अध्याय 6

Bg 6.1

श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥

श्री भगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; अनाश्रितः—आश्रय रहित; कर्म-फलम्—कर्म का फल; कार्यम्—कर्तव्य; कर्म—कर्म; करोति—करता है; यः—जो; सः—वह; सन्न्यासी—संन्यासी; —भी; योगी—योगी; —भी; —नहीं; निर्—रहित; अग्निः—अग्नि; —न तो; —भी; अक्रियः—कर्तव्यरहित।

श्रीभगवान् ने कहा : जो कर्म के फलों के प्रति अनासक्त रहकर अपने विहित कर्तव्य का पालन करता है, वही संन्यासी तथा वही सच्चा योगी है—न कि वह, जो न तो अग्नि प्रज्वलित करता है और न ही कर्म करता है।

इस अध्याय में भगवान् समझाते हैं कि अष्टांगयोग की प्रक्रिया मन तथा इन्द्रियों को वश में करने का एक साधन है। तथापि सामान्य जनों के लिए इसका पालन अत्यन्त कठिन है, विशेषकर कलियुग में। यद्यपि इस अध्याय में अष्टांगयोग की अनुशंसा की गई है, तथापि भगवान् इस बात पर बल देते हैं कि कर्मयोग की प्रक्रिया, अर्थात् कृष्णभावनामृत में कर्म करना, श्रेष्ठतर है। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार तथा उसकी सामग्री के पालन हेतु कर्म करता है, किन्तु कोई भी किसी न किसी स्वार्थ अथवा वैयक्तिक तृप्ति के बिना कर्म नहीं करता, चाहे वह संकुचित हो अथवा विस्तृत। पूर्णता की कसौटी यह है कि मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करे, न कि कर्म के फलों के भोग की दृष्टि से। कृष्णभावनामृत में कर्म करना प्रत्येक जीव का कर्तव्य है, क्योंकि स्वरूपतः सभी परम के अंश हैं। शरीर के अंग समूचे शरीर की तृप्ति हेतु कार्य करते हैं। शरीर के अवयव अपनी तृप्ति के लिए नहीं, अपितु सम्पूर्ण समष्टि की तृप्ति के लिए कार्य करते हैं। इसी प्रकार जो जीव अपनी वैयक्तिक तृप्ति के लिए नहीं, अपितु परम समष्टि की तृप्ति के लिए कर्म करता है, वही पूर्ण संन्यासी तथा पूर्ण योगी है।

संन्यासी कभी-कभी कृत्रिम रूप से यह मान लेते हैं कि वे समस्त भौतिक कर्तव्यों से मुक्त हो गए हैं, अतः वे अग्निहोत्र यज्ञों (अग्नि-यज्ञों) का सम्पादन बन्द कर देते हैं; किन्तु वास्तव में वे स्वार्थी होते हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य निराकार ब्रह्म के साथ एकता प्राप्त करना है। ऐसी इच्छा किसी भी भौतिक इच्छा से बड़ी है, फिर भी वह स्वार्थ से रहित नहीं है। इसी प्रकार जो योगी अर्धोन्मीलित नेत्रों से योग-पद्धति का अभ्यास करता है और समस्त भौतिक क्रियाओं को त्याग देता है, वह भी अपने वैयक्तिक स्व के लिए किसी न किसी तृप्ति की कामना करता है। परन्तु कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के समष्टि की तृप्ति के लिए कार्य करता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को आत्म-तृप्ति की कोई इच्छा नहीं होती। उसकी सफलता की कसौटी श्रीकृष्ण की तृप्ति है, और इस प्रकार वही पूर्ण संन्यासी अथवा पूर्ण योगी है। त्याग के सर्वोच्च पूर्णतम प्रतीक भगवान् श्रीचैतन्य इस प्रकार प्रार्थना करते हैं :

na dhanaṁ na janaṁ na sundarīṁ kavitāṁ vā jagadīśa kāmaye.

mama janmani janmanīśvare bhavatād bhaktir ahaitukī tvayi.

“हे सर्वशक्तिमान् भगवन्! मुझे न धन संचित करने की इच्छा है, न सुन्दरियों का भोग करने की। न मुझे अनुयायियों की कोई संख्या चाहिए। मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि जन्म-जन्मान्तर मेरे जीवन में आपकी भक्ति की अहैतुकी कृपा बनी रहे।“

Bg 6.10

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥

योगी—योगी; युञ्जीत—कृष्णभावनामृत में एकाग्र होना चाहिए; सततम्—निरन्तर; आत्मानम्—स्वयं को (शरीर, मन तथा आत्मा के द्वारा); रहसि—एकान्त स्थान में; स्थितः—इस प्रकार स्थित होकर; एकाकी—अकेला; यत-चित्तात्मा—मन में सदा सावधान; निराशीः—किसी अन्य वस्तु से आकृष्ट हुए बिना; अपरिग्रहः—स्वामित्व की भावना से मुक्त।

योगी को चाहिए कि वह सदा अपने मन को परमात्मा पर एकाग्र करने का प्रयत्न करे; वह किसी एकान्त स्थान में अकेला रहे और सदा सावधानीपूर्वक अपने मन को वश में रखे। उसे इच्छाओं तथा स्वामित्व की भावनाओं से मुक्त होना चाहिए।

श्रीकृष्ण की अनुभूति विभिन्न मात्राओं में ब्रह्म, परमात्मा तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में होती है। कृष्णभावनामृत का संक्षेप में अर्थ यह है कि मनुष्य सदा भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहे। किन्तु जो निराकार ब्रह्म अथवा स्थानिक परमात्मा से आसक्त हैं, वे भी आंशिक रूप से कृष्णभावनाभावित हैं, क्योंकि निराकार ब्रह्म श्रीकृष्ण की आध्यात्मिक किरण है और परमात्मा श्रीकृष्ण का सर्वव्यापक आंशिक विस्तार है। इस प्रकार निर्विशेषवादी तथा ध्यानी भी अप्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनाभावित हैं। प्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सर्वोच्च योगी है, क्योंकि ऐसा भक्त जानता है कि ब्रह्म अथवा परमात्मा से क्या अभिप्राय है। परम सत्य का उसका ज्ञान पूर्ण है, जबकि निर्विशेषवादी तथा ध्यानशील योगी अपूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित हैं।

तथापि इन सभी को यहाँ यह उपदेश दिया गया है कि वे अपने-अपने विशिष्ट अनुसरणों में निरन्तर संलग्न रहें, जिससे वे शीघ्र अथवा विलम्ब से सर्वोच्च पूर्णता को प्राप्त कर सकें। योगी का प्रथम कार्य यह है कि वह मन को सदा श्रीकृष्ण पर लगाए रखे। मनुष्य को सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करना चाहिए और उन्हें एक क्षण के लिए भी न भूलना चाहिए। मन को परम पर एकाग्र करना समाधि अथवा तुरीय अवस्था कहलाता है। मन को एकाग्र करने हेतु मनुष्य को सदा एकान्त में रहना चाहिए और बाह्य पदार्थों से उत्पन्न विक्षोभ से बचना चाहिए। उसे अपनी अनुभूति को प्रभावित करने वाली अनुकूल परिस्थितियों को स्वीकार करने तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को अस्वीकार करने में अत्यन्त सावधान रहना चाहिए। और पूर्ण संकल्प के साथ उसे ऐसी अनावश्यक भौतिक वस्तुओं की लालसा नहीं करनी चाहिए, जो स्वामित्व की भावनाओं से उसे फँसा लें।

ये समस्त पूर्णताएँ तथा सावधानियाँ तब भली-भाँति सम्पन्न होती हैं जब मनुष्य प्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनामृत में स्थित होता है, क्योंकि प्रत्यक्ष कृष्णभावनामृत का अर्थ है आत्म-निषेध, जिसमें भौतिक स्वामित्व की सम्भावना अत्यन्त अल्प रहती है। श्रील रूप गोस्वामी कृष्णभावनामृत का वर्णन इस प्रकार करते हैं :

anāsaktasya viṣayān yathārham upayuñjataḥ

nirbandhaḥ kṛṣṇa-sambandhe yuktaṁ vairāgyam ucyate

prāpañcikatayā buddhyā hari-sambandhi-vastunaḥ

mumukṣubhiḥ parityāgo vairāgyaṁ phalgu kathyate.

(भक्ति-रसामृत-सिन्धु 2.255-256)

“जब मनुष्य किसी वस्तु से आसक्त नहीं होता, किन्तु साथ ही सब कुछ को श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में स्वीकार करता है, तब वह उचित रूप से स्वामित्व के ऊपर स्थित होता है। दूसरी ओर, जो श्रीकृष्ण से उसके सम्बन्ध को जाने बिना सब कुछ अस्वीकार कर देता है, उसका वैराग्य उतना पूर्ण नहीं होता।”

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भली-भाँति जानता है कि सब कुछ श्रीकृष्ण का है, और इस प्रकार वह सदा वैयक्तिक स्वामित्व की भावनाओं से मुक्त रहता है। ऐसी स्थिति में उसे अपने वैयक्तिक हित के लिए किसी वस्तु की लालसा नहीं रहती। वह जानता है कि कृष्णभावनामृत के पक्ष में वस्तुओं को कैसे स्वीकार करना है और कृष्णभावनामृत के प्रतिकूल वस्तुओं को कैसे अस्वीकार करना है। वह सदा भौतिक वस्तुओं से पृथक् रहता है, क्योंकि वह सदा दिव्य है, और वह सदा अकेला रहता है, क्योंकि उन व्यक्तियों से उसका कोई सरोकार नहीं, जो कृष्णभावनामृत में स्थित नहीं हैं। अतएव कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति ही पूर्ण योगी है।

Bg 6.11-12

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥

शुचौ—पवित्र; देशे—भूमि में; प्रतिष्ठाप्य—रखकर; स्थिरम्—दृढ़; आसनम्—आसन; आत्मनः—अपना; —नहीं; अति—अत्यन्त; उच्छ्रितम्—ऊँचा; —न ही; अति—अत्यन्त; नीचम्—नीचा; चैल-अजिन—मुलायम वस्त्र तथा मृगचर्म; कुशोत्तरम्—कुश घास; तत्र—वहाँ; एकाग्रम्—एकाग्र; मनः—मन; कृत्वा—करके; यत-चित्त—मन को वश में करते हुए; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; क्रियः—क्रियाएँ; उपविश्य—बैठकर; आसने—आसन पर; युञ्ज्यात्—सम्पादन करे; योगम्—योगाभ्यास; आत्म—हृदय; विशुद्धये—शुद्ध करने हेतु।

योग का अभ्यास करने के लिए मनुष्य को किसी एकान्त स्थान में जाना चाहिए और भूमि पर कुश-घास बिछाकर उसे मृगचर्म तथा मुलायम वस्त्र से ढक देना चाहिए। आसन न तो अत्यन्त ऊँचा हो और न ही अत्यन्त नीचा, और वह किसी पवित्र स्थान में स्थित हो। तब योगी को उस पर अत्यन्त दृढ़ता से बैठकर मन तथा इन्द्रियों को वश में करते हुए, हृदय को शुद्ध करते हुए तथा मन को एक बिन्दु पर स्थिर करते हुए योग का अभ्यास करना चाहिए।

“पवित्र स्थान” का तात्पर्य तीर्थस्थानों से है। भारत में योगी, साधक अथवा भक्तगण सभी घर त्यागकर प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन, हृषीकेश तथा हरिद्वार जैसे पवित्र स्थानों में निवास करते हैं और एकान्त में वहाँ योग का अभ्यास करते हैं, जहाँ यमुना तथा गंगा जैसी पवित्र नदियाँ प्रवाहित होती हैं। किन्तु प्रायः यह सम्भव नहीं हो पाता, विशेषकर पाश्चात्य लोगों के लिए। बड़े नगरों के तथाकथित योग-समाज भौतिक लाभ अर्जित करने में सफल हो सकते हैं, किन्तु वे योग के वास्तविक अभ्यास के लिए तनिक भी उपयुक्त नहीं हैं। जो आत्मसंयमी नहीं है और जिसका मन अविचलित नहीं है, वह ध्यान का अभ्यास नहीं कर सकता। अतएव बृहन्नारदीय पुराण में कहा गया है कि कलियुग में (वर्तमान युग अथवा काल में), जब सामान्य जन अल्पायु होते हैं, आध्यात्मिक अनुभूति में मन्द होते हैं और सदा विविध चिन्ताओं से विचलित रहते हैं, तब आध्यात्मिक अनुभूति का सर्वोत्तम साधन भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन है।

harer nāma harer nāma harer nāmaiva kevalam

kalau nāsty eva nāsty eva nāsty eva gatir anyathā.

“इस कलह तथा पाखण्ड के युग में मुक्ति का एकमात्र साधन भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन है। कोई दूसरा मार्ग नहीं है। कोई दूसरा मार्ग नहीं है। कोई दूसरा मार्ग नहीं है।“

Bg 6.13-14

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥

समम्—सीधा; काय-शिरः—शरीर तथा सिर; ग्रीवम्—गर्दन; धारयन्—धारण करते हुए; अचलम्—अचल; स्थिरः—स्थिर; सम्प्रेक्ष्य—देखते हुए; नासिका—नाक; अग्रम्—अग्रभाग; स्वम्—अपनी; दिशः—समस्त दिशाएँ; —भी; अनवलोकयन्—न देखते हुए; प्रशान्त—अनुद्विग्न; आत्मा—मन; विगत-भीः—भय से रहित; ब्रह्मचारि-व्रते—ब्रह्मचर्य के व्रत में; स्थितः—स्थित; मनः—मन; संयम्य—पूर्णतः संयत करके; मत्—मुझ (श्रीकृष्ण) पर; चित्तः—एकाग्र; युक्तः—वास्तविक योगी; आसीत—स्थित होकर; मत्—मेरा; परः—परम लक्ष्य।

मनुष्य को अपने शरीर, गर्दन तथा सिर को सीधी रेखा में सीधा धारण करना चाहिए और दृढ़ता से नाक के अग्रभाग पर दृष्टि टिकानी चाहिए। इस प्रकार अनुद्विग्न तथा संयत मन से, भय से रहित होकर, यौन-जीवन से पूर्णतया मुक्त रहकर, मनुष्य को हृदय के भीतर मेरा ध्यान करना चाहिए और मुझे ही जीवन का परम लक्ष्य बनाना चाहिए।

जीवन का लक्ष्य श्रीकृष्ण को जानना है, जो परमात्मा के रूप में, चतुर्भुज विष्णु-रूप में, प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं। योग की प्रक्रिया का अभ्यास विष्णु के इसी स्थानिक रूप को ढूँढने तथा देखने के लिए किया जाता है, किसी अन्य प्रयोजन से नहीं। स्थानिक विष्णु-मूर्ति मनुष्य के हृदय में निवास करने वाले श्रीकृष्ण का पूर्ण प्रतिनिधित्व है। जिसके पास इस विष्णु-मूर्ति का साक्षात्कार करने की कोई योजना नहीं है, वह व्यर्थ ही छद्म-योगाभ्यास में संलग्न रहता है और निश्चय ही अपना समय नष्ट करता है। श्रीकृष्ण जीवन के परम लक्ष्य हैं, और मनुष्य के हृदय में स्थित विष्णु-मूर्ति योगाभ्यास का लक्ष्य है। हृदय के भीतर इस विष्णु-मूर्ति का साक्षात्कार करने हेतु मनुष्य को यौन-जीवन से पूर्ण विरति का पालन करना होता है; अतः उसे घर त्यागकर किसी एकान्त स्थान में अकेला रहना पड़ता है और उपर्युक्त रीति से बैठा रहना पड़ता है। मनुष्य घर पर अथवा अन्यत्र प्रतिदिन यौन-जीवन का भोग करते हुए और किसी तथाकथित योग-कक्षा में जाकर योगी नहीं बन सकता। उसे मन को वश में करने का तथा सभी प्रकार की इन्द्रियतृप्ति से बचने का अभ्यास करना होता है, जिनमें यौन-जीवन प्रमुख है। महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा रचित ब्रह्मचर्य के नियमों में कहा गया है :

karmaṇā manasā vācā sarvāvasthāsu sarvadā

sarvatra maithuṇa-tyāgo brahmacaryaṁ pracakṣate.

