप देखना चाहते हैं, क्योंकि भविष्य में ऐसे अनेक ठग होंगे जो स्वयं को ईश्वर के अवतार के रूप में प्रस्तुत करेंगे। अतः लोगों को सावधान रहना चाहिए; जो कोई स्वयं को श्रीकृष्ण होने का दावा करे, उसे लोगों के समक्ष अपने दावे की पुष्टि हेतु अपना विश्वरूप दिखलाने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
Bg 11.30
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैज्र्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥
lelihyase—चाटते हुए; grasamānaḥ—निगलते हुए; samantāt—समस्त दिशाओं से; lokān—लोगों को; samagrān—पूर्णतः; vadanaiḥ—मुखों द्वारा; jvaladbhiḥ—प्रज्वलित; tejobhiḥ—तेज से; āpūrya—आच्छादित करते हुए; jagat—विश्व को; samagram—समस्त; bhāsaḥ—प्रकाशित करते हुए; tava—आपका; ugrāḥ—भयंकर; pratapanti—झुलसाते हुए; viṣṇo—हे सर्वव्यापी प्रभु।
हे विष्णु, मैं देख रहा हूँ कि आप समस्त लोगों को अपने ज्वलित मुखों में निगल रहे हैं और अपनी अपरिमेय किरणों से विश्व को आच्छादित कर रहे हैं। लोकों को झुलसाते हुए आप प्रकट हैं।
Bg 11.31
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥
ākhyāhi—कृपया बताएँ; me—मुझे; kaḥ—कौन; bhavān—आप; ugra-rūpaḥ—भयंकर रूप; namaḥ astu—नमस्कार; te—आपको; deva-vara—देवताओं में श्रेष्ठ; prasīda—कृपालु हों; vijñātum—जानने हेतु; icchāmi—मैं चाहता हूँ; bhavantam—आपको; ādyam—आदि; na—कभी नहीं; hi—निश्चय ही; prajānāmi—जानता हूँ; tava—आपका; pravṛttim—प्रयोजन।
हे ईश्वरों के ईश्वर, इतने भयंकर रूप वाले, कृपया मुझे बताएँ कि आप कौन हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ; मुझ पर कृपालु हों। मैं नहीं जानता कि आपका प्रयोजन क्या है, और मैं उसे सुनने की इच्छा रखता हूँ।
Bg 11.32
श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥
śrī bhagavān uvāca—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; kālaḥ—काल; asmi—मैं हूँ; loka—लोकों का; kṣaya-kṛt—संहारक; pravṛddhaḥ—संलग्न होने हेतु; lokān—समस्त लोगों को; samāhartum—संहार करने; iha—इस लोक में; pravṛttaḥ—संलग्न होने हेतु; ṛte api—बिना भी; tvām—तुम्हें; na—कभी नहीं; bhaviṣyanti—होंगे; sarve—सब; ye—जो; avasthitāḥ—स्थित; pratyanīkeṣu—विपक्ष में; yodhāḥ—सैनिक।
श्रीभगवान् ने कहा: मैं काल हूँ, लोकों का संहारक, और मैं समस्त लोगों को अपने में लीन करने आया हूँ। तुम्हारे [पाण्डवों के] अतिरिक्त, यहाँ दोनों ओर के समस्त सैनिक मारे जाएँगे।
यद्यपि अर्जुन जानता था कि श्रीकृष्ण उसके मित्र तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, तथापि श्रीकृष्ण द्वारा प्रदर्शित विविध रूपों से वह विमोहित था। अतः उसने इस विनाशकारी शक्ति के वास्तविक प्रयोजन के विषय में और पूछा। वेदों में लिखा है कि परम सत्य सब कुछ का, यहाँ तक कि ब्रह्मा का भी संहार कर देता है। yasya brahme ca kṣatram ca ubhe bhavata odanaḥ/mṛtyur yasyopasecanaṁ ka itthā veda yatra saḥ। अन्ततः समस्त ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा अन्य सभी परमेश्वर द्वारा निगल लिए जाते हैं। परमेश्वर का यह रूप सर्वभक्षी विराट् है, और यहाँ श्रीकृष्ण स्वयं को सर्वभक्षी काल के उसी रूप में प्रस्तुत करते हैं। कुछ पाण्डवों को छोड़कर, उस युद्धभूमि में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति उनके द्वारा निगल लिया जाता।
अर्जुन युद्ध के पक्ष में नहीं था, और उसे लगा कि युद्ध न करना ही श्रेयस्कर है; तब कोई निराशा नहीं होगी। इसके उत्तर में भगवान् कहते हैं कि यदि वह युद्ध न भी करे, तो भी उनमें से प्रत्येक का विनाश हो जाएगा, क्योंकि यही उनकी योजना है। यदि वह युद्ध करना छोड़ दे, तो भी वे किसी अन्य प्रकार से मर जाएँगे। मृत्यु को रोका नहीं जा सकता, चाहे वह युद्ध न भी करे। वस्तुतः वे पहले से ही मर चुके थे। काल विनाश है, और समस्त प्राकट्यों को परमेश्वर की इच्छा से नष्ट होना है। यही प्रकृति का नियम है।
Bg 11.33
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥
tasmāt—अतः; tvām—तुम; uttiṣṭha—उठो; yaśaḥ—यश; labhasva—प्राप्त करो; jitvā—जीतकर; śatrūn—शत्रुओं को; bhuṅkṣva—भोग करो; rājyam—राज्य; samṛddham—समृद्ध; mayā—मेरे द्वारा; eva—निश्चय ही; ete—ये सब; nihatāḥ—पहले से मारे गए; pūrvam eva—पूर्व व्यवस्था से ही; nimitta-mātram—केवल निमित्त बनो; bhava—बनो; savyasācin—हे सव्यसाची।
अतः उठो और युद्ध हेतु तत्पर हो जाओ। अपने शत्रुओं को जीतकर तुम समृद्ध राज्य का भोग करोगे। ये मेरी व्यवस्था से पहले ही मारे जा चुके हैं, और हे सव्यसाची, तुम इस युद्ध में केवल निमित्त बन सकते हो।
सव्यसाची उसे कहते हैं जो युद्धभूमि में अत्यन्त निपुणता से बाण चला सके; इस प्रकार अर्जुन को एक ऐसे कुशल योद्धा के रूप में सम्बोधित किया गया है जो अपने शत्रुओं का वध करने हेतु बाण चलाने में समर्थ है। “केवल निमित्त बनो”: nimitta-mātram। यह शब्द भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। समूचा संसार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की योजना के अनुसार गतिमान है। पर्याप्त ज्ञान से रहित मूर्ख व्यक्ति यह सोचते हैं कि प्रकृति बिना किसी योजना के चल रही है और समस्त प्राकट्य मात्र आकस्मिक रचनाएँ हैं। ऐसे अनेक तथाकथित वैज्ञानिक हैं जो सुझाते हैं कि सम्भवतः यह ऐसा था, अथवा शायद वैसा था, किन्तु “सम्भवतः” तथा “शायद” का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस भौतिक जगत् में एक विशिष्ट योजना क्रियान्वित हो रही है। यह योजना क्या है? यह विश्व-प्रकटीकरण बद्धजीवों के लिए भगवद्धाम लौटने, अपने घर लौटने का एक अवसर है। जब तक उनमें वह प्रभुत्व की मनोवृत्ति रहती है जो उन्हें भौतिक प्रकृति पर शासन करने का प्रयास कराती है, तब तक वे बद्ध रहते हैं। किन्तु जो कोई परमेश्वर की योजना को समझ सके तथा कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करे, वह सर्वाधिक बुद्धिमान् है। विश्व-प्रकटीकरण की सृष्टि तथा संहार ईश्वर के परम मार्गदर्शन में होते हैं। इस प्रकार कुरुक्षेत्र का युद्ध ईश्वर की योजना के अनुसार लड़ा गया। अर्जुन युद्ध करने से इनकार कर रहा था, किन्तु उससे कहा गया कि उसे युद्ध करना चाहिए और साथ ही परमेश्वर की इच्छा करनी चाहिए। तब वह सुखी होगा। यदि कोई पूर्ण कृष्णभावनामृत में हो और यदि उसका जीवन उनकी दिव्य सेवा को समर्पित हो, तो वह पूर्ण है।
Bg 11.34
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥
droṇam ca—द्रोण को भी; bhīṣmam ca—भीष्म को भी; jayadratham ca—जयद्रथ को भी; karṇam—कर्ण को भी; tathā—भी; anyān—अन्य; api—निश्चय ही; yodha-vīrān—महान् योद्धा; mayā—मेरे द्वारा; hatān—पहले से मारे गए; tvam—तुम; jahi—विजयी बनो; mā—कभी नहीं; vyathiṣṭhāḥ—विचलित हो; yudhyasva—केवल युद्ध करो; jetāsi—जीत लोगे; raṇe—युद्ध में; sapatnān—शत्रुओं को।
श्रीभगवान् ने कहा: समस्त महान् योद्धा — द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण — पहले से ही विनष्ट हो चुके हैं। केवल युद्ध करो, और तुम अपने शत्रुओं को परास्त कर दोगे।
प्रत्येक योजना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा रची जाती है, किन्तु वे अपने भक्तों पर इतने दयालु तथा कृपालु हैं कि उस श्रेय को अपने उन भक्तों को देना चाहते हैं जो उनकी इच्छा के अनुसार उनकी योजना को सम्पन्न करते हैं। अतः जीवन ऐसे चलना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करे और आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझे। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की योजनाएँ उनकी कृपा से समझी जाती हैं, और भक्तों की योजनाएँ उनकी योजनाओं के समान ही उत्तम होती हैं। मनुष्य को ऐसी योजनाओं का अनुसरण करना चाहिए और अस्तित्व के संघर्ष में विजयी होना चाहिए।
Bg 11.35
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥
sañjayaḥ uvāca—सञ्जय ने कहा; etat—इस प्रकार; śrutvā—सुनकर; vacanam—वचन; keśavasya—श्रीकृष्ण के; kṛtāñjaliḥ—हाथ जोड़े हुए; vepamānaḥ—काँपते हुए; kirītī—अर्जुन; namaskṛtvā—नमस्कार करते हुए; bhūyaḥ—पुनः; eva—भी; āha kṛṣṇam—श्रीकृष्ण से कहा; sa-gadgadam—गद्गद स्वर में; bhīta-bhītaḥ—भयभीत; praṇamya—प्रणाम करते हुए।
सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा: हे राजन्, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के ये वचन सुनकर अर्जुन काँप उठा, और भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए प्रणाम करके वह गद्गद स्वर में इस प्रकार कहने लगा:
जैसा कि हम पहले ही समझा चुके हैं, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विश्वरूप द्वारा उत्पन्न स्थिति के कारण अर्जुन विस्मय से विमोहित हो गया; अतः वह बारम्बार श्रीकृष्ण को सादर प्रणाम करने लगा, और गद्गद स्वर में वह प्रार्थना करने लगा — मित्र के रूप में नहीं, अपितु विस्मय में निमग्न भक्त के रूप में।
Bg 11.36
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६ ॥
