अध्याय 8
Bg 8.1
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; किम्—क्या; तत्—वह; ब्रह्म—ब्रह्म; किम्—क्या; अध्यात्मम्—आत्मा; किम्—क्या; कर्म—सकाम कर्म; पुरुषोत्तम—हे परम पुरुष; अधिभूतम्—भौतिक प्रकटीकरण; च—तथा; किम्—क्या; प्रोक्तम्—कहलाता है; अधिदैवम्—देवता; किम्—क्या; उच्यते—कहलाता है।
अर्जुन ने पूछा: हे मेरे प्रभु, हे परम पुरुष, ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है? सकाम कर्म क्या हैं? यह भौतिक प्रकटीकरण क्या है? और देवता कौन हैं? कृपया मुझे यह समझाइए।
इस अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण “ब्रह्म क्या है?” से आरम्भ करते हुए अर्जुन के इन विभिन्न प्रश्नों का उत्तर देते हैं। भगवान् कर्म अर्थात् सकाम कर्म, भक्ति तथा योग के सिद्धान्तों, और शुद्ध रूप में भक्ति की भी व्याख्या करते हैं। श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि परम सत्य ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के रूप में जाना जाता है। इसके अतिरिक्त जीव अर्थात् व्यष्टि आत्मा को भी ब्रह्म कहा जाता है। अर्जुन आत्मा के विषय में भी पूछते हैं, जिसका अभिप्राय शरीर, आत्मा तथा मन से है। वैदिक कोश के अनुसार आत्मा से मन, आत्मा, शरीर तथा इन्द्रियों का भी बोध होता है।
अर्जुन ने परमेश्वर को पुरुषोत्तम, परम पुरुष कहकर सम्बोधित किया है, जिसका अर्थ है कि वे ये प्रश्न केवल एक मित्र से नहीं, अपितु परम पुरुष से पूछ रहे थे, उन्हें वह परम प्रमाण जानते हुए जो निश्चयात्मक उत्तर देने में समर्थ है।
Bg 8.10
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्य-
क्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
प्रयाण-काले—मृत्यु के समय; मनसा—मन के द्वारा; अचलेन—विचलित हुए बिना; भक्त्या—पूर्ण भक्ति में; युक्तः—संलग्न; योग-बलेन—योगशक्ति के बल से; च—भी; एव—निश्चय ही; भ्रुवोः—दोनों भौंहों के; मध्ये—बीच में; प्राणम्—प्राणवायु; आवेश्य—स्थापित करके; सम्यक्—पूर्ण रूप से; सः—वह; तम्—उस; परम्—दिव्य; पुरुषम्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; उपैति—प्राप्त करता है; दिव्यम्—आध्यात्मिक धाम में।
जो मनुष्य मृत्यु के समय अपनी प्राणवायु को दोनों भौंहों के बीच स्थिर कर लेता है और पूर्ण भक्ति में परमेश्वर के स्मरण में अपने को संलग्न करता है, वह निश्चय ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्राप्त करेगा।
इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मृत्यु के समय मन को भक्ति में परमेश्वर पर स्थिर करना चाहिए। जो योग में अभ्यस्त हैं, उनके लिए अनुशंसा है कि वे प्राणशक्ति को दोनों भौंहों के बीच ऊपर उठाएँ, किन्तु जो शुद्ध भक्त ऐसे योग का अभ्यास नहीं करता, उसके लिए मन को सदैव कृष्णभावनामृत में संलग्न रखना चाहिए, ताकि मृत्यु के समय वह भगवान् की कृपा से परमेश्वर का स्मरण कर सके। इसकी व्याख्या चौदहवें श्लोक में हुई है।
इस श्लोक में योग-बलेन शब्द का विशेष प्रयोग सार्थक है, क्योंकि योग के अभ्यास के बिना मनुष्य मृत्यु के समय इस दिव्य भाव-अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता। जब तक मनुष्य किसी योग-प्रणाली में, विशेषतः भक्तियोग की प्रणाली में, अभ्यस्त न हो, तब तक वह मृत्यु के समय सहसा परमेश्वर का स्मरण नहीं कर सकता। चूँकि मृत्यु के समय मनुष्य का मन अत्यन्त विचलित होता है, अतः मनुष्य को अपने जीवनकाल में योग के द्वारा दिव्यता का अभ्यास करना चाहिए।
Bg 8.11
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
यत्—जो; अक्षरम्—अक्षय; वेद-विदः—वेदों में पारंगत व्यक्ति; वदन्ति—कहते हैं; विशन्ति—प्रवेश करते हैं; यत्—जिसमें; यतयः—महान् ऋषि; वीत-रागाः—संन्यास आश्रम में; यत्—जिसकी; इच्छन्तः—इच्छा करते हुए; ब्रह्मचर्यम्—ब्रह्मचर्य; चरन्ति—अभ्यास करते हैं; तत्—उस; ते—तुम्हें; पदम्—स्थिति; संग्रहेण—संक्षेप में; प्रवक्ष्ये—मैं समझाऊँगा।
वेदों में पारंगत जन, जो ओंकार का उच्चारण करते हैं और जो संन्यास आश्रम में महान् ऋषि हैं, ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। ऐसी सिद्धि की इच्छा करते हुए मनुष्य ब्रह्मचर्य का अभ्यास करता है। अब मैं तुम्हें वह प्रक्रिया समझाऊँगा, जिसके द्वारा मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
भगवान् श्रीकृष्ण समझाते हैं कि ब्रह्म, यद्यपि अद्वितीय है, तथापि उसके विभिन्न प्रकटीकरण तथा पक्ष हैं। निर्विशेषवादियों के लिए ओम् अक्षर ब्रह्म के साथ अभिन्न है। श्रीकृष्ण यहाँ उस निराकार ब्रह्म की व्याख्या करते हैं, जिसमें संन्यास आश्रम के ऋषि प्रवेश करते हैं।
वैदिक ज्ञान-प्रणाली में विद्यार्थियों को प्रारम्भ से ही ओम् का उच्चारण करना तथा पूर्ण ब्रह्मचर्य में आध्यात्मिक गुरु के साथ रहकर परम निराकार ब्रह्म को जानना सिखाया जाता है। इस प्रकार वे ब्रह्म के दो पक्षों का साक्षात्कार करते हैं। विद्यार्थी की आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह अभ्यास अत्यन्त आवश्यक है, किन्तु इस समय ऐसा ब्रह्मचारी (अविवाहित ब्रह्मचर्यपालक) जीवन तनिक भी सम्भव नहीं है। संसार की सामाजिक रचना इतनी बदल गई है कि विद्यार्थी-जीवन के आरम्भ से ही ब्रह्मचर्य के अभ्यास की कोई सम्भावना नहीं है। सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान के विभिन्न विभागों हेतु अनेक संस्थान हैं, किन्तु कोई मान्यताप्राप्त संस्थान नहीं है, जहाँ विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य के सिद्धान्तों में शिक्षित किया जा सके। जब तक मनुष्य ब्रह्मचर्य का अभ्यास न करे, तब तक आध्यात्मिक जीवन में उन्नति अत्यन्त कठिन है। अतः भगवान् चैतन्य ने कलियुग के इस युग हेतु शास्त्रीय आदेशों के अनुसार घोषणा की है कि भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र नाम के जप के अतिरिक्त परमेश्वर के साक्षात्कार की कोई प्रक्रिया सम्भव नहीं है: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।
Bg 8.12
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूध्न्र्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥
सर्व-द्वाराणि—शरीर के समस्त द्वार; संयम्य—संयमित करके; मनः—मन; हृदि—हृदय में; निरुध्य—अवरुद्ध करके; च—भी; मूर्ध्नि—शीश पर; आधाय—स्थिर करके; आत्मनः—आत्मा का; प्राणम्—प्राणवायु; आस्थितः—स्थित; योग-धारणाम्—योग की स्थिति।
योग की स्थिति समस्त ऐन्द्रिक प्रवृत्तियों से अनासक्ति की स्थिति है। इन्द्रियों के समस्त द्वारों को बन्द करके तथा मन को हृदय में और प्राणवायु को शीश के शिखर पर स्थिर करके मनुष्य अपने को योग में स्थापित करता है।
योग का अभ्यास करने हेतु, जैसा यहाँ सुझाया गया है, मनुष्य को सर्वप्रथम समस्त इन्द्रियभोग का द्वार बन्द करना होता है। इस अभ्यास को प्रत्याहार कहा जाता है, अर्थात् इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से खींच लेना। ज्ञान प्राप्त करने वाली इन्द्रियाँ, जैसे नेत्र, कान, नासिका, जिह्वा तथा त्वचा, पूर्ण रूप से संयमित की जानी चाहिए और उन्हें आत्म-तृप्ति में संलग्न होने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। इस प्रकार मन हृदय में स्थित परमात्मा पर केन्द्रित होता है और प्राणशक्ति शीश के शिखर पर उठाई जाती है। छठे अध्याय में इस प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन है। किन्तु जैसा पहले उल्लेख किया गया है, यह अभ्यास इस युग में व्यावहारिक नहीं है। सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया कृष्णभावनामृत है। यदि कोई भक्ति में अपना मन सदैव श्रीकृष्ण पर स्थिर करने में समर्थ है, तो उसके लिए अविचलित दिव्य समाधि में, अर्थात् समाधि में, स्थित रहना अत्यन्त सरल है।
Bg 8.13