“ब्रह्मचर्य का व्रत मनुष्य को कर्म, वचन तथा मन से—सर्वदा, समस्त अवस्थाओं में तथा समस्त स्थानों में—यौन-भोग से पूर्णतया विरत रहने में सहायता करने हेतु है।” कोई भी यौन-भोग के द्वारा शुद्ध योगाभ्यास नहीं कर सकता। अतएव ब्रह्मचर्य की शिक्षा बाल्यकाल से ही दी जाती है, जब मनुष्य को यौन-जीवन का कोई ज्ञान नहीं होता। पाँच वर्ष की आयु में बालकों को गुरुकुल, अर्थात् आध्यात्मिक गुरु के स्थान पर भेज दिया जाता है, और गुरु उन बालकों को ब्रह्मचारी बनने के कठोर अनुशासन में प्रशिक्षित करते हैं। ऐसे अभ्यास के बिना कोई भी किसी भी योग में—चाहे वह ध्यान हो, ज्ञान हो अथवा भक्ति हो—उन्नति नहीं कर सकता। तथापि जो विवाहित जीवन के नियमों तथा विधि-विधानों का पालन करता है और केवल अपनी पत्नी के साथ (वह भी नियम के अधीन) यौन-सम्बन्ध रखता है, वह भी ब्रह्मचारी कहलाता है। ऐसा संयमी गृहस्थ ब्रह्मचारी भक्ति-सम्प्रदाय में स्वीकार किया जा सकता है, किन्तु ज्ञान तथा ध्यान के सम्प्रदाय गृहस्थ ब्रह्मचारियों को भी स्वीकार नहीं करते। वे बिना किसी समझौते के पूर्ण विरति की अपेक्षा करते हैं। भक्ति-सम्प्रदाय में गृहस्थ ब्रह्मचारी को संयमित यौन-जीवन की अनुमति है, क्योंकि भक्तियोग का सम्प्रदाय इतना शक्तिशाली है कि भगवान् की उच्चतर सेवा में संलग्न रहने के कारण मनुष्य स्वतः ही यौन-आकर्षण खो देता है। भगवद्गीता में कहा गया है :

viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ

rasa-varjaṁ raso ‘py asya paraṁ dṛṣṭvā nivartate

जहाँ अन्यों को इन्द्रियतृप्ति से स्वयं को रोकना पड़ता है, वहीं भगवान् का भक्त उच्चतर रस के कारण स्वतः ही विरत हो जाता है। भक्त के अतिरिक्त किसी अन्य को उस उच्चतर रस का कोई ज्ञान नहीं होता।

विगतभीः। जब तक मनुष्य पूर्णतया कृष्णभावनामृत में स्थित नहीं होता, तब तक वह निर्भय नहीं हो सकता। बद्ध आत्मा अपनी विकृत स्मृति के कारण, अर्थात् श्रीकृष्ण के साथ अपने नित्य सम्बन्ध की विस्मृति के कारण भयग्रस्त रहती है। भागवत कहता है, भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद् ईशाद् अपेतस्य विपर्ययो’स्मृतिः : कृष्णभावनामृत ही निर्भयता का एकमात्र आधार है। अतएव जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित है, उसके लिए ही पूर्ण अभ्यास सम्भव है। और चूँकि योगाभ्यास का परम लक्ष्य भगवान् को अपने भीतर देखना है, अतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पहले से ही समस्त योगियों में श्रेष्ठ है। यहाँ उल्लिखित योग पद्धति के सिद्धान्त लोकप्रिय तथाकथित योग-समाजों के सिद्धान्तों से भिन्न हैं।

Bg 6.15

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥

युञ्जन्—इस प्रकार अभ्यास करते हुए; एवम्—जैसा ऊपर कहा गया; सदा—निरन्तर; आत्मानम्—शरीर, मन तथा आत्मा; योगी—योगी; नियत-मानसः—संयमित मन वाला; शान्तिम्—शान्ति; निर्वाण-परमाम्—भौतिक अस्तित्व की समाप्ति; मत्-संस्थाम्—आध्यात्मिक आकाश में (भगवद्धाम में); अधिगच्छति—प्राप्त करता है।

इस प्रकार शरीर, मन तथा क्रियाओं के संयम का अभ्यास करते हुए योगी भौतिक अस्तित्व की समाप्ति द्वारा भगवद्धाम [अथवा श्रीकृष्ण के धाम] को प्राप्त करता है।

अब योगाभ्यास का परम लक्ष्य स्पष्ट रूप से समझाया गया है। योगाभ्यास किसी भी प्रकार की भौतिक सुविधा प्राप्त करने के लिए नहीं है; यह तो समस्त भौतिक अस्तित्व की समाप्ति को सम्भव बनाने के लिए है। जो स्वास्थ्य में सुधार चाहता है अथवा भौतिक पूर्णता की कामना करता है, वह भगवद्गीता के अनुसार योगी नहीं है। न ही भौतिक अस्तित्व की समाप्ति का अर्थ “शून्य” में प्रवेश करना है, जो केवल एक मिथ्या कल्पना है। भगवान् की सृष्टि में कहीं भी कोई शून्य नहीं है। अपितु भौतिक अस्तित्व की समाप्ति मनुष्य को आध्यात्मिक आकाश में, अर्थात् भगवद्धाम में प्रवेश करने में समर्थ बनाती है। भगवद्धाम का भगवद्गीता में भी स्पष्ट रूप से उस स्थान के रूप में वर्णन किया गया है, जहाँ न सूर्य की, न चन्द्रमा की, न ही विद्युत् की आवश्यकता है। आध्यात्मिक राज्य के समस्त लोक भौतिक आकाश में सूर्य के समान स्वयं-प्रकाशित हैं। भगवद्धाम सर्वत्र है, किन्तु आध्यात्मिक आकाश तथा उसके लोक परं धाम, अर्थात् उच्चतर धाम कहलाते हैं।

जो परिपक्व योगी भगवान् श्रीकृष्ण को समझने में पूर्ण है—जैसा कि यहाँ भगवान् ने स्वयं स्पष्ट रूप से कहा है (मत्-चित्तः, मत्-परः, मत्-स्थानम्)—वह वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है और अन्ततः उनके परम धाम, अर्थात् गोलोक वृन्दावन नामक कृष्णलोक को प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मसंहिता में स्पष्ट रूप से कहा गया है (गोलोक एव निवसत्यखिलात्म-भूतः) कि भगवान्, यद्यपि सदा अपने गोलोक नामक धाम में निवास करते हैं, अपनी उच्चतर आध्यात्मिक शक्तियों के बल पर सर्वव्यापक ब्रह्म तथा स्थानिक परमात्मा भी हैं। श्रीकृष्ण तथा उनके पूर्ण विस्तार विष्णु के समुचित ज्ञान के बिना कोई भी आध्यात्मिक आकाश में नहीं पहुँच सकता अथवा भगवान् के नित्य धाम (वैकुण्ठ गोलोक वृन्दावन) में प्रवेश नहीं कर सकता। अतएव कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला व्यक्ति ही पूर्ण योगी है, क्योंकि उसका मन सदा श्रीकृष्ण की लीलाओं में तल्लीन रहता है। स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः। वेदों में भी हम सीखते हैं : तम् एव विदित्वातिमृत्युम् एति : “केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को समझकर ही मनुष्य जन्म-मृत्यु के मार्ग को पार कर सकता है।” दूसरे शब्दों में, योग पद्धति की पूर्णता भौतिक अस्तित्व से मुक्ति की प्राप्ति है, न कि निर्दोष लोगों को मूर्ख बनाने हेतु कोई जादुई बाज़ीगरी अथवा शारीरिक कलाबाज़ी।

Bg 6.16

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥

—कभी नहीं; अति—बहुत अधिक; अश्नतः—इस प्रकार खाने वाले का; तु—किन्तु; योगः—परमेश्वर से संयोग; अस्ति—होता है; —न ही; —भी; एकान्तम्—अत्यन्त कम; अनश्नतः—भोजन से विरत रहने वाले का; —न ही; —भी; अति—बहुत अधिक; स्वप्न-शीलस्य—बहुत अधिक सोने वाले का; जाग्रतः—अथवा बहुत अधिक रात्रि-जागरण करने वाले का; —नहीं; एव—कभी; —और; अर्जुन—हे अर्जुन।

हे अर्जुन! जो बहुत अधिक खाता है अथवा बहुत कम खाता है, बहुत अधिक सोता है अथवा पर्याप्त नहीं सोता, उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है।

यहाँ योगियों के लिए आहार और निद्रा के नियमन की अनुशंसा की गई है। बहुत अधिक खाने का अर्थ है शरीर और आत्मा को एक साथ बनाए रखने के लिए जितना आवश्यक है, उससे अधिक खाना। मनुष्यों के लिए पशुओं को खाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अन्न, शाक, फल और दुग्ध की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। भगवद्गीता के अनुसार ऐसा सरल आहार सत्त्वगुण में माना जाता है। पशु-आहार उनके लिए है जो तमोगुण में हैं। अतः जो लोग पशु-आहार, मद्यपान, धूम्रपान तथा ऐसा भोजन करने में लिप्त रहते हैं, जो पहले श्रीकृष्ण को अर्पित नहीं किया गया, वे केवल दूषित वस्तुओं को खाने के कारण पापमय प्रतिक्रियाओं को भोगते हैं। भुञ्जते ते त्व् अघं पापा ये पचन्त्य् आत्म-कारणात्। जो कोई इन्द्रियतृप्ति के लिए खाता है, अथवा अपने लिए पकाता है और अपना भोजन श्रीकृष्ण को अर्पित नहीं करता, वह केवल पाप खाता है। जो पाप खाता है और अपने निर्धारित अंश से अधिक खाता है, वह पूर्ण योग का निष्पादन नहीं कर सकता। सर्वोत्तम तो यही है कि मनुष्य केवल श्रीकृष्ण को अर्पित भोजन का अवशेष ही खाए। कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति ऐसी कोई वस्तु नहीं खाता जो पहले श्रीकृष्ण को अर्पित न की गई हो। अतएव केवल कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ही योग-साधना में पूर्णता प्राप्त कर सकता है। न ही वह व्यक्ति योग का अभ्यास कर सकता है जो उपवास की अपनी कोई व्यक्तिगत विधि गढ़कर कृत्रिम रूप से भोजन से विरत रहता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति उपवास उसी प्रकार रखता है, जिस प्रकार शास्त्रों में उसकी अनुशंसा की गई है। वह न तो उपवास करता है, न आवश्यकता से अधिक खाता है, और इस प्रकार वह योग-साधना करने में सक्षम होता है। जो आवश्यकता से अधिक खाता है, वह सोते समय बहुत स्वप्न देखेगा, और फलस्वरूप उसे आवश्यकता से अधिक सोना पड़ेगा। मनुष्य को प्रतिदिन छह घण्टे से अधिक नहीं सोना चाहिए। जो चौबीस घण्टों में से छह घण्टे से अधिक सोता है, वह निश्चय ही तमोगुण से प्रभावित होता है। तमोगुण में स्थित व्यक्ति आलसी होता है और बहुत अधिक सोने की प्रवृत्ति रखता है। ऐसा व्यक्ति योग नहीं कर सकता।

Bg 6.17

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥

युक्त—नियमित; आहार—भोजन; विहारस्य—मनोरंजन; युक्त—नियमित; चेष्टस्य—जीविका के लिए कर्म करने वाले का; कर्मसु—कर्तव्यों के निर्वाह में; युक्त—नियमित; स्वप्न-अवबोधस्य—नियमित निद्रा और जागरण; योगः—योगाभ्यास; भवति—हो जाता है; दुःख-हा—दुःखों को कम करने वाला।

जो खाने, सोने, कर्म करने और मनोरंजन की अपनी आदतों में संयमित है, वह योग-पद्धति के अभ्यास द्वारा समस्त भौतिक दुःखों को शान्त कर सकता है।

खाने, सोने, रक्षा करने और मैथुन में अति — जो शरीर की माँगें हैं — योगाभ्यास में उन्नति को अवरुद्ध कर सकती है। जहाँ तक भोजन का प्रश्न है, इसका नियमन केवल तभी हो सकता है जब मनुष्य प्रसादम् अर्थात् पवित्रीकृत भोजन ग्रहण करने और स्वीकार करने का अभ्यासी हो जाए। भगवद्गीता (गीता 9.26) के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण को शाक, पुष्प, फल, अन्न, दुग्ध आदि अर्पित किए जाते हैं। इस प्रकार कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति स्वतः ही ऐसा भोजन न स्वीकार करने का अभ्यस्त हो जाता है, जो मनुष्य के उपभोग के लिए नहीं है अथवा जो सत्त्वगुण की कोटि में नहीं आता। जहाँ तक निद्रा का प्रश्न है, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्णभावनामृत में अपने कर्तव्यों के निर्वाह में सदैव सतर्क रहता है, और अतएव सोने में व्यतीत किया गया कोई भी अनावश्यक समय महान् हानि माना जाता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् की सेवा में संलग्न हुए बिना अपने जीवन का एक क्षण भी व्यतीत नहीं कर सकता। इसलिए उसकी निद्रा न्यूनतम रहती है। इस सम्बन्ध में उसके आदर्श श्रील रूप गोस्वामी हैं, जो सदैव श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रहते थे और जो दिन में दो घण्टे से अधिक नहीं सो पाते थे, और कभी-कभी तो उतना भी नहीं। ठाकुर हरिदास तीन लाख नामों के जप की अपनी दैनिक माला पूरी किए बिना न तो प्रसादम् स्वीकार करते थे और न ही एक क्षण के लिए सोते थे। जहाँ तक कर्म का प्रश्न है, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ऐसा कुछ नहीं करता जो श्रीकृष्ण के हित से सम्बद्ध न हो, और इस प्रकार उसका कर्म सदैव नियमित रहता है और इन्द्रियतृप्ति से अदूषित रहता है। चूँकि इन्द्रियतृप्ति का कोई प्रश्न ही नहीं है, अतः कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति के लिए कोई भौतिक अवकाश नहीं होता। और चूँकि वह अपने समस्त कर्म, वाणी, निद्रा, जागरण तथा अन्य सभी शारीरिक क्रियाओं में नियमित रहता है, इसलिए उसके लिए कोई भौतिक दुःख नहीं होता।

Bg 6.18

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥

यदा—जब; विनियतम्—विशेष रूप से अनुशासित; चित्तम्—मन और उसकी क्रियाएँ; आत्मनि—दिव्य में; एव—निश्चय ही; अवतिष्ठते—स्थित हो जाता है; निस्पृहः—रहित; सर्व—सभी प्रकार की; कामेभ्यः—भौतिक इच्छाओं से; युक्तः—योग में भली-भाँति स्थित; इति—इस प्रकार; उच्यते—कहा जाता है; तदा—उस समय।

जब योगी योगाभ्यास द्वारा अपनी मानसिक क्रियाओं को अनुशासित कर लेता है और समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित होकर दिव्य में स्थित हो जाता है, तब उसे योग में स्थित कहा जाता है।

योगी की क्रियाएँ साधारण व्यक्ति की क्रियाओं से उसके इस विशिष्ट लक्षण द्वारा भिन्न होती हैं कि वह समस्त प्रकार की भौतिक इच्छाओं से — जिनमें काम प्रमुख है — विरत हो जाता है। पूर्ण योगी मन की क्रियाओं में इतना भली-भाँति अनुशासित होता है कि उसे किसी भी प्रकार की भौतिक इच्छा अब विचलित नहीं कर सकती। यह पूर्णता की अवस्था कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्तियों द्वारा स्वतः ही प्राप्त की जा सकती है, जैसा कि श्रीमद्भागवत (9.4.18-20) में कहा गया है:

sa vai manaḥ kṛṣṇa-padāravindayor vacāṁsi vaikuṇṭha-guṇānavarṇane

karau harer mandira-mārjanādiṣu śrutiṁ cakārācyuta-sat-kathodaye

mukunda-liṅgālaya-darśane dṛśau tad-bhṛtyagātra-sparśe ‘ṅga-saṅgamam

ghrāṇaṁ ca tat-pāda-saroja-saurabhe śrīmat tulasyā rasanāṁ tad-arpite

pādau hareḥ kṣetra-padānusarpaṇe śiro hṛṣīkeśa-padābhivandane

kāmaṁ ca dāsye na tu kāma-kāmyayā yathottama-śloka-janāśrayā ratiḥ

“राजा अम्बरीष ने सर्वप्रथम अपने मन को भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में लगाया; तत्पश्चात् उन्होंने एक के बाद एक अपनी वाणी को भगवान् के दिव्य गुणों के वर्णन में, अपने हाथों को भगवान् के मन्दिर के मार्जन में, अपने कानों को भगवान् की लीलाओं के श्रवण में, अपने नेत्रों को भगवान् के दिव्य रूपों के दर्शन में, अपने शरीर को भक्तों के शरीरों के स्पर्श में, अपनी घ्राण-इन्द्रिय को भगवान् को अर्पित कमल-पुष्प की सुगन्ध सूँघने में, अपनी जिह्वा को भगवान् के चरणकमलों में अर्पित तुलसीदल के आस्वादन में, अपने चरणों को तीर्थस्थानों और भगवान् के मन्दिर में जाने में, अपने मस्तक को भगवान् को प्रणाम अर्पित करने में और अपनी इच्छाओं को भगवान् के अभियान के निष्पादन में लगाया। ये समस्त दिव्य क्रियाएँ शुद्ध भक्त के सर्वथा अनुरूप हैं।”

यह दिव्य अवस्था निर्विशेषवादी मार्ग के अनुयायियों द्वारा व्यक्तिगत रूप से भले ही अवर्णनीय हो, किन्तु कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति के लिए यह अत्यन्त सरल और व्यावहारिक हो जाती है, जैसा कि महाराज अम्बरीष की प्रवृत्तियों के उपर्युक्त वर्णन में स्पष्ट है। जब तक निरन्तर स्मरण द्वारा मन भगवान् के चरणकमलों में स्थिर न हो, तब तक ऐसी दिव्य प्रवृत्तियाँ व्यावहारिक नहीं होतीं। अतः भगवान् की भक्ति में इन विहित क्रियाओं को अर्चना कहा जाता है, अर्थात् भगवान् की सेवा में समस्त इन्द्रियों को संलग्न करना। इन्द्रियों और मन को संलग्नता की आवश्यकता होती है। मात्र त्याग व्यावहारिक नहीं है। इसलिए सामान्य जनों के लिए — विशेषतः उनके लिए जो संन्यास-आश्रम में नहीं हैं — इन्द्रियों और मन की उपर्युक्त वर्णित दिव्य संलग्नता ही दिव्य उपलब्धि की पूर्ण विधि है, जिसे भगवद्गीता में युक्त कहा गया है।