arjunaḥ uvāca—अर्जुन ने कहा; sthāne—उचित ही; hṛṣīkeśa—हे समस्त इन्द्रियों के स्वामी; tava—आपकी; prakīrtya—महिमा से; jagat—समस्त संसार; prahṛṣyati—हर्षित हो रहा; anurajyate—अनुरक्त हो रहा; rakṣāṁsi—असुरगण; bhītāni—भयवश; diśaḥ—दिशाओं में; dravanti—भाग रहे; sarve—सब; namasyanti—नमस्कार करते हुए; ca—भी; siddha-saṅghāḥ—सिद्ध मनुष्यगण।
हे हृषीकेश, आपका नाम सुनकर संसार हर्षित हो उठता है, और इस प्रकार सब आपके प्रति अनुरक्त हो जाते हैं। यद्यपि सिद्ध प्राणी आपको सादर नमस्कार अर्पित करते हैं, तथापि असुर भयभीत हैं और वे इधर-उधर भाग रहे हैं। यह सब उचित ही है।
कुरुक्षेत्र के युद्ध के परिणाम के विषय में श्रीकृष्ण से सुनकर अर्जुन परमेश्वर का एक प्रबुद्ध भक्त बन गया। उसने स्वीकार किया कि श्रीकृष्ण द्वारा किया गया सब कुछ पूर्णतः उचित है। अर्जुन ने इस तथ्य की पुष्टि की कि श्रीकृष्ण भक्तों के पालक तथा उपासना के लक्ष्य हैं, एवं अवांछितों के संहारक हैं। उनके कर्म सभी के लिए समान रूप से कल्याणकारी हैं। यहाँ अर्जुन ने समझा कि जब कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्ति की ओर था, तब अन्तरिक्ष में अनेक देवता, सिद्ध तथा उच्च लोकों के बुद्धिमान् प्राणी उपस्थित थे, और वे युद्ध का अवलोकन कर रहे थे, क्योंकि श्रीकृष्ण वहाँ उपस्थित थे। जब अर्जुन ने भगवान् के विश्वरूप को देखा, तब देवताओं ने उसमें आनन्द लिया, किन्तु अन्य लोग, जो असुर तथा नास्तिक थे, भगवान् की स्तुति होने पर उसे सहन न कर सके। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विनाशकारी रूप के प्रति अपने स्वाभाविक भय के कारण वे भाग गए। भक्तों तथा नास्तिकों के प्रति श्रीकृष्ण के व्यवहार की अर्जुन प्रशंसा करता है। समस्त परिस्थितियों में भक्त भगवान् की महिमा का गान करता है, क्योंकि वह जानता है कि वे जो भी करते हैं वह सभी के लिए कल्याणकारी है।
Bg 11.37
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
kasmāt—क्यों; ca—भी; te—आपको; na—नहीं; nameran—समुचित नमस्कार करें; mahātman—हे महान्; garīyase—आप श्रेष्ठतर हैं; brahmaṇaḥ—ब्रह्मा से; api—यद्यपि; ādi-kartre—परम स्रष्टा; ananta—असीम; deveśa—देवताओं के देव; jagat-nivāsa—हे विश्व के आश्रय; tvam—आप हैं; akṣaram—अविनाशी; sat-asat—कारण और कार्य; tat-param—दिव्य; yat—क्योंकि।
हे महान्, जो ब्रह्मा से भी ऊपर विराजमान हैं, आप ही आदि स्वामी हैं। हे असीम, फिर वे आपको नमन क्यों न करें? हे विश्व के आश्रय, आप ही अजेय स्रोत हैं, समस्त कारणों के कारण हैं, तथा इस भौतिक प्रकटीकरण से परे दिव्य हैं।
इस नमस्कार-अर्पण के द्वारा अर्जुन यह संकेत करते हैं कि श्रीकृष्ण सभी के द्वारा आराध्य हैं। वे सर्वव्यापी हैं तथा प्रत्येक आत्मा की आत्मा हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण को महात्मा कहकर सम्बोधित करते हैं, जिसका अर्थ है कि वे परम उदार तथा असीम हैं। अनन्त यह सूचित करता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के प्रभाव तथा ऊर्जा से आच्छादित न हो, और देवेश का अर्थ है कि वे समस्त देवताओं के नियन्ता हैं तथा उन सबसे ऊपर हैं। वे सम्पूर्ण विश्व के केन्द्र हैं। अर्जुन ने यह भी सोचा कि यह उचित ही है कि समस्त सिद्ध जीव तथा सभी शक्तिशाली देवता उन्हें अपना सादर नमस्कार अर्पित करें, क्योंकि उनसे बढ़कर कोई नहीं है। वे विशेष रूप से उल्लेख करते हैं कि श्रीकृष्ण ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि ब्रह्मा की रचना उन्हीं के द्वारा हुई है। ब्रह्मा गर्भोदकशायी विष्णु के नाभि-उदर से उगे कमल-नाल से जन्म लेते हैं, जो श्रीकृष्ण का पूर्ण विस्तार हैं; अतः ब्रह्मा तथा ब्रह्मा से जन्मे भगवान् शिव और अन्य सभी देवताओं को अपना सादर नमस्कार अर्पित करना चाहिए। इस प्रकार भगवान् को भगवान् शिव, ब्रह्मा तथा इसी प्रकार के अन्य देवता सम्मान देते हैं। अक्षरम् शब्द अत्यन्त सार्थक है, क्योंकि यह भौतिक सृष्टि विनाश के अधीन है, किन्तु भगवान् इस भौतिक सृष्टि से ऊपर हैं। वे समस्त कारणों के कारण हैं, और ऐसा होने से वे इस भौतिक प्रकृति के भीतर समस्त बद्ध आत्माओं से तथा स्वयं भौतिक विश्व-प्रकटीकरण से भी श्रेष्ठ हैं। इसीलिए वे सर्व-महान् परमेश्वर हैं।
Bg 11.38
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥
tvam—आप; ādi-devaḥ—आदि परम भगवान्; puruṣaḥ—पुरुष; purāṇaḥ—पुरातन; tvam—आप; asya—इस; viśvasya—विश्व के; param—दिव्य; nidhānam—आश्रय; vettā—ज्ञाता; asi—आप हैं; vedyam ca—तथा ज्ञेय; param ca—तथा दिव्य; dhāma—आश्रय; tvayā—आपके द्वारा; tatam—व्याप्त; viśvam—विश्व; ananta-rūpa—असीम रूप।
आप ही आदि पुरुष, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। आप ही इस प्रकट विश्व-जगत् के एकमात्र आश्रय हैं। आप सब कुछ जानते हैं, और जो कुछ भी ज्ञेय है वह आप ही हैं। आप भौतिक गुणों से परे हैं। हे असीम रूप! यह समस्त विश्व-प्रकटीकरण आपसे ही व्याप्त है!
समस्त वस्तुएँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् पर ही टिकी हैं; अतः वे ही परम विश्राम-स्थल हैं। निधानम् का अर्थ है कि सब कुछ, यहाँ तक कि ब्रह्म-तेज भी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण पर ही टिका है। इस जगत् में जो कुछ घटित हो रहा है उसके वे ज्ञाता हैं, और यदि ज्ञान का कोई अन्त हो, तो वे ही समस्त ज्ञान के अन्त हैं; इस प्रकार वे ही ज्ञात तथा ज्ञेय हैं। वे ज्ञान के विषय हैं, क्योंकि वे सर्वव्यापी हैं। चूँकि वे आध्यात्मिक जगत् में कारण हैं, अतः वे दिव्य हैं। वे दिव्य जगत् में भी प्रमुख पुरुष हैं।
Bg 11.39
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥
vāyuḥ—वायु; yamaḥ—नियन्ता; agniḥ—अग्नि; varuṇaḥ—जल; śaśāṅkaḥ—चन्द्रमा; prajāpatiḥ—ब्रह्मा; tvam—आप; prapitāmahaḥ—प्रपितामह; ca—भी; namaḥ—नमस्कार अर्पित करते हुए; namaḥ te—पुनः मैं आपको नमस्कार करता हूँ; astu—हो; sahasra-kṛtvaḥ—सहस्र बार; punaḥ ca—तथा पुनः; bhūyaḥ—फिर; api—भी; namaḥ—मैं नमस्कार करता हूँ; namaḥ te—आपको नमस्कार अर्पित करते हुए।
आप ही वायु, अग्नि, जल हैं, और आप ही चन्द्रमा हैं! आप ही परम नियन्ता तथा प्रपितामह हैं। इस प्रकार मैं आपको सहस्र बार, और बारम्बार सादर नमस्कार अर्पित करता हूँ!
यहाँ भगवान् को वायु कहकर सम्बोधित किया गया है, क्योंकि वायु समस्त देवताओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है। अर्जुन श्रीकृष्ण को प्रपितामह कहकर भी सम्बोधित करते हैं, क्योंकि वे विश्व के प्रथम जीव ब्रह्मा के पिता हैं।
Bg 11.4
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
मन्यसे—यदि आप सोचते हैं; यदि—यदि; तत्—वह; शक्यम्—देखने में समर्थ; मया—मेरे द्वारा; द्रष्टुम्—देखने के लिए; इति—इस प्रकार; प्रभो—हे प्रभु; योगेश्वर—समस्त योगशक्ति के स्वामी; ततः—तब; मे—मुझे; त्वम्—आप; दर्शय—दिखलाइए; आत्मानम्—स्वयं को; अव्ययम्—नित्य।
हे मेरे प्रभु, हे समस्त योगशक्ति के स्वामी, यदि आप यह समझते हैं कि मैं आपके विश्वरूप को देखने में समर्थ हूँ, तो कृपया मुझे वह विश्व-स्वरूप दिखलाइए।
कहा जाता है कि भौतिक इन्द्रियों के द्वारा परमेश्वर श्रीकृष्ण को न तो कोई देख सकता है, न सुन सकता है, न समझ सकता है और न ही उनका अनुभव कर सकता है। किन्तु यदि कोई आरम्भ से ही भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहे, तो वह प्राकट्य के द्वारा भगवान् का दर्शन कर सकता है। प्रत्येक जीव केवल एक आध्यात्मिक स्फुलिंग है; अतः परमेश्वर को देख पाना अथवा समझ पाना सम्भव नहीं है। अर्जुन एक भक्त के रूप में अपनी तर्क-शक्ति पर निर्भर नहीं करते; अपितु वे एक जीव के रूप में अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हैं और श्रीकृष्ण की अनुपम स्थिति को मानते हैं। अर्जुन यह समझ सकते थे कि किसी जीव के लिए असीम अनन्त को समझ पाना सम्भव नहीं है। यदि वह अनन्त स्वयं को प्रकट करे, तो उस अनन्त की कृपा से ही उस अनन्त के स्वरूप को समझना सम्भव होता है। यहाँ “योगेश्वर” शब्द भी अत्यन्त सार्थक है, क्योंकि भगवान् के पास अचिन्त्य शक्ति है। यद्यपि वे असीम हैं, तथापि यदि वे चाहें तो अपनी कृपा से स्वयं को प्रकट कर सकते हैं। अतएव अर्जुन श्रीकृष्ण की उस अचिन्त्य कृपा के लिए विनती करते हैं। वे श्रीकृष्ण को आदेश नहीं देते। श्रीकृष्ण किसी के समक्ष स्वयं को प्रकट करने के लिए बाध्य नहीं हैं, जब तक कि वह कृष्णभावनामृत में पूर्णतया शरणागत होकर भक्ति में संलग्न न हो। इस प्रकार जो लोग अपनी मानसिक कल्पना के बल पर निर्भर रहते हैं, उनके लिए श्रीकृष्ण को देख पाना सम्भव नहीं है।
Bg 11.40
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
namaḥ—नमस्कार अर्पित करते हुए; purastāt—सामने से; atha—भी; pṛṣṭhataḥ—पीछे से; te—आपको; namaḥ astu—मैं नमस्कार अर्पित करता हूँ; te—आपको; sarvataḥ—सभी ओर से; eva sarva—क्योंकि आप ही सब कुछ हैं; ananta-vīrya—असीम सामर्थ्य; amita-vikramaḥ—असीम बल; tvam—आप; sarvam—सब कुछ; samāpnoṣi—आच्छादित करते हैं; tataḥ asi—अतः आप हैं; sarvaḥ—सब कुछ।
सामने से, पीछे से तथा सभी ओर से आपको नमस्कार! हे असीम सामर्थ्य वाले, आप ही असीम बल के स्वामी हैं! आप सर्वव्यापी हैं, और इस प्रकार आप ही सब कुछ हैं!