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
ओम्—अक्षरों का संयोग, ओंकार; इति—इस प्रकार; एक-अक्षरम्—परम, अविनाशी; ब्रह्म—परब्रह्म; व्याहरन्—उच्चारण करते हुए; माम्—मुझको (श्रीकृष्ण को); अनुस्मरन्—स्मरण करते हुए; यः—जो कोई; प्रयाति—प्रस्थान करता है; त्यजन्—त्यागते हुए; देहम्—इस शरीर को; सः—वह; याति—प्राप्त करता है; परमाम्—परम; गतिम्—गन्तव्य।
इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा अक्षरों के परम संयोग, ओम् इस पवित्र अक्षर का उच्चारण करते हुए, यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का चिन्तन करता है और अपना शरीर त्यागता है, तो वह निश्चय ही आध्यात्मिक लोकों को प्राप्त करेगा।
यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ओम्, ब्रह्म तथा भगवान् श्रीकृष्ण भिन्न नहीं हैं। श्रीकृष्ण की निराकार ध्वनि ओम् है, किन्तु हरे कृष्ण ध्वनि में ओम् सम्मिलित है। इस युग में स्पष्ट रूप से अनुशंसा है कि यदि कोई इस जीवन के अन्त में हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते हुए अपना शरीर त्यागता है, तो वह आध्यात्मिक लोकों को प्राप्त करेगा। इसी प्रकार, जो श्रीकृष्ण के भक्त हैं, वे कृष्णलोक अथवा गोलोक वृन्दावन में प्रवेश करते हैं, जबकि निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति में रह जाते हैं। साकारवादी आध्यात्मिक आकाश में वैकुण्ठ नामक अनेक असंख्य लोकों में भी प्रवेश करते हैं।
Bg 8.14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥
अनन्य-चेताः—विचलन रहित; सततम्—सदैव; यः—जो कोई; माम्—मुझको (श्रीकृष्ण को); स्मरति—स्मरण करता है; नित्यशः—नियमित रूप से; तस्य—उसके लिए; अहम्—मैं हूँ; सुलभः—प्राप्त करने में अत्यन्त सरल; पार्थ—हे पृथापुत्र; नित्य—नियमित रूप से; युक्तस्य—संलग्न; योगिनः—भक्त के लिए।
हे पृथापुत्र, जो विचलन रहित होकर मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं सरलता से प्राप्य हूँ, क्योंकि वह भक्ति में निरन्तर संलग्न रहता है।
इस श्लोक में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अनन्य भक्तों के भक्तियोग का वर्णन है। पूर्ववर्ती श्लोकों में चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख है—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा कल्पनावादी दार्शनिक। भौतिक बन्धन से मुक्ति की विभिन्न प्रक्रियाओं का भी वर्णन हुआ है: कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा हठयोग। किन्तु यहाँ इनके किसी मिश्रण के बिना, भक्तियोग का उल्लेख है। भक्तियोग में भक्तगण श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी वस्तु की इच्छा नहीं करते। शुद्ध भक्त न तो स्वर्गलोकों में उन्नति की इच्छा करता है, न ही भौतिक बन्धन से मोक्ष अथवा मुक्ति चाहता है। शुद्ध भक्त किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता। चैतन्य-चरितामृत में शुद्ध भक्त को निष्काम कहा गया है, जिसका अर्थ है कि उसे स्वार्थ की कोई इच्छा नहीं है। पूर्ण शान्ति केवल उसी की है, उनकी नहीं जो व्यक्तिगत लाभ के लिए प्रयत्न करते हैं। शुद्ध भक्त केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहता है, अतः भगवान् कहते हैं कि जो कोई अविचल रूप से उनके प्रति समर्पित है, उसके लिए वे सरलता से प्राप्य हैं। भक्त परमेश्वर के किसी भी दिव्य रूप की सेवा कर सकता है, और उसे उन समस्याओं में से किसी का सामना नहीं करना पड़ता जो अन्य योगों के साधकों को कष्ट देती हैं। भक्तियोग अत्यन्त सरल, शुद्ध तथा सम्पन्न करने में सुगम है। मनुष्य केवल हरे कृष्ण का जप करके आरम्भ कर सकता है। श्रीकृष्ण उन पर अत्यन्त कृपालु हैं जो उनकी सेवा में संलग्न होते हैं, और वे उस भक्त की, जो पूर्ण रूप से उनके शरणागत है, विविध प्रकार से सहायता करते हैं, ताकि वह उन्हें यथारूप समझ सके। भगवान् ऐसे भक्त को पर्याप्त बुद्धि प्रदान करते हैं, ताकि अन्ततः भक्त उन्हें उनके आध्यात्मिक धाम में प्राप्त कर सके।
शुद्ध भक्त की विशेष योग्यता यह है कि वह समय अथवा स्थान का विचार किए बिना सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है। इसमें कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। उसे कहीं भी और किसी भी समय अपनी सेवा सम्पन्न करने में समर्थ होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि भक्त को वृन्दावन जैसे पवित्र स्थानों में अथवा किसी पवित्र नगर में, जहाँ भगवान् रहे थे, रहना चाहिए, किन्तु शुद्ध भक्त कहीं भी रह सकता है और अपनी भक्ति द्वारा वृन्दावन का वातावरण निर्मित कर सकता है। श्री अद्वैत ने ही भगवान् चैतन्य से कहा था, “हे प्रभु, जहाँ भी आप हैं—वहीं वृन्दावन है।”
शुद्ध भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण करता है और उनका ध्यान करता है। ये शुद्ध भक्त की वे योग्यताएँ हैं, जिनके कारण भगवान् उसे अत्यन्त सरलता से प्राप्य हैं। भक्तियोग वह प्रणाली है जिसकी गीता सबसे ऊपर अनुशंसा करती है। सामान्यतः भक्तियोगी पाँच विभिन्न रीतियों में संलग्न रहते हैं: 1) शान्त-भक्त, तटस्थता में भक्ति में संलग्न; 2) दास्य-भक्त, सेवक के रूप में भक्ति में संलग्न; 3) सख्य-भक्त, मित्र के रूप में संलग्न; 4) वात्सल्य-भक्त, माता-पिता के रूप में संलग्न; और 5) माधुर्य-भक्त, परमेश्वर के दाम्पत्य प्रेमी के रूप में संलग्न। इनमें से किसी भी रीति में शुद्ध भक्त सदैव परमेश्वर की दिव्य प्रेममयी सेवा में निरन्तर संलग्न रहता है और परमेश्वर को विस्मृत नहीं कर सकता, अतः उसके लिए भगवान् सरलता से प्राप्य हैं। शुद्ध भक्त एक क्षण के लिए भी परमेश्वर को विस्मृत नहीं कर सकता, और इसी प्रकार परमेश्वर भी एक क्षण के लिए अपने शुद्ध भक्त को विस्मृत नहीं कर सकते। हरे कृष्ण महामन्त्र के जप की कृष्णभावनामृत-प्रक्रिया का यही महान् आशीर्वाद है।
Bg 8.15
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥
माम्—मुझको; उपेत्य—प्राप्त करके; पुनः—पुनः; जन्म—जन्म; दुःख-आलयम्—दुःखों का स्थान; अशाश्वतम्—क्षणिक; न—कभी नहीं; आप्नुवन्ति—प्राप्त करते हैं; महात्मानः—महान् आत्माएँ; संसिद्धिम्—सिद्धि; परमाम्—परम; गताः—प्राप्त।
मुझे प्राप्त करने के पश्चात् महान् आत्माएँ, जो भक्ति में योगी हैं, इस क्षणिक संसार में कभी नहीं लौटतीं, जो दुःखों से पूर्ण है, क्योंकि उन्होंने परम सिद्धि प्राप्त कर ली है।
चूँकि यह क्षणिक भौतिक जगत् जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु के दुःखों से पूर्ण है, अतः जो परम सिद्धि प्राप्त करता है और परम लोक, कृष्णलोक, गोलोक वृन्दावन को प्राप्त करता है, वह स्वभावतः लौटना नहीं चाहता। वैदिक साहित्य में परम लोक का वर्णन हमारी भौतिक दृष्टि से परे के रूप में हुआ है, और इसे परम लक्ष्य माना जाता है। महात्मा (महान् आत्माएँ) साक्षात्कारी भक्तों से दिव्य सन्देश प्राप्त करते हैं और इस प्रकार धीरे-धीरे कृष्णभावनामृत में भक्ति का विकास करते हैं और दिव्य सेवा में इतने तल्लीन हो जाते हैं कि वे किसी भी भौतिक लोक में उन्नति की कामना नहीं करते, न ही वे किसी आध्यात्मिक लोक में स्थानान्तरित किए जाने की इच्छा करते हैं। वे केवल श्रीकृष्ण की संगति चाहते हैं और कुछ नहीं। कृष्णभावनामृत में ऐसी महान् आत्माएँ जीवन की परम सिद्धि प्राप्त करती हैं। दूसरे शब्दों में, वे परम आत्माएँ हैं।
Bg 8.16
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
आब्रह्म—ब्रह्मलोक तक; भुवनात्—लोक-समूहों से; लोकाः—लोक; पुनः—पुनः; आवर्तिनः—लौटने वाले; अर्जुन—हे अर्जुन; माम्—मुझको; उपेत्य—प्राप्त करके; तु—किन्तु; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; पुनः जन्म—पुनर्जन्म; न—कभी नहीं; विद्यते—होता है।