Bg 6.19

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥

यथा—जैसे; दीपः—दीपक; निवातस्थः—वायुरहित स्थान में; —नहीं; इङ्गते—डोलता; सा उपमा—उससे तुलना की गई; स्मृता—उपमित; योगिनः—योगी की; यत-चित्तस्य—जिसका मन वश में है; युञ्जतः—निरन्तर संलग्न; योगम्—ध्यान में; आत्मनः—दिव्य पर।

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक नहीं डोलता, उसी प्रकार वह दिव्यवादी, जिसका मन वश में है, दिव्य आत्मा पर अपने ध्यान में सदैव स्थिर रहता है।

सच्चा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति, जो सदैव दिव्य में निमग्न रहता है और अपने आराध्य भगवान् के निरन्तर अविचल ध्यान में लीन रहता है, वायुरहित स्थान में रखे दीपक के समान स्थिर रहता है।

Bg 6.2

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥

यम्—जिसे; सन्न्यासम्—संन्यास; इति—इस प्रकार; प्राहुः—वे कहते हैं; योगम्—परम के साथ युक्त होना; तम्—उसे; विद्धि—तुम जान लो; पाण्डव—हे पाण्डुपुत्र; —कभी नहीं; हि—निश्चय ही; असन्न्यस्त—त्याग किए बिना; सङ्कल्पः—आत्म-तृप्ति; योगी—योगी; भवति—बनता है; कश्चन—कोई भी।

हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही तुम योग, अर्थात् अपने को परम से युक्त करना जानो, क्योंकि जब तक मनुष्य इन्द्रियतृप्ति की इच्छा का त्याग नहीं करता, तब तक वह योगी नहीं बन सकता।

वास्तविक संन्यासयोग अथवा भक्ति का अर्थ यह है कि मनुष्य जीव के रूप में अपनी स्वरूपगत स्थिति को जाने और तदनुसार कर्म करे। जीव की कोई पृथक् स्वतन्त्र पहचान नहीं है। वह परम की तटस्था शक्ति है। जब वह भौतिक शक्ति द्वारा फँस जाता है, तब वह बद्ध हो जाता है, और जब वह कृष्णभावनाभावित होता है, अर्थात् आध्यात्मिक शक्ति के प्रति सचेत होता है, तब वह अपनी वास्तविक एवं स्वाभाविक जीवन-दशा में स्थित होता है। अतः जब मनुष्य पूर्ण ज्ञान में स्थित होता है, तब वह समस्त भौतिक इन्द्रियतृप्ति का परित्याग कर देता है, अर्थात् सभी प्रकार की इन्द्रियतृप्तिमूलक क्रियाओं का त्याग कर देता है। इसी का अभ्यास वे योगी करते हैं, जो इन्द्रियों को भौतिक आसक्ति से रोकते हैं। किन्तु कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति के लिए अपनी इन्द्रियों को किसी ऐसे कार्य में लगाने का अवसर ही नहीं रहता, जो श्रीकृष्ण के प्रयोजन हेतु न हो। अतएव कृष्णभावनाभावित व्यक्ति एक साथ ही संन्यासी तथा योगी है। ज्ञान का तथा इन्द्रियों के संयम का जो प्रयोजन ज्ञान एवं योग की प्रक्रियाओं में निर्धारित है, वह कृष्णभावनामृत में स्वतः ही सिद्ध हो जाता है। यदि मनुष्य अपने स्वार्थपूर्ण स्वभाव की क्रियाओं को त्यागने में असमर्थ है, तो ज्ञान और योग व्यर्थ हैं। वास्तविक लक्ष्य यही है कि जीव समस्त स्वार्थपूर्ण तृप्ति का त्याग कर दे और परम को सन्तुष्ट करने के लिए तत्पर रहे। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को किसी भी प्रकार के आत्म-भोग की इच्छा नहीं होती। वह सदा परम के भोग के लिए संलग्न रहता है। जिसे परम का कोई ज्ञान नहीं है, उसे अनिवार्यतः आत्म-तृप्ति में ही प्रवृत्त रहना पड़ता है, क्योंकि कोई भी निष्क्रियता की भूमि पर टिक नहीं सकता। ये समस्त प्रयोजन कृष्णभावनामृत के अभ्यास से भली-भाँति सिद्ध हो जाते हैं।

Bg 6.20-23

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥ २३ ॥

यत्र—उस स्थिति में; उपरमते—जब मनुष्य दिव्य आनन्द का अनुभव करता है; चित्तम्—मानसिक क्रियाएँ; निरुद्धम्—भौतिक वस्तु से निरुद्ध; योग-सेवया—योग के अनुष्ठान द्वारा; यत्र—जिसमें; —भी; एव—निश्चय ही; आत्मना—शुद्ध मन द्वारा; आत्मानम्—आत्मा को; पश्यन्—स्थिति का साक्षात्कार करते हुए; आत्मनि—आत्मा में; तुष्यति—सन्तुष्ट हो जाता है; सुखम्—सुख; आत्यन्तिकम्—परम; यत्—जिसमें; तत्—वह; बुद्धि—बुद्धि; ग्राह्यम्—ग्राह्य; अतीन्द्रियम्—दिव्य; वेत्ति—जानता है; यत्र—जिसमें; —कभी नहीं; —भी; एव—निश्चय ही; अयम्—इसमें; स्थितः—स्थित; चलति—विचलित होता है; तत्त्वतः—सत्य से; यम्—जिसे; लब्ध्वा—प्राप्ति द्वारा; —भी; अपरम्—कोई अन्य; लाभम्—लाभ; मन्यते—नहीं मानता; —कभी नहीं; अधिकम्—उससे अधिक; ततः—उससे; यस्मिन्—जिसमें; स्थितः—स्थित होकर; —कभी नहीं; दुःखेन—दुःखों से; गुरुणापि—यद्यपि अत्यन्त कठिन; विचाल्यते—विचलित होता है; तम्—उसे; विद्यात्—तुम्हें जानना चाहिए; दुःख-संयोग—भौतिक संसर्ग के दुःख; वियोगम्—विनाश; योग-संज्ञितम्—योग में समाधि।

पूर्णता की अवस्था को समाधि अथवा त्राण कहा जाता है, जब योगाभ्यास द्वारा मनुष्य का मन भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्णतः निरुद्ध हो जाता है। इसका लक्षण मनुष्य की वह क्षमता है जिससे वह शुद्ध मन द्वारा आत्मा को देख सकता है तथा आत्मा में आस्वादन और आनन्द ले सकता है। उस आनन्दमय अवस्था में मनुष्य असीम दिव्य सुख में स्थित होता है और दिव्य इन्द्रियों के माध्यम से आनन्द भोगता है। इस प्रकार स्थित होकर मनुष्य कभी सत्य से विचलित नहीं होता, और इसे प्राप्त करके वह मानता है कि इससे बड़ा कोई लाभ नहीं है। ऐसी स्थिति में स्थित होकर मनुष्य महानतम कठिनाई के मध्य भी कभी विचलित नहीं होता। यह वस्तुतः भौतिक संसर्ग से उत्पन्न समस्त दुःखों से वास्तविक मुक्ति है।

योगाभ्यास द्वारा मनुष्य भौतिक धारणाओं से क्रमशः विरक्त हो जाता है। यह योग-सिद्धान्त का प्रमुख लक्षण है। और इसके पश्चात् मनुष्य समाधि अथवा त्राण में स्थित हो जाता है, जिसका अर्थ है कि योगी दिव्य मन और बुद्धि के माध्यम से परमात्मा का साक्षात्कार करता है, और आत्मा को परमात्मा से अभिन्न मानने की किसी भी भ्रान्ति के बिना। योगाभ्यास प्रायः पतञ्जलि-पद्धति के सिद्धान्तों पर आधारित है। कुछ अप्रामाणिक भाष्यकार जीवात्मा को परमात्मा से अभिन्न सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, और अद्वैतवादी इसी को मुक्ति मानते हैं, किन्तु वे पतञ्जलि की योग-पद्धति के वास्तविक प्रयोजन को नहीं समझते। पतञ्जलि-पद्धति में दिव्य आनन्द की स्वीकृति है, किन्तु अद्वैतवादी एकत्व के सिद्धान्त के विघटन के भय से इस दिव्य आनन्द को स्वीकार नहीं करते। ज्ञान और ज्ञाता की द्वैतता को अद्वैतवादी स्वीकार नहीं करता, किन्तु इस श्लोक में दिव्य आनन्द को — जो दिव्य इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव किया जाता है — स्वीकार किया गया है। और इसकी पुष्टि योग-पद्धति के सुप्रसिद्ध प्रवक्ता पतञ्जलि मुनि द्वारा होती है। वे महान् ऋषि अपने योग-सूत्रों में घोषणा करते हैं: पुरुषार्थ-शून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूप-प्रतिष्ठा वा चिति-शक्तिर् इति।

यह चिति-शक्ति अथवा अन्तरंगा शक्ति दिव्य है। पुरुषार्थ का अर्थ है भौतिक धार्मिकता, आर्थिक विकास, इन्द्रियतृप्ति और अन्ततः परमेश्वर से एक होने का प्रयास। इस “परमेश्वर से एकत्व” को अद्वैतवादी कैवल्य कहता है। किन्तु पतञ्जलि के अनुसार यह कैवल्य एक अन्तरंगा अथवा दिव्य शक्ति है, जिसके द्वारा जीव अपनी स्वाभाविक स्थिति के प्रति सचेत हो जाता है। भगवान् चैतन्य के शब्दों में इस स्थिति को चेतो-दर्पण-मार्जनम् अर्थात् मन के मलिन दर्पण का परिमार्जन कहा जाता है। यह “परिमार्जन” वस्तुतः मुक्ति अथवा भव-महादावाग्नि-निर्वापणम् है। निर्वाण का सिद्धान्त — जो प्रारम्भिक भी है — इसी सिद्धान्त से मेल खाता है। श्रीमद्भागवत में इसे स्वरूपेण व्यवस्थितिः कहा जाता है। भगवद्गीता भी इस श्लोक में इस स्थिति की पुष्टि करती है।

निर्वाण अथवा भौतिक उपरति के पश्चात् आध्यात्मिक क्रियाओं अथवा भगवान् की भक्ति का प्राकट्य होता है, जिसे कृष्णभावनामृत कहा जाता है। श्रीमद्भागवत के शब्दों में, स्वरूपेण व्यवस्थितिः: यही “जीव का वास्तविक जीवन” है। माया अथवा भ्रम भौतिक संक्रमण से दूषित आध्यात्मिक जीवन की अवस्था है। इस भौतिक संक्रमण से मुक्ति का अर्थ जीव की मूल नित्य स्थिति का विनाश नहीं है। पतञ्जलि भी अपने शब्दों कैवल्यं स्वरूप-प्रतिष्ठा वा चिति-शक्तिर् इति द्वारा इसे स्वीकार करते हैं। यह चिति-शक्ति अथवा दिव्य आनन्द ही वास्तविक जीवन है। इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्रों में आनन्दमयो ऽभ्यासात् के रूप में होती है। यह स्वाभाविक दिव्य आनन्द योग का परम लक्ष्य है और भक्ति अथवा भक्तियोग के निष्पादन द्वारा सरलता से प्राप्त किया जाता है। भक्तियोग का सजीव वर्णन भगवद्गीता के सप्तम अध्याय में किया जाएगा।

जैसा कि इस अध्याय में वर्णित है, योग-पद्धति में दो प्रकार की समाधि होती है, जिन्हें सम्प्रज्ञात-समाधि और असम्प्रज्ञात-समाधि कहा जाता है। जब मनुष्य विविध दार्शनिक अनुसन्धानों द्वारा दिव्य स्थिति में स्थित हो जाता है, तो इसे सम्प्रज्ञात-समाधि कहा जाता है। असम्प्रज्ञात-समाधि में सांसारिक सुख से अब कोई सम्बन्ध नहीं रहता, क्योंकि तब मनुष्य इन्द्रियों से प्राप्त समस्त प्रकार के सुखों से परे, दिव्य हो जाता है। योगी एक बार उस दिव्य स्थिति में स्थित हो जाने पर उससे कभी विचलित नहीं होता। जब तक योगी इस स्थिति तक नहीं पहुँच पाता, तब तक वह असफल रहता है। आज की तथाकथित योग-साधना, जिसमें विविध इन्द्रिय-सुख सम्मिलित हैं, विरोधाभासी है। काम और मादक द्रव्यों में लिप्त योगी एक उपहास है। यहाँ तक कि वे योगी भी, जो योग-प्रक्रिया में सिद्धियों से आकृष्ट हो जाते हैं, पूर्ण रूप से स्थित नहीं होते। यदि योगी योग के उपोत्पादों से आकृष्ट हो जाएँ, तो वे पूर्णता की अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकते, जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है। अतः जो व्यक्ति व्यायाम-कौशल अथवा सिद्धियों के दिखावटी अभ्यास में लिप्त रहते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उस मार्ग में योग का लक्ष्य खो जाता है।

इस युग में योग की सर्वोत्तम साधना कृष्णभावनामृत है, जो विभ्रमकारी नहीं है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने कार्य में इतना सुखी रहता है कि वह किसी अन्य सुख की आकांक्षा नहीं करता। इस कपट के युग में विशेष रूप से हठयोग, ध्यानयोग और ज्ञानयोग का अभ्यास करने में अनेक बाधाएँ हैं, किन्तु कर्मयोग अथवा भक्तियोग के निष्पादन में ऐसी कोई समस्या नहीं है।

जब तक भौतिक शरीर विद्यमान रहता है, तब तक मनुष्य को शरीर की माँगों — अर्थात् खाने, सोने, रक्षा करने और मैथुन — को पूरा करना पड़ता है। किन्तु जो व्यक्ति शुद्ध भक्तियोग अथवा कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह शरीर की माँगों को पूरा करते समय इन्द्रियों को उद्दीप्त नहीं करता। प्रत्युत वह जीवन की केवल अत्यावश्यक वस्तुओं को स्वीकार करता है, बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग करता है, और कृष्णभावनामृत में दिव्य सुख का भोग करता है। वह आकस्मिक घटनाओं — जैसे दुर्घटनाएँ, रोग, अभाव और यहाँ तक कि किसी अत्यन्त प्रिय सम्बन्धी की मृत्यु — के प्रति उदासीन रहता है, किन्तु वह कृष्णभावनामृत अथवा भक्तियोग में अपने कर्तव्यों के निष्पादन हेतु सदैव सतर्क रहता है। दुर्घटनाएँ उसे कभी उसके कर्तव्य से विचलित नहीं करतीं। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, आगमापायिनो ऽनित्यास् तांस् तितिक्षस्व भारत। वह ऐसी समस्त आकस्मिक घटनाओं को सहन करता है, क्योंकि वह जानता है कि वे आती-जाती रहती हैं और उसके कर्तव्यों को प्रभावित नहीं करतीं। इस प्रकार वह योग-साधना में सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करता है।

Bg 6.24

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥

सः—वह योग-पद्धति; निश्चयेन—दृढ़ संकल्प के साथ; योक्तव्यः—अभ्यास की जानी चाहिए; योगः—ऐसे अभ्यास में; अनिर्विण्ण-चेतसा—विचलित हुए बिना; संकल्प—भौतिक इच्छाएँ; प्रभवान्—से उत्पन्न; कामान्—इन्द्रियतृप्ति; त्यक्त्वा—त्यागकर; सर्वान्—समस्त; अशेषतः—पूर्णतः; मनसा—मन द्वारा; एव—निश्चय ही; इन्द्रिय-ग्रामम्—समस्त इन्द्रियों को; विनियम्य—नियमित करते हुए; समन्ततः—चारों ओर से।

मनुष्य को अविचल संकल्प और श्रद्धा के साथ योग के अभ्यास में संलग्न होना चाहिए। उसे मिथ्या अहंकार से उत्पन्न समस्त भौतिक इच्छाओं को बिना किसी अपवाद के त्याग देना चाहिए और इस प्रकार मन द्वारा चारों ओर से समस्त इन्द्रियों को वश में करना चाहिए।

योग-साधक को संकल्पवान् होना चाहिए और धैर्यपूर्वक बिना विचलित हुए अभ्यास का निष्पादन करना चाहिए। मनुष्य को अन्त में सफलता के प्रति आश्वस्त रहना चाहिए और इस मार्ग का महान् दृढ़ता के साथ अनुसरण करना चाहिए, तथा सफलता की प्राप्ति में किसी विलम्ब के होने पर हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। दृढ़ साधक के लिए सफलता निश्चित है। भक्तियोग के विषय में रूप गोस्वामी कहते हैं:

utsāhān niścayād dhairyāt tat tat karma-pravartanāt

saṅga-tyāgāt satovṛtteḥ ṣaḍbhir bhaktiḥ prasidhyati

“भक्तियोग की प्रक्रिया को भक्तों की संगति में विहित कर्तव्यों का अनुसरण करके और सत्त्वगुण की क्रियाओं में पूर्ण रूप से संलग्न होकर, पूर्ण हृदय के उत्साह, दृढ़ता और संकल्प के साथ सफलतापूर्वक निष्पादित किया जा सकता है।”

संकल्प के विषय में मनुष्य को उस चिड़िया का उदाहरण लेना चाहिए, जिसने अपने अण्डे समुद्र की लहरों में खो दिए थे। एक चिड़िया ने समुद्र के तट पर अपने अण्डे दिए, किन्तु विशाल समुद्र अपनी लहरों पर उन अण्डों को बहा ले गया। चिड़िया अत्यन्त व्याकुल हो गई और उसने समुद्र से अपने अण्डे लौटाने को कहा। समुद्र ने उसकी प्रार्थना पर विचार तक नहीं किया। अतः चिड़िया ने समुद्र को सुखा देने का निश्चय किया। वह अपनी छोटी-सी चोंच से जल निकालने लगी, और उसके असम्भव संकल्प पर सब उस पर हँसे। उसकी इस क्रिया का समाचार फैल गया, और अन्ततः भगवान् विष्णु के विशालकाय पक्षीवाहन गरुड ने उसे सुना। उन्हें अपनी छोटी बहन पक्षी पर करुणा आई, और इसलिए वे चिड़िया को देखने आए। गरुड उस छोटी चिड़िया के संकल्प से अत्यन्त प्रसन्न हुए, और उन्होंने सहायता का वचन दिया। इस प्रकार गरुड ने तुरन्त समुद्र से अण्डे लौटाने को कहा, अन्यथा वे स्वयं चिड़िया का कार्य अपने हाथ में ले लेंगे। इससे समुद्र भयभीत हो गया और उसने अण्डे लौटा दिए। इस प्रकार गरुड की कृपा से चिड़िया सुखी हो गई।

इसी प्रकार योग की साधना, विशेषतः कृष्णभावनामृत में भक्तियोग, एक अत्यन्त कठिन कार्य प्रतीत हो सकती है। किन्तु यदि कोई महान् संकल्प के साथ इन सिद्धान्तों का अनुसरण करता है, तो भगवान् निश्चय ही सहायता करते हैं, क्योंकि जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं, ईश्वर उनकी सहायता करते हैं।

Bg 6.25

शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २५ ॥

शनैः—क्रमशः; शनैः—पग-पग; उपरमेत्—विरत हो; बुद्ध्या—बुद्धि द्वारा; धृति-गृहीतया—दृढ़ विश्वास धारण करते हुए; आत्म-संस्थम्—दिव्य में स्थित; मनः—मन; कृत्वा—ऐसा करके; —नहीं; किञ्चित्—कुछ भी अन्य; अपि—भी; चिन्तयेत्—चिन्तन करे।

मनुष्य को पूर्ण विश्वास के साथ क्रमशः, पग-पग, बुद्धि के माध्यम से समाधि में स्थित हो जाना चाहिए, और इस प्रकार मन को केवल आत्मा पर स्थिर करना चाहिए तथा अन्य किसी वस्तु का चिन्तन नहीं करना चाहिए।

उचित विश्वास और बुद्धि द्वारा मनुष्य को क्रमशः इन्द्रिय-क्रियाओं से विरत हो जाना चाहिए। इसे प्रत्याहार कहते हैं। विश्वास, ध्यान और इन्द्रियों की उपरति द्वारा वश में किए गए मन को समाधि में स्थित होना चाहिए। उस समय जीवन की भौतिक धारणा में संलग्न होने का कोई संकट नहीं रहता। दूसरे शब्दों में, यद्यपि जब तक भौतिक शरीर विद्यमान रहता है तब तक मनुष्य भौतिक वस्तु से जुड़ा रहता है, तथापि उसे इन्द्रियतृप्ति के विषय में नहीं सोचना चाहिए। मनुष्य को परम आत्मा के सुख के अतिरिक्त किसी अन्य सुख का विचार नहीं करना चाहिए। यह अवस्था प्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनामृत का अभ्यास करके सरलता से प्राप्त की जाती है।

Bg 6.26

यतो यतो निश्चलति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥

यतः—जिससे भी; यतः—जहाँ भी; निश्चलति—वस्तुतः विचलित होता है; मनः—मन; चञ्चलम्—चपल; अस्थिरम्—अस्थिर; ततः—वहाँ से; ततः—और उसके पश्चात्; नियम्य—नियमित करते हुए; एतत्—इसे; आत्मनि—आत्मा में; एव—निश्चय ही; वशम्—वश में; नयेत्—लाना चाहिए।

मन अपनी चपल और अस्थिर प्रकृति के कारण जिस किसी वस्तु से और जहाँ कहीं भी भटके, मनुष्य को निश्चय ही उसे वहाँ से हटाकर पुनः आत्मा के वश में लाना चाहिए।

मन की प्रकृति चपल और अस्थिर है। किन्तु आत्म-साक्षात्कारी योगी को मन को वश में करना होता है; मन को उसे वश में नहीं करना चाहिए। जो मन को (और अतएव इन्द्रियों को भी) वश में करता है, उसे गोस्वामी अथवा स्वामी कहा जाता है, और जो मन के वश में होता है, उसे गोदास अथवा इन्द्रियों का दास कहा जाता है। गोस्वामी इन्द्रिय-सुख के मानदण्ड को जानता है। दिव्य इन्द्रिय-सुख में इन्द्रियाँ हृषीकेश अथवा इन्द्रियों के परम स्वामी — श्रीकृष्ण — की सेवा में संलग्न रहती हैं। शुद्ध इन्द्रियों से श्रीकृष्ण की सेवा करना कृष्णभावनामृत कहलाता है। यही इन्द्रियों को पूर्ण वश में लाने का उपाय है। और तो और, यही योग-साधना की सर्वोच्च पूर्णता है।

Bg 6.27

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥

प्रशान्त—श्रीकृष्ण के चरणकमलों में स्थिर मन; मनसम्—जिसका मन इस प्रकार स्थिर है उसका; हि—निश्चय ही; एनम्—इस; योगिनम्—योगी को; सुखम्—सुख; उत्तमम्—सर्वोच्च; उपैति—प्राप्त होता है; शान्त-रजसम्—शान्त किया गया रजोगुण; ब्रह्म-भूतम्—परब्रह्म से तादात्म्य द्वारा मुक्त; अकल्मषम्—समस्त पूर्व पापमय प्रतिक्रिया से मुक्त।

जिस योगी का मन मुझ पर स्थिर है, वह निश्चय ही सर्वोच्च सुख प्राप्त करता है। ब्रह्म के साथ अपने तादात्म्य के कारण वह मुक्त हो जाता है; उसका मन शान्त होता है, उसका रजोगुण शान्त हो जाता है, और वह पाप से मुक्त हो जाता है।

ब्रह्म-भूत भौतिक संदूषण से मुक्त होकर भगवान् की दिव्य सेवा में स्थित होने की अवस्था है। मद्-भक्तिं लभते पराम् (गीता 18.54)। जब तक मनुष्य का मन भगवान् के चरणकमलों में स्थिर न हो, तब तक वह परब्रह्म अर्थात् परम सत्य की ब्रह्म-स्थिति में नहीं रह सकता। स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः। भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में सदैव संलग्न रहना अथवा कृष्णभावनामृत में स्थित रहना ही वस्तुतः रजोगुण और समस्त भौतिक संदूषण से मुक्त होना है।

Bg 6.28

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥

युञ्जन्—इस प्रकार योगाभ्यास में संलग्न होकर; एवम्—इस प्रकार; सदा—सदैव; आत्मानम्—आत्मा; योगी—जो परमात्मा के सम्पर्क में है; विगत—मुक्त हो जाता है; कल्मषः—समस्त भौतिक संदूषण से; सुखेन—दिव्य सुख में; ब्रह्म-संस्पर्शम्—परमेश्वर के निरन्तर सम्पर्क में रहते हुए; अत्यन्तम्—सर्वोच्च; सुखम्—सुख; अश्नुते—प्राप्त करता है।

आत्मा में स्थिर रहकर तथा समस्त भौतिक संदूषण से मुक्त होकर योगी परम चेतना के सम्पर्क में सुख की सर्वोच्च पूर्ण अवस्था को प्राप्त करता है।

आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है परमेश्वर के सम्बन्ध में अपनी स्वाभाविक स्थिति को जानना। जीवात्मा परमेश्वर का अंश है, और उसकी स्थिति भगवान् को दिव्य सेवा अर्पित करना है। परमेश्वर के साथ इस दिव्य सम्पर्क को ब्रह्म-संस्पर्श कहा जाता है।

Bg 6.29

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥

सर्व-भूत-स्थम्—समस्त प्राणियों में स्थित; आत्मानम्—परमात्मा को; सर्व—समस्त; भूतानि—प्राणी; —भी; आत्मनि—आत्मा में; ईक्षते—देखता है; योग-युक्त-आत्मा—जो कृष्णभावनामृत में युक्त है; सर्वत्र—सर्वत्र; सम-दर्शनः—समान दृष्टि से देखने वाला।

सच्चा योगी समस्त प्राणियों में मुझे देखता है, और प्रत्येक प्राणी को मुझमें भी देखता है। वास्तव में, आत्म-साक्षात्कारी पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है।

कृष्णभावनाभावित योगी पूर्ण द्रष्टा है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण, परमेश्वर को, परमात्मा रूप में प्रत्येक के हृदय में स्थित देखता है। ईश्वरः सर्व-भूतानां हृद्-देशे ऽर्जुन तिष्ठति। भगवान् अपने परमात्मा-स्वरूप में कुत्ते के और ब्राह्मण के, दोनों के हृदय में स्थित हैं। पूर्ण योगी जानता है कि भगवान् नित्य दिव्य हैं और कुत्ते अथवा ब्राह्मण में अपनी उपस्थिति से वे भौतिक रूप से प्रभावित नहीं होते। यही भगवान् की परम निष्पक्षता है। जीवात्मा भी अपने व्यक्तिगत हृदय में स्थित है, किन्तु वह समस्त हृदयों में उपस्थित नहीं है। यही जीवात्मा और परमात्मा के बीच का भेद है। जो वस्तुतः योग के अभ्यास में नहीं है, वह इतनी स्पष्टता से नहीं देख सकता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति आस्तिक और नास्तिक दोनों के हृदय में श्रीकृष्ण को देख सकता है। स्मृति में इसकी पुष्टि इस प्रकार होती है: आततत्वाच् च मातृत्वाद् आत्मा हि परमो हरिः।

भगवान्, समस्त प्राणियों के स्रोत होने के कारण, माता और पालक के समान हैं। जिस प्रकार माता विभिन्न प्रकार के समस्त बच्चों के प्रति निष्पक्ष रहती है, उसी प्रकार परम पिता (अथवा माता) भी रहते हैं। फलस्वरूप परमात्मा सदैव प्रत्येक जीव में रहते हैं। बाह्य रूप से भी प्रत्येक जीव भगवान् की शक्ति में स्थित है। जैसा कि सप्तम अध्याय में समझाया जाएगा, भगवान् की मुख्यतः दो शक्तियाँ हैं — आध्यात्मिक (अथवा परा) और भौतिक (अथवा अपरा)। यद्यपि जीव परा शक्ति का अंश है, तथापि वह अपरा शक्ति द्वारा बद्ध है; जीव सदैव भगवान् की शक्ति में रहता है। प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार से उनमें स्थित है। योगी समान दृष्टि से देखता है, क्योंकि वह देखता है कि समस्त जीव, यद्यपि सकाम कर्म के फलों के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थितियों में होते हैं, सभी परिस्थितियों में ईश्वर के सेवक बने रहते हैं। भौतिक शक्ति में रहते हुए जीव भौतिक इन्द्रियों की सेवा करता है; और आध्यात्मिक शक्ति में रहते हुए वह प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर की सेवा करता है। दोनों ही दशाओं में जीव ईश्वर का सेवक है। समत्व की यह दृष्टि कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति में पूर्ण होती है।

Bg 6.3

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्यतस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥

आरुरुक्षोः—जिसने अभी-अभी योग आरम्भ किया है, उसका; मुनेः—मुनि का; योगम्—अष्टांगयोग पद्धति; कर्म—कर्म; कारणम्—कारण; उच्यते—कहा जाता है; योग—अष्टांगयोग; आरूढस्य—जिसने प्राप्त कर लिया है, उसका; तस्य—उसका; एव—निश्चय ही; शमः—समस्त भौतिक क्रियाओं की समाप्ति; कारणम्—कारण; उच्यते—कहा जाता है।

अष्टांगयोग पद्धति में जो नवदीक्षित है, उसके लिए कर्म साधन कहा जाता है; और जिसने योग को पहले से ही प्राप्त कर लिया है, उसके लिए समस्त भौतिक क्रियाओं की समाप्ति साधन कही जाती है।

अपने को परम से युक्त करने की प्रक्रिया योग कहलाती है, जिसकी तुलना सर्वोच्च आध्यात्मिक साक्षात्कार प्राप्त करने हेतु एक सीढ़ी से की जा सकती है। यह सीढ़ी जीव की निम्नतम भौतिक दशा से आरम्भ होकर शुद्ध आध्यात्मिक जीवन में पूर्ण आत्म-साक्षात्कार तक ऊपर चढ़ती है। विभिन्न उन्नति-स्तरों के अनुसार इस सीढ़ी के भिन्न-भिन्न भाग भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते हैं। किन्तु समग्र रूप में यह सम्पूर्ण सीढ़ी योग कहलाती है, और इसे तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है, अर्थात् ज्ञानयोग, ध्यानयोग तथा भक्तियोग। सीढ़ी का आरम्भ योगारुरुक्षु अवस्था कहलाता है, और सर्वोच्च सोपान योगारूढ कहलाता है।

अष्टांगयोग पद्धति के विषय में, जीवन के नियामक सिद्धान्तों तथा विभिन्न आसनों के अभ्यास (जो प्रायः शारीरिक व्यायाम ही हैं) के माध्यम से ध्यान में प्रवेश करने के आरम्भिक प्रयत्न सकाम भौतिक क्रियाएँ माने जाते हैं। ऐसी समस्त क्रियाएँ इन्द्रियों को वश में करने हेतु पूर्ण मानसिक सन्तुलन की प्राप्ति की ओर ले जाती हैं। जब मनुष्य ध्यान के अभ्यास में निपुण हो जाता है, तब वह समस्त विक्षोभकारी मानसिक क्रियाओं को विराम दे देता है।

किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति आरम्भ से ही ध्यान की भूमि पर स्थित रहता है, क्योंकि वह सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है। और निरन्तर श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रहने के कारण, उसने समस्त भौतिक क्रियाओं को विराम दे दिया है, ऐसा माना जाता है।

Bg 6.30

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥

यः—जो कोई; माम्—मुझे; पश्यति—देखता है; सर्वत्र—सर्वत्र; सर्वम्—सब कुछ; —और; मयि—मुझमें; पश्यति—देखता है; तस्य—उसके लिए; अहम्—मैं; —नहीं; प्रणश्यामि—लुप्त होता हूँ; सः—वह; —भी; मे—मेरे लिए; —न ही; प्रणश्यति—लुप्त होता है।

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी लुप्त नहीं होता, और न ही वह कभी मेरे लिए लुप्त होता है।

कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्ण को सर्वत्र देखता है, और वह सब कुछ श्रीकृष्ण में देखता है। ऐसा व्यक्ति भले ही भौतिक प्रकृति के समस्त पृथक् प्राकट्यों को देखता प्रतीत हो, किन्तु प्रत्येक स्थिति में वह श्रीकृष्ण के प्रति सचेत रहता है, यह जानते हुए कि सब कुछ श्रीकृष्ण की शक्ति का प्राकट्य है। श्रीकृष्ण के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता, और श्रीकृष्ण सबके स्वामी हैं — यही कृष्णभावनामृत का मूल सिद्धान्त है।

कृष्णभावनामृत श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम का विकास है — एक ऐसी स्थिति जो भौतिक मुक्ति से भी परे है। यह आत्म-साक्षात्कार से परे की अवस्था है, जहाँ भक्त इस अर्थ में श्रीकृष्ण से एक हो जाता है कि श्रीकृष्ण भक्त के लिए सब कुछ बन जाते हैं, और भक्त श्रीकृष्ण के प्रेम में परिपूर्ण हो जाता है। तब भगवान् और भक्त के बीच एक घनिष्ठ सम्बन्ध विद्यमान होता है। उस अवस्था में जीव अपनी अमरता प्राप्त करता है। न ही भगवान् कभी भक्त की दृष्टि से ओझल होते हैं। श्रीकृष्ण में विलीन हो जाना आध्यात्मिक विनाश है। भक्त ऐसा कोई संकट मोल नहीं लेता। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है:

premāñjana-cchurita-bhakti-vilocanena

santaḥ sadaiva hṛdayeṣu vilokayanti

yaṁ śyāmasundaram acintya-guṇa-svarūpaṁ

govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi

“मैं उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जो उस भक्त द्वारा सदैव देखे जाते हैं, जिसके नेत्र प्रेम के लेप से अनुलिप्त हैं। वे भक्त के हृदय में स्थित अपने नित्य श्यामसुन्दर रूप में देखे जाते हैं।” (ब्रह्म-संहिता 5.38)

इस अवस्था में भगवान् श्रीकृष्ण कभी भक्त की दृष्टि से ओझल नहीं होते, और न ही भक्त कभी भगवान् को दृष्टि से ओझल होने देता है। उस योगी के विषय में भी यही लागू होता है, जो भगवान् को हृदय में परमात्मा रूप में देखता है। ऐसा योगी शुद्ध भक्त बन जाता है और अपने भीतर भगवान् को देखे बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता।

Bg 6.31

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥

सर्व-भूत-स्थितम्—प्रत्येक के हृदय में स्थित; यः—जो; माम्—मुझको; भजति—भक्ति में सेवा करता है; एकत्वम्—एकत्व में; आस्थितः—इस प्रकार स्थित; सर्वथा—सभी प्रकार से; वर्तमानः—स्थित होकर; अपि—यद्यपि; सः—वह; योगी—दिव्यवादी; मयि—मुझमें; वर्तते—रहता है।

जो योगी यह जानता है कि मैं और समस्त प्राणियों के भीतर स्थित परमात्मा एक हैं, वह सभी परिस्थितियों में मेरी सेवा करता है और सदैव मुझमें ही रहता है।

जो योगी परमात्मा पर ध्यान का अभ्यास करता है, वह अपने भीतर श्रीकृष्ण के पूर्ण अंश को विष्णु रूप में — चार भुजाओं वाले, शंख, चक्र, गदा और कमल-पुष्प धारण किए हुए — देखता है। योगी को जान लेना चाहिए कि विष्णु श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं। परमात्मा के इस रूप में श्रीकृष्ण प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं। इसके अतिरिक्त, जीवों के असंख्य हृदयों में उपस्थित असंख्य परमात्माओं के बीच कोई भेद नहीं है। न ही श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा में सदैव संलग्न कृष्णभावनाभावित व्यक्ति और परमात्मा पर ध्यान में संलग्न पूर्ण योगी के बीच कोई भेद है। कृष्णभावनामृत में स्थित योगी — यद्यपि वह भौतिक अस्तित्व में रहते हुए विविध क्रियाओं में संलग्न हो सकता है — सदैव श्रीकृष्ण में स्थित रहता है। इसकी पुष्टि श्रील रूप गोस्वामी के भक्ति-रसामृत-सिन्धु में होती है: निखिलेष्व् अवस्थासु जीवन्मुक्त स उच्यते। भगवान् का भक्त, जो सदैव कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, स्वतः ही मुक्त है। नारद-पञ्चरात्र में इसकी पुष्टि इस प्रकार होती है:

dik-kālādy-anavacchinne kṛṣṇe ceto vidhāya ca

tanmayo bhavati kṣipraṁ jīvo brahmaṇi yojayet.