अपने सखा श्रीकृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण भावावेश से अर्जुन सभी ओर से उन्हें अपना नमस्कार अर्पित कर रहे हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि वे ही समस्त शक्तियों तथा समस्त पराक्रम के स्वामी हैं और युद्धभूमि पर एकत्र समस्त महान् योद्धाओं से कहीं श्रेष्ठ हैं। विष्णु पुराण में कहा गया है: यो ऽयं तवागतो देव-समीपं देवता-गणः स त्वम् एव जगत्-स्रष्टा यतः सर्व-गतो भवान्। “जो कोई आपके समक्ष आता है, चाहे वह देवता ही क्यों न हो, हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, वह आपके ही द्वारा रचा गया है।“
Bg 11.41-42
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
sakhā—सखा; iti—इस प्रकार; matvā—सोचकर; prasabham—क्षणिक; yat—जो कुछ; uktam—कहा; he kṛṣṇa—हे कृष्ण; he yādava—हे यादव; he sakhā iti—हे मेरे प्रिय सखा; ajānatā—बिना जाने; mahimānam—महिमा; tava—आपकी; idam—यह; mayā—मेरे द्वारा; pramādāt—मूर्खतावश; praṇayena—प्रेमवश; vā api—अथवा; yat—जो कुछ; ca—भी; avahāsārtham—परिहास के लिए; asatkṛtaḥ—अनादर; asi—किया गया; vihāra—विश्राम में; śayyā—परिहास में; āsana—विश्राम-स्थान में; bhojaneṣu—अथवा साथ भोजन करते समय; ekaḥ—अकेले; athavā—अथवा; api—अन्यों के समक्ष; acyuta—हे अच्युत; tat-samakṣam—आपके प्रतिद्वन्द्वी के रूप में; tat—वह सब; kṣāmaye—क्षमा करें; tvām—आप; aham—मैं; aprameyam—अप्रमेय।
मैंने भूतकाल में आपकी महिमा को बिना जाने आपको “हे कृष्ण,” “हे यादव,” “हे मेरे सखा,” कहकर सम्बोधित किया है। मैंने उन्माद में अथवा प्रेम में जो कुछ किया हो, कृपया उसे क्षमा कर दें। मैंने विश्राम करते समय, अथवा एक ही शय्या पर लेटते समय, या साथ भोजन करते समय—कभी अकेले तथा कभी अनेक सखाओं के समक्ष—आपका अनेक बार अनादर किया है। कृपया मेरे समस्त अपराधों के लिए मुझे क्षमा कर दें।
यद्यपि श्रीकृष्ण अर्जुन के समक्ष अपने विश्वरूप में प्रकट हुए हैं, तथापि अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ अपने सख्य-सम्बन्ध का स्मरण करते हैं और अतः क्षमा माँग रहे हैं तथा उनसे प्रार्थना कर रहे हैं कि वे उन अनेक अनौपचारिक भावभंगिमाओं के लिए, जो सख्य-भाव से उत्पन्न हुईं, उन्हें क्षमा कर दें। वे यह स्वीकार कर रहे हैं कि पहले उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि श्रीकृष्ण ऐसा विश्वरूप धारण कर सकते हैं, यद्यपि उन्होंने अपने अन्तरंग सखा के रूप में इसकी व्याख्या की थी। अर्जुन को यह ज्ञात नहीं था कि उन्होंने श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य को स्वीकार किए बिना, उन्हें “हे मेरे सखा, हे कृष्ण, हे यादव,” इत्यादि कहकर सम्बोधित करते हुए, कितनी बार उनका अनादर किया होगा। किन्तु श्रीकृष्ण इतने दयालु तथा कृपालु हैं कि ऐसे ऐश्वर्य के होते हुए भी उन्होंने अर्जुन के साथ एक सखा की भाँति खेल किया। भक्त तथा भगवान् के बीच दिव्य प्रेम का ऐसा ही आदान-प्रदान होता है। जीव तथा श्रीकृष्ण के बीच का सम्बन्ध नित्य रूप से स्थिर है; जैसा कि अर्जुन के आचरण से हम देख सकते हैं, उसे विस्मृत नहीं किया जा सकता। यद्यपि अर्जुन ने विश्वरूप में ऐश्वर्य देख लिया, तथापि वे श्रीकृष्ण के साथ अपने सख्य-सम्बन्ध को विस्मृत न कर सके।
Bg 11.43
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
pitā—पिता; asi—आप हैं; lokasya—समस्त जगत् के; cara—चर; acarasya—अचर; tvam—आप हैं; asya—इसके; pūjyaḥ—आराध्य; ca—भी; guruḥ—गुरु; garīyān—गौरवशाली; na—कभी नहीं; tvat-samaḥ—आपके समान; asti—है; abhyadhikaḥ—श्रेष्ठतर; kutaḥ—यह कैसे सम्भव है; anyaḥ—अन्य; loka-traye—तीनों लोकों में; api—भी; apratima—अप्रमेय; prabhāva—शक्ति।
आप ही इस सम्पूर्ण विश्व-प्रकटीकरण के पिता हैं, आराध्य प्रमुख हैं, आध्यात्मिक गुरु हैं। आपके समान कोई नहीं है, और न ही कोई आपके साथ एक हो सकता है। तीनों लोकों के भीतर आप अप्रमेय हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण उसी प्रकार आराध्य हैं जिस प्रकार पिता अपने पुत्र के लिए आराध्य होता है। वे आध्यात्मिक गुरु हैं, क्योंकि उन्होंने मूल रूप से ब्रह्मा को वैदिक उपदेश दिया, और इस समय वे अर्जुन को भगवद्गीता का भी उपदेश दे रहे हैं; अतः वे ही आदि आध्यात्मिक गुरु हैं, और इस समय किसी भी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को श्रीकृष्ण से उत्पन्न गुरु-परम्परा की श्रृंखला में वंशज होना चाहिए। श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि हुए बिना कोई भी दिव्य विषय का शिक्षक अथवा आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता।
भगवान् को सभी प्रकार से नमस्कार अर्पित किया जा रहा है। वे अप्रमेय महिमा वाले हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से कोई भी बढ़कर नहीं हो सकता, क्योंकि किसी भी प्रकटीकरण में—आध्यात्मिक हो या भौतिक—कोई भी श्रीकृष्ण के समान अथवा उनसे उच्चतर नहीं है। प्रत्येक उनसे नीचे है। कोई भी उनसे आगे नहीं निकल सकता।
परमेश्वर श्रीकृष्ण की इन्द्रियाँ तथा शरीर साधारण मनुष्य के समान हैं, किन्तु उनके लिए उनकी इन्द्रियों, शरीर, मन तथा स्वयं के बीच कोई भेद नहीं है। जो मूर्ख व्यक्ति उन्हें भली-भाँति नहीं जानते, वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपनी आत्मा, मन, हृदय तथा अन्य सब वस्तुओं से भिन्न हैं। श्रीकृष्ण परम हैं; अतः उनकी क्रियाएँ तथा शक्तियाँ परम हैं। यह भी कहा गया है कि उनकी इन्द्रियाँ हमारी इन्द्रियों के समान नहीं हैं। वे समस्त इन्द्रिय-क्रियाएँ कर सकते हैं; अतः उनकी इन्द्रियाँ न तो अपूर्ण हैं और न ही सीमित। कोई भी उनसे बढ़कर नहीं हो सकता, कोई भी उनके समान नहीं हो सकता, और प्रत्येक उनसे नीचे है।
जो कोई उनके दिव्य शरीर, क्रियाओं तथा पूर्णता को जान लेता है, वह अपने शरीर त्यागने के पश्चात् उनके पास लौट जाता है और इस दुःखमय जगत् में पुनः नहीं आता। अतः मनुष्य को यह जानना चाहिए कि श्रीकृष्ण की क्रियाएँ अन्यों से भिन्न हैं। सर्वोत्तम नीति यही है कि श्रीकृष्ण के सिद्धान्तों का अनुसरण किया जाए; इससे मनुष्य पूर्ण बन जाएगा। यह भी कहा गया है कि कोई भी ऐसा नहीं है जो श्रीकृष्ण का स्वामी हो; प्रत्येक उनका सेवक है। केवल श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं, और प्रत्येक सेवक है। प्रत्येक उनके आदेश का पालन कर रहा है। ऐसा कोई नहीं है जो उनके आदेश को अस्वीकार कर सके। प्रत्येक उनके निर्देशानुसार, उनके अधीक्षण में रहकर कार्य कर रहा है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, वे ही समस्त कारणों के कारण हैं।
Bg 11.44
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥
tasmāt—अतः; praṇamya—नमस्कार अर्पित करने के पश्चात्; praṇidhāya—लिटाकर; kāyam—शरीर; prasādaye—कृपा माँगने हेतु; tvām—आपसे; aham—मैं; īśam—परमेश्वर से; īḍyam—जो आराध्य हैं; pitā iva—पिता के समान; putrasya—पुत्र के; sakhā iva—सखा के समान; sakhyuḥ—सखा के; priyaḥ—प्रेमी; priyāyāḥ—प्रियतम के; arhasi—आपको चाहिए; deva—मेरे प्रभु; soḍhum—सहन करना।
आप परमेश्वर हैं, जो प्रत्येक जीव द्वारा आराध्य हैं। अतः मैं आपको अपना नमस्कार अर्पित करने तथा आपकी कृपा माँगने हेतु भूमि पर गिर पड़ता हूँ। मैंने आपके प्रति जो भी अपराध किए हों, कृपया उन्हें सहन कर लें और मेरे साथ वैसे ही धैर्य रखें जैसे पिता अपने पुत्र के साथ, अथवा सखा अपने सखा के साथ, अथवा प्रेमी अपनी प्रियतमा के साथ रखता है।
श्रीकृष्ण के भक्त श्रीकृष्ण से विविध सम्बन्धों में जुड़े होते हैं; कोई श्रीकृष्ण को पुत्र की भाँति मान सकता है, कोई श्रीकृष्ण को पति की भाँति, कोई सखा की भाँति, कोई स्वामी की भाँति, इत्यादि। श्रीकृष्ण तथा अर्जुन सख्य-सम्बन्ध में जुड़े हैं। जिस प्रकार पिता सहन करता है, अथवा पति या स्वामी सहन करता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण सहन करते हैं।
Bg 11.45
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥
adṛṣṭa-pūrvam—जो पहले कभी न देखा गया हो; hṛṣitaḥ—हर्षित; asmi—मैं हूँ; dṛṣṭvā—देखकर; bhayena—भय से; ca—भी; pravyathitam—विचलित; manaḥ—मन; me—मेरा; tat—अतः; eva—निश्चय ही; me—मुझे; darśaya—दिखाइए; deva—हे प्रभु; rūpam—वह रूप; prasīda—कृपा करें; deveśa—हे देवेश; jagat-nivāsa—विश्व के आश्रय।
इस विश्वरूप को देखकर, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा, मैं हर्षित हूँ, किन्तु साथ ही मेरा मन भय से विचलित है। अतः कृपया मुझ पर अपना अनुग्रह करें और पुनः अपना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वाला रूप प्रकट करें, हे देवेश, हे विश्व के धाम।