भौतिक जगत् के सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम लोक तक, सभी दुःख के स्थान हैं, जहाँ बारम्बार जन्म-मृत्यु होती रहती है। किन्तु हे कुन्तीपुत्र, जो मेरे धाम को प्राप्त कर लेता है, वह पुनः कभी जन्म नहीं लेता।
कर्म, ज्ञान, हठ आदि सभी प्रकार के योगियों को कृष्ण के दिव्य धाम में जाने तथा वहाँ से कभी न लौटने से पूर्व अन्ततः भक्तियोग, अर्थात् कृष्णभावनामृत में भक्ति की पूर्णता प्राप्त करनी ही पड़ती है। जो सर्वोच्च भौतिक लोकों अथवा देवताओं के लोकों को प्राप्त करते हैं, वे पुनः बारम्बार जन्म-मृत्यु के अधीन हो जाते हैं। जिस प्रकार पृथ्वी के व्यक्ति उच्चतर लोकों को उठाए जाते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मलोक, चन्द्रलोक तथा इन्द्रलोक जैसे उच्चतर लोकों के निवासी पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। कठोपनिषद् में अनुशंसित पञ्चाग्नि-विद्या नामक यज्ञ का अभ्यास मनुष्य को ब्रह्मलोक प्राप्त करा सकता है, किन्तु यदि ब्रह्मलोक में मनुष्य कृष्णभावनामृत का अनुशीलन नहीं करता, तो उसे पृथ्वी पर लौटना ही पड़ता है। जो उच्चतर लोकों में कृष्णभावनामृत में प्रगति करते हैं, वे क्रमशः उच्चतर एवं उच्चतर लोकों तक उठाए जाते हैं और विश्व-प्रलय के समय नित्य आध्यात्मिक राज्य में स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं। जब इस भौतिक ब्रह्माण्ड का प्रलय होता है, तब ब्रह्मा तथा उनके भक्तगण, जो निरन्तर कृष्णभावनामृत में संलग्न रहते हैं, सभी आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड में तथा अपनी इच्छाओं के अनुसार विशिष्ट आध्यात्मिक लोकों में स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं।
Bg 8.17
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥
सहस्र—सहस्र; युग—युगों; पर्यन्तम्—सहित; अहः—दिन; यत्—जो; ब्रह्मणः—ब्रह्मा का; विदुः—जानते हैं; रात्रिम्—रात्रि; युग—युगों; सहस्र-अन्ताम्—इसी प्रकार, एक सहस्र के अन्त में; ते—वे; अहः-रात्र—दिन तथा रात्रि; विदः—समझने वाले; जनाः—मनुष्य।
मानवीय गणना के अनुसार, एक सहस्र युगों का योग ब्रह्मा के एक दिन के तुल्य है। और उनकी रात्रि की अवधि भी इतनी ही है।
भौतिक ब्रह्माण्ड की अवधि सीमित है। यह कल्पों के चक्रों में प्रकट होता है। एक कल्प ब्रह्मा का एक दिन होता है, और ब्रह्मा का एक दिन चार युगों, अर्थात् सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि के एक सहस्र चक्रों से बनता है। सत्ययुग का चक्र सद्गुण, प्रज्ञा तथा धर्म से युक्त होता है, जिसमें अज्ञान तथा दुर्गुण प्रायः नहीं होते, और यह युग 17,28,000 वर्षों तक रहता है। त्रेतायुग में दुर्गुण का प्रवेश होता है, और यह युग 12,96,000 वर्षों तक रहता है। द्वापरयुग में सद्गुण तथा धर्म का और अधिक ह्रास होता है, दुर्गुण बढ़ता है, और यह युग 8,64,000 वर्षों तक रहता है। और अन्ततः कलियुग में (वह युग जिसका अनुभव हम विगत पाँच हज़ार वर्षों से कर रहे हैं) कलह, अज्ञान, अधर्म तथा दुर्गुण की प्रचुरता होती है, सच्चा सद्गुण प्रायः अस्तित्वहीन रहता है, और यह युग 4,32,000 वर्षों तक रहता है। कलियुग में दुर्गुण इस सीमा तक बढ़ जाता है कि युग की समाप्ति पर स्वयं परमेश्वर कल्कि अवतार के रूप में प्रकट होते हैं, असुरों का संहार करते हैं, अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, और एक अन्य सत्ययुग का आरम्भ करते हैं। तब यह प्रक्रिया पुनः चल पड़ती है। ये चार युग सहस्र बार घूमकर सृष्टिकर्ता देव ब्रह्मा का एक दिन बनाते हैं, और इतनी ही संख्या उनकी एक रात्रि बनाती है। ब्रह्मा ऐसे सौ “वर्ष” जीवित रहते हैं और तत्पश्चात् मृत्यु को प्राप्त होते हैं। ये “सौ वर्ष” पार्थिव गणना के अनुसार 311 खरब 40 अरब पार्थिव वर्षों के तुल्य होते हैं। इन गणनाओं के अनुसार ब्रह्मा का जीवन अद्भुत तथा अनन्त प्रतीत होता है, किन्तु नित्यता के दृष्टिकोण से वह विद्युत्-चमक के समान क्षणभंगुर है। कारण-सागर में असंख्य ब्रह्मा हैं, जो अटलाण्टिक के बुलबुलों के समान उठते तथा विलीन होते रहते हैं। ब्रह्मा तथा उनकी सृष्टि—सभी भौतिक ब्रह्माण्ड के अंश हैं, अतः वे निरन्तर परिवर्तनशील हैं।
भौतिक ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा भी जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु की प्रक्रिया से मुक्त नहीं हैं। तथापि ब्रह्मा इस ब्रह्माण्ड के प्रबन्धन में साक्षात् परमेश्वर की सेवा में संलग्न रहते हैं—अतएव वे तत्काल मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। उन्नत संन्यासियों को ब्रह्मा के विशिष्ट लोक ब्रह्मलोक में पदोन्नत किया जाता है, जो भौतिक ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च लोक है और जो लोक-व्यवस्था के ऊपरी स्तरों के समस्त स्वर्गीय लोकों के पश्चात् तक भी विद्यमान रहता है, किन्तु यथासमय ब्रह्मा तथा ब्रह्मलोक के समस्त निवासी भौतिक प्रकृति के नियम के अनुसार मृत्यु के अधीन हो जाते हैं।
Bg 8.18
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥
अव्यक्तात्—अव्यक्त से; व्यक्तयः—जीव; सर्वाः—समस्त; प्रभवन्ति—प्रकट होते हैं; अहः-आगमे—दिन के आरम्भ में; रात्रि-आगमे—रात्रि के आगमन पर; प्रलीयन्ते—विनष्ट हो जाते हैं; तत्र—वहाँ; एव—निश्चय ही; अव्यक्त—अव्यक्त; संज्ञके—कहलाने वाले में।
जब ब्रह्मा का दिन प्रकट होता है, तब जीवों का यह समूह अस्तित्व में आता है, और ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर वे सब विनष्ट हो जाते हैं।
अल्पबुद्धि जीव इस भौतिक जगत् के भीतर रहने का प्रयत्न करते हैं और तदनुसार विभिन्न लोक-व्यवस्थाओं में उन्नत तथा अवनत होते रहते हैं। ब्रह्मा के दिन के समय वे अपनी क्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं, और ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर वे विनष्ट हो जाते हैं। दिन में वे भौतिक क्रियाओं हेतु विभिन्न शरीर प्राप्त करते हैं, और रात्रि में ये शरीर नष्ट हो जाते हैं। जीव (व्यष्टि आत्माएँ) विष्णु के शरीर में सुसंहत रहते हैं और बारम्बार ब्रह्मा के दिन के आगमन पर प्रकट होते हैं। जब ब्रह्मा का जीवन अन्ततः समाप्त हो जाता है, तब वे सब विनष्ट हो जाते हैं और करोड़ों-करोड़ों वर्षों तक अव्यक्त रहते हैं। अन्ततः जब किसी अन्य कल्प में ब्रह्मा का पुनः जन्म होता है, तब वे फिर से प्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार जीव भौतिक जगत् द्वारा मोहित रहते हैं। तथापि जो बुद्धिमान् प्राणी कृष्णभावनामृत को ग्रहण करते हैं और भक्ति में हरे कृष्ण, हरे राम का जप करते हैं, वे इसी जीवन में भी अपने को कृष्ण के आध्यात्मिक लोक में स्थानान्तरित कर लेते हैं और वहाँ नित्य आनन्दमय हो जाते हैं, ऐसे पुनर्जन्मों के अधीन नहीं रहते।
Bg 8.19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥
भूत-ग्रामः—समस्त जीवों का समूह; सः—वे; एव—निश्चय ही; अयम्—यह; भूत्वा भूत्वा—जन्म लेकर; प्रलीयते—विनष्ट होते हैं; रात्रि—रात्रि; आगमे—आगमन पर; अवशः—स्वतः ही; पार्थ—हे पृथापुत्र; प्रभवन्ति—प्रकट होते हैं; अहः—दिन के समय; आगमे—आगमन पर।
हे पार्थ, बारम्बार दिन आता है और जीवों का यह समूह सक्रिय होता है; और फिर रात्रि होती है, और वे विवश होकर विलीन हो जाते हैं।
Bg 8.2
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥
अधियज्ञः—यज्ञ के स्वामी; कथम्—कैसे; कः—कौन; अत्र—यहाँ; देहे—शरीर में; अस्मिन्—इसमें; मधुसूदन—हे मधुसूदन; प्रयाण-काले—मृत्यु के समय; च—तथा; कथम्—कैसे; ज्ञेयः—जाने जाते हैं; असि—आप; नियत-आत्मभिः—आत्मसंयमी जनों द्वारा।
हे मधुसूदन, यज्ञ के ये स्वामी शरीर में किस प्रकार निवास करते हैं, और शरीर के किस भाग में निवास करते हैं? और भक्ति में संलग्न जन मृत्यु के समय आपको कैसे जान सकते हैं?
यज्ञ के स्वामी से अभिप्राय इन्द्र तथा विष्णु से है। ब्रह्मा तथा शिव सहित जो आदि देवता हैं, उनमें विष्णु प्रमुख हैं, और प्रशासनिक देवताओं में इन्द्र प्रमुख हैं। इन्द्र तथा विष्णु, दोनों की यज्ञानुष्ठान द्वारा आराधना की जाती है। किन्तु यहाँ अर्जुन पूछते हैं कि वस्तुतः यज्ञ के स्वामी कौन हैं, और भगवान् जीव के शरीर के भीतर किस प्रकार निवास करते हैं।
अर्जुन भगवान् को मधुसूदन कहकर सम्बोधित करते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण ने एक बार मधु नामक असुर का वध किया था। वस्तुतः ये प्रश्न, जो सन्देह के स्वभाव के हैं, अर्जुन के मन में उठने नहीं चाहिए थे, क्योंकि अर्जुन कृष्णभावनाभावित भक्त हैं। अतः ये सन्देह असुरों के समान हैं। चूँकि श्रीकृष्ण असुरों का वध करने में अत्यन्त निपुण हैं, अतः यहाँ अर्जुन उन्हें मधुसूदन कहकर सम्बोधित करते हैं, ताकि श्रीकृष्ण अर्जुन के मन में उठने वाले इन आसुरिक सन्देहों का वध कर सकें।
इस श्लोक में प्रयाण-काल शब्द अत्यन्त सार्थक है, क्योंकि हम जीवन में जो कुछ करते हैं, उसकी परीक्षा मृत्यु के समय होगी। अर्जुन को भय है कि मृत्यु के समय जो कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, वे परमेश्वर को विस्मृत कर देंगे, क्योंकि उस समय शरीर की क्रियाएँ अस्तव्यस्त हो जाती हैं और मन आतंकित अवस्था में हो सकता है। अतः महान् भक्त महाराज कुलशेखर प्रार्थना करते हैं, “हे मेरे प्रभु, मैं अभी स्वस्थ रहते हुए ही तत्क्षण मर जाऊँ, ताकि मेरे मन का हंस आपके चरणकमलों की नाल में प्रवेश कर सके।” यह रूपक इसलिए प्रयुक्त हुआ है, क्योंकि हंस प्रायः कमल-पुष्प की नाल में प्रवेश करने में आनन्द लेता है—इसी प्रकार शुद्ध भक्त का मन भगवान् के चरणकमलों की ओर आकृष्ट होता है। महाराज कुलशेखर को भय है कि मृत्यु के क्षण में उनका कण्ठ इतना अवरुद्ध हो जाएगा कि वे पवित्र नामों का उच्चारण नहीं कर सकेंगे, अतः “तत्क्षण मर जाना” ही श्रेयस्कर है। अर्जुन प्रश्न करते हैं कि ऐसे समय में मनुष्य का मन श्रीकृष्ण के चरणकमलों पर किस प्रकार स्थिर रह सकता है।
Bg 8.20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥
अव्यक्तः—अव्यक्त; अक्षरः—अविनाशी; इति—इस प्रकार; उक्तः—कहा गया; तम्—जो; आहुः—जाना जाता है; परमाम्—परम; गतिम्—गन्तव्य; यम्—जिसे; प्राप्य—प्राप्त करके; न—कभी नहीं; निवर्तन्ते—लौटते हैं; तत्-धाम—वह धाम; परमम्—परम; मम—मेरा।
वह परम धाम अव्यक्त तथा अविनाशी कहलाता है, और वही परम गन्तव्य है। जब मनुष्य वहाँ जाता है, तब वह कभी नहीं लौटता। वही मेरा परम धाम है।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के परम धाम का वर्णन ब्रह्म-संहिता में चिन्तामणि-धाम के रूप में हुआ है, जो ऐसा स्थान है जहाँ समस्त इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का परम धाम, जो गोलोक वृन्दावन के नाम से विख्यात है, स्पर्शमणि से निर्मित प्रासादों से परिपूर्ण है। वहाँ ऐसे वृक्ष भी हैं, जिन्हें “कल्पवृक्ष” कहा जाता है, जो माँगने पर किसी भी प्रकार का भोज्य पदार्थ प्रदान करते हैं, और वहाँ सुरभि नामक गौएँ हैं, जो दुग्ध की असीम आपूर्ति करती हैं। इस धाम में भगवान् की सेवा सहस्रों लक्ष्मियों (भाग्य की देवियों) द्वारा होती है, और वे गोविन्द कहलाते हैं, जो आदि भगवान् तथा समस्त कारणों के कारण हैं। भगवान् को अपनी वंशी बजाने का अभ्यास है (वेणुं क्वणन्तम्)। उनका दिव्य रूप समस्त लोकों में सर्वाधिक आकर्षक है—उनके नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान हैं और उनके शरीर का वर्ण मेघों के समान है। वे इतने आकर्षक हैं कि उनका सौन्दर्य सहस्रों कामदेवों के सौन्दर्य से बढ़कर है। वे केसरिया वस्त्र धारण करते हैं, अपने गले में माला तथा अपने केशों में मोरपंख धारण करते हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अपने व्यक्तिगत धाम (गोलोक वृन्दावन) का, जो आध्यात्मिक राज्य का सर्वोच्च लोक है, केवल एक संक्षिप्त संकेत देते हैं। एक सजीव वर्णन ब्रह्म-संहिता में दिया गया है। वैदिक साहित्य कहता है कि परम भगवान् के धाम से बढ़कर कुछ भी नहीं है, और वह धाम ही परम गन्तव्य है। जब मनुष्य उसे प्राप्त कर लेता है, तब वह कभी भौतिक जगत् में नहीं लौटता। कृष्ण का परम धाम तथा स्वयं कृष्ण अभिन्न हैं, क्योंकि वे एक ही गुण के हैं। इस पृथ्वी पर, दिल्ली से नब्बे मील दक्षिण-पूर्व में स्थित वृन्दावन, आध्यात्मिक आकाश में स्थित उस परम गोलोक वृन्दावन का प्रतिरूप है। जब कृष्ण इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब उन्होंने भारत के मथुरा जनपद में वृन्दावन नामक उसी विशेष भूखण्ड पर अपनी लीलाएँ कीं।
Bg 8.21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥
अव्यक्तः—अव्यक्त; अक्षरः—अविनाशी; इति—इस प्रकार; उक्तः—कहा गया; तम्—जो; आहुः—जाना जाता है; परमाम्—परम; गतिम्—गन्तव्य; यम्—जिसे; प्राप्य—प्राप्त करके; न—कभी नहीं; निवर्तन्ते—लौटते हैं; तत्-धाम—वह धाम; परमम्—परम; मम—मेरा।
वह परम धाम अव्यक्त तथा अविनाशी कहलाता है, और वही परम गन्तव्य है। जब मनुष्य वहाँ जाता है, तब वह कभी नहीं लौटता। वही मेरा परम धाम है।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के परम धाम का वर्णन ब्रह्म-संहिता में चिन्तामणि-धाम के रूप में हुआ है, जो ऐसा स्थान है जहाँ समस्त इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का परम धाम, जो गोलोक वृन्दावन के नाम से विख्यात है, स्पर्शमणि से निर्मित प्रासादों से परिपूर्ण है। वहाँ ऐसे वृक्ष भी हैं, जिन्हें “कल्पवृक्ष” कहा जाता है, जो माँगने पर किसी भी प्रकार का भोज्य पदार्थ प्रदान करते हैं, और वहाँ सुरभि नामक गौएँ हैं, जो दुग्ध की असीम आपूर्ति करती हैं। इस धाम में भगवान् की सेवा सहस्रों लक्ष्मियों (भाग्य की देवियों) द्वारा होती है, और वे गोविन्द कहलाते हैं, जो आदि भगवान् तथा समस्त कारणों के कारण हैं। भगवान् को अपनी वंशी बजाने का अभ्यास है (वेणुं क्वणन्तम्)। उनका दिव्य रूप समस्त लोकों में सर्वाधिक आकर्षक है—उनके नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान हैं और उनके शरीर का वर्ण मेघों के समान है। वे इतने आकर्षक हैं कि उनका सौन्दर्य सहस्रों कामदेवों के सौन्दर्य से बढ़कर है। वे केसरिया वस्त्र धारण करते हैं, अपने गले में माला तथा अपने केशों में मोरपंख धारण करते हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अपने व्यक्तिगत धाम (गोलोक वृन्दावन) का, जो आध्यात्मिक राज्य का सर्वोच्च लोक है, केवल एक संक्षिप्त संकेत देते हैं। एक सजीव वर्णन ब्रह्म-संहिता में दिया गया है। वैदिक साहित्य कहता है कि परम भगवान् के धाम से बढ़कर कुछ भी नहीं है, और वह धाम ही परम गन्तव्य है। जब मनुष्य उसे प्राप्त कर लेता है, तब वह कभी भौतिक जगत् में नहीं लौटता। कृष्ण का परम धाम तथा स्वयं कृष्ण अभिन्न हैं, क्योंकि वे एक ही गुण के हैं। इस पृथ्वी पर, दिल्ली से नब्बे मील दक्षिण-पूर्व में स्थित वृन्दावन, आध्यात्मिक आकाश में स्थित उस परम गोलोक वृन्दावन का प्रतिरूप है। जब कृष्ण इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब उन्होंने भारत के मथुरा जनपद में वृन्दावन नामक उसी विशेष भूखण्ड पर अपनी लीलाएँ कीं।
Bg 8.22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥
पुरुषः—परम पुरुष; सः—वे; परः—परम, जिससे बढ़कर कोई नहीं; पार्थ—हे पृथापुत्र; भक्त्या—भक्ति द्वारा; लभ्यः—प्राप्त किए जा सकते हैं; तु—किन्तु; अनन्यया—अनन्य, अविचलित भक्ति द्वारा; यस्य—जिनके; अन्तःस्थानि—भीतर; भूतानि—यह समस्त भौतिक प्रकटीकरण; येन—जिनके द्वारा; सर्वम्—समस्त; इदम्—जो कुछ हम देख सकते हैं; ततम्—व्याप्त।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो सबसे बढ़कर हैं, अनन्य भक्ति द्वारा प्राप्य हैं। यद्यपि वे अपने धाम में विद्यमान हैं, तथापि वे सर्वव्यापी हैं, और सब कुछ उनके भीतर स्थित है।
यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वह परम गन्तव्य, जहाँ से कोई वापसी नहीं, परम पुरुष कृष्ण का धाम है। ब्रह्म-संहिता इस परम धाम का वर्णन आनन्द-चिन्मय-रस के रूप में करती है, जो ऐसा स्थान है जहाँ सब कुछ आध्यात्मिक आनन्द से परिपूर्ण है। वहाँ जो भी विविधता प्रकट है, वह सब आध्यात्मिक आनन्द के गुण की है—वहाँ कुछ भी भौतिक नहीं है। समस्त विविधता स्वयं परम भगवान् के आध्यात्मिक विस्तार के रूप में विस्तृत होती है, क्योंकि वहाँ का प्रकटीकरण पूर्णतः आध्यात्मिक शक्ति का है, जैसा कि सप्तम अध्याय में समझाया गया है। जहाँ तक इस भौतिक जगत् का प्रश्न है, यद्यपि भगवान् सदैव अपने परम धाम में रहते हैं, तथापि वे अपनी भौतिक शक्ति द्वारा सर्वव्यापी हैं। अतः अपनी आध्यात्मिक तथा भौतिक शक्तियों द्वारा वे सर्वत्र विद्यमान हैं—भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ब्रह्माण्डों में। यस्यान्तःस्थानि का अर्थ है कि सब कुछ उनके द्वारा धारण किया जाता है, चाहे वह आध्यात्मिक शक्ति हो अथवा भौतिक।
यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि केवल भक्ति, अर्थात् भगवद्भक्ति द्वारा ही मनुष्य वैकुण्ठ (आध्यात्मिक) लोक-व्यवस्था में प्रवेश कर सकता है। समस्त वैकुण्ठों में केवल एक ही परम भगवान् कृष्ण हैं, जिन्होंने स्वयं को करोड़ों-करोड़ों पूर्ण विस्तारों में विस्तृत किया है। ये पूर्ण विस्तार चतुर्भुज हैं, और वे असंख्य आध्यात्मिक लोकों पर शासन करते हैं। वे अनेक नामों से विख्यात हैं—पुरुषोत्तम, त्रिविक्रम, केशव, माधव, अनिरुद्ध, हृषीकेश, संकर्षण, प्रद्युम्न, श्रीधर, वासुदेव, दामोदर, जनार्दन, नारायण, वामन, पद्मनाभ आदि। ये पूर्ण विस्तार वृक्ष के पत्तों के समान हैं, और मुख्य वृक्ष कृष्ण के समान है। अपने परम धाम गोलोक वृन्दावन में निवास करते हुए, कृष्ण अपनी सर्वव्यापकता की शक्ति से दोनों ब्रह्माण्डों (भौतिक तथा आध्यात्मिक) के समस्त कार्यों को बिना किसी त्रुटि के व्यवस्थित रूप से संचालित करते हैं।
Bg 8.23
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
यत्र—जिस; काले—समय; तु—किन्तु; अनावृत्तिम्—अवापसी; आवृत्तिम्—वापसी; च—भी; एव—निश्चय ही; योगिनः—विभिन्न प्रकार के योगियों का; प्रयाताः—जो जाता है; यान्ति—प्रस्थान करता है; तम्—उस; कालम्—समय; वक्ष्यामि—वर्णन करता हूँ; भरतर्षभ—हे भरतश्रेष्ठ।
हे भरतश्रेष्ठ, अब मैं तुम्हें वे विभिन्न काल समझाऊँगा, जिनमें इस जगत् से प्रयाण करते हुए मनुष्य लौटता अथवा नहीं लौटता।
परम भगवान् के अनन्य भक्त, जो पूर्णतः शरणागत आत्माएँ हैं, इस बात की चिन्ता नहीं करते कि वे कब अपने शरीर का त्याग करते हैं अथवा किस विधि से। वे सब कुछ कृष्ण के हाथों में छोड़ देते हैं और इस प्रकार सरलतापूर्वक तथा प्रसन्नतापूर्वक भगवान् के पास लौट जाते हैं। किन्तु जो अनन्य भक्त नहीं हैं और जो इसके स्थान पर कर्मयोग, ज्ञानयोग, हठयोग आदि आध्यात्मिक साक्षात्कार की विधियों पर निर्भर रहते हैं, उन्हें उपयुक्त समय पर शरीर त्यागना पड़ता है, और इसी से यह सुनिश्चित होता है कि वे जन्म-मृत्यु के जगत् में लौटेंगे अथवा नहीं।
यदि योगी पूर्ण है, तो वह इस भौतिक जगत् को छोड़ने के लिए समय तथा स्थान चुन सकता है, किन्तु यदि वह उतना पूर्ण नहीं है, तो उसे प्रकृति की इच्छा पर ही प्रयाण करना पड़ता है। शरीर त्यागने तथा न लौटने का सर्वाधिक उपयुक्त समय भगवान् इन श्लोकों में समझा रहे हैं। आचार्य बलदेव विद्याभूषण के अनुसार, यहाँ प्रयुक्त संस्कृत शब्द काल समय के अधिष्ठाता देवता को सूचित करता है।
Bg 8.24
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥
अग्निः—अग्नि; ज्योतिः—प्रकाश; अहः—दिन; शुक्लः—शुक्ल; षट्-मासाः—छह मास; उत्तरायणम्—जब सूर्य उत्तर की ओर गमन करता है; तत्र—वहाँ; प्रयाताः—जो जाता है; गच्छन्ति—प्रयाण करता है; ब्रह्म—परब्रह्म; ब्रह्म-विदः—जो परब्रह्म को जानता है; जनाः—व्यक्ति।
जो परब्रह्म को जानते हैं, वे अग्निदेव के प्रभाव-काल में, प्रकाश में, शुभ क्षण में, चन्द्रमा के शुक्लपक्ष में तथा उन छह मासों में जगत् से प्रयाण करते हैं, जब सूर्य उत्तर की ओर गमन करता है।
जब अग्नि, प्रकाश, दिन तथा चन्द्रमा का उल्लेख होता है, तब यह समझना चाहिए कि इन सब पर विभिन्न अधिष्ठाता देवता हैं, जो आत्मा के प्रयाण की व्यवस्था करते हैं। मृत्यु के समय जीव एक नए जीवन के मार्ग पर अग्रसर होता है। यदि कोई ऊपर निर्दिष्ट समय पर, चाहे संयोगवश अथवा व्यवस्था द्वारा, शरीर त्यागता है, तो उसके लिए निराकार ब्रह्मज्योति प्राप्त करना सम्भव है। योगाभ्यास में उन्नत योगी शरीर त्यागने के समय तथा स्थान की व्यवस्था कर सकते हैं। अन्यों का कोई नियन्त्रण नहीं रहता—यदि संयोगवश वे किसी शुभ क्षण में प्रयाण करते हैं, तो वे जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं लौटेंगे, किन्तु यदि नहीं, तो उनके लौटने की पूरी सम्भावना रहती है। तथापि कृष्णभावनामृत में स्थित शुद्ध भक्त के लिए लौटने का कोई भय नहीं है, चाहे वह शुभ अथवा अशुभ क्षण में, संयोगवश अथवा व्यवस्था द्वारा शरीर त्यागे।
Bg 8.25
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥
धूमः—धूम; रात्रिः—रात्रि; तथा—भी; कृष्णः—कृष्णपक्ष; षट्-मासाः—छह मास; दक्षिण-अयनम्—जब सूर्य दक्षिण की ओर गमन करता है; तत्र—वहाँ; चान्द्रमसम्—चन्द्रलोक; ज्योतिः—प्रकाश; योगी—योगी; प्राप्य—प्राप्त करके; निवर्तते—लौटता है।
जो योगी धूम में, रात्रि में, कृष्णपक्ष में अथवा उन छह मासों में जगत् से प्रयाण करता है, जब सूर्य दक्षिण की ओर जाता है, अथवा जो चन्द्रलोक को प्राप्त करता है, वह पुनः लौट आता है।
श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध में हमें बताया गया है कि जो पृथ्वी पर सकाम कर्मों तथा यज्ञ-विधियों में निपुण होते हैं, वे मृत्यु के समय चन्द्रलोक को प्राप्त करते हैं। ये उन्नत आत्माएँ चन्द्रमा पर लगभग दस हज़ार वर्षों (देवताओं की गणना के अनुसार) तक निवास करती हैं और सोम-रस का पान करते हुए जीवन का आनन्द भोगती हैं। वे अन्ततः पृथ्वी पर लौट आती हैं। इसका अर्थ है कि चन्द्रमा पर जीवों की उच्चतर श्रेणियाँ हैं, यद्यपि वे स्थूल इन्द्रियों द्वारा अनुभव में नहीं आतीं।
Bg 8.26
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
शुक्ल—प्रकाश; कृष्णे—अन्धकार; गती—प्रयाण-मार्ग; हि—निश्चय ही; एते—ये सब; जगतः—भौतिक जगत् का; शाश्वते—वेद; मते—मत में; एकया—एक से; याति—जाता है; अनावृत्तिम्—अवापसी; अन्यया—अन्य से; आवर्तते—लौट आता है; पुनः—पुनः।
वेदों के अनुसार, इस जगत् से प्रयाण के दो मार्ग हैं—एक प्रकाश में और एक अन्धकार में। जब मनुष्य प्रकाश में प्रयाण करता है, तब वह नहीं लौटता; किन्तु जब वह अन्धकार में प्रयाण करता है, तब वह लौट आता है।
प्रयाण तथा वापसी का यही वर्णन आचार्य बलदेव विद्याभूषण ने छान्दोग्य उपनिषद् से उद्धृत किया है। इस प्रकार, जो सकाम कर्मी तथा दार्शनिक कल्पनावादी हैं, वे अनादि काल से निरन्तर आते तथा जाते रहते हैं। वस्तुतः वे परम मोक्ष को प्राप्त नहीं करते, क्योंकि वे कृष्ण की शरण नहीं लेते।
Bg 8.27
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥
न—कभी नहीं; एते—ये सब; सृती—भिन्न मार्ग; पार्थ—हे पृथापुत्र; जानन्—यद्यपि वे जानते हैं; योगी—भगवान् के भक्तगण; मुह्यति—मोहित होता है; कश्चन—कोई भी; तस्मात्—अतः; सर्वेषु कालेषु—सदा; योग-युक्तः—कृष्णभावनामृत में संलग्न; भव—बन जाओ; अर्जुन—हे अर्जुन।
हे अर्जुन, जो भक्त इन दोनों मार्गों को जानते हैं, वे कभी मोहित नहीं होते। अतः तुम सदा भक्ति में स्थिर रहो।
कृष्ण यहाँ अर्जुन को सलाह दे रहे हैं कि भौतिक जगत् से प्रयाण करते समय आत्मा जिन विभिन्न मार्गों को अपना सकती है, उनसे उसे विचलित नहीं होना चाहिए। परम भगवान् के भक्त को इस बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि वह व्यवस्था द्वारा प्रयाण करेगा अथवा संयोगवश। भक्त को कृष्णभावनामृत में दृढ़तापूर्वक स्थित रहना चाहिए और हरे कृष्ण का जप करना चाहिए। उसे जानना चाहिए कि इन दोनों मार्गों में से किसी के विषय में चिन्ता करना कष्टप्रद है। कृष्णभावनामृत में तल्लीन होने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि मनुष्य सदा उनकी सेवा में संयोजित रहे, और इससे आध्यात्मिक राज्य की ओर उसका मार्ग सुरक्षित, सुनिश्चित तथा प्रत्यक्ष हो जाएगा। इस श्लोक में योग-युक्त शब्द विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। जो योग में दृढ़ है, वह अपनी समस्त क्रियाओं में निरन्तर कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है। श्री रूप गोस्वामी सलाह देते हैं कि मनुष्य को भौतिक जगत् में अनासक्त रहना चाहिए और उसके समस्त कार्य कृष्णभावनामृत में निमग्न होने चाहिए। इस प्रकार मनुष्य पूर्णता प्राप्त करता है। अतएव भक्त इन वर्णनों से विचलित नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि परम धाम की ओर उसका प्रयाण भक्ति द्वारा सुनिश्चित है।
Bg 8.28
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥
वेदेषु—वेदों के अध्ययन में; यज्ञेषु—यज्ञ के अनुष्ठान में; तपःसु—विभिन्न प्रकार की तपस्याओं को करने में; च—भी; एव—निश्चय ही; दानेषु—दान देने में; यत्—जो; पुण्य-फलम्—पुण्य कर्म का फल; प्रदिष्टम्—निर्देशित; अत्येति—पार कर जाता है; तत्—वे सब; सर्वम् इदम्—ऊपर वर्णित ये सब; विदित्वा—जानकर; योगी—भक्त; परम्—परम; स्थानम्—धाम; उपैति—प्राप्त करता है; च—भी; आद्यम्—आदि।
जो व्यक्ति भक्ति-मार्ग को स्वीकार करता है, वह वेदों के अध्ययन, कठोर यज्ञ करने, दान देने अथवा दार्शनिक तथा सकाम कर्मों में लगने से प्राप्त होने वाले फलों से वंचित नहीं रहता। अन्त में वह परम धाम को प्राप्त करता है।
यह श्लोक सप्तम तथा अष्टम अध्यायों का सार है, विशेषतः इसलिए कि ये अध्याय कृष्णभावनामृत तथा भक्ति का प्रतिपादन करते हैं। मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में वेदों का अध्ययन करना होता है और उनकी देखरेख में रहते हुए अनेक तपस्याएँ तथा प्रायश्चित करने होते हैं। ब्रह्मचारी को आध्यात्मिक गुरु के गृह में सेवक के समान रहना होता है, और उसे द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर उसे आध्यात्मिक गुरु के पास लाना होता है। वह केवल गुरु के आदेश पर ही भोजन ग्रहण करता है, और यदि गुरु उस दिन शिष्य को भोजन हेतु बुलाना भूल जाएँ, तो शिष्य उपवास करता है। ये ब्रह्मचर्य के पालन हेतु कुछ वैदिक नियम हैं।
पाँच से बीस वर्षों की अवधि तक गुरु के अधीन वेदों का अध्ययन करने के पश्चात् शिष्य पूर्ण चरित्र का पुरुष बन सकता है। वेदों का अध्ययन आराम-कुर्सी पर बैठे कल्पनावादियों के मनोरंजन के लिए नहीं, अपितु चरित्र-निर्माण के लिए है। इस प्रशिक्षण के पश्चात् ब्रह्मचारी को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने तथा विवाह करने की अनुमति दी जाती है। जब वह गृहस्थ होता है, तब उसे भी अनेक यज्ञ करने होते हैं और अग्रिम ज्ञान-प्राप्ति हेतु प्रयत्न करना होता है। तत्पश्चात् गृहस्थ जीवन से निवृत्त होकर, वानप्रस्थ आश्रम को स्वीकार करने पर, वह कठोर प्रायश्चित करता है, जैसे वनों में निवास करना, वृक्ष की छाल पहनना, मुण्डन न कराना आदि। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा अन्ततः संन्यास के आदेशों का पालन करके मनुष्य जीवन की पूर्णावस्था तक उन्नत होता है। तत्पश्चात् कुछ स्वर्गीय राज्यों तक उठाए जाते हैं, और जब वे और भी अधिक उन्नत हो जाते हैं, तब वे आध्यात्मिक आकाश में मुक्त हो जाते हैं—अथवा तो निराकार ब्रह्मज्योति में, अथवा वैकुण्ठ लोकों में, अथवा कृष्णलोक में। यही वह मार्ग है, जो वैदिक साहित्य द्वारा निर्दिष्ट है।
तथापि कृष्णभावनामृत की विशेषता यह है कि भक्ति में संलग्न होकर, एक ही प्रहार में, मनुष्य जीवन के विभिन्न आश्रमों के समस्त अनुष्ठानों को पार कर सकता है।
मनुष्य को गीता के सप्तम तथा अष्टम अध्यायों को विद्वत्ता अथवा मानसिक कल्पना से नहीं, अपितु शुद्ध भक्तों की संगति में उन्हें श्रवण करके समझने का प्रयत्न करना चाहिए। षष्ठ से द्वादश तक के अध्याय गीता का सार हैं। यदि कोई सौभाग्यशाली होकर गीता को—विशेषतः इन मध्यवर्ती छह अध्यायों को—भक्तों की संगति में समझ ले, तो उसका जीवन तत्काल समस्त तपस्याओं, यज्ञों, दानों, कल्पनाओं आदि से बढ़कर महिमामण्डित हो जाता है। मनुष्य को गीता भक्त से सुननी चाहिए, क्योंकि चतुर्थ अध्याय के आरम्भ में कहा गया है कि गीता को केवल भक्तगण ही पूर्ण रूप से समझ सकते हैं। गीता को भक्तों से सुनना, न कि मनोधर्मियों से, श्रद्धा कहलाता है। भक्तों की संगति द्वारा मनुष्य भक्ति में स्थापित होता है, और इस सेवा से कृष्ण की लीलाएँ, रूप, क्रीड़ाएँ, नाम आदि स्पष्ट हो जाते हैं, और समस्त आशंकाएँ दूर हो जाती हैं। तब, एक बार सन्देह दूर हो जाने पर, गीता का अध्ययन अत्यन्त आनन्दप्रद हो जाता है, और मनुष्य में कृष्णभावनामृत के प्रति रुचि तथा भाव उत्पन्न होते हैं। उन्नत अवस्था में मनुष्य पूर्णतः कृष्ण के प्रेम में पड़ जाता है, और यही जीवन की सर्वोच्च पूर्णावस्था का आरम्भ है, जो भक्त को आध्यात्मिक आकाश में कृष्ण के धाम गोलोक वृन्दावन में स्थानान्तरण हेतु तैयार करती है, जहाँ भक्त नित्य सुख में प्रवेश करता है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टम अध्याय, “परम की प्राप्ति” विषयक, भक्तिवेदान्त तात्पर्यों की समाप्ति होती है।
Bg 8.3
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; अक्षरम्—अविनाशी; ब्रह्म—ब्रह्म; परमम्—दिव्य; स्वभावः—नित्य स्वभाव; अध्यात्मम्—आत्मा; उच्यते—कहलाता है; भूत-भाव-उद्भव-करः—जीवों के भौतिक शरीरों को उत्पन्न करने वाली क्रिया; विसर्गः—सृष्टि; कर्म—सकाम कर्म; संज्ञितः—कहलाता है।
परमेश्वर ने कहा, अविनाशी, दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है, और उसका नित्य स्वभाव आत्मा कहलाता है। इन भौतिक शरीरों के विकास से सम्बद्ध क्रिया कर्म अर्थात् सकाम कर्म कहलाती है।
ब्रह्म अविनाशी तथा नित्य विद्यमान है, और उसका स्वरूप किसी भी समय परिवर्तित नहीं होता। किन्तु ब्रह्म के परे परब्रह्म है। ब्रह्म से अभिप्राय जीव से है, और परब्रह्म से अभिप्राय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से है। जीव की स्वरूपगत स्थिति उस स्थिति से भिन्न है, जो वह भौतिक जगत् में ग्रहण करता है। भौतिक चेतना में उसका स्वभाव पदार्थ का स्वामी बनने का प्रयत्न करना है, किन्तु आध्यात्मिक (कृष्ण) चेतना में उसकी स्थिति परमेश्वर की सेवा करना है। जब जीव भौतिक चेतना में रहता है, तब उसे भौतिक जगत् में विविध शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं। इसे ही कर्म कहा जाता है, अर्थात् भौतिक चेतना के बल से विविध सृष्टि।
वैदिक साहित्य में जीव को जीवात्मा तथा ब्रह्म कहा जाता है, किन्तु उसे कभी परब्रह्म नहीं कहा जाता। जीव (जीवात्मा) भिन्न-भिन्न स्थितियाँ ग्रहण करता है—कभी वह अन्धकारमय भौतिक प्रकृति में लीन हो जाता है और अपने को पदार्थ के साथ तदात्म कर लेता है, और कभी अपने को श्रेष्ठ आध्यात्मिक प्रकृति के साथ तदात्म करता है। अतः उसे परमेश्वर की तटस्थ शक्ति कहा जाता है। भौतिक अथवा आध्यात्मिक प्रकृति के साथ अपने तादात्म्य के अनुसार वह भौतिक अथवा आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करता है। भौतिक प्रकृति में वह चौरासी लाख योनियों में से किसी भी योनि में शरीर ग्रहण कर सकता है, किन्तु आध्यात्मिक प्रकृति में उसका केवल एक ही शरीर होता है। भौतिक प्रकृति में वह अपने कर्म के अनुसार कभी मनुष्य, देवता, पशु, हिंस्र प्राणी, पक्षी आदि के रूप में प्रकट होता है। भौतिक स्वर्गलोकों को प्राप्त करने तथा उनकी सुविधाओं का भोग करने के लिए वह कभी-कभी यज्ञ सम्पन्न करता है, किन्तु जब उसका पुण्य क्षीण हो जाता है, तब वह पुनः मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर लौट आता है।
यज्ञ की प्रक्रिया में जीव विशिष्ट स्वर्गलोकों को प्राप्त करने हेतु विशिष्ट यज्ञ करता है और फलस्वरूप उन्हें प्राप्त करता है। जब यज्ञ का पुण्य क्षीण हो जाता है, तब जीव वर्षा के रूप में पृथ्वी पर उतरता है, फिर अन्न का रूप धारण करता है, और वह अन्न मनुष्य द्वारा खाया जाकर वीर्य में परिणत होता है, जो स्त्री को गर्भवती करता है, और इस प्रकार जीव पुनः यज्ञ करने हेतु मानव रूप प्राप्त करता है और इस प्रकार वही चक्र दोहराता है। इस रीति से जीव भौतिक मार्ग पर निरन्तर आता-जाता रहता है। किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ऐसे यज्ञों से बचता है। वह सीधे कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है और इस प्रकार भगवद्धाम लौटने हेतु अपने को तैयार करता है।
गीता पर निर्विशेषवादी भाष्यकार अकारण यह मान लेते हैं कि ब्रह्म भौतिक जगत् में जीव का रूप धारण कर लेता है, और इसकी पुष्टि हेतु वे गीता के पन्द्रहवें अध्याय के सातवें श्लोक का सन्दर्भ देते हैं। किन्तु यह श्लोक भी जीव को “मेरा ही नित्य अंश” कहता है। भगवान् का अंश, जीव, भौतिक जगत् में पतित हो सकता है, किन्तु परमेश्वर (अच्युत) कभी पतित नहीं होते। अतः यह मान्यता कि परब्रह्म जीव का रूप धारण कर लेता है, स्वीकार्य नहीं है। यह स्मरण रखना महत्त्वपूर्ण है कि वैदिक साहित्य में ब्रह्म (जीव) को परब्रह्म (परमेश्वर) से पृथक् माना गया है।
Bg 8.4
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥
अधिभूतम्—भौतिक प्रकटीकरण; क्षरः—निरन्तर परिवर्तनशील; भावः—प्रकृति; पुरुषः—विराट् रूप; च—तथा; अधिदैवतम्—सूर्य तथा चन्द्र जैसे समस्त देवताओं सहित; अधियज्ञः—परमात्मा; अहम्—मैं (श्रीकृष्ण); एव—निश्चय ही; अत्र—इसमें; देहे—शरीर में; देह-भृताम्—देहधारियों के; वर—हे परम।
भौतिक प्रकृति अनन्त रूप से परिवर्तनशील जानी जाती है। यह विश्व परमेश्वर का विराट् रूप है, और मैं वही भगवान् हूँ, जो परमात्मा के रूप में प्रत्येक देहधारी प्राणी के हृदय में निवास करता हुआ अभिव्यक्त है।
भौतिक प्रकृति निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। भौतिक शरीर सामान्यतः छह अवस्थाओं से होकर गुज़रते हैं: वे जन्म लेते हैं, बढ़ते हैं, कुछ काल तक स्थिर रहते हैं, कुछ उपजात उत्पन्न करते हैं, क्षीण होते हैं, और तब लुप्त हो जाते हैं। इस भौतिक प्रकृति को अधिभूत कहा जाता है। चूँकि इसकी सृष्टि एक निश्चित बिन्दु पर होती है और एक निश्चित बिन्दु पर इसका संहार होगा, अतः परमेश्वर के उस विराट् रूप की धारणा, जिसमें समस्त देवता तथा उनके विभिन्न लोक सम्मिलित हैं, अधिदैवत कहलाती है। व्यष्टि आत्मा (जीव) शरीर के साथ रहती है। भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण प्रतिनिधि परमात्मा, परमात्मा अथवा अधियज्ञ कहलाता है और हृदय में स्थित रहता है। इस श्लोक के सन्दर्भ में एव शब्द विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इस शब्द द्वारा भगवान् बल देते हैं कि परमात्मा उनसे भिन्न नहीं है। परमात्मा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, व्यष्टि आत्मा के निकट विराजमान होकर व्यष्टि आत्मा की क्रियाओं का साक्षी है तथा चेतना का स्रोत है। परमात्मा जीव को स्वतन्त्र रूप से कर्म करने का अवसर देता है, और वह उसकी क्रियाओं का साक्षी होता है। परमेश्वर के इन सभी विभिन्न प्रकटीकरणों के कार्य भगवान् की दिव्य सेवा में संलग्न शुद्ध कृष्णभावनाभावित भक्त के लिए स्वतः स्पष्ट हो जाते हैं। भगवान् का विराट् विश्व-रूप, जो अधिदैवत कहलाता है, उस नवदीक्षित द्वारा चिन्तन किया जाता है, जो परमात्मा के रूप में अपने प्रकटीकरण में परमेश्वर के पास नहीं पहुँच सकता। नवदीक्षित को उस विराट् रूप का चिन्तन करने का परामर्श दिया जाता है, जिसके चरण निम्नतर लोक माने जाते हैं, जिसके नेत्र सूर्य तथा चन्द्र माने जाते हैं, और जिसका शीश उच्चतर ग्रहमण्डल माना जाता है।
Bg 8.5
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥
अन्त-काले—जीवन के अन्त में; च—भी; माम्—मुझको; एव—निश्चय ही; स्मरन्—स्मरण करते हुए; मुक्त्वा—त्यागकर; कलेवरम्—शरीर; यः—जो; प्रयाति—जाता है; सः—वह; मद्-भावम्—मेरी प्रकृति; याति—प्राप्त करता है; न—नहीं; अस्ति—है; अत्र—यहाँ; संशयः—सन्देह।
और जो कोई मृत्यु के समय केवल मेरा ही स्मरण करते हुए अपना शरीर त्यागता है, वह तत्क्षण मेरी प्रकृति प्राप्त करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है।
इस श्लोक में कृष्णभावनामृत के महत्त्व पर बल दिया गया है। जो कोई कृष्णभावनामृत में अपना शरीर त्यागता है, वह तत्क्षण परमेश्वर के दिव्य धाम में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। स्मरन् (स्मरण करते हुए) शब्द महत्त्वपूर्ण है। उस अशुद्ध आत्मा के लिए श्रीकृष्ण का स्मरण सम्भव नहीं है, जिसने भक्ति में कृष्णभावनामृत का अभ्यास नहीं किया है। श्रीकृष्ण का स्मरण करने हेतु मनुष्य को भगवान् चैतन्य के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, वृक्ष से अधिक सहनशील, तृण से अधिक विनम्र होकर तथा बदले में सम्मान की अपेक्षा किए बिना दूसरों को समस्त सम्मान अर्पित करते हुए, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, इस महामन्त्र का निरन्तर जप करना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए शरीर से सफलतापूर्वक प्रस्थान कर सकेगा और इस प्रकार परम लक्ष्य प्राप्त कर सकेगा।
Bg 8.6
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
यम् यम्—जो भी; वा—अथवा; अपि—भी; स्मरन्—स्मरण करते हुए; भावम्—प्रकृति; त्यजति—त्यागता है; अन्ते—अन्त में; कलेवरम्—इस शरीर को; तम् तम्—उसी प्रकार; एव—निश्चय ही; एति—प्राप्त करता है; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; सदा—सदैव; तत्—उस; भाव—भाव की; भावितः—स्मरण करते हुए।
मनुष्य शरीर त्यागते समय जिस किसी भाव का स्मरण करता है, वह उसी भाव को अवश्य प्राप्त करता है।
मृत्यु के संकटपूर्ण क्षण में अपनी प्रकृति बदलने की प्रक्रिया यहाँ समझाई गई है। मनुष्य उचित मनःस्थिति में किस प्रकार मर सकता है? महाराज भरत ने मृत्यु के समय एक मृग का चिन्तन किया और इस प्रकार उसी योनि में स्थानान्तरित हो गए। तथापि मृग होने पर भी महाराज भरत अपने पूर्व कर्मों का स्मरण रख सके। निःसन्देह मनुष्य के जीवन के विचारों तथा कर्मों का संचित प्रभाव मृत्यु के क्षण में उसके विचारों को प्रभावित करता है; अतः इस जीवन के कर्म ही मनुष्य के भावी भाव का निर्धारण करते हैं। यदि कोई दिव्य रूप से श्रीकृष्ण की सेवा में तल्लीन है, तो उसका अगला शरीर दिव्य (आध्यात्मिक) होगा, भौतिक नहीं। अतः अपने भाव को सफलतापूर्वक दिव्य जीवन में बदलने हेतु हरे कृष्ण का जप ही सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया है।
Bg 8.7
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥ ७ ॥
तस्मात्—अतः; सर्वेषु—सभी; कालेषु—समय; माम्—मुझको; अनुस्मर—स्मरण करते रहो; युध्य—युद्ध करो; च—भी; मयि—मुझमें; अर्पित—समर्पित; मनः—मन; बुद्धिः—बुद्धि; माम्—मुझको; एव—निश्चय ही; एष्यसि—प्राप्त करोगे; असंशयः—नि:सन्देह।
अतः हे अर्जुन, तुम्हें सदैव मेरा अर्थात् श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के अपने विहित कर्तव्य का पालन करना चाहिए। अपनी क्रियाओं को मुझे समर्पित कर तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझ पर स्थिर कर, तुम नि:सन्देह मुझे प्राप्त करोगे।
अर्जुन को दी गई यह शिक्षा भौतिक कार्यों में संलग्न समस्त मनुष्यों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भगवान् यह नहीं कहते कि मनुष्य को अपने विहित कर्तव्य अथवा कार्य त्याग देने चाहिए। मनुष्य उन्हें जारी रख सकता है और साथ ही हरे कृष्ण का जप करते हुए श्रीकृष्ण का चिन्तन कर सकता है। इससे मनुष्य भौतिक कल्मष से मुक्त होगा और अपने मन एवं बुद्धि को श्रीकृष्ण में संलग्न करेगा। श्रीकृष्ण के नामों का जप करने से मनुष्य नि:सन्देह परम लोक, कृष्णलोक में स्थानान्तरित कर दिया जाएगा।
Bg 8.8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ ८ ॥
अभ्यास—अभ्यास; योग-युक्तेन—ध्यान में संलग्न होकर; चेतसा—मन तथा बुद्धि द्वारा; न अन्य-गामिना—विचलित हुए बिना; परमम्—परम; पुरुषम्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; दिव्यम्—दिव्य; याति—प्राप्त करता है; पार्थ—हे पृथापुत्र; अनुचिन्तयन्—निरन्तर चिन्तन करते हुए।
हे पार्थ [अर्जुन], जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का ध्यान करता है, अपने मन को निरन्तर मेरे स्मरण में संलग्न रखता है, मार्ग से विचलित नहीं होता, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है।
इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अपने स्मरण के महत्त्व पर बल देते हैं। श्रीकृष्ण की स्मृति हरे कृष्ण महामन्त्र के जप से पुनर्जीवित होती है। जप करने तथा परमेश्वर के ध्वनि-कम्पन का श्रवण करने के इस अभ्यास से मनुष्य के कान, जिह्वा तथा मन संलग्न होते हैं। इस योगमय ध्यान का अभ्यास करना अत्यन्त सरल है, और यह मनुष्य को परमेश्वर की प्राप्ति में सहायता करता है। पुरुष का अर्थ है भोक्ता। यद्यपि जीव परमेश्वर की तटस्थ शक्ति से सम्बद्ध हैं, तथापि वे भौतिक कल्मष में हैं। वे अपने को भोक्ता मानते हैं, किन्तु वे परम भोक्ता नहीं हैं। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि परम भोक्ता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जो नारायण, वासुदेव आदि के रूप में अपने विभिन्न प्रकटीकरणों तथा पूर्ण विस्तारों में विद्यमान हैं।
भक्तगण हरे कृष्ण का जप करके अपनी आराधना के विषय परमेश्वर का, उनके किसी भी रूप में—नारायण, श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि—निरन्तर चिन्तन कर सकते हैं। यह अभ्यास उसे शुद्ध करेगा, और उसके जीवन के अन्त में, उसके निरन्तर जप के कारण, वह भगवद्धाम में स्थानान्तरित कर दिया जाएगा। योगाभ्यास अन्तःस्थ परमात्मा का ध्यान है; इसी प्रकार हरे कृष्ण का जप करके मनुष्य अपने मन को सदैव परमेश्वर पर स्थिर करता है। मन चंचल है, अतः मन को बलपूर्वक श्रीकृष्ण का चिन्तन करने में संलग्न करना आवश्यक है। एक उदाहरण प्रायः दिया जाता है कि वह झींगुर, जो तितली बनने का चिन्तन करता है, इसी जीवन में तितली में परिणत हो जाता है। इसी प्रकार, यदि हम निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करें, तो यह निश्चित है कि अपने जीवन के अन्त में हमारी शारीरिक रचना श्रीकृष्ण के समान ही होगी।
Bg 8.9
कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ ९ ॥
कविम्—जो सब कुछ जानता है; पुराणम्—सबसे प्राचीन; अनुशासितारम्—नियन्ता; अणोः—अणु से; अणीयांसम्—छोटा; अनुस्मरेत्—सदैव चिन्तन करता है; यः—जो; सर्वस्य—प्रत्येक वस्तु का; धातारम्—पालनकर्ता; अचिन्त्य—अकल्पनीय; रूपम्—रूप; आदित्य-वर्णम्—सूर्य के समान प्रकाशमान; तमसः—अन्धकार से; परस्तात्—दिव्य।
मनुष्य को परम पुरुष का ध्यान उस रूप में करना चाहिए, जो सब कुछ जानते हैं, जो सबसे प्राचीन हैं, जो नियन्ता हैं, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर हैं, जो प्रत्येक वस्तु के पालनकर्ता हैं, जो समस्त भौतिक धारणा से परे हैं, जो अकल्पनीय हैं, और जो सदैव एक पुरुष हैं। वे सूर्य के समान प्रकाशमान हैं और दिव्य होने के कारण इस भौतिक प्रकृति से परे हैं।
परमेश्वर के चिन्तन की प्रक्रिया का उल्लेख इस श्लोक में है। प्रमुख बिन्दु यह है कि वे न तो निराकार हैं और न शून्य। मनुष्य किसी निराकार अथवा शून्य वस्तु का ध्यान नहीं कर सकता। यह अत्यन्त कठिन है। किन्तु श्रीकृष्ण के चिन्तन की प्रक्रिया अत्यन्त सरल है और यहाँ तथ्यतः वर्णित है। सर्वप्रथम, वे पुरुष हैं, आध्यात्मिक हैं, श्रीराम तथा श्रीकृष्ण हैं, और यहाँ उनका वर्णन कवि के रूप में हुआ है; अर्थात् वे भूत, वर्तमान तथा भविष्य को जानते हैं और अतः सब कुछ जानते हैं। वे सबसे प्राचीन पुरुष हैं, क्योंकि वे प्रत्येक वस्तु के उद्गम हैं; प्रत्येक वस्तु उन्हीं से जन्म लेती है। वे विश्व के परम नियन्ता, मानवता के पालनकर्ता तथा शिक्षक भी हैं। वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर हैं। जीव बाल की नोक के दस हज़ारवें भाग के बराबर है, किन्तु भगवान् इतने अकल्पनीय रूप से सूक्ष्म हैं कि वे इस कण के हृदय में प्रवेश कर जाते हैं। अतः वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर कहलाते हैं। परमेश्वर होने के कारण वे अणु में तथा सूक्ष्मतम के हृदय में प्रवेश कर सकते हैं और परमात्मा के रूप में उसे नियन्त्रित कर सकते हैं। इतने सूक्ष्म होते हुए भी वे सर्वव्यापी हैं और प्रत्येक वस्तु का पालन कर रहे हैं। उन्हीं के द्वारा ये समस्त ग्रहमण्डल धारण किए हुए हैं। हम प्रायः आश्चर्य करते हैं कि ये विशाल ग्रह वायु में किस प्रकार तैर रहे हैं। यहाँ कहा गया है कि परमेश्वर अपनी अकल्पनीय ऊर्जा से इन समस्त विशाल ग्रहों तथा आकाशगंगाओं की प्रणालियों को धारण किए हुए हैं। इस सन्दर्भ में अचिन्त्य (अकल्पनीय) शब्द अत्यन्त सार्थक है। ईश्वर की ऊर्जा हमारी धारणा से परे है, हमारे चिन्तन की सीमा से परे है, और अतः अकल्पनीय (अचिन्त्य) कहलाती है। इस बिन्दु पर कौन तर्क कर सकता है? वे इस भौतिक जगत् में व्याप्त हैं और फिर भी इससे परे हैं। हम इस भौतिक जगत् को भी नहीं समझ सकते, जो आध्यात्मिक जगत् की तुलना में नगण्य है—तो फिर हम उसे कैसे समझ सकते हैं जो इससे परे है? अचिन्त्य का अर्थ है वह जो इस भौतिक जगत् से परे है, वह जिसे हमारा तर्क, युक्ति तथा दार्शनिक कल्पना स्पर्श नहीं कर सकती, वह जो अकल्पनीय है। अतः बुद्धिमान पुरुषों को निरर्थक तर्क तथा कल्पना से बचते हुए, वेद, गीता तथा श्रीमद्भागवत जैसे शास्त्रों में जो कहा गया है उसे स्वीकार करना चाहिए और उनके द्वारा निर्धारित सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए। इससे मनुष्य को समझ प्राप्त होगी।