“श्रीकृष्ण के दिव्य रूप पर, जो सर्वव्यापी हैं और काल तथा देश से परे हैं, अपना ध्यान केन्द्रित करके मनुष्य श्रीकृष्ण के चिन्तन में निमग्न हो जाता है और तब उनके साथ दिव्य संगति की आनन्दमय अवस्था को प्राप्त करता है।”

कृष्णभावनामृत योग-साधना में समाधि की सर्वोच्च अवस्था है। यही समझ कि श्रीकृष्ण प्रत्येक के हृदय में परमात्मा रूप में उपस्थित हैं, योगी को निर्दोष बना देती है। वेद भगवान् की इस अचिन्त्य शक्ति की पुष्टि इस प्रकार करते हैं:

eko ‘pi san bahudhā yo ‘vabhāti

aiśvaryād rūpam ekaṁ ca sūryavad bahudheyate.

“विष्णु एक हैं, फिर भी वे निश्चय ही सर्वव्यापी हैं। अपनी अचिन्त्य शक्ति से, अपने एक रूप के होते हुए भी, वे सर्वत्र उपस्थित हैं। सूर्य के समान वे एक साथ अनेक स्थानों में प्रकट होते हैं।“

Bg 6.32

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥

आत्म—स्वयं; औपम्येन—तुलना द्वारा; सर्वत्र—सर्वत्र; समम्—समता; पश्यति—देखता है; यः—जो; अर्जुन—हे अर्जुन; सुखम्—सुख; वा—अथवा; यदि—यदि; वा—अथवा; दुःखम्—दुःख; सः—ऐसा; योगी—योगी; परमः—पूर्ण; मतः—माना जाता है।

हे अर्जुन! वही पूर्ण योगी है, जो अपने साथ तुलना करके समस्त प्राणियों की वास्तविक समता को उनके सुख तथा दुःख दोनों में देखता है।

जो कृष्णभावनाभावित है, वही पूर्ण योगी है; वह अपने व्यक्तिगत अनुभव के बल पर सबके सुख तथा दुःख से अवगत रहता है। जीव के दुःख का कारण भगवान् के साथ उसके सम्बन्ध की विस्मृति है। और सुख का कारण श्रीकृष्ण को मनुष्य के समस्त कार्यकलापों का परम भोक्ता जानना है। श्रीकृष्ण समस्त भूमियों तथा लोकों के स्वामी हैं। पूर्ण योगी समस्त जीवों का सबसे निष्कपट मित्र होता है। वह जानता है कि भौतिक प्रकृति के गुणों से बद्ध जीव, श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध की विस्मृति के कारण, त्रिविध भौतिक दुःखों के अधीन होता है। चूँकि कृष्णभावनामृत में स्थित मनुष्य सुखी रहता है, अतः वह सर्वत्र श्रीकृष्ण के ज्ञान का वितरण करने का प्रयास करता है। चूँकि पूर्ण योगी कृष्णभावनाभावित बनने के महत्त्व का प्रचार करने का प्रयत्न करता है, इसलिए वह संसार का सर्वश्रेष्ठ परोपकारी है, और वह भगवान् का सर्वाधिक प्रिय सेवक है। न तस्मात् कश्चिद् मे प्रियकृत् तमः। दूसरे शब्दों में, भगवान् का भक्त सदा समस्त जीवों के कल्याण की ओर दृष्टि रखता है, और इस प्रकार वह वस्तुतः सबका मित्र है। वह सर्वश्रेष्ठ योगी है, क्योंकि वह योग में सिद्धि की कामना अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं करता, अपितु दूसरों के लिए भी प्रयत्न करता है। वह अपने सहवर्ती जीवों से ईर्ष्या नहीं करता। यहाँ भगवान् के शुद्ध भक्त तथा केवल अपने व्यक्तिगत उत्थान में रुचि रखने वाले योगी के बीच विरोध दर्शाया गया है। जो योगी पूर्ण रूप से ध्यान करने के लिए किसी एकान्त स्थान में चला गया है, वह सम्भवतः उस भक्त के समान पूर्ण नहीं है, जो प्रत्येक मनुष्य को कृष्णभावनामृत की ओर मोड़ने का भरसक प्रयास कर रहा है।

Bg 6.33

अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥

अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; यः—प्रणाली; अयम्—यह; योगः—योग; त्वया—आपके द्वारा; प्रोक्तः—वर्णित; साम्येन—सामान्यतः; मधुसूदन—हे मधु असुर के संहारक; एतस्य—इसका; अहम्—मैं; —नहीं; पश्यामि—देखता हूँ; चञ्चलत्वात्—चञ्चल होने के कारण; स्थितिम्—स्थिति; स्थिराम्—स्थिर।

अर्जुन ने कहा : हे मधुसूदन! जिस योग-प्रणाली का आपने सार रूप में वर्णन किया है, वह मुझे अव्यावहारिक तथा असह्य प्रतीत होती है, क्योंकि मन चञ्चल तथा अस्थिर है।

भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को बताई गई योग-प्रणाली का, जो शुचौ देशे शब्दों से आरम्भ होकर योगी परमः पर समाप्त होती है, यहाँ अर्जुन अपनी असमर्थता की भावना से अस्वीकार कर रहे हैं। इस कलियुग में किसी सामान्य मनुष्य के लिए घर छोड़कर पर्वतों या वनों के किसी एकान्त स्थान में जाकर योग का अभ्यास करना सम्भव नहीं है। वर्तमान युग अल्पायु जीवन के लिए कटु संघर्ष से चिह्नित है। लोग सरल तथा व्यावहारिक उपायों से भी आत्म-साक्षात्कार के विषय में गम्भीर नहीं हैं, फिर इस कठिन योग-प्रणाली की तो बात ही क्या, जो जीवन-शैली, बैठने की रीति, स्थान के चयन तथा भौतिक प्रवृत्तियों से मन की अनासक्ति का नियमन करती है। एक व्यावहारिक मनुष्य के रूप में अर्जुन ने सोचा कि इस योग-प्रणाली का पालन करना असम्भव है, यद्यपि वे अनेक प्रकार से अनुकूल रूप से सम्पन्न थे। वे राजपरिवार के थे तथा असंख्य गुणों की दृष्टि से अत्यन्त उन्नत थे; वे महान् योद्धा थे, उनकी आयु दीर्घ थी, और सबसे बढ़कर, वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र थे। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व अर्जुन के पास हमसे कहीं अधिक उत्तम सुविधाएँ थीं, फिर भी उन्होंने इस योग-प्रणाली को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वस्तुतः इतिहास में हमें ऐसा कोई अभिलेख नहीं मिलता कि उन्होंने किसी भी समय इसका अभ्यास किया हो। अतः इस प्रणाली को इस कलियुग में सामान्यतः असम्भव माना जाना चाहिए। निःसन्देह यह कुछ अत्यन्त विरल मनुष्यों के लिए सम्भव हो सकता है, किन्तु सामान्य जनता के लिए यह एक असम्भव प्रस्ताव है। यदि पाँच हज़ार वर्ष पूर्व ऐसा था, तो आज की क्या बात? जो लोग विभिन्न तथाकथित विद्यालयों तथा समाजों में इस योग-प्रणाली का अनुकरण कर रहे हैं, वे यद्यपि आत्मसन्तुष्ट हैं, किन्तु निश्चय ही अपना समय नष्ट कर रहे हैं। वे अभीष्ट लक्ष्य से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं।

Bg 6.34

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥

चञ्चलम्—चञ्चल; हि—निश्चय ही; मनः—मन; कृष्ण—हे श्रीकृष्ण; प्रमाथि—विक्षुब्ध करने वाला; बलवत्—प्रबल; दृढम्—हठी; तस्य—उसका; अहम्—मैं; निग्रहम्—वश में करना; मन्ये—सोचता हूँ; वायोः—वायु का; इव—समान; सुदुष्करम्—कठिन।

हे श्रीकृष्ण! क्योंकि मन चञ्चल, उद्दण्ड, हठी तथा अत्यन्त प्रबल है, इसलिए मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उसे वश में करना वायु को नियन्त्रित करने से भी अधिक कठिन है।

मन इतना प्रबल तथा हठी है कि यद्यपि वह बुद्धि के अधीन माना जाता है, तथापि कभी-कभी वह बुद्धि पर भी विजय पा लेता है। व्यावहारिक जगत् में रहने वाले मनुष्य के लिए, जिसे अनेक विरोधी तत्त्वों से संघर्ष करना पड़ता है, मन को वश में करना निश्चय ही अत्यन्त कठिन है। कृत्रिम रूप से कोई व्यक्ति मित्र तथा शत्रु दोनों के प्रति मानसिक समता स्थापित कर सकता है, किन्तु अन्ततः कोई भी सांसारिक मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि यह प्रचण्ड वायु को नियन्त्रित करने से भी अधिक कठिन है। वैदिक साहित्य में कहा गया है :

ātmānaṁ rathinaṁ viddhi śarīraṁ ratham eva ca

buddhintu sārathiṁ viddhi manaḥ pragraham eva ca

indriyāṇi hayānāhur viṣayāṁs teṣu gocarān

ātmendriya-mano-yukto bhoktety āhur manīṣiṇaḥ.

“जीव भौतिक शरीररूपी रथ में यात्री है, और बुद्धि सारथि है। मन लगाम है, और इन्द्रियाँ घोड़े हैं। इस प्रकार आत्मा मन तथा इन्द्रियों के संग में भोक्ता अथवा भोग करने वाला बनता है। महान् विचारक ऐसा ही समझते हैं।” बुद्धि से मन का निर्देशन होना चाहिए, किन्तु मन इतना प्रबल तथा हठी है कि वह प्रायः अपनी ही बुद्धि पर भी विजय पा लेता है। ऐसे प्रबल मन को योग के अभ्यास से वश में किया जाना चाहिए, किन्तु ऐसा अभ्यास अर्जुन जैसे सांसारिक व्यक्ति के लिए कभी व्यावहारिक नहीं है। फिर आधुनिक मनुष्य की तो बात ही क्या? यहाँ प्रयुक्त उपमा उपयुक्त है : चलती हुई वायु को कोई पकड़ नहीं सकता। और उद्दण्ड मन को पकड़ना तो उससे भी अधिक कठिन है। मन को वश में करने का सबसे सरल उपाय, जैसा कि भगवान् चैतन्य ने सुझाया है, पूर्ण विनयपूर्वक “हरे कृष्ण” का—उद्धार के महामन्त्र का—जप करना है। निर्धारित विधि है स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः : मनुष्य को अपना मन पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण में संलग्न करना चाहिए। तभी मन को विचलित करने वाली कोई अन्य प्रवृत्ति शेष नहीं रहेगी।

Bg 6.35

श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥

श्रीभगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; असंशयम्—निःसन्देह; महा-बाहो—हे महाबाहु; मनः—मन; दुर्निग्रहम्—वश में करना कठिन; चलम्—चञ्चल; अभ्यासेन—अभ्यास द्वारा; तु—किन्तु; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; वैराग्येण—वैराग्य द्वारा; —भी; गृह्यते—वश में किया जा सकता है।

श्रीभगवान् ने कहा : हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! निःसन्देह चञ्चल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु निरन्तर अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा यह सम्भव है।

हठी मन को वश में करने की कठिनाई को, जैसा अर्जुन ने व्यक्त किया, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वीकार करते हैं। किन्तु साथ ही वे यह भी सुझाते हैं कि अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा यह सम्भव है। वह अभ्यास क्या है? वर्तमान युग में कोई भी कठोर नियमों तथा विधि-विधानों का पालन नहीं कर सकता, जैसे स्वयं को किसी पवित्र स्थान में स्थापित करना, मन को परमात्मा पर केन्द्रित करना, इन्द्रियों तथा मन का संयम करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, एकान्त में रहना आदि। तथापि कृष्णभावनामृत के अभ्यास से मनुष्य भगवान् की नौ प्रकार की भक्ति में संलग्न होता है। ऐसी भक्ति-प्रवृत्तियों में सर्वप्रथम तथा सर्वप्रमुख श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करना है। मन से समस्त सन्देहों को दूर करने की यह एक अत्यन्त शक्तिशाली दिव्य विधि है। मनुष्य जितना अधिक श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करता है, उतना ही अधिक वह प्रबुद्ध होता है तथा प्रत्येक उस वस्तु से अनासक्त होता है, जो मन को श्रीकृष्ण से दूर खींचती है। मन को उन कार्यों से अनासक्त करके, जो भगवान् को समर्पित नहीं हैं, मनुष्य अत्यन्त सरलता से वैराग्य सीख सकता है। वैराग्य का अर्थ है पदार्थ से अनासक्ति तथा मन को आत्मा में संलग्न करना। निर्विशेष आध्यात्मिक वैराग्य, मन को श्रीकृष्ण के कार्यकलापों में संलग्न करने की अपेक्षा अधिक कठिन है। यह व्यावहारिक है, क्योंकि श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करने से मनुष्य स्वतः ही परमात्मा के प्रति आसक्त हो जाता है। इस आसक्ति को परेशानुभूति अर्थात् आध्यात्मिक सन्तोष कहा जाता है। यह ठीक उस सन्तोष की अनुभूति के समान है, जो भूखे मनुष्य को खाए गए अन्न के प्रत्येक ग्रास से होती है। इसी प्रकार, भक्ति के निर्वाह से मनुष्य दिव्य सन्तोष का अनुभव करता है, ज्यों-ज्यों मन भौतिक लक्ष्यों से अनासक्त होता जाता है। यह कुछ-कुछ रोग को कुशल उपचार तथा उपयुक्त आहार से दूर करने के समान है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य कार्यकलापों का श्रवण उन्मत्त मन के लिए कुशल उपचार है, और श्रीकृष्ण को अर्पित आहार ग्रहण करना पीड़ित रोगी के लिए उपयुक्त पथ्य है। यही उपचार कृष्णभावनामृत की विधि है।

Bg 6.36

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥

असंयत—अनियन्त्रित; आत्मना—मन से; योगः—आत्म-साक्षात्कार; दुष्प्रापः—प्राप्त करना कठिन; इति—इस प्रकार; मे—मेरा; मतिः—मत; वश्य—नियन्त्रित; आत्मना—मन से; तु—किन्तु; यतता—प्रयत्न करते हुए; शक्यः—व्यावहारिक; अवाप्तुम्—प्राप्त करना; उपायतः—उपयुक्त उपायों द्वारा।

जिसका मन अनियन्त्रित है, उसके लिए आत्म-साक्षात्कार कठिन कार्य है। किन्तु जिसका मन नियन्त्रित है तथा जो उचित उपायों से प्रयत्न करता है, उसकी सफलता निश्चित है। यही मेरा मत है।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् घोषणा करते हैं कि जो मनुष्य मन को भौतिक प्रवृत्ति से अनासक्त करने का उचित उपचार स्वीकार नहीं करता, वह आत्म-साक्षात्कार में सफलता शायद ही प्राप्त कर सकता है। मन को भौतिक भोग में संलग्न रखते हुए योग का अभ्यास करने का प्रयत्न करना, अग्नि पर जल डालते हुए उसे प्रज्वलित करने के समान है। इसी प्रकार, मानसिक नियन्त्रण के बिना योग का अभ्यास समय का अपव्यय है। योग-अभ्यास का ऐसा प्रदर्शन भौतिक दृष्टि से लाभकारी हो सकता है, किन्तु जहाँ तक आध्यात्मिक अनुभूति का प्रश्न है, वह व्यर्थ है। अतः मन को भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में निरन्तर संलग्न करके नियन्त्रित करना चाहिए। जब तक कोई मनुष्य कृष्णभावनामृत में संलग्न न हो, वह मन को सुदृढ़ रूप से नियन्त्रित नहीं कर सकता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति बिना किसी पृथक् प्रयास के योग-अभ्यास का फल सरलता से प्राप्त कर लेता है, किन्तु योग का अभ्यासी कृष्णभावनाभावित बने बिना सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

Bg 6.37

अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥

अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; अयतिः—असफल योगी; श्रद्धया—श्रद्धा सहित; उपेतः—संलग्न; योगात्—योग से; चलित—विचलित; मानसः—ऐसे मन वाला; अप्राप्य—न पाकर; योग-संसिद्धिम्—योग में सर्वोच्च सिद्धि; काम्—कौन-सा; गतिम्—गन्तव्य; कृष्ण—हे श्रीकृष्ण; गच्छति—प्राप्त करता है।

अर्जुन ने कहा : हे श्रीकृष्ण! उस श्रद्धालु मनुष्य का क्या गन्तव्य होता है, जो परिश्रम नहीं करता, जो आरम्भ में आत्म-साक्षात्कार की विधि को ग्रहण करता है, किन्तु बाद में सांसारिक वृत्ति के कारण उससे विमुख हो जाता है और इस प्रकार योग में सिद्धि प्राप्त नहीं करता?

आत्म-साक्षात्कार अथवा योग का मार्ग भगवद्गीता में वर्णित है। आत्म-साक्षात्कार का मूल सिद्धान्त यह ज्ञान है कि जीव यह भौतिक शरीर नहीं है, अपितु वह इससे भिन्न है, और उसका सुख नित्य जीवन, आनन्द तथा ज्ञान में निहित है। ये दिव्य हैं, शरीर तथा मन दोनों से परे हैं। आत्म-साक्षात्कार ज्ञान के मार्ग, अष्टांग-प्रणाली के अभ्यास अथवा भक्तियोग द्वारा खोजा जाता है। इनमें से प्रत्येक विधि में मनुष्य को जीव की स्वरूप-स्थिति, भगवान् के साथ उसके सम्बन्ध तथा उन कार्यों का साक्षात्कार करना होता है, जिनके द्वारा वह खोए हुए सम्बन्ध को पुनः स्थापित कर सकता है और कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है। उपर्युक्त तीनों विधियों में से किसी का भी अनुसरण करते हुए, मनुष्य अवश्य ही शीघ्र या विलम्ब से परम लक्ष्य तक पहुँचता है। भगवान् ने इसका कथन द्वितीय अध्याय में किया था : दिव्य मार्ग पर थोड़ा-सा भी प्रयत्न उद्धार की महान् आशा प्रदान करता है। इन तीनों विधियों में से भक्तियोग का मार्ग इस युग के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, क्योंकि यह ईश्वर-साक्षात्कार की सर्वाधिक प्रत्यक्ष विधि है। दुहरी आश्वस्ति के लिए, अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से अपने पूर्व कथन की पुष्टि करने का अनुरोध कर रहे हैं। मनुष्य निष्ठापूर्वक आत्म-साक्षात्कार का मार्ग ग्रहण कर सकता है, किन्तु ज्ञान के अनुशीलन की प्रक्रिया तथा अष्टांग योग-प्रणाली का अभ्यास इस युग के लिए सामान्यतः अत्यन्त कठिन है। अतः निरन्तर प्रयत्न के बावजूद, मनुष्य अनेक कारणों से असफल हो सकता है। सर्वप्रथम, सम्भव है कि वह विधि का अनुसरण न कर रहा हो। दिव्य मार्ग का अनुसरण करना कमोबेश मोहिनी शक्ति के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करना है। फलतः, जब भी कोई व्यक्ति मोहिनी शक्ति के चंगुल से निकलने का प्रयास करता है, वह उसे विविध प्रलोभनों से पराजित करने का प्रयत्न करती है। बद्धजीव पहले से ही भौतिक शक्ति के गुणों द्वारा प्रलोभित है, और दिव्य अनुशासनों का पालन करते समय भी पुनः प्रलोभित होने की पूरी सम्भावना रहती है। इसे योगात् चलित-मानसः कहते हैं : दिव्य मार्ग से विचलन। अर्जुन आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से विचलन के परिणामों को जानने के लिए जिज्ञासु हैं।

Bg 6.38

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥

कच्चित्—क्या; —नहीं; उभय—दोनों; विभ्रष्टः—से विचलित; छिन्न—फटा हुआ; अभ्रम्—बादल; इव—के समान; नश्यति—नष्ट होता है; अप्रतिष्ठः—बिना किसी स्थिति के; महा-बाहो—हे महाबाहु श्रीकृष्ण; विमूढः—मोहग्रस्त; ब्रह्मणः—दिव्य का; पथि—मार्ग पर।

हे महाबाहु श्रीकृष्ण! क्या ऐसा मनुष्य, जो दिव्य मार्ग से विचलित हो गया है, फटे हुए बादल के समान नष्ट नहीं हो जाता, और किसी भी क्षेत्र में उसका कोई स्थान नहीं रहता?

उन्नति के दो मार्ग हैं। जो भौतिकतावादी हैं, उन्हें दिव्य में कोई रुचि नहीं है; अतः उनकी रुचि आर्थिक विकास द्वारा भौतिक उन्नति में, अथवा उपयुक्त कर्म द्वारा उच्चतर लोकों में पदोन्नति में अधिक होती है। जब मनुष्य दिव्य मार्ग को ग्रहण करता है, तो उसे समस्त भौतिक कार्यकलापों को त्यागना तथा तथाकथित भौतिक सुख के समस्त रूपों का परित्याग करना होता है। यदि अभिलाषी योगी असफल हो जाता है, तो वह प्रत्यक्षतः दोनों मार्ग खो देता है; दूसरे शब्दों में, वह न तो भौतिक सुख भोग सकता है और न आध्यात्मिक सफलता। उसका कोई स्थान नहीं रहता; वह फटे हुए बादल के समान है। आकाश में बादल कभी छोटे बादल से अलग होकर किसी बड़े बादल में मिल जाता है। किन्तु यदि वह किसी बड़े बादल में नहीं मिल पाता, तो वह वायु द्वारा उड़ा दिया जाता है और विशाल आकाश में तुच्छ बनकर लुप्त हो जाता है। ब्रह्मणः पथि दिव्य साक्षात्कार का वह मार्ग है, जो स्वयं को स्वरूपतः आध्यात्मिक तथा परमेश्वर का अंश-स्वरूप जानने से प्राप्त होता है, जो ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के रूप में प्रकट होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण परम परब्रह्म की पूर्णतम अभिव्यक्ति हैं, और अतः जो परम पुरुष के प्रति शरणागत है, वही सफल योगी है। ब्रह्म तथा परमात्मा के साक्षात्कार द्वारा जीवन के इस लक्ष्य तक पहुँचने में अनेकानेक जन्म लगते हैं : बहूनां जन्मनाम् अन्ते। अतः दिव्य साक्षात्कार का सर्वोच्च रूप भक्तियोग अथवा कृष्णभावनामृत है, जो प्रत्यक्ष विधि है।

Bg 6.39

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥

एतत्—यह है; मे—मेरा; संशयम्—सन्देह; कृष्ण—हे श्रीकृष्ण; छेत्तुम्—दूर करने हेतु; अर्हसि—करने का अनुरोध; अशेषतः—पूर्णतः; त्वत्—आप; अन्यः—के अतिरिक्त; संशयस्य—सन्देह का; अस्य—इस; छेत्ता—दूर करने वाला; —कभी नहीं; हि—निश्चय ही; उपपद्यते—पाया जाना।

हे श्रीकृष्ण! यह मेरा सन्देह है, और मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इसे पूर्णतः दूर करें। आपके अतिरिक्त ऐसा कोई नहीं मिलता, जो इस सन्देह का नाश कर सके।

श्रीकृष्ण भूत, वर्तमान तथा भविष्य के पूर्ण ज्ञाता हैं। भगवद्गीता के आरम्भ में भगवान् ने कहा था कि समस्त जीव भूतकाल में पृथक्-पृथक् रूप से विद्यमान थे, वे अब वर्तमान में विद्यमान हैं, और वे भविष्य में भी, भौतिक बन्धन से मुक्ति के पश्चात् भी, अपनी पृथक् पहचान बनाए रखते हैं। अतः उन्होंने व्यक्तिगत जीव के भविष्य के प्रश्न को पहले ही स्पष्ट कर दिया है। अब अर्जुन असफल योगी के भविष्य के विषय में जानना चाहते हैं। श्रीकृष्ण के समान अथवा उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है, और निश्चय ही वे तथाकथित महान् ऋषि तथा दार्शनिक, जो भौतिक प्रकृति की दया पर निर्भर हैं, उनकी समानता नहीं कर सकते। अतः श्रीकृष्ण का निर्णय समस्त सन्देहों का अन्तिम तथा पूर्ण उत्तर है, क्योंकि वे भूत, वर्तमान तथा भविष्य को पूर्ण रूप से जानते हैं—किन्तु उन्हें कोई नहीं जानता। श्रीकृष्ण तथा कृष्णभावनाभावित भक्त ही जान सकते हैं कि वास्तविकता क्या है।

Bg 6.4

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥

यदा—जब; हि—निश्चय ही; —नहीं; इन्द्रिय-अर्थेषु—इन्द्रियतृप्ति में; —कभी नहीं; कर्मसु—सकाम क्रियाओं में; अनुषज्जते—अनिवार्यतः संलग्न होता है; सर्व-सङ्कल्प—समस्त भौतिक इच्छाएँ; सन्न्यासी—त्यागी; योग-आरूढः—योग में उन्नत; तदा—उस समय; उच्यते—कहा जाता है।

जब मनुष्य समस्त भौतिक इच्छाओं का त्याग करके न तो इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करता है और न ही सकाम क्रियाओं में प्रवृत्त होता है, तब उसे योगारूढ कहा जाता है।

जब मनुष्य भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में पूर्णतः संलग्न रहता है, तब वह अपने में ही प्रसन्न रहता है, और इस प्रकार वह न तो इन्द्रियतृप्ति में प्रवृत्त रहता है और न ही सकाम क्रियाओं में। अन्यथा मनुष्य को इन्द्रियतृप्ति में प्रवृत्त रहना ही पड़ता है, क्योंकि वह किसी न किसी प्रवृत्ति के बिना जीवित नहीं रह सकता। कृष्णभावनामृत के बिना मनुष्य को सदा आत्मकेन्द्रित अथवा विस्तृत स्वार्थपूर्ण क्रियाओं की खोज में रहना पड़ता है। किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सब कुछ श्रीकृष्ण की तृप्ति के लिए कर सकता है और इस प्रकार इन्द्रियतृप्ति से पूर्णतया विरक्त रह सकता है। जिसे ऐसी अनुभूति नहीं है, उसे योगरूपी सीढ़ी के सर्वोच्च सोपान पर आरूढ होने से पूर्व भौतिक इच्छाओं से यान्त्रिक रूप से बचने का प्रयत्न करना पड़ता है।

Bg 6.40

श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥

श्रीभगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; पार्थ—हे पृथापुत्र; न एव—ऐसा कभी नहीं है; इह—इस भौतिक जगत् में; —कभी नहीं; अमुत्र—अगले जीवन में; विनाशः—विनाश; तस्य—उसका; विद्यते—विद्यमान है; —कभी नहीं; हि—निश्चय ही; कल्याण-कृत्—जो शुभ कार्यों में संलग्न है; कश्चित्—कोई भी; दुर्गतिम्—अधोगति; तात—तत्पश्चात्; गच्छति—जाना।

श्रीभगवान् ने कहा : हे पृथापुत्र! शुभ कार्यों में संलग्न योगी का न तो इस लोक में विनाश होता है और न आध्यात्मिक जगत् में; हे मित्र! जो भलाई करता है, वह कभी बुराई से पराजित नहीं होता।

श्रीमद्भागवत (1.5.17) में श्री नारद मुनि व्यासदेव को इस प्रकार उपदेश देते हैं :

tyaktvā sva-dharmaṁ caraṇāmbujaṁ harer

bhajann apakko ‘tha patet tato yadi

yatra kva vābhadram abhūd amuṣya kiṁ

ko vārtha āpto ‘bhajatāṁ sva-dharmataḥ

“यदि कोई समस्त भौतिक संभावनाओं को त्यागकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूर्ण शरण ग्रहण करता है, तो किसी भी प्रकार की कोई हानि या अधोगति नहीं होती। दूसरी ओर, अभक्त भले ही अपने वृत्तिपरक कर्तव्यों में पूर्ण रूप से संलग्न रहे, फिर भी कुछ प्राप्त नहीं करता।” भौतिक संभावनाओं के लिए अनेक कार्यकलाप हैं, जो शास्त्रीय तथा प्रथागत दोनों हैं। योगी से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवन में आध्यात्मिक उन्नति अर्थात् कृष्णभावनामृत के निमित्त समस्त भौतिक कार्यकलापों का त्याग कर दे। कोई यह तर्क कर सकता है कि कृष्णभावनामृत द्वारा मनुष्य सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकता है यदि वह पूर्ण हो, किन्तु यदि वह ऐसी सिद्धावस्था प्राप्त नहीं करता, तो वह भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों रूप से हानि उठाता है। शास्त्रों में विधान है कि मनुष्य को विहित कर्तव्यों के पालन न करने की प्रतिक्रिया भोगनी पड़ती है; अतः जो दिव्य कार्यकलापों का उचित रूप से निर्वाह करने में असफल रहता है, वह इन प्रतिक्रियाओं के अधीन हो जाता है। भागवत असफल योगी को आश्वस्त करता है कि उसे किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। यद्यपि वह विहित कर्तव्यों का पूर्ण रूप से पालन न करने की प्रतिक्रिया के अधीन हो सकता है, तथापि वह तब भी हानि में नहीं रहता, क्योंकि शुभ कृष्णभावनामृत कभी विस्मृत नहीं होता, और जो इसमें संलग्न रहा है, वह अगले जीवन में निम्नकुल में जन्म लेने पर भी ऐसा ही बना रहेगा। दूसरी ओर, जो केवल विहित कर्तव्यों का कठोरता से पालन करता है, यदि उसमें कृष्णभावनामृत का अभाव है, तो आवश्यक नहीं कि वह शुभ फल प्राप्त करे।

तात्पर्य को इस प्रकार समझा जा सकता है : मानवता को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, अर्थात् नियमित तथा अनियमित। जो लोग अपने अगले जीवन अथवा आध्यात्मिक मोक्ष के ज्ञान के बिना केवल पाशविक इन्द्रियतृप्ति में संलग्न हैं, वे अनियमित वर्ग के हैं। और जो शास्त्रों में वर्णित विहित कर्तव्यों के सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं, वे नियमित वर्ग में वर्गीकृत किए जाते हैं। अनियमित वर्ग के लोग, चाहे सभ्य हों या असभ्य, शिक्षित हों या अशिक्षित, बलवान हों या दुर्बल, पाशविक प्रवृत्तियों से भरे हुए हैं। उनके कार्यकलाप कभी शुभ नहीं होते, क्योंकि खाने, सोने, रक्षा करने तथा मैथुन की पाशविक प्रवृत्तियों का भोग करते हुए, वे निरन्तर भौतिक अस्तित्व में बने रहते हैं, जो सदा दुःखमय है। दूसरी ओर, जो शास्त्रीय विधानों द्वारा नियमित हैं और इस प्रकार क्रमशः कृष्णभावनामृत तक ऊपर उठते हैं, वे निश्चय ही जीवन में उन्नति करते हैं।

जो लोग तब शुभ के मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं, उन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, अर्थात् 1) शास्त्रीय नियमों तथा विधि-विधानों के अनुयायी, जो भौतिक समृद्धि का भोग कर रहे हैं, 2) वे जो भौतिक अस्तित्व से परम मुक्ति खोजने का प्रयास कर रहे हैं, और 3) वे जो कृष्णभावनामृत में भक्त हैं। जो भौतिक सुख के लिए शास्त्रों के नियमों तथा विधि-विधानों का अनुसरण कर रहे हैं, उन्हें पुनः दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है : वे जो सकाम कर्मी हैं, और वे जो इन्द्रियतृप्ति हेतु किसी फल की कामना नहीं करते। जो इन्द्रियतृप्ति के लिए सकाम फलों के पीछे हैं, उन्हें जीवन के उच्चतर स्तर तक—यहाँ तक कि उच्चतर लोकों तक—उन्नत किया जा सकता है; किन्तु फिर भी, चूँकि वे भौतिक अस्तित्व से मुक्त नहीं हैं, अतः वे वास्तव में शुभ मार्ग का अनुसरण नहीं कर रहे हैं। केवल वही कार्यकलाप शुभ हैं, जो मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाते हैं। ऐसा कोई भी कार्य, जो अन्ततः आत्म-साक्षात्कार अथवा जीवन की भौतिक देहात्म-बुद्धि से मुक्ति की ओर लक्षित नहीं है, तनिक भी शुभ नहीं है। कृष्णभावनामृत में किया गया कार्य ही एकमात्र शुभ कार्य है, और जो कोई कृष्णभावनामृत के मार्ग पर उन्नति करने के निमित्त समस्त शारीरिक कष्टों को स्वेच्छा से स्वीकार करता है, उसे कठोर तपस्या में स्थित पूर्ण योगी कहा जा सकता है। और चूँकि अष्टांग योग-प्रणाली कृष्णभावनामृत के परम साक्षात्कार की ओर निर्दिष्ट है, अतः ऐसा अभ्यास भी शुभ है, और जो इस विषय में अपना भरसक प्रयास कर रहा है, उसे अधोगति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।

Bg 6.41

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥

प्राप्य—प्राप्त करके; पुण्य-कृताम्—जिन्होंने पुण्य कर्म किए उनके; लोकान्—लोक; उषित्वा—निवास करके; शाश्वतीः—अनेक; समाः—वर्ष; शुचीनाम्—पवित्र पुरुषों के; श्रीमताम्—समृद्ध पुरुषों के; गेहे—घर में; योग-भ्रष्टः—जो आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से पतित है; अभिजायते—जन्म लेता है।

असफल योगी, पुण्यात्मा जीवों के लोकों में अनेकानेक वर्षों के भोग के पश्चात्, धर्मपरायण लोगों के परिवार में अथवा सम्पन्न कुलीन परिवार में जन्म लेता है।

असफल योगियों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है : एक वह, जो अत्यल्प उन्नति के पश्चात् पतित हुआ, और दूसरा वह, जो योग के दीर्घ अभ्यास के पश्चात् पतित हुआ। जो योगी अल्प काल के अभ्यास के पश्चात् पतित होता है, वह उन उच्चतर लोकों में जाता है, जहाँ पुण्यात्मा जीवों को प्रवेश की अनुमति है। वहाँ दीर्घ जीवन के पश्चात्, उसे पुनः इस लोक में भेजा जाता है, ताकि वह किसी धर्मपरायण ब्राह्मण वैष्णव अथवा कुलीन व्यापारियों के परिवार में जन्म ले।

योग-अभ्यास का वास्तविक प्रयोजन कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करना है। किन्तु जो इस सीमा तक परिश्रम नहीं करते और भौतिक प्रलोभनों के कारण असफल हो जाते हैं, उन्हें भगवान् की कृपा से अपनी भौतिक प्रवृत्तियों का पूर्ण उपयोग करने की अनुमति दी जाती है। और तत्पश्चात्, उन्हें धर्मपरायण अथवा कुलीन परिवारों में समृद्ध जीवन व्यतीत करने के अवसर दिए जाते हैं। जो ऐसे परिवारों में जन्म लेते हैं, वे इन सुविधाओं का लाभ उठाकर स्वयं को पूर्ण कृष्णभावनामृत तक उन्नत करने का प्रयास कर सकते हैं।

Bg 6.42

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥

अथवा—अथवा; योगिनाम्—विद्वान योगियों के; एव—निश्चय ही; कुले—कुल में; भवति—जन्म लेता है; धीमताम्—जो महान प्रज्ञा से सम्पन्न हैं उनके; एतत्—यह; हि—निश्चय ही; दुर्लभतरम्—अत्यन्त दुर्लभ; लोके—इस संसार में; जन्म—जन्म; यत्—जो; ईदृशम्—इस प्रकार का।

अथवा वह योगियों के ऐसे कुल में जन्म लेता है, जो निश्चय ही महान प्रज्ञा से सम्पन्न होते हैं। वस्तुतः इस संसार में ऐसा जन्म दुर्लभ है।

योगियों अथवा योगियों के—जो महान प्रज्ञा से युक्त हैं—कुल में जन्म लेने की यहाँ प्रशंसा की गई है, क्योंकि ऐसे कुल में जन्मा बालक जीवन के आरम्भ से ही आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करता है। विशेषतः आचार्य अथवा गोस्वामी कुलों में ऐसा ही होता है। ऐसे कुल परम्परा तथा प्रशिक्षण से अत्यन्त विद्वान तथा भक्त होते हैं, और इस प्रकार वे आध्यात्मिक गुरु बनते हैं। भारत में ऐसे अनेक आचार्य-कुल हैं, किन्तु अब वे अपर्याप्त शिक्षा तथा प्रशिक्षण के कारण पतित हो गए हैं। भगवान् की कृपा से, अब भी ऐसे कुल हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी योगियों का पोषण करते हैं। ऐसे कुलों में जन्म लेना निश्चय ही अत्यन्त सौभाग्य की बात है। सौभाग्यवश, हमारे आध्यात्मिक गुरु ॐ विष्णुपाद श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज तथा हम दोनों को ही भगवान् की कृपा से ऐसे कुलों में जन्म लेने का अवसर मिला, और हम दोनों को ही जीवन के आरम्भ से ही भगवान् की भक्ति में प्रशिक्षित किया गया। बाद में हम दिव्य व्यवस्था के आदेश से मिले।

Bg 6.43

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥

तत्र—तत्पश्चात्; तम्—उस; बुद्धि-संयोगम्—ऐसी चेतना का पुनरुद्धार; लभते—पुनः प्राप्त करता है; पौर्व—पूर्व; देहिकम्—देह-चेतना; यतते—प्रयत्न करता है; —भी; ततः—तत्पश्चात्; भूयः—पुनः; संसिद्धौ—सिद्धि हेतु; कुरु-नन्दन—हे कुरुपुत्र।

हे कुरुपुत्र! ऐसा जन्म प्राप्त करने पर, वह अपने पूर्व जीवन की दिव्य चेतना को पुनः जाग्रत करता है, और पूर्ण सफलता प्राप्त करने के निमित्त वह और अधिक उन्नति करने का प्रयास करता है।

राजा भरत, जिन्होंने अपना तृतीय जन्म एक श्रेष्ठ ब्राह्मण के कुल में लिया, पूर्व दिव्य चेतना के पुनरुद्धार हेतु श्रेष्ठ जन्म के उदाहरण हैं। राजा भरत संसार के सम्राट थे, और उनके समय से यह लोक देवताओं के मध्य भारतवर्ष के नाम से प्रसिद्ध है। पहले यह इलावर्तवर्ष के नाम से जाना जाता था। सम्राट ने अल्पायु में ही आध्यात्मिक सिद्धि के लिए संन्यास ले लिया, किन्तु सफलता प्राप्त करने में असफल रहे। अपने अगले जीवन में उन्होंने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण के कुल में जन्म लिया और जड़भरत के नाम से प्रसिद्ध हुए, क्योंकि वे सदा एकान्त में रहते थे और किसी से बात नहीं करते थे। और बाद में, राजा रहूगण ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ योगी के रूप में पहचाना। उनके जीवन से यह समझा जाता है कि दिव्य प्रयत्न, अथवा योग का अभ्यास, कभी व्यर्थ नहीं जाता। भगवान् की कृपा से योगी को कृष्णभावनामृत में पूर्ण सिद्धि हेतु बार-बार अवसर प्राप्त होते हैं।

Bg 6.44

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४ ॥

पूर्व—पूर्व; अभ्यासेन—अभ्यास द्वारा; तेन—उसके प्रभाव से; एव—निश्चय ही; ह्रियते—आकृष्ट होता है; हि—निश्चय ही; अवशः—विवश; अपि—भी; सः—वह; जिज्ञासुः—जानने का इच्छुक; अपि—भी; योगस्य—योग का; शब्द-ब्रह्म—शास्त्र के कर्मकाण्डीय सिद्धान्त; अतिवर्तते—पार कर जाता है।

अपने पूर्व जीवन की दिव्य चेतना के प्रभाव से, वह स्वतः ही योग के सिद्धान्तों के प्रति आकृष्ट हो जाता है—बिना उन्हें खोजे भी। योग के लिए प्रयत्नशील ऐसा जिज्ञासु योगी सदा शास्त्र के कर्मकाण्डीय सिद्धान्तों से ऊपर स्थित रहता है।

उन्नत योगी शास्त्र के कर्मकाण्डों के प्रति अधिक आकृष्ट नहीं होते, अपितु वे स्वतः ही योग के उन सिद्धान्तों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं, जो उन्हें पूर्ण कृष्णभावनामृत अर्थात् योग की सर्वोच्च सिद्धि तक उन्नत कर सकते हैं। श्रीमद्भागवत (3.33.8) में उन्नत योगियों द्वारा वैदिक कर्मकाण्डों की ऐसी उपेक्षा की इस प्रकार व्याख्या की गई है :

aho bata śvapaco ‘to garīyān

yajjihvāgre vartate nāma tubhyam

tepus tapas te juhuvuḥ sasnur āryā

brahmānūcur nāma gṛṇanti ye te.

“हे प्रभु! जो व्यक्ति आपके पवित्र नामों का कीर्तन करते हैं, वे आध्यात्मिक जीवन में अत्यन्त, अत्यन्त उन्नत हैं, भले ही वे श्वपच (कुत्ता खाने वालों) के कुलों में जन्मे हों। ऐसे कीर्तनकर्ताओं ने निःसन्देह समस्त प्रकार की तपस्याएँ तथा यज्ञ सम्पन्न किए हैं, समस्त पवित्र स्थानों में स्नान किया है, और समस्त शास्त्रीय अध्ययन पूर्ण किए हैं।”

इसका सुप्रसिद्ध उदाहरण भगवान् चैतन्य ने प्रस्तुत किया, जिन्होंने ठाकुर हरिदास को अपने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शिष्यों में से एक रूप में स्वीकार किया। यद्यपि ठाकुर हरिदास ने एक मुसलमान परिवार में जन्म लिया था, तथापि उन्हें भगवान् चैतन्य द्वारा नामाचार्य के पद पर प्रतिष्ठित किया गया, क्योंकि वे प्रतिदिन भगवान् के तीन लाख पवित्र नामों के जप के सिद्धान्त का दृढ़ता से पालन करते थे : हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। और चूँकि वे निरन्तर भगवान् के पवित्र नाम का जप करते थे, अतः यह समझा जाता है कि अपने पूर्व जीवन में वे अवश्य ही वेदों की समस्त कर्मकाण्डीय विधियों से, जिन्हें शब्द-ब्रह्म कहा जाता है, गुज़रे होंगे। अतः जब तक मनुष्य शुद्ध नहीं होता, तब तक वह न तो कृष्णभावनामृत के सिद्धान्त को ग्रहण कर सकता है और न भगवान् के पवित्र नाम—हरे कृष्ण—के जप में संलग्न हो सकता है।

Bg 6.45

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५ ॥

प्रयत्नात्—कठोर अभ्यास द्वारा; यतमानः—जो प्रयत्न करता है; तु—किन्तु; योगी—ऐसा योगी; संशुद्ध—धुले हुए; किल्बिषः—समस्त प्रकार के पाप; अनेक—अनेकानेक; जन्म—जन्म; संसिद्धः—इस प्रकार सिद्धि प्राप्त; ततः—तत्पश्चात्; याति—प्राप्त करता है; पराम्—सर्वोच्च; गतिम्—गन्तव्य।

किन्तु जब योगी निष्ठापूर्वक प्रयत्न के साथ और अधिक उन्नति करने में संलग्न होता है, समस्त कल्मषों से धुलकर, तब अन्ततः, अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात्, वह परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

जो व्यक्ति किसी विशेष रूप से धर्मपरायण, कुलीन अथवा पवित्र परिवार में जन्म लेता है, वह योग-अभ्यास के निर्वाह हेतु अपनी अनुकूल स्थिति के प्रति सचेत हो जाता है। अतः दृढ़ संकल्प के साथ वह अपने अधूरे कार्य का आरम्भ करता है, और इस प्रकार वह स्वयं को समस्त भौतिक कल्मषों से पूर्णतः शुद्ध कर लेता है। जब वह अन्ततः समस्त कल्मषों से मुक्त हो जाता है, तब वह सर्वोच्च सिद्धि—कृष्णभावनामृत—को प्राप्त करता है। कृष्णभावनामृत समस्त कल्मषों से मुक्त हो जाने की पूर्ण अवस्था है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में होती है :

yeṣāṁ tvanta-gataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇya-karmaṇām

te dvandva-moha-nirmuktā bhajante māṁ dṛḍha-vratāḥ

“अनेकानेक जन्मों तक पुण्य कर्म करने के पश्चात्, जब मनुष्य समस्त कल्मषों से तथा समस्त मोहमयी द्वैतताओं से पूर्णतः मुक्त हो जाता है, तब वह भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न हो जाता है।“

Bg 6.46

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥

तपस्विभ्यः—तपस्वी से; अधिकः—श्रेष्ठ; योगी—योगी; ज्ञानिभ्यः—ज्ञानी से; अपि—भी; मतः—माना गया; अधिकः—श्रेष्ठ; कर्मिभ्यः—सकाम कर्मी से; —भी; अधिकः—श्रेष्ठ; योगी—योगी; तस्मात्—अतः; योगी—योगी; भव—बनो; अर्जुन—हे अर्जुन।

योगी तपस्वी से श्रेष्ठ है, ज्ञानी से श्रेष्ठ है, तथा सकाम कर्मी से श्रेष्ठ है। अतः हे अर्जुन! समस्त परिस्थितियों में, योगी बनो।

जब हम योग की बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य अपनी चेतना को परम परब्रह्म से जोड़ने से होता है। ऐसी प्रक्रिया को विभिन्न अभ्यासियों द्वारा, अपनाई गई विशेष विधि के अनुसार, भिन्न-भिन्न नाम दिए जाते हैं। जब यह जोड़ने की प्रक्रिया प्रधानतः सकाम कर्मों में होती है, तो उसे कर्मयोग कहते हैं; जब यह प्रधानतः अनुभवपरक होती है, तो उसे ज्ञानयोग कहते हैं; और जब यह प्रधानतः परमेश्वर के साथ भक्तिमय सम्बन्ध में होती है, तो उसे भक्तियोग कहते हैं। भक्तियोग अथवा कृष्णभावनामृत समस्त योगों की परम सिद्धि है, जैसा कि अगले श्लोक में समझाया जाएगा। भगवान् ने यहाँ योग की श्रेष्ठता की पुष्टि की है, किन्तु उन्होंने यह नहीं कहा कि यह भक्तियोग से श्रेष्ठ है। भक्तियोग पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान है, और इस प्रकार, कोई भी वस्तु इससे श्रेष्ठ नहीं हो सकती। आत्म-ज्ञान के बिना तपस्या अपूर्ण है। परमेश्वर के प्रति शरणागति के बिना अनुभवपरक ज्ञान भी अपूर्ण है। और कृष्णभावनामृत के बिना सकाम कर्म समय का अपव्यय है। अतः यहाँ वर्णित योग-साधना का सर्वाधिक प्रशंसित रूप भक्तियोग है, और इसकी और भी स्पष्ट व्याख्या अगले श्लोक में की गई है।

Bg 6.47

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥

योगिनाम्—समस्त योगियों में; अपि—भी; सर्वेषाम्—सब प्रकार के; मत्-गतेन—मुझमें स्थित; अन्तः-आत्मना—सदा अपने भीतर मेरा चिन्तन करते हुए; श्रद्धावान्—पूर्ण श्रद्धा सहित; भजते—दिव्य प्रेममयी सेवा करता है; यः—जो; माम्—मुझको (परमेश्वर को); सः—वह; मे—मेरा; युक्ततमः—सर्वश्रेष्ठ योगी; मतः—माना जाता है।

और समस्त योगियों में, जो अत्यन्त श्रद्धापूर्वक सदा मुझमें स्थित रहता है, और दिव्य प्रेममयी सेवा में मेरी आराधना करता है, वह योग में मुझसे सर्वाधिक घनिष्ठ रूप से युक्त है तथा सबसे श्रेष्ठ है।

यहाँ “भजते” शब्द सार्थक है। “भजते” का मूल “भज्” धातु में है, जिसका प्रयोग वहाँ होता है जहाँ सेवा की आवश्यकता हो। अंग्रेज़ी शब्द “worship” का प्रयोग “भज” के समान अर्थ में नहीं किया जा सकता। “Worship” का अर्थ है किसी योग्य व्यक्ति को आदरना, अथवा उसके प्रति आदर एवं सम्मान प्रकट करना। किन्तु प्रेम तथा श्रद्धा सहित सेवा विशेष रूप से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लिए ही अभिप्रेत है। कोई मनुष्य किसी आदरणीय पुरुष अथवा देवता की पूजा से विरत रह सकता है, और तब वह असभ्य कहलाएगा, किन्तु परमेश्वर की सेवा से विरत रहकर कोई पूर्णतः निन्दित हुए बिना नहीं रह सकता। प्रत्येक जीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का अंश है, और इस प्रकार प्रत्येक जीव अपने स्वरूप से ही परमेश्वर की सेवा हेतु अभिप्रेत है। ऐसा करने में चूक जाने पर वह नीचे गिर जाता है। भागवत इसकी पुष्टि इस प्रकार करता है:

ya eṣāṁ puruṣaṁ sākṣād ātma-prabhavam īśvaram

na bhajanty avajānanti sthānād bhraṣṭā patanty adhaḥ.

“जो कोई आदिपुरुष भगवान् की, जो समस्त जीवों के स्रोत हैं, सेवा नहीं करता और अपने कर्तव्य की उपेक्षा करता है, वह निश्चय ही अपनी स्वाभाविक स्थिति से नीचे गिर जाएगा।”

इस श्लोक में भी “भजन्ति” शब्द का प्रयोग हुआ है। अतः “भजन्ति” केवल परमेश्वर के लिए ही प्रयोज्य है, जबकि “worship” शब्द देवताओं अथवा किसी अन्य सामान्य जीव के लिए प्रयुक्त हो सकता है। श्रीमद्भागवत के इस श्लोक में प्रयुक्त “अवजानन्ति” शब्द भगवद्गीता में भी पाया जाता है—अवजानन्ति मां मूढाः: “केवल मूर्ख तथा धूर्त ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का उपहास करते हैं।” ऐसे मूर्ख भगवान् के प्रति सेवाभाव के बिना भगवद्गीता पर टीका लिखने का दुस्साहस करते हैं। फलतः वे “भजन्ति” शब्द तथा “worship” शब्द में उचित भेद नहीं कर पाते।

समस्त प्रकार की योग-साधनाओं की पराकाष्ठा भक्तियोग में है। अन्य समस्त योग तो भक्तियोग में भक्ति की अवस्था तक पहुँचने के साधन मात्र हैं। योग का वास्तविक अर्थ भक्तियोग ही है; अन्य समस्त योग भक्तियोग के गन्तव्य की ओर बढ़ने के सोपान हैं। कर्मयोग के आरम्भ से लेकर भक्तियोग के अन्त तक आत्म-साक्षात्कार का एक दीर्घ मार्ग है। फलरहित कर्मयोग इस मार्ग का आरम्भ है। जब कर्मयोग में ज्ञान तथा वैराग्य की वृद्धि होती है, तब उस अवस्था को ज्ञानयोग कहते हैं। जब ज्ञानयोग में विविध शारीरिक प्रक्रियाओं द्वारा परमात्मा पर ध्यान की वृद्धि होती है, और मन उन्हीं पर केन्द्रित रहता है, तब इसे अष्टांगयोग कहते हैं। और जब कोई अष्टांगयोग को लाँघकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के समीप पहुँच जाता है, तब इसे भक्तियोग कहते हैं, जो पराकाष्ठा है। वस्तुतः भक्तियोग ही चरम लक्ष्य है, किन्तु भक्तियोग का सूक्ष्म रूप से विश्लेषण करने हेतु इन अन्य योगों को समझना आवश्यक है। अतः जो योगी अग्रसर होता रहता है, वही नित्य कल्याण के सच्चे मार्ग पर है। जो किसी एक विशेष बिन्दु पर अटका रहता है और आगे प्रगति नहीं करता, वह उसी विशेष नाम से पुकारा जाता है—कर्मयोगी, ज्ञानयोगी अथवा ध्यानयोगी, राजयोगी, हठयोगी इत्यादि। यदि कोई इतना सौभाग्यशाली हो कि भक्तियोग के बिन्दु तक पहुँच जाए, तो समझ लेना चाहिए कि उसने अन्य समस्त योगों को लाँघ लिया है। इस प्रकार कृष्णभावनाभावित होना योग की सर्वोच्च अवस्था है, ठीक जैसे जब हम हिमालय की चर्चा करते हैं, तो हम विश्व के सर्वोच्च पर्वतों की ओर संकेत करते हैं, जिनमें सर्वोच्च शिखर माउण्ट एवरेस्ट को पराकाष्ठा माना जाता है।

यह महान् सौभाग्य से ही होता है कि कोई भक्तियोग के मार्ग पर कृष्णभावनामृत तक पहुँचकर वैदिक निर्देश के अनुसार भली-भाँति स्थित हो जाता है। आदर्श योगी अपना ध्यान श्रीकृष्ण पर केन्द्रित करता है, जो श्यामसुन्दर कहलाते हैं, जिनका वर्ण मेघ के समान सुन्दर है, जिनका कमल-सदृश मुख सूर्य के समान तेजोमय है, जिनका वस्त्र रत्नों से देदीप्यमान है तथा जिनका शरीर पुष्पमालाओं से सुशोभित है। उनकी भव्य आभा, जो ब्रह्मज्योति कहलाती है, समस्त दिशाओं को प्रकाशित करती है। वे राम, नृसिंह, वराह तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण जैसे विविध रूपों में अवतार लेते हैं, और मनुष्य की भाँति माता यशोदा के पुत्र रूप में अवतरित होते हैं, और श्रीकृष्ण, गोविन्द तथा वासुदेव के नाम से विख्यात हैं। वे पूर्ण पुत्र, पति, सखा तथा स्वामी हैं, और समस्त ऐश्वर्यों एवं दिव्य गुणों से परिपूर्ण हैं। यदि कोई भगवान् के इन लक्षणों के प्रति पूर्णतः सचेत रहता है, तो वही सर्वोच्च योगी कहलाता है।

योग की यह सर्वोच्च सिद्धि की अवस्था केवल भक्तियोग द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है, जैसा कि समस्त वैदिक साहित्य में पुष्टि होती है:

yasya deve parā bhaktir yathā deve tathā gurau.

tasyaite kathitā hy arthāḥ prakāśante mahātmanaḥ.

“केवल उन्हीं महान् आत्माओं पर, जिनकी भगवान् तथा आध्यात्मिक गुरु दोनों में अविचल श्रद्धा है, वैदिक ज्ञान के समस्त मर्म स्वतः प्रकट हो जाते हैं।”

भक्तिरस्य भजनं तदिहामुत्रोपाधि नैरास्येनामुष्मिन् मनः कल्पनम्; एतद् एव नैष्कर्म्यम्। “भक्ति का अर्थ है भगवान् की वह प्रेममयी सेवा जो इस जीवन में अथवा अगले जीवन में भौतिक लाभ की इच्छा से रहित हो। ऐसी प्रवृत्तियों से रहित होकर मनुष्य को मन को पूर्ण रूप से परमेश्वर में लीन कर देना चाहिए। यही नैष्कर्म्य का प्रयोजन है।”

ये भक्ति अथवा कृष्णभावनामृत के सम्पादन के, जो योग-पद्धति की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था है, कुछ साधन हैं।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के सांख्ययोग ब्रह्मविद्या विषयक छठे अध्याय पर श्रील भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त हुए।

Bg 6.5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥

उद्धरेत्—मनुष्य को उद्धार करना चाहिए; आत्मना—मन के द्वारा; आत्मानम्—बद्ध आत्मा का; —कभी नहीं; आत्मानम्—बद्ध आत्मा को; अवसादयेत्—अधोगति में डाले; आत्मा—मन; एव—निश्चय ही; हि—वस्तुतः; आत्मनः—बद्ध आत्मा का; बन्धुः—मित्र; आत्मा—मन; एव—निश्चय ही; रिपुः—शत्रु; आत्मनः—बद्ध आत्मा का।

मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करे, न कि अपनी अधोगति। मन ही बद्ध आत्मा का मित्र है, और वही उसका शत्रु भी है।

आत्मा शब्द भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के अनुसार शरीर, मन तथा आत्मा का बोधक है। योग पद्धति में मन तथा बद्ध आत्मा विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। चूँकि योगाभ्यास का केन्द्र-बिन्दु मन है, अतः यहाँ आत्मा का तात्पर्य मन से है। योग पद्धति का प्रयोजन मन को वश में करना तथा उसे विषयों की आसक्ति से दूर खींचना है। यहाँ इस बात पर बल दिया गया है कि मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि वह बद्ध आत्मा को अज्ञान के पंक से उबार सके। भौतिक अस्तित्व में मनुष्य मन तथा इन्द्रियों के प्रभाव के अधीन रहता है। वस्तुतः शुद्ध आत्मा भौतिक जगत् में इसीलिए फँसी हुई है क्योंकि मन का अहंकार भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाना चाहता है। अतः मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि वह भौतिक प्रकृति की चमक-दमक से आकृष्ट न हो, और इस प्रकार बद्ध आत्मा की रक्षा हो सके। मनुष्य को विषयों के प्रति आकर्षण से अपनी अधोगति नहीं करनी चाहिए। मनुष्य जितना अधिक विषयों से आकृष्ट होता है, उतना ही अधिक वह भौतिक अस्तित्व में फँसता जाता है। अपने को छुड़ाने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि मन को सदा कृष्णभावनामृत में संलग्न रखा जाए। यहाँ हि शब्द का प्रयोग इसी बात पर बल देने के लिए हुआ है, अर्थात् मनुष्य को ऐसा करना ही चाहिए। यह भी कहा गया है :

mana eva manuṣyāṇāṁ kāraṇaṁ bandha-mokṣayoḥ

bandhāya viṣayāsaṅgo muktyai nirviṣayaṁ manaḥ.

“मनुष्यों के लिए मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मुक्ति का कारण है। विषयों में लीन मन बन्धन का कारण है, और विषयों से विरक्त मन मुक्ति का कारण है।” अतएव जो मन सदा कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है, वही परम मुक्ति का कारण है।

Bg 6.6

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥

बन्धुः—मित्र; आत्मा—मन; आत्मनः—जीव का; तस्य—उसका; येन—जिसके द्वारा; आत्मा—मन; एव—निश्चय ही; आत्मना—जीव के द्वारा; जितः—जीता गया; अनात्मनः—जो मन को वश में करने में असफल रहा, उसका; तु—किन्तु; शत्रुत्वे—शत्रुता के कारण; वर्तेत—बना रहता है; आत्मा एव—वही मन; शत्रुवत्—शत्रु के समान।

जिसने मन को जीत लिया है, उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है; किन्तु जो ऐसा करने में असफल रहा है, उसके लिए उसका मन ही सबसे बड़ा शत्रु बन जाएगा।

अष्टांगयोग के अभ्यास का प्रयोजन मन को वश में करना है, जिससे वह मानव-जीवन के लक्ष्य की पूर्ति में मित्र बन सके। जब तक मन को वश में नहीं किया जाता, तब तक योग का अभ्यास (दिखावे के लिए) केवल समय का अपव्यय है। जो अपने मन को वश में नहीं कर सकता, वह सदा सबसे बड़े शत्रु के साथ निवास करता है, और इस प्रकार उसका जीवन तथा उसका लक्ष्य नष्ट हो जाते हैं। जीव की स्वरूपगत स्थिति यह है कि वह उच्चतर के आदेश का पालन करे। जब तक मनुष्य का मन अजेय शत्रु बना रहता है, तब तक उसे काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि के आदेशों की सेवा करनी पड़ती है। किन्तु जब मन जीत लिया जाता है, तब मनुष्य स्वेच्छा से भगवान् के आदेश का पालन करने को सहमत हो जाता है, जो परमात्मा के रूप में प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं। वास्तविक योगाभ्यास में हृदय के भीतर परमात्मा से मिलना और तत्पश्चात् उनके आदेश का पालन करना निहित है। जो प्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, उसके लिए भगवान् के आदेश के प्रति पूर्ण शरणागति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।

Bg 6.7

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥

जित-आत्मनः—जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसका; प्रशान्तस्य—जिसने मन पर ऐसे संयम से शान्ति प्राप्त कर ली है, उसका; परमात्मा—परमात्मा; समाहितः—पूर्णतः प्राप्त; शीत—शीत; उष्ण—उष्णता; सुख—सुख में; दुःखेषु—दुःख में; तथा—भी; मान—मान; अपमानयोः—अपमान में।

जिसने मन को जीत लिया है, उसके लिए परमात्मा पहले से ही प्राप्त हैं, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है। ऐसे मनुष्य के लिए सुख तथा दुःख, शीत तथा उष्णता, मान तथा अपमान—सब समान हैं।

वस्तुतः प्रत्येक जीव का यह प्रयोजन है कि वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश का पालन करे, जो परमात्मा के रूप में प्रत्येक के हृदय में विराजमान हैं। जब मन बाह्य माया-शक्ति द्वारा भटका दिया जाता है, तब मनुष्य भौतिक क्रियाओं में फँस जाता है। अतः ज्यों ही किसी योग पद्धति के द्वारा मनुष्य का मन वश में हो जाता है, त्यों ही उसे लक्ष्य पर पहुँचा हुआ मान लेना चाहिए। मनुष्य को उच्चतर आदेश का पालन करना ही होता है। जब मनुष्य का मन उच्चतर प्रकृति पर स्थिर हो जाता है, तब उसके पास परम के आदेश का पालन करने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं रहता। मन को किसी न किसी उच्चतर आदेश को स्वीकार करके उसका पालन करना ही पड़ता है। मन को वश में करने का परिणाम यह होता है कि मनुष्य स्वतः ही परमात्मा के आदेश का पालन करने लगता है। चूँकि कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति यह दिव्य स्थिति तत्काल प्राप्त कर लेता है, अतः भगवान् का भक्त भौतिक अस्तित्व के द्वन्द्वों—अर्थात् दुःख तथा सुख, शीत तथा उष्णता आदि—से अप्रभावित रहता है। यह दशा व्यावहारिक समाधि, अर्थात् परम में तल्लीनता है।

Bg 6.8

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्राश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥

ज्ञान—अर्जित ज्ञान; विज्ञान—अनुभूत ज्ञान; तृप्त—सन्तुष्ट; आत्मा—जीव; कूटस्थः—आध्यात्मिक रूप से स्थित; विजित-इन्द्रियः—जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं; युक्तः—आत्म-साक्षात्कार में सक्षम; इति—इस प्रकार; उच्यते—कहा जाता है; योगी—योगी; सम—समभाव; लोष्ट्र—कंकड़; अश्म—पत्थर; काञ्चनः—स्वर्ण।

जब मनुष्य अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति के बल पर पूर्णतः सन्तुष्ट हो जाता है, तब उसे आत्म-साक्षात्कार में स्थित कहा जाता है और वह योगी [अथवा योगसिद्ध] कहलाता है। ऐसा व्यक्ति दिव्यता में स्थित होता है और आत्मसंयमी होता है। वह सब कुछ को—चाहे वह कंकड़ हो, पत्थर हो अथवा स्वर्ण—समान दृष्टि से देखता है।

परम सत्य की अनुभूति के बिना शास्त्रीय ज्ञान निरर्थक है। इसे इस प्रकार कहा गया है :

ataḥ śrī-kṛṣṇa-nāmādi na bhaved grāhyam indriyaiḥ

sevonmukhe hi jihvādau svayam eva sphuraty adaḥ.

“कोई भी अपनी भौतिक रूप से दूषित इन्द्रियों के द्वारा श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा लीलाओं की दिव्य प्रकृति को नहीं समझ सकता। केवल जब मनुष्य भगवान् की दिव्य सेवा से आध्यात्मिक रूप से अनुप्राणित हो जाता है, तभी भगवान् के दिव्य नाम, रूप, गुण तथा लीलाएँ उस पर प्रकट होते हैं।” (पद्म पुराण)

यह भगवद्गीता कृष्णभावनामृत का विज्ञान है। कोई भी केवल सांसारिक पाण्डित्य से कृष्णभावनाभावित नहीं बन सकता। मनुष्य को इतना सौभाग्यशाली होना चाहिए कि वह किसी शुद्ध चेतना में स्थित व्यक्ति की संगति प्राप्त करे। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को श्रीकृष्ण की कृपा से अनुभूत ज्ञान प्राप्त होता है, क्योंकि वह शुद्ध भक्ति से सन्तुष्ट रहता है। अनुभूत ज्ञान के द्वारा मनुष्य पूर्ण बनता है। दिव्य ज्ञान के द्वारा मनुष्य अपने विश्वासों में दृढ़ रह सकता है, किन्तु केवल अकादमिक ज्ञान के द्वारा मनुष्य आभासी विरोधाभासों से सहज ही भ्रमित तथा विमोहित हो सकता है। वही अनुभूत आत्मा वास्तव में आत्मसंयमी है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के शरणागत है। वह दिव्य है, क्योंकि सांसारिक पाण्डित्य से उसका कोई सरोकार नहीं है। उसके लिए सांसारिक पाण्डित्य तथा मानसिक कल्पना, जो दूसरों के लिए स्वर्ण के समान मूल्यवान हो सकती है, कंकड़ अथवा पत्थर से अधिक मूल्य की नहीं है।

Bg 6.9

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ ॥

सुहृत्—स्वभाव से शुभचिन्तक; मित्र—स्नेहपूर्ण हितैषी; अरि—शत्रु; उदासीन—विवादियों के बीच तटस्थ; मध्यस्थ—विवादियों के बीच मध्यस्थ; द्वेष्य—द्वेषी; बन्धुषु—सम्बन्धियों अथवा शुभचिन्तकों में; साधुषु—पुण्यात्माओं के प्रति; अपि—साथ ही; —तथा; पापेषु—पापियों के प्रति; सम-बुद्धिः—समान बुद्धि रखने वाला; विशिष्यते—अत्यधिक उन्नत है।

जब मनुष्य सबको—सच्चे शुभचिन्तक, मित्रों तथा शत्रुओं, द्वेषियों, पुण्यात्माओं, पापियों तथा उन सबको, जो उदासीन एवं निष्पक्ष हैं—समान दृष्टि से देखता है, तब उसे और भी अधिक उन्नत कहा जाता है।