अर्जुन सदा श्रीकृष्ण के विश्वास में रहते हैं, क्योंकि वे उनके अत्यन्त प्रिय सखा हैं, और जिस प्रकार एक प्रिय सखा अपने सखा के ऐश्वर्य से हर्षित होता है, उसी प्रकार अर्जुन यह देखकर अत्यन्त प्रसन्न हैं कि उनके सखा श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और ऐसा अद्भुत विश्वरूप दिखा सकते हैं। किन्तु साथ ही, उस विश्वरूप को देखने के पश्चात्, उन्हें भय है कि उन्होंने अपने अनन्य सख्य-भाव से श्रीकृष्ण के प्रति इतने अपराध कर डाले हैं। इस प्रकार उनका मन भय से विचलित है, यद्यपि उन्हें भयभीत होने का कोई कारण नहीं था। अतः अर्जुन श्रीकृष्ण से अपना नारायण-रूप दिखाने को कह रहे हैं, क्योंकि वे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं। यह विश्वरूप भौतिक तथा क्षणिक है, जैसे भौतिक जगत् क्षणिक है। किन्तु वैकुण्ठ लोकों में उनका नारायण के रूप में चतुर्भुज दिव्य रूप है। आध्यात्मिक आकाश में असंख्य लोक हैं, और उनमें से प्रत्येक में श्रीकृष्ण भिन्न-भिन्न नामों वाले अपने पूर्ण प्रकटीकरणों द्वारा विद्यमान हैं। इस प्रकार अर्जुन ने वैकुण्ठ लोकों में प्रकट रूपों में से एक को देखने की इच्छा की। निस्सन्देह प्रत्येक वैकुण्ठ लोक में नारायण का रूप चतुर्भुज है, और चारों हाथ भिन्न-भिन्न चिह्न धारण करते हैं—शंख, गदा, कमल तथा चक्र। इन चारों वस्तुओं को किन-किन हाथों में धारण किया जाता है, उसके अनुसार नारायणों के नाम पड़ते हैं। ये समस्त रूप श्रीकृष्ण के लिए एक ही हैं; अतः अर्जुन उनके चतुर्भुज स्वरूप को देखने की प्रार्थना करते हैं।
Bg 11.46
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥
kirīṭinam—मुकुट सहित; gadinam—गदा सहित; cakra-hastam—हाथ में चक्र; icchāmi—मैं चाहता हूँ; tvām—आपको; draṣṭum—देखना; aham—मैं; tathā eva—उसी स्थिति में; tena eva—उसी; rūpeṇa—रूप से; catur-bhujena—चतुर्भुज; sahasra-bāho—हे सहस्रबाहु; bhava—बन जाइए; viśva-mūrte—हे विश्वरूप।
हे विश्व के स्वामी, मैं आपको आपके चतुर्भुज रूप में देखना चाहता हूँ, जिसमें मुकुट-मण्डित मस्तक हो तथा आपके हाथों में गदा, चक्र, शंख और कमल-पुष्प हों। मैं आपको उसी रूप में देखने को लालायित हूँ।
ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि भगवान् नित्य रूप से सैकड़ों-हज़ारों रूपों में स्थित हैं, और प्रमुख रूप वे हैं जैसे राम, नृसिंह, नारायण, इत्यादि। असंख्य रूप हैं। किन्तु अर्जुन जानते थे कि श्रीकृष्ण ही आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जिन्होंने अपना क्षणिक विश्वरूप धारण किया है। वे अब नारायण के रूप को, जो एक आध्यात्मिक रूप है, देखने को कह रहे हैं। यह श्लोक श्रीमद्भागवत के इस कथन को बिना किसी सन्देह के स्थापित करता है कि श्रीकृष्ण ही आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और अन्य समस्त स्वरूप उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। वे अपने पूर्ण विस्तारों से भिन्न नहीं हैं, और वे अपने असंख्य रूपों में से किसी भी रूप में भगवान् हैं। इन समस्त रूपों में वे एक युवक की भाँति नित्य नवीन हैं। यही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का शाश्वत लक्षण है। जो श्रीकृष्ण को जान लेता है, वह तत्क्षण भौतिक जगत् के समस्त कल्मष से मुक्त हो जाता है।
Bg 11.47
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
śrī bhagavān uvāca—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; mayā—मेरे द्वारा; prasannena—प्रसन्नतापूर्वक; tava—तुम्हें; arjuna—हे अर्जुन; idam—यह; rūpam—रूप; param—दिव्य; darśitam—दिखाया गया; ātma-yogāt—अपनी अन्तरंगा शक्ति से; tejomayam—तेज से परिपूर्ण; viśvam—समस्त विश्व; anantam—असीम; ādyam—आदि; yat me—जो मेरा है; tvat-anyena—तुम्हारे अतिरिक्त; na dṛṣṭa-pūrvam—पहले किसी ने नहीं देखा।
श्रीभगवान् ने कहा: हे प्रिय अर्जुन, मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें अपनी अन्तरंगा शक्ति से भौतिक जगत् के भीतर यह विश्वरूप दिखाता हूँ। तुमसे पूर्व किसी ने भी इस असीम तथा प्रचण्ड तेजोमय रूप को कभी नहीं देखा।
अर्जुन परमेश्वर का विश्वरूप देखना चाहते थे, अतः अपने भक्त अर्जुन पर अपनी कृपा से भगवान् श्रीकृष्ण ने अपना तेज तथा ऐश्वर्य से परिपूर्ण विश्वरूप दिखाया। यह रूप सूर्य के समान देदीप्यमान था, और इसके अनेक मुख तीव्रता से बदल रहे थे। श्रीकृष्ण ने यह रूप केवल अपने सखा अर्जुन की इच्छा को सन्तुष्ट करने हेतु दिखाया। यह रूप श्रीकृष्ण ने अपनी अन्तरंगा शक्ति से प्रकट किया, जो मानवीय कल्पना के लिए अचिन्त्य है। अर्जुन से पूर्व भगवान् का यह विश्वरूप किसी ने नहीं देखा था, किन्तु चूँकि यह रूप अर्जुन को दिखाया गया, अतः स्वर्गलोक तथा बाह्य अन्तरिक्ष के अन्य लोकों के अन्य भक्त भी इसे देख सके। उन्होंने इसे पहले नहीं देखा था, किन्तु अर्जुन के कारण वे भी इसे देख सके। दूसरे शब्दों में, भगवान् के समस्त गुरु-परम्परावर्ती भक्त उस विश्वरूप को देख सके जो श्रीकृष्ण की कृपा से अर्जुन को दिखाया गया। किसी ने यह टिप्पणी की कि यह रूप दुर्योधन को भी तब दिखाया गया था जब श्रीकृष्ण शान्ति-वार्ता हेतु दुर्योधन के पास गए थे। दुर्भाग्यवश दुर्योधन ने शान्ति-प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, किन्तु उस समय श्रीकृष्ण ने अपने कुछ विश्वरूप प्रकट किए। किन्तु वे रूप अर्जुन को दिखाए गए इस रूप से भिन्न हैं। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस रूप को पहले किसी ने कभी नहीं देखा।
Bg 11.48
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
na—कभी नहीं; veda—वैदिक अध्ययन; yajña—यज्ञ; adhyayanaiḥ—अध्ययन से; na dānaiḥ—दान से; na—कभी नहीं; ca—भी; kriyābhiḥ—पुण्य कर्मों से; na tapobhiḥ—गम्भीर तपस्याओं से; ugraiḥ—कठोर; evam—इस प्रकार; rūpaḥ—रूप; śakyaḥ—देखा जा सकता है; aham—मैं; nṛloke—इस भौतिक जगत् में; draṣṭum—देखना; tvat—तुम्हारे; anyena—अन्य के द्वारा; kuru-pravīra—हे कुरुवीरों में श्रेष्ठ।
हे कुरुवीरों में श्रेष्ठ, तुमसे पूर्व किसी ने भी मेरे इस विश्वरूप को कभी नहीं देखा, क्योंकि न तो वेदों के अध्ययन से, न यज्ञ करने से, न दान अथवा इसी प्रकार की क्रियाओं से यह रूप देखा जा सकता है। केवल तुमने ही इसे देखा है।
इस सन्दर्भ में दिव्य दृष्टि को भली-भाँति समझ लेना चाहिए। दिव्य दृष्टि किसे प्राप्त हो सकती है? दिव्य का अर्थ है ईश्वरीय। जब तक कोई देवता के समान दिव्यता की स्थिति प्राप्त नहीं करता, तब तक उसे दिव्य दृष्टि नहीं हो सकती। और देवता क्या है? वैदिक शास्त्रों में कहा गया है कि जो भगवान् विष्णु के भक्त हैं, वे ही देवता हैं। जो नास्तिक हैं, अर्थात् जो विष्णु में विश्वास नहीं करते, अथवा जो केवल श्रीकृष्ण के निराकार अंश को ही परम मानते हैं, उन्हें दिव्य दृष्टि नहीं हो सकती। श्रीकृष्ण की निन्दा करते हुए साथ ही दिव्य दृष्टि प्राप्त करना सम्भव नहीं है। दिव्य हुए बिना मनुष्य को दिव्य दृष्टि नहीं हो सकती। दूसरे शब्दों में, जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, वे भी अर्जुन की भाँति देख सकते हैं।
भगवद्गीता विश्वरूप का वर्णन देती है, और यह वर्णन अर्जुन से पूर्व सभी के लिए अज्ञात था। अब इस घटना के पश्चात् मनुष्य को विश्वरूप का कुछ बोध हो सकता है; जो वस्तुतः दिव्य हैं, वे ही भगवान् का विश्वरूप देख सकते हैं। किन्तु श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त हुए बिना कोई दिव्य नहीं हो सकता। तथापि जो भक्त वस्तुतः दिव्य प्रकृति में स्थित हैं और जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, वे भगवान् का विश्वरूप देखने में अधिक रुचि नहीं रखते। जैसा कि पूर्ववर्ती श्लोक में वर्णित है, अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण का विष्णु के रूप में चतुर्भुज रूप देखना चाहते थे, और वे वस्तुतः विश्वरूप से भयभीत थे।
इस श्लोक में कुछ सार्थक शब्द हैं, जैसे वेद-यज्ञाध्ययनैः, जो वैदिक साहित्य के अध्ययन तथा यज्ञ-सम्बन्धी विधियों के विषय को सूचित करता है। वेद समस्त प्रकार के वैदिक साहित्य को सूचित करता है, अर्थात् चार वेद (ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व) तथा अठारह पुराण और उपनिषद्, और वेदान्त-सूत्र। मनुष्य इनका अध्ययन घर पर अथवा कहीं भी कर सकता है। इसी प्रकार, यज्ञ की विधि के अध्ययन हेतु सूत्र, कल्प-सूत्र तथा मीमांसा-सूत्र हैं। दानैः उस दान को सूचित करता है जो किसी उपयुक्त पात्र को अर्पित किया जाता है, जैसे वे जो भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न हैं, अर्थात् ब्राह्मण तथा वैष्णवगण। इसी प्रकार, पुण्य कर्म अग्नि-होत्र इत्यादि को, अर्थात् विभिन्न वर्णों के विहित कर्तव्यों को सूचित करते हैं। पुण्य कर्म तथा कुछ शारीरिक कष्टों के स्वैच्छिक स्वीकार को तपस्या कहा जाता है। अतः मनुष्य ये सब कर सकता है, शारीरिक तप स्वीकार कर सकता है, दान दे सकता है, वेदों का अध्ययन कर सकता है, इत्यादि, किन्तु जब तक वह अर्जुन के समान भक्त न हो, तब तक उस विश्वरूप को देखना सम्भव नहीं है। जो निर्विशेषवादी हैं, वे भी कल्पना करते हैं कि वे भगवान् का विश्वरूप देख रहे हैं, किन्तु भगवद्गीता से हम समझते हैं कि निर्विशेषवादी भक्त नहीं हैं। अतः वे भगवान् का विश्वरूप देखने में असमर्थ हैं।
ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो अवतारों की रचना करते हैं। वे मिथ्या रूप से किसी साधारण मनुष्य को अवतार होने का दावा करते हैं, किन्तु यह सब मूर्खता है। हमें भगवद्गीता के सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए, अन्यथा पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की कोई सम्भावना नहीं है। यद्यपि भगवद्गीता ईश्वर-विज्ञान का प्रारम्भिक अध्ययन मानी जाती है, तथापि वह इतनी पूर्ण है कि मनुष्य यह विवेक कर सकता है कि क्या है क्या। किसी कूट अवतार के अनुयायी कह सकते हैं कि उन्होंने भी ईश्वर के दिव्य अवतार को, विश्वरूप को, देखा है, किन्तु यह स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जब तक कोई श्रीकृष्ण का भक्त न बने, तब तक वह ईश्वर का विश्वरूप नहीं देख सकता। अतः मनुष्य को सर्वप्रथम श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त बनना होता है; तभी वह दावा कर सकता है कि वह जो विश्वरूप उसने देखा है उसे दिखा सकता है। श्रीकृष्ण का भक्त कूट अवतारों अथवा कूट अवतारों के अनुयायियों को स्वीकार नहीं कर सकता।
Bg 11.49
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
mā—ऐसा न हो; te—तुम्हें; vyathā—कष्ट; mā—ऐसा न हो; ca—भी; vimūḍha-bhāvaḥ—मोह; dṛṣṭvā—देखकर; rūpam—रूप; ghoram—भयानक; īdṛk—ऐसा; mama—मेरा; idam—जैसा है; vyapetabhīḥ—समस्त भय से मुक्त हो जाओ; prīta-manāḥ—मन में प्रसन्न; punaḥ—पुनः; tvam—तुम; tat—वह; eva—इस प्रकार; me—मेरा; rūpam—रूप; idam—यह; prapaśya—देखो।
मेरे इस भयानक स्वरूप को देखकर तुम्हारा मन विचलित हो उठा है। अब इसे समाप्त होने दो। हे मेरे भक्त, समस्त विक्षोभ से मुक्त हो जाओ। शान्त मन से अब तुम वह रूप देख सकते हो जिसकी तुम इच्छा करते हो।
भगवद्गीता के आरम्भ में अर्जुन अपने आराध्य पितामहों तथा गुरुओं भीष्म और द्रोण को मारने के विषय में चिन्तित थे। किन्तु श्रीकृष्ण ने कहा कि उन्हें अपने पितामह को मारने से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। जब सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया गया, तब भीष्म तथा द्रोण मौन रहे, और कर्तव्य की ऐसी उपेक्षा के कारण उन्हें मारा जाना चाहिए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप केवल यह दिखाने हेतु दिखाया कि ये लोग अपने अधर्म-कृत्य के कारण पहले ही मारे जा चुके हैं। वह दृश्य अर्जुन को इसलिए दिखाया गया, क्योंकि भक्त सदा शान्त रहते हैं, और वे ऐसे भयानक कृत्य नहीं कर सकते। विश्वरूप के प्राकट्य का प्रयोजन दिखा दिया गया; अब अर्जुन चतुर्भुज रूप देखना चाहते थे, और श्रीकृष्ण ने उन्हें दिखाया। भक्त विश्वरूप में अधिक रुचि नहीं रखता, क्योंकि वह प्रेमपूर्ण भावों के आदान-प्रदान में सहायक नहीं होता। भक्त अपने सादर आराधना-भाव अर्पित करना चाहता है; अतः वह द्विभुज अथवा चतुर्भुज श्रीकृष्ण-रूप देखना चाहता है, जिससे वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ प्रेममयी सेवा में आदान-प्रदान कर सके।
Bg 11.5
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; पश्य—देखो; मे—मेरे; पार्थ—हे पृथापुत्र; रूपाणि—रूपों को; शतशः—सैकड़ों; अथ—भी; सहस्रशः—सहस्रों; नाना-विधानि—विविध प्रकार के; दिव्यानि—दिव्य; नाना—विविध; वर्ण—रंग के; आकृतीनि—रूप; च—भी।
श्रीभगवान् ने कहा : हे प्रिय अर्जुन, हे पृथापुत्र, अब तुम मेरे ऐश्वर्यों को देखो—सैकड़ों-सहस्रों विविध दिव्य रूप, जो समुद्र के समान बहुरंगी हैं।
अर्जुन श्रीकृष्ण को उनके विश्वरूप में देखना चाहते थे, जो यद्यपि एक दिव्य रूप है, तथापि केवल विश्व-प्रकटीकरण हेतु प्रकट होता है और अतः इस भौतिक प्रकृति के नश्वर काल के अधीन रहता है। जिस प्रकार भौतिक प्रकृति कभी प्रकट होती है और कभी अप्रकट, उसी प्रकार श्रीकृष्ण का यह विश्वरूप भी कभी प्रकट और कभी अप्रकट रहता है। यह श्रीकृष्ण के अन्य रूपों की भाँति आध्यात्मिक आकाश में नित्य स्थित नहीं रहता। जहाँ तक किसी भक्त का सम्बन्ध है, वह विश्वरूप देखने का इच्छुक नहीं होता; किन्तु चूँकि अर्जुन श्रीकृष्ण को इस रूप में देखना चाहते थे, अतः श्रीकृष्ण इस रूप को प्रकट करते हैं। इस विश्वरूप को किसी साधारण मनुष्य द्वारा देखा जाना सम्भव नहीं है। श्रीकृष्ण को ही किसी को इसे देखने की शक्ति प्रदान करनी होती है।
Bg 11.50
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥
sañjayaḥ uvāca—सञ्जय ने कहा; iti—इस प्रकार; arjunam—अर्जुन से; vāsudevaḥ—श्रीकृष्ण; tathā—उस प्रकार; uktvā—कहकर; svakam—अपना; rūpam—रूप; darśayāmāsa—दिखाया; bhūyaḥ—पुनः; āśvāsayāmāsa—उसे आश्वस्त भी किया; ca—भी; bhītam—भयभीत; enam—उसे; bhūtvā punaḥ—पुनः बनकर; saumya-vapuḥ—सुन्दर रूप; mahātmā—महात्मा।
सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से इस प्रकार कहते हुए अपना वास्तविक चतुर्भुज रूप प्रकट किया, और अन्ततः उन्होंने भयभीत अर्जुन को धीरज बँधाते हुए उसे अपना द्विभुज रूप दिखाया।
जब श्रीकृष्ण वसुदेव तथा देवकी के पुत्र रूप में प्रकट हुए, तब वे सर्वप्रथम चतुर्भुज नारायण के रूप में प्रकट हुए, किन्तु अपने माता-पिता द्वारा प्रार्थना किए जाने पर उन्होंने स्वयं को दिखावट में एक साधारण शिशु में रूपान्तरित कर लिया। इसी प्रकार, श्रीकृष्ण जानते थे कि अर्जुन श्रीकृष्ण का चतुर्भुज रूप देखने में रुचि नहीं रखते, किन्तु चूँकि उन्होंने यह चतुर्भुज रूप देखने को कहा, अतः उन्होंने उन्हें यह रूप भी पुनः दिखाया और फिर अपने द्विभुज रूप में स्वयं को प्रकट किया। सौम्य-वपुः शब्द अत्यन्त सार्थक है। सौम्य-वपु एक अत्यन्त सुन्दर रूप है; इसे सर्वाधिक सुन्दर रूप के रूप में जाना जाता है। जब वे उपस्थित थे, तब प्रत्येक केवल श्रीकृष्ण के रूप से ही आकर्षित हो जाता था, और चूँकि श्रीकृष्ण विश्व के निर्देशक हैं, अतः उन्होंने अपने भक्त अर्जुन का भय दूर कर दिया और उसे पुनः अपना श्रीकृष्ण का सुन्दर रूप दिखाया। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि केवल वही व्यक्ति श्रीकृष्ण का सुन्दर रूप देख सकता है जिसके नेत्र प्रेम के अंजन से अनुरंजित हों।
Bg 11.51
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥
arjunaḥ uvāca—अर्जुन ने कहा; dṛṣṭvā—देखकर; idam—यह; mānuṣam—मानवीय; rūpam—रूप; tava—आपका; saumyam—अत्यन्त सुन्दर; janārdana—हे शत्रुओं के दण्डदाता; idānīm—अभी-अभी; asmi—मैं हूँ; saṁvṛttaḥ—स्थिर; sa-cetāḥ—अपनी चेतना में; prakṛtim—अपने; gataḥ—मैं आ गया हूँ।
जब अर्जुन ने इस प्रकार श्रीकृष्ण को उनके मूल रूप में देखा, तब उन्होंने कहा: इस अत्यन्त सुन्दर मानवीय रूप को देखकर मेरा मन अब शान्त हो गया है, और मैं अपने मूल स्वभाव में पुनः स्थिर हो गया हूँ।
यहाँ मानुषं रूपम् शब्द स्पष्ट रूप से सूचित करते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मूल रूप से द्विभुज हैं। जो श्रीकृष्ण को एक साधारण व्यक्ति बताकर उनका उपहास करते हैं, उन्हें यहाँ उनके दिव्य स्वभाव से अनभिज्ञ दिखाया गया है। यदि श्रीकृष्ण एक साधारण मनुष्य के समान हैं, तो उनके लिए विश्वरूप दिखाना और पुनः चतुर्भुज नारायण-रूप दिखाना कैसे सम्भव है? अतः भगवद्गीता में अत्यन्त स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो यह सोचता है कि श्रीकृष्ण एक साधारण व्यक्ति हैं और पाठक को यह दावा करके भ्रमित करता है कि वस्तुतः श्रीकृष्ण के भीतर का निराकार ब्रह्म बोल रहा है, वह सबसे बड़ा अन्याय कर रहा है। श्रीकृष्ण ने वस्तुतः अपना विश्वरूप तथा अपना चतुर्भुज विष्णु-रूप दिखाया है। तो फिर वे एक साधारण मनुष्य कैसे हो सकते हैं? शुद्ध भक्त भगवद्गीता पर भ्रामक टीकाओं से विचलित नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि क्या है क्या। भगवद्गीता के मूल श्लोक सूर्य के समान स्पष्ट हैं; उन्हें मूर्ख टीकाकारों की दीप-ज्योति की आवश्यकता नहीं।
Bg 11.52
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥
śrī bhagavān uvāca—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; sudur-darśana—देखने में अत्यन्त कठिन; idam—यह; rūpam—रूप; dṛṣṭavān asi—जैसा तुमने देखा है; yat—जो; mama—मेरा; devāḥ—देवता; api asya—यह भी; rūpasya—रूप के; nityam—नित्य; darśana-kāṅkṣiṇaḥ—सदा देखने को लालायित।
श्रीभगवान् ने कहा: हे प्रिय अर्जुन, जिस रूप को तुम अब देख रहे हो, उसका दर्शन अत्यन्त कठिन है। देवता भी इस अत्यन्त प्रिय रूप को देखने का अवसर सदा खोजते रहते हैं।
इस अध्याय के अड़तालीसवें श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने विश्वरूप का प्रकटीकरण समाप्त किया और अर्जुन को बताया कि यह रूप इतनी सारी क्रियाओं, यज्ञों इत्यादि से देखा जाना सम्भव नहीं है। अब यहाँ सुदुर्दर्शम् शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो सूचित करता है कि श्रीकृष्ण का द्विभुज रूप इससे भी अधिक गोपनीय है। मनुष्य तप, वैदिक अध्ययन तथा दार्शनिक कल्पना इत्यादि विविध क्रियाओं में थोड़ा-सा भक्ति का अंश मिलाकर श्रीकृष्ण का विश्वरूप देख पाने में समर्थ हो सकता है। यह सम्भव हो सकता है, किन्तु भक्ति के अंश के बिना कोई नहीं देख सकता; यह पहले ही समझाया जा चुका है। फिर भी, उस विश्वरूप से परे, श्रीकृष्ण का द्विभुज मनुष्य के रूप में रूप, ब्रह्मा तथा भगवान् शिव जैसे देवताओं के लिए भी देखना और भी अधिक कठिन है। वे उन्हें देखने की इच्छा करते हैं, और हमारे पास श्रीमद्भागवत में प्रमाण हैं कि जब वे अपनी माता देवकी के गर्भ में माने जाते थे, तब स्वर्ग के समस्त देवता श्रीकृष्ण के इस आश्चर्य को देखने आए। उन्होंने उन्हें देखने की प्रतीक्षा तक की। कोई मूर्ख व्यक्ति उनका उपहास कर सकता है, किन्तु वह एक साधारण व्यक्ति है। श्रीकृष्ण को वस्तुतः ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवता अपने द्विभुज रूप में देखना चाहते हैं।
भगवद्गीता में यह भी पुष्ट होता है कि वे उन मूर्ख व्यक्तियों को दृश्य नहीं हैं जो उनका उपहास करते हैं। जैसा कि ब्रह्म-संहिता द्वारा तथा स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा भगवद्गीता में पुष्ट है, श्रीकृष्ण का शरीर पूर्णतः आध्यात्मिक तथा आनन्द एवं नित्यता से परिपूर्ण है। उनका शरीर भौतिक शरीर के समान कभी नहीं है। किन्तु कुछ ऐसे लोगों के लिए जो भगवद्गीता अथवा इसी प्रकार के वैदिक शास्त्रों को पढ़कर श्रीकृष्ण का अध्ययन करते हैं, श्रीकृष्ण एक समस्या हैं। भौतिक प्रक्रिया का प्रयोग करने वाले के लिए श्रीकृष्ण एक महान् ऐतिहासिक पुरुष तथा अत्यन्त विद्वान् दार्शनिक माने जाते हैं। किन्तु वे एक साधारण मनुष्य नहीं हैं। किन्तु कुछ लोग सोचते हैं कि यद्यपि वे इतने शक्तिशाली थे, तथापि उन्हें एक भौतिक शरीर स्वीकार करना पड़ा। अन्ततः वे सोचते हैं कि परम सत्य निराकार है; अतः वे सोचते हैं कि उन्होंने अपने निराकार पक्ष से भौतिक प्रकृति से युक्त एक साकार पक्ष धारण किया। यह परमेश्वर का भौतिकतावादी आकलन है। एक अन्य आकलन काल्पनिक है। जो ज्ञान की खोज में हैं, वे भी श्रीकृष्ण के विषय में कल्पना करते हैं और उन्हें परम के विश्वरूप से कम महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इस प्रकार कुछ लोग सोचते हैं कि श्रीकृष्ण का जो विश्वरूप अर्जुन को प्रकट हुआ, वह उनके साकार रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण है। उनके अनुसार, परम का साकार रूप कुछ काल्पनिक है। वे मानते हैं कि अन्तिम विचार में, परम सत्य कोई पुरुष नहीं है। किन्तु दिव्य प्रक्रिया भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में वर्णित है: श्रीकृष्ण के विषय में अधिकारियों से सुनना। यही वास्तविक वैदिक प्रक्रिया है, और जो वस्तुतः वैदिक मार्ग में हैं वे श्रीकृष्ण के विषय में अधिकारी से सुनते हैं, और उनके विषय में बारम्बार सुनने से श्रीकृष्ण प्रिय हो जाते हैं। जैसा कि हमने कई बार चर्चा की है, श्रीकृष्ण अपनी योगमाया शक्ति से आच्छादित हैं। वे प्रत्येक तथा किसी को भी दृश्य अथवा प्रकट नहीं होते। केवल उसी को वे दृश्य होते हैं जिसके समक्ष वे स्वयं को प्रकट करें। इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य में होती है; जो शरणागत आत्मा है, उसके लिए परम सत्य वस्तुतः समझा जा सकता है। दिव्यता का साधक, निरन्तर कृष्णभावनामृत द्वारा तथा श्रीकृष्ण की भक्ति द्वारा, अपने आध्यात्मिक नेत्र खुलवा सकता है और प्रकाशना द्वारा श्रीकृष्ण को देख सकता है। ऐसी प्रकाशना देवताओं के लिए भी सम्भव नहीं है; अतः देवताओं के लिए भी श्रीकृष्ण को समझना कठिन है, और उन्नत देवता सदा श्रीकृष्ण को उनके द्विभुज रूप में देखने की आशा में रहते हैं। निष्कर्ष यह है कि यद्यपि श्रीकृष्ण का विश्वरूप देखना अत्यन्त कठिन है तथा प्रत्येक एवं किसी के लिए सम्भव नहीं है, फिर भी उनके श्यामसुन्दर रूप में साकार रूप को समझना और भी अधिक कठिन है।
Bg 11.53
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
na—कभी नहीं; aham—मैं; vedaiḥ—वेदों के अध्ययन से; na—कभी नहीं; tapasā—गम्भीर तपस्याओं से; na—कभी नहीं; dānena—दान से; na—कभी नहीं; ca—भी; ijyayā—पूजा से; śakyaḥ—यह सम्भव है; evam-vidhaḥ—इस प्रकार; draṣṭum—देखना; dṛṣṭavān—देखते हुए; asi—तुम हो; mām—मुझे; yathā—जैसे।
जिस रूप को तुम अपने दिव्य नेत्रों से देख रहे हो, उसे केवल वेदों का अध्ययन करने से, न गम्भीर तपस्याएँ करने से, न दान से, न पूजा से समझा जा सकता है। इन साधनों से मनुष्य मुझे, जैसा मैं हूँ, वैसा नहीं देख सकता।
श्रीकृष्ण सर्वप्रथम अपने माता-पिता देवकी तथा वसुदेव के समक्ष चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए, और फिर उन्होंने स्वयं को द्विभुज रूप में रूपान्तरित कर लिया। यह रहस्य उनके लिए समझना अत्यन्त कठिन है जो नास्तिक हैं अथवा जो भक्ति से रहित हैं। उन विद्वानों के लिए जिन्होंने केवल कल्पना के माध्यम से अथवा मात्र शैक्षणिक रुचि से वैदिक साहित्य का अध्ययन किया है, श्रीकृष्ण को समझना सरल नहीं है। न ही उन व्यक्तियों द्वारा उन्हें समझा जा सकता है जो औपचारिक रूप से पूजा अर्पित करने मन्दिर जाते हैं। वे अपना दर्शन कर लेते हैं, किन्तु वे श्रीकृष्ण को, जैसे वे हैं, नहीं समझ सकते। श्रीकृष्ण को केवल भक्ति के मार्ग से ही समझा जा सकता है, जैसा कि श्रीकृष्ण ने स्वयं अगले श्लोक में समझाया है।
Bg 11.54
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ ५४ ॥
bhaktyā—भक्ति के द्वारा; tu—किन्तु; ananyayā—सकाम कर्म अथवा मनोधर्म से अमिश्रित; śakyaḥ—सम्भव; aham—मैं; evam-vidhaḥ—इस प्रकार; arjuna—हे अर्जुन; jñātum—जानना; draṣṭum—देखना; tattvena—तथ्यतः; praveṣṭum—और प्रवेश करना; ca—भी; parantapa—हे महाबाहु।
हे अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही मुझे यथार्थ रूप में, तुम्हारे समक्ष खड़े हुए, समझा जा सकता है, और इसी प्रकार साक्षात् देखा जा सकता है। केवल इसी रीति से तुम मेरे ज्ञान के रहस्यों में प्रवेश कर सकते हो।
श्रीकृष्ण को केवल अनन्य भक्ति की प्रक्रिया से ही समझा जा सकता है। इस श्लोक में वे इसे स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हैं, ताकि वे अनधिकृत भाष्यकार, जो मनोधर्म की प्रक्रिया से भगवद्गीता को समझने का प्रयत्न करते हैं, यह जान लें कि वे मात्र अपना समय व्यर्थ गँवा रहे हैं। कोई नहीं समझ सकता कि श्रीकृष्ण कौन हैं अथवा वे किस प्रकार माता-पिता से चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए और तत्क्षण स्वयं को द्विभुज रूप में परिवर्तित कर लिया। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई उन्हें देख नहीं सकता। तथापि जो वैदिक साहित्य के अति अनुभवी विद्यार्थी हैं, वे वैदिक साहित्य से अनेकानेक रीतियों में उनके विषय में सीख सकते हैं। अनेक नियम एवं विधान हैं, और यदि कोई श्रीकृष्ण को तनिक भी समझना चाहता है, तो उसे प्रामाणिक साहित्य में वर्णित विधि-विधानों का पालन करना होगा। मनुष्य उन्हीं सिद्धान्तों के अनुरूप तपस्या कर सकता है। जहाँ तक दान का प्रश्न है, यह स्पष्ट है कि दान श्रीकृष्ण के उन भक्तों को देना चाहिए जो समस्त संसार में कृष्ण-दर्शन अथवा कृष्णभावनामृत के प्रसार हेतु उनकी भक्ति में संलग्न हैं। कृष्णभावनामृत मानवता के लिए एक वरदान है। श्रील रूप गोस्वामी ने भगवान् चैतन्य की दान में सर्वाधिक उदार पुरुष के रूप में सराहना की, क्योंकि कृष्णप्रेम, जिसे प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, उन्होंने मुक्त रूप से वितरित किया। और यदि कोई मन्दिर में विहित रीति से आराधना करता है (भारत के मन्दिरों में सदा कोई न कोई विग्रह रहता है, प्रायः विष्णु अथवा श्रीकृष्ण का), तो यह उन्नति का एक अवसर है। भगवान् की भक्ति में नवदीक्षितों के लिए मन्दिर-आराधना अत्यन्त आवश्यक है, और इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य में होती है।
जिसकी परमेश्वर के प्रति अविचल भक्ति है और जो आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में रहता है, वह प्रकटीकरण द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का दर्शन कर सकता है। जो किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में व्यक्तिगत प्रशिक्षण ग्रहण नहीं करता, उसके लिए श्रीकृष्ण को समझना आरम्भ करना भी असम्भव है। यहाँ tu शब्द का प्रयोग विशेष रूप से यह इंगित करने हेतु हुआ है कि श्रीकृष्ण को समझने में अन्य कोई प्रक्रिया न तो प्रयुक्त की जा सकती है, न अनुशंसित की जा सकती है, और न ही सफल हो सकती है।
श्रीकृष्ण के व्यक्तिगत रूप—द्विभुज रूप तथा चतुर्भुज रूप—अर्जुन को दिखाए गए उस क्षणिक विश्वरूप से सर्वथा भिन्न हैं। चतुर्भुज रूप नारायण हैं, और द्विभुज रूप श्रीकृष्ण हैं; ये नित्य एवं दिव्य हैं, जबकि अर्जुन को दिखाया गया विश्वरूप क्षणिक है। sudurdarśam शब्द ही, जिसका अर्थ है दुर्दर्शनीय, यह सूचित करता है कि उस विश्वरूप को किसी ने नहीं देखा। यह भी सूचित करता है कि भक्तों के मध्य उसे दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। वह रूप श्रीकृष्ण ने अर्जुन के अनुरोध पर प्रकट किया, क्योंकि भविष्य में, जब कोई स्वयं को ईश्वर का अवतार बताए, तो लोग उससे उसका विश्वरूप दिखाने की माँग कर सकें।
श्रीकृष्ण विश्वरूप से नारायण के चतुर्भुज रूप में और तत्पश्चात् अपने द्विभुज स्वाभाविक रूप में परिवर्तित होते हैं। यह इंगित करता है कि वैदिक साहित्य में वर्णित चतुर्भुज रूप तथा अन्य रूप, सब के सब मूल द्विभुज श्रीकृष्ण के ही प्रकाश हैं। वे समस्त प्रकाशों के उद्गम हैं। इन रूपों से भी श्रीकृष्ण भिन्न हैं, फिर निराकार धारणा की तो बात ही क्या। जहाँ तक श्रीकृष्ण के चतुर्भुज रूपों का प्रश्न है, स्पष्ट रूप से कहा गया है कि श्रीकृष्ण का सर्वाधिक समरूप चतुर्भुज रूप भी (जो महा-विष्णु के नाम से विख्यात है, जो कारणार्णव पर शयन करते हैं और जिनके श्वास से अगणित ब्रह्माण्ड निकलते एवं प्रवेश करते हैं) परमेश्वर का ही विस्तार है। अतः मनुष्य को निश्चित रूप से श्रीकृष्ण के व्यक्तिगत रूप की ही आराधना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में करनी चाहिए, जो नित्यता, आनन्द एवं ज्ञानस्वरूप हैं। वे विष्णु के समस्त रूपों के स्रोत हैं, वे समस्त अवतार-रूपों के स्रोत हैं, और वे मूल परम पुरुष हैं, जैसा कि भगवद्गीता में पुष्ट होता है।
वैदिक साहित्य में कहा गया है कि परम परब्रह्म एक व्यक्ति हैं। उनका नाम श्रीकृष्ण है, और वे यदा-कदा इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। इसी प्रकार, श्रीमद्भागवत में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के समस्त प्रकार के अवतारों का वर्णन है, और वहाँ कहा गया है कि श्रीकृष्ण ईश्वर के अवतार नहीं हैं, अपितु स्वयं मूल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। kṛṣṇas tu bhagavān svayam। इसी प्रकार, भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं, mattaḥ parataraṁ nānyat: “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में मेरे स्वरूप से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है।” वे भगवद्गीता में अन्यत्र भी कहते हैं, aham ādir hi devānām: “मैं समस्त देवताओं का उद्गम हूँ।” और श्रीकृष्ण से भगवद्गीता समझने के पश्चात् अर्जुन भी इसकी पुष्टि निम्नलिखित शब्दों में करते हैं: paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān: “अब मैं पूर्णतः समझ गया कि आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, परम सत्य हैं, और आप ही सबके आश्रय हैं।” अतः जो विश्वरूप श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिखाया, वह ईश्वर का मूल रूप नहीं है। मूल रूप तो कृष्ण-रूप ही है। सहस्रों-सहस्र शीशों एवं भुजाओं वाला विश्वरूप मात्र उन लोगों का ध्यान आकृष्ट करने हेतु प्रकट किया जाता है, जिनमें ईश्वर के प्रति कोई प्रेम नहीं है। यह ईश्वर का मूल रूप नहीं है।
विश्वरूप उन शुद्ध भक्तों के लिए आकर्षक नहीं है, जो भिन्न-भिन्न दिव्य सम्बन्धों में भगवान् के प्रेम में मग्न हैं। परमेश्वर अपने मूल कृष्ण-रूप में ही दिव्य प्रेम का आदान-प्रदान करते हैं। अतः अर्जुन के लिए, जो सख्य-भाव में श्रीकृष्ण से इतने घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित थे, विश्वरूप का यह प्रकटीकरण सुखद नहीं था; अपितु भयप्रद था। अर्जुन, जो श्रीकृष्ण के नित्य संगी हैं, अवश्य ही दिव्य नेत्रों से युक्त रहे होंगे; वे साधारण मनुष्य नहीं थे। अतः वे विश्वरूप से मोहित नहीं हुए। यह रूप उन व्यक्तियों को आश्चर्यजनक प्रतीत हो सकता है, जो सकाम कर्मों द्वारा स्वयं को उन्नत करने में संलग्न हैं, किन्तु जो व्यक्ति भक्ति में संलग्न हैं, उनके लिए श्रीकृष्ण का द्विभुज रूप ही सर्वाधिक प्रिय है।
Bg 11.55
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥
mat-karma-kṛt—मेरे कार्य में संलग्न; mat-paramaḥ—मुझ परम को परम मानने वाला; mat-bhaktaḥ—मेरी भक्ति में संलग्न; saṅga-varjitaḥ—पूर्व कर्मों एवं मनोधर्म के कल्मष से मुक्त; nirvairaḥ—शत्रुता रहित; sarva-bhūteṣu—समस्त जीवों के प्रति; yaḥ—जो; saḥ—वह; mām—मुझको; eti—प्राप्त होता है; pāṇḍava—हे पाण्डुपुत्र।
हे अर्जुन! जो मेरी शुद्ध भक्ति में संलग्न रहता है, पूर्व कर्मों एवं मनोधर्म के कल्मष से मुक्त है, और समस्त जीवों के प्रति मैत्रीभाव रखता है, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त होता है।
जो कोई समस्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवानों में सर्वोपरि भगवान् के समीप, आध्यात्मिक आकाश में कृष्णलोक नामक ग्रह पर जाना चाहता है, और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध होना चाहता है, उसे यह सूत्र अपनाना होगा, जैसा कि स्वयं परमेश्वर ने कहा है। अतः इस श्लोक को भगवद्गीता का सार माना जाता है। भगवद्गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो उन बद्धजीवों के लिए निर्दिष्ट है, जो प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने के उद्देश्य से भौतिक जगत् में संलग्न हैं और जो यथार्थ आध्यात्मिक जीवन से अनभिज्ञ हैं। भगवद्गीता का प्रयोजन यह दर्शाना है कि मनुष्य किस प्रकार अपने आध्यात्मिक अस्तित्व तथा परम आध्यात्मिक पुरुष के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को समझ सकता है, और यह सिखाना है कि किस प्रकार वह स्वधाम, भगवद्धाम लौट सकता है। अब यहाँ वह श्लोक है जो उस प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाता है, जिसके द्वारा मनुष्य अपनी आध्यात्मिक प्रवृत्ति में सफलता प्राप्त कर सकता है: अर्थात् भक्ति। जहाँ तक कर्म का प्रश्न है, मनुष्य को अपनी समस्त ऊर्जा पूर्णतः कृष्णभावनाभावित कर्मों में लगानी चाहिए। श्रीकृष्ण के सम्बन्ध के अतिरिक्त किसी मनुष्य को कोई कर्म नहीं करना चाहिए। इसे कृष्ण-कर्म कहते हैं। मनुष्य विविध कर्मों में संलग्न हो सकता है, किन्तु उसे अपने कर्म के फल में आसक्त नहीं होना चाहिए, अपितु वह फल उन्हीं के लिए अर्पित करना चाहिए। उदाहरणार्थ, मनुष्य व्यवसाय में संलग्न हो सकता है, किन्तु उस कर्म को कृष्णभावनामृत में परिणत करने हेतु उसे श्रीकृष्ण के लिए व्यवसाय करना होगा। यदि श्रीकृष्ण व्यवसाय के स्वामी हैं, तो श्रीकृष्ण को ही व्यवसाय के लाभ का उपभोग करना चाहिए। यदि किसी व्यवसायी के पास सहस्रों-सहस्र डॉलर हैं, और यदि उसे यह सब श्रीकृष्ण को अर्पित करना हो, तो वह ऐसा कर सकता है। यह श्रीकृष्ण के लिए कर्म है। अपनी इन्द्रियतृप्ति हेतु एक विशाल भवन बनाने के स्थान पर, वह श्रीकृष्ण के लिए एक सुन्दर मन्दिर बना सकता है, और श्रीकृष्ण के विग्रह की स्थापना करके विग्रह की सेवा की व्यवस्था कर सकता है, जैसा कि भक्ति के अधिकृत ग्रन्थों में रूपरेखित है। यह सब कृष्ण-कर्म है। मनुष्य को अपने कर्म के फल में आसक्त नहीं होना चाहिए, अपितु वह फल श्रीकृष्ण को अर्पित करना चाहिए। मनुष्य को श्रीकृष्ण को अर्पित किए गए भोग के अवशेष को प्रसादम् के रूप में भी ग्रहण करना चाहिए। तथापि यदि कोई श्रीकृष्ण के लिए मन्दिर बनाने में समर्थ न हो, तो वह श्रीकृष्ण के मन्दिर की सफाई में स्वयं को संलग्न कर सकता है; यह भी कृष्ण-कर्म है। मनुष्य उद्यान का परिपालन कर सकता है। जिसके पास भूमि है—भारत में, कम से कम, किसी भी निर्धन व्यक्ति के पास कुछ न कुछ भूमि होती है—वह श्रीकृष्ण को अर्पित करने हेतु पुष्प उगाकर उस भूमि का उनके लिए उपयोग कर सकता है। वह तुलसी के पौधे बो सकता है, क्योंकि तुलसी-पत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं, और श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसकी अनुशंसा की है। श्रीकृष्ण इच्छा करते हैं कि मनुष्य उन्हें एक पत्र, अथवा एक पुष्प, अथवा थोड़ा जल अर्पित करे—और वे सन्तुष्ट हो जाते हैं। यह पत्र विशेष रूप से तुलसी को इंगित करता है। अतः मनुष्य तुलसी के पत्र बो सकता है और पौधे पर जल सींच सकता है। इस प्रकार, सर्वाधिक निर्धन मनुष्य भी श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न हो सकता है। ये कुछ उदाहरण हैं कि मनुष्य किस प्रकार श्रीकृष्ण के लिए कर्म में संलग्न हो सकता है।
mat-paramaḥ शब्द उस व्यक्ति को इंगित करता है जो अपने परमधाम में श्रीकृष्ण के संग को जीवन की सर्वोच्च सिद्धि मानता है। ऐसा व्यक्ति चन्द्रलोक, सूर्यलोक अथवा स्वर्गीय लोकों, अथवा इस ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च ग्रह ब्रह्मलोक जैसे उच्चतर ग्रहों पर उन्नत होने की इच्छा नहीं करता। उसका इनके प्रति कोई आकर्षण नहीं है। वह केवल आध्यात्मिक आकाश में स्थानान्तरित होने के प्रति आकृष्ट है। और आध्यात्मिक आकाश में भी वह तेजोमय ब्रह्मज्योति में लीन होने से सन्तुष्ट नहीं होता, क्योंकि वह सर्वोच्च आध्यात्मिक ग्रह, अर्थात् कृष्णलोक, गोलोक वृन्दावन, में प्रवेश करना चाहता है। उस ग्रह का उसे पूर्ण ज्ञान है, और अतः किसी अन्य में उसकी रुचि नहीं होती। mad-bhaktaḥ शब्द द्वारा इंगित किए अनुसार, वह पूर्ण रूप से भक्ति में, विशेष रूप से भक्ति की नौ प्रक्रियाओं में संलग्न होता है: श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, भगवान् के चरणकमलों की सेवा, प्रार्थना अर्पित करना, भगवान् के आदेशों का पालन, उनसे मित्रता करना, तथा सब कुछ उन्हें समर्पित कर देना। मनुष्य भक्ति की सभी नौ प्रक्रियाओं में, अथवा आठ में, अथवा सात में, अथवा कम से कम एक में संलग्न हो सकता है, और वह उसे निश्चय ही सिद्ध बना देगी।
saṅga-varjitaḥ पद अत्यन्त सार्थक है। मनुष्य को उन व्यक्तियों की संगति से स्वयं को पृथक् कर लेना चाहिए जो श्रीकृष्ण के विरुद्ध हैं। न केवल नास्तिक व्यक्ति श्रीकृष्ण के विरुद्ध हैं, अपितु वे भी हैं जो सकाम कर्मों एवं मनोधर्म के प्रति आकृष्ट हैं। अतः भक्ति का शुद्ध रूप भक्ति-रसामृत-सिन्धु में इस प्रकार वर्णित है: anyābhilāṣitā-śūnyaṁ jñāna-karmādy-anāvṛtam ānukūlyena kṛṣṇānuśīlanaṁ bhaktir uttamā। इस श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यदि कोई अनन्य भक्ति सम्पन्न करना चाहता है, तो उसे समस्त प्रकार के भौतिक कल्मष से मुक्त होना होगा। उसे उन व्यक्तियों की संगति से मुक्त होना होगा जो सकाम कर्मों एवं मनोधर्म के व्यसनी हैं। जब, ऐसी अवांछित संगति तथा भौतिक इच्छाओं के कल्मष से मुक्त होकर, मनुष्य अनुकूल रीति से श्रीकृष्ण के ज्ञान का अनुशीलन करता है, तो उसे शुद्ध भक्ति कहते हैं। ānukūlyasya saṅkalpaḥ prātikūlyasya varjanam। मनुष्य को श्रीकृष्ण का चिन्तन करना चाहिए और श्रीकृष्ण के लिए अनुकूल रीति से कर्म करना चाहिए, प्रतिकूल रीति से नहीं। कंस श्रीकृष्ण का शत्रु था। श्रीकृष्ण के जन्म के आरम्भ से ही उसने उन्हें मारने के लिए अनेकानेक रीतियों में योजना बनाई, और क्योंकि वह सदा असफल रहता था, अतः वह सदा श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करता रहता था। इस प्रकार कर्म करते समय, भोजन करते समय एवं शयन करते समय वह प्रत्येक रीति से सदा कृष्णभावनाभावित रहता था, किन्तु वह कृष्णभावनामृत अनुकूल नहीं था, और अतः चौबीसों घण्टे सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करने के बावजूद वह असुर माना गया, और अन्ततः श्रीकृष्ण ने उसका वध किया। निःसन्देह जो कोई श्रीकृष्ण के हाथों मारा जाता है, वह तत्क्षण मोक्ष प्राप्त करता है, किन्तु यह शुद्ध भक्त का लक्ष्य नहीं है। शुद्ध भक्त तो मोक्ष की भी इच्छा नहीं करता। वह सर्वोच्च ग्रह गोलोक वृन्दावन में स्थानान्तरित होने की भी इच्छा नहीं करता। उसका एकमात्र उद्देश्य है, जहाँ भी वह रहे, वहीं श्रीकृष्ण की सेवा करना।
श्रीकृष्ण का भक्त सबके प्रति मैत्रीभाव रखता है। अतः यहाँ कहा गया है कि उसका कोई शत्रु नहीं है। यह किस प्रकार है? कृष्णभावनामृत में स्थित भक्त जानता है कि केवल श्रीकृष्ण की भक्ति ही मनुष्य को जीवन की समस्त समस्याओं से उबार सकती है। उसे इसका व्यक्तिगत अनुभव है, और अतः वह इस पद्धति को, अर्थात् कृष्णभावनामृत को, मानव समाज में प्रस्तुत करना चाहता है। इतिहास में भगवान् के ऐसे भक्तों के अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने ईश्वर-भावना के प्रसार हेतु अपने प्राणों को संकट में डाला। सर्वाधिक प्रिय उदाहरण भगवान् ईसा मसीह का है। अभक्तों ने उन्हें क्रूस पर चढ़ाया, किन्तु उन्होंने ईश्वर-भावना के प्रसार हेतु अपने प्राणों का बलिदान किया। निःसन्देह यह समझना उथला होगा कि वे मारे गए। इसी प्रकार, भारत में भी अनेक उदाहरण हैं, जैसे ठाकुर हरिदास। ऐसा संकट क्यों? क्योंकि वे कृष्णभावनामृत का प्रसार करना चाहते थे, और यह कठिन है। एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जानता है कि यदि कोई मनुष्य दुःख भोग रहा है, तो वह श्रीकृष्ण के साथ अपने नित्य सम्बन्ध की विस्मृति के कारण है। अतः मनुष्य मानव समाज का जो सर्वोच्च हित कर सकता है, वह है अपने पड़ोसी को समस्त भौतिक समस्याओं से उबारना। इस प्रकार, एक शुद्ध भक्त भगवान् की सेवा में संलग्न रहता है। अब, हम कल्पना कर सकते हैं कि श्रीकृष्ण उन लोगों पर कितने कृपालु हैं जो उनके लिए सब कुछ संकट में डालकर उनकी सेवा में संलग्न हैं। अतः यह निश्चित है कि ऐसे व्यक्तियों को शरीर त्यागने के पश्चात् अवश्य ही परमधाम पहुँचना है।
संक्षेप में, श्रीकृष्ण का विश्वरूप, जो एक क्षणिक प्रकटीकरण है, तथा काल का रूप जो सब कुछ निगल जाता है, और यहाँ तक कि विष्णु का चतुर्भुज रूप भी—ये सब श्रीकृष्ण ने ही प्रकट किए हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण इन समस्त प्रकटीकरणों के उद्गम हैं। ऐसा नहीं है कि श्रीकृष्ण मूल विश्व-रूप, अथवा विष्णु, के प्रकटीकरण हैं। श्रीकृष्ण समस्त रूपों के उद्गम हैं। सहस्रों विष्णु हैं, किन्तु एक भक्त के लिए श्रीकृष्ण के मूल रूप, द्विभुज श्यामसुन्दर, के अतिरिक्त कोई रूप महत्त्वपूर्ण नहीं है। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि जो प्रेम एवं भक्ति में श्रीकृष्ण के श्यामसुन्दर रूप के प्रति आसक्त हैं, वे उन्हें सदा हृदय के भीतर ही देखते हैं और अन्य कुछ नहीं देख सकते। अतः मनुष्य को समझना चाहिए कि इस ग्यारहवें अध्याय का तात्पर्य यही है कि श्रीकृष्ण का रूप ही आवश्यक एवं सर्वोपरि है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय, “विश्वरूप”, के सम्बन्ध में भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण होते हैं।
Bg 11.6
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
पश्य—देखो; आदित्यान्—अदिति के बारह पुत्रों को; वसून्—आठ वसुओं को; रुद्रान्—रुद्र के ग्यारह रूपों को; अश्विनौ—दोनों अश्विनीकुमारों को; मरुतः—उनचास मरुद्गणों को (वायु के देवता); तथा—भी; बहूनि—अनेक; अदृष्ट—जिन्हें तुमने न सुना है न देखा है; पूर्वाणि—पहले; पश्य—वहाँ देखो; आश्चर्याणि—समस्त आश्चर्यजनक वस्तुएँ; भारत—हे भरतश्रेष्ठ।
हे भरतश्रेष्ठ, यहाँ आदित्यों, रुद्रों तथा समस्त देवताओं के विभिन्न प्रकटीकरणों को देखो। उन अनेक वस्तुओं को निहारो, जिन्हें इससे पूर्व किसी ने न कभी देखा है और न सुना है।
यद्यपि अर्जुन श्रीकृष्ण के व्यक्तिगत मित्र थे और विद्वानों में सर्वाधिक उन्नत थे, तथापि उनके लिए श्रीकृष्ण के विषय में सब कुछ जान पाना सम्भव नहीं था। यहाँ कहा गया है कि मनुष्यों ने इन समस्त रूपों तथा प्रकटीकरणों के विषय में न तो सुना है और न जाना है। अब श्रीकृष्ण इन आश्चर्यजनक रूपों को प्रकट करते हैं।
Bg 11.7
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
इह—इसमें; एकस्थम्—एक स्थान में; जगत्—ब्रह्माण्ड; कृत्स्नम्—पूर्णतया; पश्य—देखो; अद्य—तुरन्त; स—सहित; चर—चर; अचरम्—अचर; मम—मेरे; देहे—इस शरीर में; गुडाकेश—हे अर्जुन; यत्—जो; च—भी; अन्यत्—अन्य; द्रष्टुम्—देखने के लिए; इच्छसि—तुम चाहो।
जो कुछ तुम देखना चाहते हो, उसे इस शरीर में एक ही साथ देखा जा सकता है। यह विश्वरूप तुम्हें वह सब कुछ दिखला सकता है, जिसकी तुम अब इच्छा करते हो और साथ ही जिसकी तुम भविष्य में इच्छा करोगे। यहाँ सब कुछ पूर्णतया विद्यमान है।
कोई भी मनुष्य एक स्थान पर बैठकर समस्त ब्रह्माण्ड को नहीं देख सकता। बड़े-से-बड़ा वैज्ञानिक भी यह नहीं देख सकता कि ब्रह्माण्ड के अन्य भागों में क्या हो रहा है। श्रीकृष्ण उसे वह सब कुछ देखने की शक्ति प्रदान करते हैं, जिसे वह देखना चाहता है—भूत, वर्तमान तथा भविष्य। इस प्रकार श्रीकृष्ण की कृपा से अर्जुन सब कुछ देख पाने में समर्थ होते हैं।
Bg 11.8
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
न—कभी नहीं; तु—किन्तु; माम्—मुझे; शक्यसे—समर्थ; द्रष्टुम्—देखने के लिए; अनेन—इससे; एव—निश्चय ही; स्व-चक्षुषा—अपने नेत्रों से; दिव्यम्—दिव्य; ददामि—मैं देता हूँ; ते—तुम्हें; चक्षुः—नेत्र; पश्य—देखो; मे—मेरी; योगम् ऐश्वरम्—अचिन्त्य योगशक्ति को।
किन्तु तुम मुझे अपने इन वर्तमान नेत्रों से नहीं देख सकते। अतः मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ, जिनके द्वारा तुम मेरे योगैश्वर्य का दर्शन कर सकोगे।
एक शुद्ध भक्त श्रीकृष्ण को द्विभुज रूप के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में देखना पसन्द नहीं करता; भक्त को उनका विश्वरूप उनकी कृपा से ही देखना होता है—मन से नहीं, अपितु आध्यात्मिक नेत्रों से। श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखने के लिए अर्जुन से कहा जाता है कि वे अपना मन नहीं, अपितु अपनी दृष्टि बदलें। श्रीकृष्ण का विश्वरूप अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नहीं है; यह बात आगे के श्लोकों में स्पष्ट हो जाएगी। तथापि चूँकि अर्जुन इसे देखना चाहते थे, अतः भगवान् उन्हें वह विशेष दृष्टि प्रदान करते हैं, जो उस विश्वरूप को देखने के लिए आवश्यक है।
जो भक्त श्रीकृष्ण के साथ अपने दिव्य सम्बन्ध में सम्यक् रूप से स्थित हैं, वे प्रेममय गुणों से आकृष्ट होते हैं, न कि ऐश्वर्य के निरीश्वर प्रदर्शन से। श्रीकृष्ण के खेल-सखा, श्रीकृष्ण के मित्र तथा श्रीकृष्ण के माता-पिता कभी नहीं चाहते कि श्रीकृष्ण अपने ऐश्वर्यों का प्रदर्शन करें। वे शुद्ध प्रेम में इतने निमग्न रहते हैं कि उन्हें यह भी ज्ञात नहीं होता कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। अपने प्रेममय आदान-प्रदान में वे यह भूल जाते हैं कि श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि जो बालक श्रीकृष्ण के साथ खेलते हैं, वे सब अत्यन्त पुण्यात्मा जीव हैं, और अनेक-अनेक जन्मों के पश्चात् वे श्रीकृष्ण के साथ खेलने का अवसर प्राप्त करते हैं। ऐसे बालक नहीं जानते कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वे उन्हें एक व्यक्तिगत मित्र मानते हैं। उस परम पुरुष को महान् ऋषि निराकार ब्रह्म मानते हैं, भक्तगण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मानते हैं, और साधारण मनुष्य इस भौतिक प्रकृति का उत्पाद मानते हैं। तथ्य यह है कि भक्त को विश्वरूप अर्थात् विश्व-स्वरूप देखने की चिन्ता नहीं होती; किन्तु अर्जुन इसे श्रीकृष्ण के कथन को प्रमाणित करने के लिए देखना चाहते थे, ताकि भविष्य में लोग यह समझ सकें कि श्रीकृष्ण ने स्वयं को परम के रूप में केवल सैद्धान्तिक अथवा दार्शनिक रूप से ही प्रस्तुत नहीं किया, अपितु वास्तव में स्वयं को अर्जुन के समक्ष ऐसा ही प्रकट किया। अर्जुन को इसकी पुष्टि अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि अर्जुन गुरु-परम्परा के आदिप्रवर्तक हैं। जो लोग वास्तव में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को समझने के इच्छुक हैं और जो अर्जुन के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि श्रीकृष्ण ने स्वयं को परम के रूप में केवल सैद्धान्तिक रूप से ही प्रस्तुत नहीं किया, अपितु वास्तव में स्वयं को परम के रूप में प्रकट किया।
भगवान् ने अर्जुन को अपना विश्वरूप देखने की आवश्यक शक्ति इसलिए प्रदान की, क्योंकि वे जानते थे कि अर्जुन को इसे देखने की कोई विशेष इच्छा नहीं थी, जैसा कि हम पहले ही समझा चुके हैं।
Bg 11.9
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥
सञ्जयः उवाच—सञ्जय ने कहा; एवम्—इस प्रकार; उक्त्वा—कहकर; ततः—तत्पश्चात्; राजन्—हे राजन्; महा-योगेश्वरः—परम शक्तिशाली योगेश्वर; हरिः—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, श्रीकृष्ण ने; दर्शयामास—दिखलाया; पार्थाय—अर्जुन को; परमम्—दिव्य; रूपम्—विश्वरूप; ऐश्वरम्—ऐश्वर्य।
सञ्जय ने कहा : हे राजन्, इस प्रकार कहकर समस्त योगशक्ति के स्वामी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखलाया।