अध्याय 17

Bg 17.1

अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥

अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; ये—जो लोग; शास्त्र-विधिम्—शास्त्र के विधि-विधान; उत्सृज्य—त्यागकर; यजन्ते—पूजा करते हैं; श्रद्धया—पूर्ण श्रद्धा से; अन्विताः—युक्त; तेषाम्—उनकी; निष्ठा—श्रद्धा; तु—किन्तु; का—क्या है; कृष्ण—हे श्रीकृष्ण; सत्त्वम्—सतोगुण में; आहो—कहा; रजः—रजोगुण में; तमः—तमोगुण में।

अर्जुन ने कहा, हे श्रीकृष्ण! जो व्यक्ति शास्त्र के सिद्धान्तों का पालन नहीं करता, अपितु अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करता है, उसकी स्थिति क्या होती है? वह सतोगुण में है, रजोगुण में है अथवा तमोगुण में?

चतुर्थ अध्याय के उनतालीसवें श्लोक में कहा गया है कि किसी विशेष प्रकार की पूजा के प्रति श्रद्धावान् व्यक्ति क्रमशः ज्ञान की अवस्था तक उन्नत होता है और शान्ति एवं समृद्धि की परम सिद्ध अवस्था को प्राप्त करता है। सोलहवें अध्याय में यह निष्कर्ष निकाला गया कि जो शास्त्रों में निर्दिष्ट सिद्धान्तों का पालन नहीं करता, वह असुर अर्थात् राक्षस कहलाता है, और जो शास्त्रीय आदेशों का श्रद्धापूर्वक पालन करता है, वह देव अर्थात् देवता कहलाता है। अब, यदि कोई श्रद्धा सहित ऐसे कुछ नियमों का पालन करे जो शास्त्रीय आदेशों में उल्लिखित नहीं हैं, तो उसकी स्थिति क्या होगी? अर्जुन के इस सन्देह का निवारण श्रीकृष्ण को करना है। जो लोग किसी मनुष्य को चुनकर तथा उसमें अपनी श्रद्धा रखकर किसी प्रकार के ईश्वर की रचना कर लेते हैं, क्या वे सतोगुण में, रजोगुण में अथवा तमोगुण में पूजा कर रहे हैं? क्या ऐसे व्यक्ति जीवन की सिद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं? क्या उनके लिए यह सम्भव है कि वे वास्तविक ज्ञान में स्थित हों और अपने को परम सिद्ध अवस्था तक उन्नत करें? जो लोग शास्त्रों के विधि-विधानों का पालन नहीं करते, किन्तु किसी वस्तु में श्रद्धा रखते हैं तथा देवों, देवताओं एवं मनुष्यों की पूजा करते हैं, क्या वे अपने प्रयत्न में सफलता प्राप्त करते हैं? अर्जुन ये प्रश्न श्रीकृष्ण के समक्ष रख रहे हैं।

Bg 17.11

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदिष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥

अफल-कांक्षिभिः—फल की इच्छा से रहित; यज्ञः—यज्ञ; विधि—तदनुसार; दृष्टः—निर्देश; यः—जो कोई; इज्यते—सम्पन्न करता है; यष्टव्यम्—करना ही चाहिए; एव—निश्चय ही; इति—इस प्रकार; मनः—मन; समाधाय—में स्थिर; सः—वह; सात्त्विकः—सतोगुण में है।

यज्ञों में, जो यज्ञ कर्तव्य एवं शास्त्रीय नियमों के अनुसार तथा फल की किसी अपेक्षा के बिना सम्पन्न किया जाता है, वह सतोगुणी स्वभाव का होता है।

सामान्य प्रवृत्ति यह है कि किसी प्रयोजन को मन में रखकर यज्ञ अर्पित किया जाए, किन्तु यहाँ कहा गया है कि यज्ञ ऐसी किसी इच्छा के बिना सम्पन्न किया जाना चाहिए। इसे कर्तव्य समझकर किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ, मन्दिरों अथवा गिरजाघरों में अनुष्ठानों का सम्पादन लीजिए। सामान्यतः वे भौतिक लाभ के प्रयोजन से सम्पन्न किए जाते हैं, किन्तु वह सतोगुण में नहीं है। मनुष्य को कर्तव्य समझकर मन्दिर अथवा गिरजाघर जाना चाहिए, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को आदर अर्पित करना चाहिए तथा पुष्प एवं खाद्य-पदार्थ अर्पित करने चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि केवल ईश्वर की पूजा के लिए मन्दिर जाने का कोई लाभ नहीं है। किन्तु आर्थिक लाभ हेतु पूजा शास्त्रीय आदेश में अनुशंसित नहीं है। मनुष्य को केवल अर्चाविग्रह को आदर अर्पित करने के लिए जाना चाहिए। यह मनुष्य को सतोगुण में स्थित करेगा। प्रत्येक सभ्य मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह शास्त्रों के आदेशों का पालन करे तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को आदर अर्पित करे।

Bg 17.12

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥

अभिसन्धाय—इच्छा करते हुए; तु—किन्तु; फलम्—फल; दम्भ—गर्व; अर्थम्—भौतिक लाभ; अपि—भी; —और; एव—निश्चय ही; यत्—जो; इज्यते—पूजा; भरत-श्रेष्ठ—हे भरतश्रेष्ठ; तम्—उस; यज्ञम्—यज्ञ को; विद्धि—जानो; राजसम्—रजोगुण में।

किन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ किसी भौतिक लक्ष्य अथवा लाभ हेतु सम्पन्न किया जाता है, अथवा गर्ववश आडम्बरपूर्वक किया जाता है, वह रजोगुणी स्वभाव का होता है।

कभी-कभी यज्ञ एवं अनुष्ठान स्वर्गलोक तक उन्नति हेतु अथवा इस संसार में किसी भौतिक लाभ हेतु सम्पन्न किए जाते हैं। ऐसे यज्ञ अथवा अनुष्ठान रजोगुण में माने जाते हैं।

Bg 17.13

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥

विधि-हीनम्—शास्त्रीय निर्देश के बिना; असृष्ट-अन्नम्—प्रसादम् के वितरण के बिना; मन्त्र-हीनम्—वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के बिना; अदक्षिणम्—पुरोहितों को दक्षिणा के बिना; श्रद्धा—श्रद्धा; विरहितम्—बिना; यज्ञम्—यज्ञ; तामसम्—तमोगुण में; परिचक्षते—माना जाता है।

और जो यज्ञ शास्त्रीय आदेशों की अवहेलना में सम्पन्न किया जाता है, जिसमें कोई आध्यात्मिक भोजन वितरित नहीं किया जाता, कोई मन्त्र उच्चारित नहीं किए जाते और पुरोहितों को कोई दक्षिणा नहीं दी जाती, और जो श्रद्धाहीन है—वह यज्ञ तमोगुणी स्वभाव का होता है।

तमोगुण अथवा अन्धकार के गुण में श्रद्धा वस्तुतः श्रद्धाहीनता है। कभी-कभी लोग केवल धन कमाने के लिए किसी देवता की पूजा करते हैं और फिर शास्त्रीय आदेशों की उपेक्षा करते हुए उस धन को मनोरंजन पर व्यय करते हैं। धार्मिकता के ऐसे आडम्बरपूर्ण प्रदर्शन वास्तविक रूप में स्वीकार नहीं किए जाते। वे सब तमोगुण में हैं; वे आसुरी मनोवृत्ति उत्पन्न करते हैं और मानव समाज को लाभ नहीं पहुँचाते।

Bg 17.14

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥

देव—परमेश्वर; द्विज—ब्राह्मण; गुरु—आध्यात्मिक गुरु; प्राज्ञ—पूजनीय व्यक्ति; पूजनम्—पूजा; शौचम्—पवित्रता; आर्जवम्—सरलता; ब्रह्म-चर्यम्—ब्रह्मचर्य; अहिंसा—अहिंसा; —भी; शारीरम्—शरीर से सम्बन्धित; तपः—तप; उच्यते—कहा जाता है।

शरीर का तप इस प्रकार है: परमेश्वर, ब्राह्मणों, आध्यात्मिक गुरु तथा पिता एवं माता जैसे श्रेष्ठजनों की पूजा। पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य एवं अहिंसा भी शरीर के तप हैं।

परमेश्वर यहाँ विभिन्न प्रकार के तप एवं तपस्या की व्याख्या करते हैं। सर्वप्रथम वे शरीर द्वारा अभ्यास किए जाने वाले तप एवं तपस्याओं की व्याख्या करते हैं। मनुष्य को ईश्वर अथवा देवताओं, पूर्ण एवं योग्य ब्राह्मणों तथा आध्यात्मिक गुरु एवं पिता, माता अथवा वैदिक ज्ञान से परिचित किसी भी व्यक्ति जैसे श्रेष्ठजनों को आदर अर्पित करना चाहिए, अथवा आदर अर्पित करना सीखना चाहिए। इन्हें समुचित आदर दिया जाना चाहिए। मनुष्य को अपने को बाह्य एवं आन्तरिक रूप से शुद्ध करने का अभ्यास करना चाहिए, और उसे आचरण में सरल बनना सीखना चाहिए। उसे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जो शास्त्रीय आदेश द्वारा अनुमोदित न हो। उसे विवाहित जीवन के बाहर यौन-भोग में लिप्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि शास्त्र में यौन-सम्बन्ध केवल विवाह में ही अनुमोदित है, अन्यथा नहीं। यह ब्रह्मचर्य कहलाता है। जहाँ तक शरीर का सम्बन्ध है, ये तप एवं तपस्याएँ हैं।

Bg 17.15

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥

अनुद्वेग—उद्विग्न न करने वाले; करम्—उत्पन्न करते हुए; वाक्यम्—वचन; सत्यम्—सत्य; प्रिय—प्रिय; हितम्—हितकर; —भी; यत्—जो; स्वाध्याय—वैदिक अध्ययन; अभ्यसनम्—अभ्यास; —भी; एव—निश्चय ही; वाङ्मयम्—वाणी का; तपः—तप; उच्यते—कहा जाता है।

वाणी का तप सत्य एवं हितकर वचन बोलने तथा ऐसी वाणी से बचने में निहित है जो उद्वेग उत्पन्न करे। मनुष्य को नियमित रूप से वेदों का पाठ भी करना चाहिए।

मनुष्य को इस प्रकार नहीं बोलना चाहिए कि दूसरों के मन उद्विग्न हों। निस्सन्देह, जब कोई शिक्षक बोलता है, तो वह अपने शिष्यों की शिक्षा हेतु सत्य बोल सकता है, किन्तु ऐसे शिक्षक को उन अन्य व्यक्तियों से नहीं बोलना चाहिए जो उसके शिष्य नहीं हैं, यदि उससे उनके मन उद्विग्न होंगे। जहाँ तक बोलने का सम्बन्ध है, यह तप है। इसके अतिरिक्त, मनुष्य को निरर्थक बातें नहीं करनी चाहिए। आध्यात्मिक मण्डलियों में बोलते समय, मनुष्य के कथनों की पुष्टि शास्त्रों द्वारा होनी चाहिए। मनुष्य जो कह रहा है, उसकी पुष्टि के लिए उसे तुरन्त शास्त्रीय प्रमाण से उद्धरण देना चाहिए। साथ ही, ऐसी बातें कानों को अत्यन्त सुखद होनी चाहिए। ऐसी चर्चाओं से मनुष्य सर्वोच्च लाभ प्राप्त कर सकता है और मानव समाज को उन्नत कर सकता है। वैदिक साहित्य का असीम भण्डार है, और मनुष्य को इसका अध्ययन करना चाहिए। यह वाणी का तप कहलाता है।

Bg 17.16

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥

मनः-प्रसादः—मन का सन्तोष; सौम्यत्वम्—दूसरों के प्रति कपटरहितता; मौनम्—गम्भीरता; आत्म—आत्मा; विनिग्रहः—संयम; भाव—स्वभाव; संशुद्धिः—शुद्धि; इति—इस प्रकार; एतत्—यह है; तपः—तप; मानसम्—मन का; उच्यते—कहा जाता है।

और प्रसन्नता, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं विचार की शुद्धता—ये मन के तप हैं।

मन को तपस्वी बनाने का अर्थ है उसे इन्द्रियतृप्ति से विरक्त करना। इसे इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वह सदैव दूसरों का कल्याण करने का विचार कर सके। मन के लिए सर्वोत्तम प्रशिक्षण विचार में गम्भीरता है। मनुष्य को कृष्णभावनामृत से विचलित नहीं होना चाहिए और सदैव इन्द्रियतृप्ति से बचना चाहिए। मनुष्य के स्वभाव को शुद्ध करने का अर्थ है कृष्णभावनाभावित होना। मन का सन्तोष केवल मन को इन्द्रिय-भोग के विचारों से दूर ले जाकर ही प्राप्त किया जा सकता है। जितना अधिक हम इन्द्रिय-भोग का विचार करते हैं, उतना ही अधिक मन असन्तुष्ट होता जाता है। वर्तमान युग में हम मन को इन्द्रियतृप्ति हेतु अनेक भिन्न-भिन्न रीतियों में अनावश्यक रूप से संलग्न करते हैं, और इसलिए मन के सन्तुष्ट होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। सर्वोत्तम उपाय यह है कि मन को वैदिक साहित्य की ओर मोड़ा जाए, जो सन्तोषप्रद कथाओं से पूर्ण है, जैसा कि पुराणों एवं महाभारत में है। मनुष्य इस ज्ञान का लाभ उठा सकता है और इस प्रकार शुद्ध हो सकता है। मन कपट से रहित होना चाहिए, और मनुष्य को सबके कल्याण का विचार करना चाहिए। मौन का अर्थ है कि मनुष्य सदैव आत्म-साक्षात्कार का विचार करता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति इसी अर्थ में पूर्ण मौन का पालन करता है। मन के संयम का अर्थ है मन को इन्द्रिय-भोग से विरक्त करना। मनुष्य को अपने व्यवहार में सरल होना चाहिए और इस प्रकार अपने अस्तित्व को शुद्ध करना चाहिए। ये सभी गुण मिलकर मानसिक क्रियाओं में तप का निर्माण करते हैं।

Bg 17.17

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥

श्रद्धया—श्रद्धा से; परया—दिव्य; तप्तम्—सम्पन्न; तपः—तप; तत्—वह; त्रि-विधम्—तीन प्रकार का; नरैः—मनुष्यों द्वारा; अफल-आकांक्षिभिः—फल की इच्छा से रहित; युक्तैः—संलग्न; सात्त्विकम्—सतोगुण में; परि-चक्षते—कहा जाता है।

यह त्रिविध तप, जो उन मनुष्यों द्वारा सम्पन्न किया जाता है जिनका लक्ष्य स्वयं को भौतिक रूप से लाभ पहुँचाना नहीं अपितु परमेश्वर को प्रसन्न करना है, सतोगुणी स्वभाव का होता है।

Bg 17.18

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥

सत्कार—आदर; मान—सम्मान; पूजा-अर्थम्—पूजा हेतु; तपः—तप; दम्भेन—गर्व से; —भी; एव—निश्चय ही; यत्—जो; क्रियते—सम्पन्न किया जाता है; तत्—वह; इह—इस संसार में; प्रोक्तम्—कहा गया है; राजसम्—रजोगुण में; चलम्—चंचल; अध्रुवम्—अस्थायी।

वे आडम्बरपूर्ण तप एवं तपस्याएँ जो आदर, सम्मान एवं श्रद्धा प्राप्त करने के लिए सम्पन्न की जाती हैं, रजोगुण में कही जाती हैं। वे न तो स्थिर हैं और न ही स्थायी।

कभी-कभी तप एवं तपस्या लोगों को आकृष्ट करने तथा दूसरों से सम्मान, आदर एवं पूजा प्राप्त करने हेतु सम्पन्न की जाती है। रजोगुणी व्यक्ति यह व्यवस्था करते हैं कि अधीनस्थ उनकी पूजा करें तथा उन्हें अपने चरण धुलाने एवं धन अर्पित करने देते हैं। तप के सम्पादन द्वारा कृत्रिम रूप से की गई ऐसी व्यवस्थाएँ रजोगुण में मानी जाती हैं। उनके परिणाम अस्थायी होते हैं; वे कुछ समय तक चल सकते हैं, किन्तु वे स्थायी नहीं होते।

Bg 17.19

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥

मूढ—मूर्खतापूर्ण; ग्राहेण—प्रयास से; आत्मनः—अपने ही स्वरूप की; यत्—जो; पीडया—यातना द्वारा; क्रियते—की जाती है; तपः—तपस्या; परस्य—दूसरों का; उत्सादनार्थम्—विनाश के लिए; वा—अथवा; तत्—वह; तामसम्—तमोगुण में; उदाहृतम्—कही जाती है।

और जो तपस्याएँ हठपूर्वक आत्म-यातना द्वारा मूर्खतापूर्वक की जाती हैं, अथवा जो दूसरों के विनाश या हानि के लिए की जाती हैं, वे तमोगुण में कही जाती हैं।

हिरण्यकशिपु जैसे असुरों द्वारा की गई मूर्खतापूर्ण तपस्या के उदाहरण विद्यमान हैं, जिसने अमर होने तथा देवताओं का वध करने के लिए कठोर तपस्या की। उसने ब्रह्मा से ऐसी ही वस्तुओं की प्रार्थना की, किन्तु अन्ततः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा उसका वध हुआ। किसी असम्भव वस्तु के लिए तपस्या करना निश्चय ही तमोगुण में है।

Bg 17.2

श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; त्रि-विधा—तीन प्रकार की; भवति—होती है; श्रद्धा—श्रद्धा; देहिनाम्—देहधारियों की; सा—वह; स्व-भाव-जा—उसकी भौतिक प्रकृति के गुण के अनुसार; सात्त्विकी—सतोगुण; राजसी—रजोगुण; —भी; एव—निश्चय ही; तामसी—तमोगुण; —और; इति—इस प्रकार; ताम्—उसे; सृणु—मुझसे सुनो।

श्रीभगवान् ने कहा, देहधारी जीव द्वारा अर्जित प्रकृति के गुणों के अनुसार, मनुष्य की श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है—सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी। अब इनके विषय में सुनो।

जो लोग शास्त्रों के विधि-विधानों को जानते हैं, किन्तु आलस्य अथवा प्रमादवश इन विधि-विधानों के पालन को त्याग देते हैं, वे प्रकृति के गुणों द्वारा शासित होते हैं। सतोगुण, रजोगुण अथवा तमोगुण में अपने पूर्व कर्मों के अनुसार वे एक ऐसी प्रकृति अर्जित करते हैं जो किसी विशिष्ट गुण की होती है। जीव का प्रकृति के विभिन्न गुणों के साथ संसर्ग सनातन रूप से चलता आ रहा है, क्योंकि जीव भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में है। इस प्रकार वह भौतिक गुणों के साथ अपने संसर्ग के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की मनोवृत्ति अर्जित करता है। किन्तु यदि कोई प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु का संग करे तथा उनके नियमों और शास्त्रों का पालन करे, तो यह प्रकृति बदली जा सकती है। क्रमशः मनुष्य अपनी स्थिति को तमोगुण से सतोगुण की ओर, अथवा रजोगुण से सतोगुण की ओर बदल सकता है। निष्कर्ष यह है कि प्रकृति के किसी विशेष गुण में अन्धश्रद्धा मनुष्य को सिद्ध अवस्था तक उन्नत होने में सहायता नहीं कर सकती। मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के संग में बुद्धिपूर्वक, सावधानी से विषयों पर विचार करना होता है। इस प्रकार मनुष्य अपनी स्थिति को प्रकृति के उच्चतर गुण की ओर बदल सकता है।

Bg 17.20

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥

दातव्यम्—देने योग्य; इति—इस प्रकार; यत्—जो; दानम्—दान; दीयते—दिया जाता है; अनुपकारिणे—प्रत्युपकार की परवाह किए बिना किसी व्यक्ति को; देशे—स्थान में; काले—समय में; —भी; पात्रे—उपयुक्त व्यक्ति को; —और; तत्—वह; दानम्—दान; सात्त्विकम्—सतोगुण में; स्मृतम्—माना जाता है।

जो दान कर्तव्य समझकर, उचित स्थान एवं समय पर, सुपात्र व्यक्ति को, तथा प्रत्युपकार की आशा के बिना दिया जाता है, वह सतोगुणी दान माना जाता है।

वैदिक साहित्य में आध्यात्मिक कार्यों में संलग्न व्यक्ति को दान देने की अनुशंसा की गई है। अविवेकपूर्वक दान देने की कोई अनुशंसा नहीं है। आध्यात्मिक पूर्णता का सदैव विचार रहता है। अतः यह अनुशंसा की जाती है कि दान तीर्थस्थान पर, चन्द्र या सूर्य ग्रहण के समय, अथवा मास के अन्त में, अथवा योग्य ब्राह्मण या वैष्णव (भक्त) को, अथवा मन्दिरों में दिया जाए। ऐसे दान प्रत्युपकार के किसी विचार के बिना दिए जाने चाहिए। निर्धन को दान कभी-कभी करुणावश दिया जाता है, किन्तु यदि कोई निर्धन व्यक्ति दान देने योग्य न हो, तो उससे कोई आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती। दूसरे शब्दों में, अविवेकपूर्ण दान की वैदिक साहित्य में अनुशंसा नहीं की गई है।

Bg 17.21

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥

यत्—जो; तु—किन्तु; प्रति-उपकार-अर्थम्—किसी प्रत्युपकार की प्राप्ति के लिए; फलम्—फल; उद्दिश्य—इच्छा करते हुए; वा—अथवा; पुनः—फिर; दीयते—दान में दिया जाता है; —भी; परिक्लिष्टम्—अनिच्छापूर्वक; तत्—वह; दानम्—दान; राजसम्—रजोगुण में; स्मृतम्—समझा जाता है।

किन्तु जो दान किसी प्रत्युपकार की आशा से, अथवा सकाम फल की कामना से, अथवा अनिच्छापूर्ण भाव से किया जाता है, वह रजोगुणी दान कहा जाता है।

दान कभी-कभी स्वर्गलोक में उन्नति के लिए किया जाता है और कभी-कभी बहुत कष्ट के साथ तथा पश्चात्ताप-सहित किया जाता है। “मैंने इस प्रकार इतना अधिक व्यय क्यों किया?” दान कभी-कभी किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के अनुरोध पर, किसी बाध्यता के अधीन भी किया जाता है। इस प्रकार के दान रजोगुण में किए गए कहे जाते हैं।

ऐसी अनेक दानशील संस्थाएँ हैं जो अपने दान उन संस्थानों को अर्पित करती हैं जहाँ इन्द्रियतृप्ति चलती रहती है। ऐसे दानों की वैदिक शास्त्र में अनुशंसा नहीं की गई है। केवल सतोगुणी दान की ही अनुशंसा की गई है।

Bg 17.22

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

अदेश—अपवित्र स्थान; काले—अपवित्र समय; यत्—जो; दानम्—दान; अपात्रेभ्यः—अपात्र व्यक्तियों को; —भी; दीयते—दिया जाता है; असत्कृतम्—बिना आदर के; अवज्ञातम्—बिना समुचित ध्यान के; तत्—वह; तामसम्—तमोगुण में; उदाहृतम्—कहा जाता है।

और जो दान अनुपयुक्त स्थान एवं समय पर, अपात्र व्यक्तियों को, बिना आदर एवं तिरस्कारपूर्वक किया जाता है, वह तमोगुणी दान है।

यहाँ मादक पदार्थों के सेवन तथा द्यूत में लिप्तता के लिए दिए गए अंशदान को प्रोत्साहित नहीं किया गया है। उस प्रकार का अंशदान तमोगुण में है। ऐसा दान हितकर नहीं होता; अपितु इससे पापी व्यक्ति प्रोत्साहित होते हैं। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति उपयुक्त व्यक्ति को बिना आदर एवं बिना ध्यान के दान दे, तो उस प्रकार का दान भी तमोगुण में कहा जाता है।

Bg 17.23

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥

—परम का संकेत; तत्—वह; सत्—नित्य; इति—वह; निर्देशः—संकेत; ब्राह्मणाः—परम का; त्रि-विधः—तीन प्रकार; स्मृतः—माना जाता है; ब्रह्मणः—ब्राह्मणगण; तेन—अतः; वेदाः—वैदिक साहित्य; —भी; यज्ञाः—यज्ञ; —भी; विहिताः—यज्ञ; पुरा—प्राचीन काल में।

सृष्टि के आरम्भ से ही तीन अक्षरों—ॐ तत् सत्—का प्रयोग परम परब्रह्म [ब्रह्म] को इंगित करने के लिए होता आया है। परम के सन्तोष के लिए ब्राह्मणगण वैदिक स्तोत्रों का गायन करते समय तथा यज्ञों के समय इनका उच्चारण करते थे।

यह समझाया जा चुका है कि तपस्या, यज्ञ, दान एवं भोजन तीन कोटियों में विभक्त हैं—सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण। किन्तु प्रथम श्रेणी के हों, द्वितीय श्रेणी के हों या तृतीय श्रेणी के, वे सभी बद्ध हैं तथा प्रकृति के भौतिक गुणों से कलुषित हैं। जब वे परम—ॐ तत् सत्, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, नित्य—को लक्ष्य करके किए जाते हैं, तब वे आध्यात्मिक उन्नति के साधन बन जाते हैं। शास्त्रीय निर्देशों में ऐसा ही उद्देश्य इंगित किया गया है। ये तीनों शब्द—ॐ तत् सत्—विशेष रूप से परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को इंगित करते हैं। वैदिक स्तोत्रों में “ॐ” शब्द सदा पाया जाता है।

जो शास्त्रों के नियमों का पालन किए बिना कर्म करता है, वह परम सत्य को प्राप्त नहीं करेगा। उसे कोई क्षणिक फल मिलेगा, किन्तु जीवन का परम लक्ष्य नहीं। निष्कर्ष यह है कि दान, यज्ञ एवं तपस्या का सम्पादन सतोगुण में ही किया जाना चाहिए। रजोगुण या तमोगुण में किए जाने पर वे निश्चय ही गुणवत्ता में निम्न होते हैं। ये तीन शब्द—ॐ तत् सत्—परमेश्वर के पवित्र नाम के साथ उच्चरित होते हैं, यथा ॐ तद् विष्णोः। जब भी कोई वैदिक स्तोत्र अथवा परमेश्वर का पवित्र नाम उच्चरित होता है, तब “ॐ” जोड़ा जाता है। यही वैदिक साहित्य का संकेत है। ये तीनों शब्द वैदिक स्तोत्रों से लिए गए हैं। ॐ इत्येतद् ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम प्रथम लक्ष्य को इंगित करता है। तत्पश्चात् तत्त्वमसि द्वितीय लक्ष्य को इंगित करता है। और सद् एव सौम्य तृतीय लक्ष्य को इंगित करता है। संयुक्त होकर वे ॐ तत् सत् बन जाते हैं। प्राचीन काल में जब प्रथम सृष्ट जीव ब्रह्मा ने यज्ञ किए, तब उन्होंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के इन तीन नामों का उच्चारण किया। वही सिद्धान्त गुरु-परम्परा द्वारा चलता आया है। अतः इस स्तोत्र का महान् महत्त्व है। इसलिए भगवद्गीता अनुशंसा करती है कि जो भी कर्म किया जाए, वह ॐ तत् सत् के लिए, अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लिए किया जाए। जब कोई इन तीन शब्दों के साथ तपस्या, दान एवं यज्ञ करता है, तब वह कृष्णभावनामृत में कर्म कर रहा होता है। कृष्णभावनामृत दिव्य कार्यों का एक वैज्ञानिक सम्पादन है, जो मनुष्य को घर अर्थात् भगवद्धाम लौटने में समर्थ बनाता है। इस प्रकार दिव्य रीति से कर्म करने में ऊर्जा का कोई ह्रास नहीं होता।

Bg 17.24

तस्माद् ॐ इत्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥

तस्मात्—अतः; —ॐ से आरम्भ करते हुए; इति—इस प्रकार; उदाहृत्य—इंगित करते हुए; यज्ञ—यज्ञ; दान—दान; तपः—तपस्या; क्रियाः—कर्म; प्रवर्तन्ते—आरम्भ होते हैं; विधान-उक्ताः—शास्त्रीय नियम के अनुसार; सततम्—सदा; ब्रह्म-वादिनाम्—दिव्यदर्शियों के।

इस प्रकार दिव्यदर्शी परम की प्राप्ति के लिए सदा ॐ से आरम्भ करते हुए यज्ञ, दान एवं तपस्या करते हैं।

ॐ तद् विष्णोः परमं पदम्। विष्णु के चरणकमल सर्वोच्च भक्तिमय स्तर हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के निमित्त समस्त कार्यों का सम्पादन समस्त क्रियाओं की पूर्णता सुनिश्चित करता है।

Bg 17.25

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥ २५ ॥

तत्—वह; इति—वे; अनभिसन्धाय—सकाम फल के बिना; फलम्—यज्ञ का फल; यज्ञ—यज्ञ; तपः—तपस्या; क्रियाः—कार्य; दान—दान; क्रियाः—कार्य; —भी; विविधाः—विविध प्रकार के; क्रियन्ते—किए जाते हैं; मोक्ष-काङ्क्षिभिः—जो वास्तव में मुक्ति की इच्छा करते हैं।

मनुष्य को ‘तत्’ शब्द के साथ यज्ञ, तपस्या एवं दान करना चाहिए। ऐसे दिव्य कार्यों का प्रयोजन भौतिक बन्धन से मुक्त होना है।

आध्यात्मिक पद पर उन्नत होने के लिए मनुष्य को किसी भौतिक लाभ हेतु कर्म नहीं करना चाहिए। कर्म आध्यात्मिक राज्य में स्थानान्तरित होने के, घर लौटने के, भगवद्धाम लौटने के परम लाभ के लिए किए जाने चाहिए।

Bg 17.26-27

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥

सत्-भावे—परम के स्वभाव के अर्थ में; साधु-भावे—भक्ति के स्वभाव के अर्थ में; —भी; सत्—परम; इति—इस प्रकार; एतत्—यह; प्रयुज्यते—प्रयुक्त होता है; प्रशस्ते—प्रामाणिक; कर्मणि—कर्मों में; तथा—भी; सत्-शब्दः—ध्वनि; पार्थ—हे पृथापुत्र; युज्यते—प्रयुक्त होता है; यज्ञे—यज्ञ में; तपसि—तपस्या में; दाने—दान में; —भी; स्थितिः—स्थित; सत्—परम; इति—इस प्रकार; —और; उच्यते—उच्चरित होता है; कर्म—कर्म; —भी; एव—निश्चय ही; तत्—वह; अर्थीयम्—के लिए अभिप्रेत हैं; सत्—परम; इति—इस प्रकार; एव—निश्चय ही; अभिधीयते—अभ्यास किया जाता है।

परम सत्य भक्तिमय यज्ञ का लक्ष्य है, तथा इसे ‘सत्’ शब्द से इंगित किया जाता है। हे पृथापुत्र, परम पुरुष को प्रसन्न करने के लिए किए गए यज्ञ, तपस्या एवं दान के ये कार्य परम स्वभाव के अनुरूप होते हैं।

प्रशस्ते कर्मणि अर्थात् विहित कर्तव्य शब्द इंगित करते हैं कि वैदिक साहित्य में अनेक कर्म विहित हैं जो शुद्धिकरण की प्रक्रियाएँ हैं तथा जन्म-काल की देखरेख से लेकर जीवन के अन्त तक चलते हैं। ऐसी शुद्धिकरण-प्रक्रियाएँ जीव की परम मुक्ति के लिए अपनाई जाती हैं। ऐसे सभी कार्यों में यह अनुशंसा की जाती है कि मनुष्य ॐ तत् सत् का उच्चारण करे। सद्-भावे तथा साधु-भावे शब्द दिव्य स्थिति को इंगित करते हैं। जो कृष्णभावनामृत में कर्म कर रहा होता है, उसे सत्त्व कहा जाता है, और जो कृष्णभावनामृत में कार्यों के प्रति पूर्णतः सचेत है, उसे स्वरूप कहा जाता है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भक्तों की संगति में दिव्य विषय स्पष्ट हो जाता है। उत्तम संगति के बिना मनुष्य दिव्य ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। किसी व्यक्ति को दीक्षा देते समय अथवा यज्ञोपवीत अर्पित करते समय मनुष्य ॐ तत् सत् शब्दों का उच्चारण करता है। इसी प्रकार, समस्त प्रकार के योगाभ्यासों में परम लक्ष्य ॐ तत् सत् का आवाहन किया जाता है। ये शब्द ॐ तत् सत् समस्त कार्यों को पूर्ण करने के लिए प्रयुक्त होते हैं। यह परम ॐ तत् सत् सब कुछ सम्पूर्ण कर देता है।

Bg 17.28

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥

अश्रद्धया—बिना श्रद्धा के; हुतम्—सम्पन्न; दत्तम्—दिया गया; तपः—तपस्या; तप्तम्—किया गया; कृतम्—सम्पन्न; —भी; यत्—जो; असत्—असत्; इति—इस प्रकार; उच्यते—कहा जाता है; पार्थ—हे पृथापुत्र; —कभी नहीं; —भी; तत्—वह; प्रेत्य—मृत्यु के पश्चात्; नो—न ही; इह—इस जीवन में।

किन्तु हे पृथापुत्र, परम में श्रद्धा के बिना किए गए यज्ञ, तपस्या एवं दान, चाहे जो भी विधि सम्पन्न की जाए, अनित्य होते हैं। वे असत् कहलाते हैं तथा इस जीवन एवं अगले, दोनों में निरर्थक होते हैं।

दिव्य उद्देश्य के बिना किया गया कोई भी कार्य—चाहे वह यज्ञ हो, दान हो या तपस्या—निरर्थक होता है। अतः इस श्लोक में घोषित किया गया है कि ऐसे कार्य निन्दनीय हैं। प्रत्येक कार्य परम के लिए कृष्णभावनामृत में किया जाना चाहिए। ऐसी श्रद्धा के बिना, तथा समुचित मार्गदर्शन के बिना, कभी कोई फल नहीं हो सकता। समस्त वैदिक शास्त्रों में परम में श्रद्धा रखने का परामर्श दिया गया है। समस्त वैदिक उपदेशों के अनुसरण में परम लक्ष्य श्रीकृष्ण को जानना ही है। इस सिद्धान्त का पालन किए बिना कोई भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। अतः सर्वोत्तम मार्ग यही है कि मनुष्य प्रारम्भ से ही किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में कृष्णभावनामृत में कर्म करे। प्रत्येक वस्तु को सफल बनाने का यही उपाय है।

बद्ध अवस्था में लोग देवताओं, प्रेतों, अथवा कुवेर जैसे यक्षों की पूजा की ओर आकृष्ट होते हैं। सतोगुण रजोगुण एवं तमोगुण से श्रेष्ठ है, किन्तु जो प्रत्यक्षतः कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से परे दिव्य स्थिति में होता है। यद्यपि क्रमिक उन्नति की एक प्रक्रिया है, तथापि यदि कोई शुद्ध भक्तों की संगति से प्रत्यक्षतः कृष्णभावनामृत को ग्रहण कर ले, तो वही सर्वोत्तम मार्ग है। और इसी अध्याय में इसकी अनुशंसा की गई है। इस मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को पहले उपयुक्त आध्यात्मिक गुरु को खोजना होगा तथा उनके निर्देशन में प्रशिक्षण ग्रहण करना होगा। तब मनुष्य परम में श्रद्धा प्राप्त कर सकता है। समय के साथ जब वह श्रद्धा परिपक्व होती है, तब उसे भगवत्प्रेम कहा जाता है। यह प्रेम ही जीवों का परम लक्ष्य है। अतः मनुष्य को प्रत्यक्षतः कृष्णभावनामृत ग्रहण करना चाहिए। यही इस सत्रहवें अध्याय का सन्देश है।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय “श्रद्धात्रय-विभाग” पर श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के तात्पर्य समाप्त होते हैं।

Bg 17.3

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ॥

सत्त्व-अनुरूपा—अस्तित्व के अनुसार; सर्वस्य—प्रत्येक का; श्रद्धा—श्रद्धा; भवति—होती है; भारत—हे भरतपुत्र; श्रद्धा—श्रद्धा; मयः—से पूर्ण; अयम्—यह; पुरुषः—जीव; यः—जो कोई; यत्—जिस; श्रद्धः—श्रद्धा; सः—वह; एव—निश्चय ही; सः—वह।

प्रकृति के विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने अस्तित्व के अनुसार, मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है। कहा जाता है कि जीव ने जिन गुणों को अर्जित किया है, उन्हीं के अनुसार वह एक विशेष श्रद्धा वाला होता है।

प्रत्येक मनुष्य की एक विशेष प्रकार की श्रद्धा होती है, चाहे वह कुछ भी हो। किन्तु उसने जो प्रकृति अर्जित की है, उसके अनुसार उसकी श्रद्धा सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी मानी जाती है। इस प्रकार अपनी विशेष प्रकार की श्रद्धा के अनुसार मनुष्य कुछ विशेष व्यक्तियों का संग करता है। अब वास्तविक तथ्य यह है कि प्रत्येक जीव, जैसा कि पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है, मूलतः परमेश्वर का खण्ड अंश है। अतः वह मूलतः प्रकृति के समस्त गुणों से परे दिव्य है। किन्तु जब वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाता है और बद्ध जीवन में भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में आता है, तब वह भौतिक प्रकृति की विभिन्न विविधताओं के संसर्ग से अपनी स्थिति उत्पन्न कर लेता है। इसके फलस्वरूप उत्पन्न कृत्रिम श्रद्धा एवं अस्तित्व केवल भौतिक हैं। यद्यपि मनुष्य किसी संस्कार अथवा जीवन की किसी धारणा से संचालित हो, फिर भी वह मूलतः निर्गुण अर्थात् दिव्य है। अतः मनुष्य को उस भौतिक कल्मष से शुद्ध होना होता है जिसे उसने अर्जित किया है, जिससे वह परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को पुनः प्राप्त कर सके। निर्भय होकर वापस लौटने का एकमात्र पथ यही है—कृष्णभावनामृत। यदि मनुष्य कृष्णभावनामृत में स्थित हो, तो वह पथ उसकी सिद्ध अवस्था तक उन्नति के लिए सुनिश्चित है। यदि मनुष्य आत्म-साक्षात्कार के इस पथ को नहीं अपनाता, तो वह निश्चय ही प्रकृति के गुणों के प्रभाव से संचालित होगा।

इस श्लोक में सत्त्व अर्थात् श्रद्धा शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सत्त्व अथवा श्रद्धा सदैव सत्कर्मों से उत्पन्न होती है। मनुष्य की श्रद्धा किसी देवता में, अथवा किसी रचित ईश्वर में, अथवा किसी मानसिक कल्पना में हो सकती है। यह मानी जाती है कि किसी ऐसी वस्तु में उसकी दृढ़ श्रद्धा है जो भौतिक सत्कर्मों को उत्पन्न करती है। किन्तु भौतिक बद्ध जीवन में भौतिक प्रकृति का कोई भी कर्म पूर्णतः शुद्ध नहीं होता। वे मिश्रित होते हैं। वे शुद्ध सत्त्व में नहीं होते। शुद्ध सत्त्व दिव्य है; शुद्ध सत्त्व में मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के वास्तविक स्वरूप को समझ सकता है। जब तक मनुष्य की श्रद्धा पूर्णतः शुद्ध सत्त्व में नहीं होती, तब तक वह श्रद्धा प्रकृति के किसी भी गुण से संदूषित होने के अधीन रहती है। प्रकृति के संदूषित गुण हृदय तक विस्तार पाते हैं। अतः प्रकृति के किसी विशेष गुण के सम्पर्क में हृदय की स्थिति के अनुसार, मनुष्य की श्रद्धा स्थापित होती है। यह समझना चाहिए कि यदि मनुष्य का हृदय सतोगुण में है, तो उसकी श्रद्धा भी सतोगुण में होती है। यदि उसका हृदय रजोगुण में है, तो उसकी श्रद्धा भी रजोगुण में होती है। और यदि उसका हृदय तमोगुण अर्थात् भ्रम में है, तो उसकी श्रद्धा भी इसी प्रकार संदूषित होती है। इस प्रकार हम इस संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार की श्रद्धा पाते हैं, और भिन्न-भिन्न प्रकार की श्रद्धा के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के धर्म होते हैं। धार्मिक श्रद्धा का वास्तविक सिद्धान्त शुद्ध सत्त्व में स्थित है, किन्तु हृदय के कलुषित होने के कारण हम भिन्न-भिन्न प्रकार के धार्मिक सिद्धान्त पाते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न प्रकार की श्रद्धा के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की पूजा होती है।

Bg 17.4

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥

यजन्ते—पूजा करते हैं; सात्त्विकाः—जो सतोगुण में हैं; देवान्—देवताओं की; यक्ष-रक्षांसि राजसाः—जो रजोगुण में हैं वे असुरों की पूजा करते हैं; प्रेतान्—मृत आत्माओं; भूत-गणान्—भूत-प्रेत; च अन्ये—और अन्य; यजन्ते—पूजा करते हैं; तामसाः—तमोगुण में; जनाः—लोग।

सतोगुणी मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं; रजोगुणी असुरों की पूजा करते हैं; और तमोगुणी भूत-प्रेतों एवं आत्माओं की पूजा करते हैं।

इस श्लोक में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विभिन्न प्रकार के पूजकों का उनके बाह्य कर्मों के अनुसार वर्णन करते हैं। शास्त्रीय आदेश के अनुसार केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही पूजनीय हैं, किन्तु जो लोग शास्त्रीय आदेशों से भली-भाँति परिचित अथवा श्रद्धावान् नहीं हैं, वे भौतिक प्रकृति के गुणों में अपनी विशिष्ट स्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न वस्तुओं की पूजा करते हैं। जो सतोगुण में स्थित हैं, वे सामान्यतः देवताओं की पूजा करते हैं। देवताओं में ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र, चन्द्र एवं सूर्यदेव जैसे अन्य देवता सम्मिलित हैं। विविध देवता हैं। सतोगुणी किसी विशेष प्रयोजन हेतु किसी विशेष देवता की पूजा करते हैं। इसी प्रकार जो रजोगुण में हैं, वे असुरों की पूजा करते हैं। हमें स्मरण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय कलकत्ता में एक व्यक्ति हिटलर की पूजा करता था, क्योंकि उस युद्ध की कृपा से उसने काले बाज़ार में व्यापार करके विशाल धनराशि एकत्र कर ली थी। इसी प्रकार जो रजोगुण एवं तमोगुण में हैं, वे सामान्यतः किसी शक्तिशाली मनुष्य को ईश्वर के रूप में चुन लेते हैं। वे सोचते हैं कि किसी का भी ईश्वर के रूप में पूजन किया जा सकता है और उससे वही परिणाम प्राप्त होंगे।

अब यहाँ स्पष्ट रूप से वर्णित है कि जो रजोगुण में हैं, वे ऐसे ईश्वरों की पूजा करते हैं तथा उनकी रचना करते हैं, और जो तमोगुण अर्थात् अन्धकार में हैं, वे मृत आत्माओं की पूजा करते हैं। कभी-कभी लोग किसी मृत व्यक्ति की समाधि पर पूजा करते हैं। यौन-सेवा भी तमोगुण में मानी जाती है। इसी प्रकार भारत के दूरस्थ गाँवों में भूतों के पूजक हैं। हमने देखा है कि भारत में निम्न वर्ग के लोग कभी-कभी वन में जाते हैं, और यदि उन्हें यह ज्ञात हो कि किसी वृक्ष में कोई भूत निवास करता है, तो वे उस वृक्ष की पूजा करते हैं और बलि अर्पित करते हैं। ये भिन्न-भिन्न प्रकार की पूजाएँ वस्तुतः ईश्वर-पूजा नहीं हैं। ईश्वर-पूजा उन व्यक्तियों के लिए है जो दिव्यतः शुद्ध सत्त्व में स्थित हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है, सत्त्वं विशुद्धं वासुदेव-शब्दितम्। “जब मनुष्य शुद्ध सत्त्व में स्थित होता है, तब वह वासुदेव की पूजा करता है।” तात्पर्य यह है कि जो प्रकृति के भौतिक गुणों से पूर्णतः शुद्ध हो चुके हैं और जो दिव्यतः स्थित हैं, वे ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा कर सकते हैं।

निर्विशेषवादी सतोगुण में स्थित माने जाते हैं, और वे पाँच प्रकार के देवताओं की पूजा करते हैं। वे निराकार विष्णु अथवा भौतिक जगत् में विष्णु-रूप की पूजा करते हैं, जो दार्शनिकीकृत विष्णु के रूप में जाना जाता है। विष्णु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विस्तार हैं, किन्तु निर्विशेषवादी, क्योंकि वे अन्ततः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में विश्वास नहीं करते, यह कल्पना करते हैं कि विष्णु-रूप निराकार ब्रह्म का ही एक अन्य पक्ष है; इसी प्रकार वे यह कल्पना करते हैं कि भगवान् ब्रह्मा रजोगुण में निराकार रूप हैं। अतः वे कभी-कभी पाँच प्रकार के पूजनीय ईश्वरों का वर्णन करते हैं, किन्तु क्योंकि वे यह सोचते हैं कि वास्तविक सत्य निराकार ब्रह्म है, इसलिए वे अन्ततः समस्त पूजनीय वस्तुओं का परित्याग कर देते हैं। निष्कर्ष यह है कि भौतिक प्रकृति के गुणों की विभिन्न विशेषताएँ दिव्य प्रकृति वाले व्यक्तियों के संग से शुद्ध की जा सकती हैं।

Bg 17.5-6

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥

अशास्त्र—शास्त्रों में उल्लिखित नहीं; विहितम्—निर्देशित; घोरम्—दूसरों के लिए हानिकर; तप्यन्ते—तपस्या करते हैं; ये—जो; तपः—तप; जनाः—व्यक्ति; दम्भ—गर्व; अहंकार—अहंकार; संयुक्ताः—संलग्न; काम—वासना; राग—आसक्ति; बल—बल; अन्विताः—से प्रेरित; कर्षयन्तः—कष्ट देते हुए; शरीर-स्थम्—शरीर के भीतर स्थित; भूतग्रामम्—भौतिक तत्त्वों का संयोग; अचेतसः—ऐसी भ्रान्त मनोवृत्ति से; माम्—मुझको; —भी; एव—निश्चय ही; अन्तः—भीतर; शरीर-स्थम्—शरीर में स्थित; तान्—उन्हें; विद्धि—जानो; आसुर—असुर; निश्चयान्—निश्चय ही।

जो लोग शास्त्रों में अननुशंसित कठोर तप एवं तपस्या करते हैं, उन्हें गर्व, अहंकार, वासना एवं आसक्ति से करते हैं, जो रजोगुण से प्रेरित हैं और जो अपने शारीरिक अंगों के साथ-साथ भीतर निवास करने वाले परमात्मा को भी कष्ट देते हैं, उन्हें असुर समझना चाहिए।

ऐसे व्यक्ति हैं जो तप एवं तपस्या की ऐसी विधियाँ गढ़ लेते हैं जो शास्त्रीय आदेशों में उल्लिखित नहीं हैं। उदाहरणार्थ, किसी गूढ़ प्रयोजन हेतु उपवास करना, जैसे विशुद्ध रूप से किसी राजनीतिक लक्ष्य को बढ़ावा देने के लिए, शास्त्रीय निर्देशों में उल्लिखित नहीं है। शास्त्र आध्यात्मिक उन्नति हेतु उपवास की अनुशंसा करते हैं, किसी राजनीतिक लक्ष्य अथवा सामाजिक प्रयोजन हेतु नहीं। जो व्यक्ति ऐसी तपस्याएँ अपनाते हैं, वे भगवद्गीता के अनुसार निश्चय ही आसुरी हैं। उनके कर्म शास्त्रीय आदेश के विरुद्ध हैं और सामान्य जनता के लिए कल्याणकारी नहीं हैं। वस्तुतः वे गर्व, मिथ्या अहंकार, वासना एवं भौतिक भोग की आसक्ति से कर्म करते हैं। ऐसे कर्मों से न केवल उन भौतिक तत्त्वों के संयोग में, जिनसे शरीर निर्मित है, अपितु शरीर के भीतर निवास करने वाले स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में भी विक्षोभ उत्पन्न होता है। किसी राजनीतिक लक्ष्य हेतु ऐसा अनधिकृत उपवास अथवा तपस्या निश्चय ही दूसरों के लिए अत्यन्त क्षोभकारी है। वे वैदिक साहित्य में उल्लिखित नहीं हैं। कोई आसुरी व्यक्ति यह सोच सकता है कि इस विधि से वह अपने शत्रु अथवा अन्य पक्षों को अपनी इच्छा के अनुरूप विवश कर सकता है, किन्तु कभी-कभी ऐसे उपवास से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। इन कर्मों का पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अनुमोदन नहीं करते, और वे कहते हैं कि जो इनमें संलग्न होते हैं, वे असुर हैं। ऐसे प्रदर्शन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति अपमान हैं, क्योंकि वे वैदिक शास्त्रीय आदेशों की अवज्ञा में किए जाते हैं। इस सन्दर्भ में अचेतसः शब्द महत्त्वपूर्ण है—सामान्य मानसिक स्थिति वाले व्यक्तियों को शास्त्रीय आदेशों का पालन करना चाहिए। जो ऐसी स्थिति में नहीं हैं, वे शास्त्रों की उपेक्षा एवं अवज्ञा करते हैं तथा तप एवं तपस्या की अपनी विधि गढ़ लेते हैं। मनुष्य को सदैव आसुरी लोगों के उस अन्तिम परिणाम का स्मरण रखना चाहिए जिसका वर्णन पूर्ववर्ती अध्याय में किया गया है। भगवान् उन्हें आसुरी व्यक्तियों के गर्भ में जन्म लेने हेतु विवश करते हैं। फलस्वरूप वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को जाने बिना जन्म-जन्मान्तर आसुरी सिद्धान्तों के अनुसार जीवन व्यतीत करेंगे। तथापि यदि ऐसे व्यक्ति इतने सौभाग्यशाली हों कि उन्हें कोई आध्यात्मिक गुरु प्राप्त हो जो उन्हें वैदिक प्रज्ञा के पथ की ओर निर्देशित कर सके, तो वे इस बन्धन से मुक्त हो सकते हैं और अन्ततः परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

Bg 17.7

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥

आहारः—भोजन; तु—निश्चय ही; अपि—भी; सर्वस्य—प्रत्येक का; त्रिविधः—तीन प्रकार का; भवति—होता है; प्रियः—प्रिय; यज्ञः—यज्ञ; तपः—तप; तथा—भी; दानम्—दान; तेषाम्—उनके; भेदम्—भेद; इमम्—इस प्रकार; शृणु—सुनो।

जिस भोजन को सभी ग्रहण करते हैं, वह भी भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार का होता है। यही बात यज्ञ, तप एवं दान पर भी लागू होती है। सुनो, मैं तुम्हें इनके भेद बताऊँगा।

विभिन्न स्थितियों एवं भौतिक प्रकृति के गुणों की दृष्टि से, भोजन करने, यज्ञ, तप एवं दान करने की रीति में भेद होते हैं। ये सब एक ही स्तर पर सम्पन्न नहीं होते। जो लोग विश्लेषणपूर्वक यह समझ सकते हैं कि कौन-से कर्म भौतिक प्रकृति के किस गुण में हैं, वे वस्तुतः बुद्धिमान् हैं; जो सब प्रकार के यज्ञ अथवा भोजन अथवा दान को एक समान मानते हैं, वे विवेक नहीं कर सकते, और वे मूर्ख हैं। ऐसे प्रचारक हैं जो यह प्रतिपादन करते हैं कि मनुष्य जो चाहे वह कर सकता है और सिद्धि प्राप्त कर सकता है। किन्तु ये मूर्ख मार्गदर्शक शास्त्र के निर्देश के अनुसार कार्य नहीं कर रहे। वे विधियाँ गढ़ रहे हैं और सामान्य जनता को भटका रहे हैं।

Bg 17.8-10

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥

आयुः—आयु की अवधि; सत्त्व—अस्तित्व; बल—बल; आरोग्य—स्वास्थ्य; सुख—सुख; प्रीति—और सन्तोष; विवर्धनाः—बढ़ाने वाले; रस्याः—रसयुक्त; स्निग्धाः—चिकने; स्थिराः—टिकाऊ; हृद्याः—हृदय को प्रिय; आहाराः—भोजन; सात्त्विक—सतोगुणी को; प्रियाः—रुचिकर।

सतोगुणी भोजन आयु की अवधि को बढ़ाते हैं, मनुष्य के अस्तित्व को शुद्ध करते हैं तथा बल, स्वास्थ्य, सुख एवं सन्तोष प्रदान करते हैं। ऐसे पौष्टिक भोजन मधुर, रसयुक्त, चिकने एवं रुचिकर होते हैं। जो भोजन अत्यधिक कटु, अत्यधिक खट्टे, नमकीन, तीखे, रूखे एवं गरम होते हैं, वे रजोगुणी लोगों को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन पीड़ा, क्लेश एवं रोग उत्पन्न करते हैं। जो भोजन खाए जाने से तीन घण्टे से अधिक पूर्व पकाया गया हो, जो स्वादहीन, बासी, सड़ा हुआ, विकृत एवं अपवित्र हो, वह भोजन तमोगुणी लोगों को प्रिय होता है।

भोजन का प्रयोजन आयु की अवधि को बढ़ाना, मन को शुद्ध करना तथा शारीरिक बल में सहायता करना है। यही इसका एकमात्र प्रयोजन है। भूतकाल में महान् अधिकारियों ने उन भोजनों का चयन किया जो स्वास्थ्य में सर्वाधिक सहायक होते हैं और आयु की अवधि को बढ़ाते हैं, जैसे दुग्ध-पदार्थ, शर्करा, चावल, गेहूँ, फल एवं शाक। ये भोजन सतोगुणी व्यक्तियों को अत्यन्त प्रिय हैं। कुछ अन्य भोजन, जैसे भुना हुआ अन्न एवं गुड़, यद्यपि स्वयं में अधिक रुचिकर नहीं होते, किन्तु दूध अथवा अन्य भोजनों के साथ मिलाए जाने पर सुखद बनाए जा सकते हैं। तब वे सतोगुण में होते हैं। ये सभी भोजन स्वभाव से शुद्ध हैं। वे मांस एवं मद्य जैसी अस्पृश्य वस्तुओं से सर्वथा भिन्न हैं। चिकने भोजन, जैसा कि आठवें श्लोक में उल्लिखित है, वध से प्राप्त पशु-चर्बी से कोई सम्बन्ध नहीं रखते। पशु-चर्बी दूध के रूप में उपलब्ध है, जो समस्त भोजनों में सर्वाधिक अद्भुत है। दूध, मक्खन, पनीर एवं इसी प्रकार के पदार्थ पशु-चर्बी को ऐसे रूप में प्रदान करते हैं जो निर्दोष प्राणियों के वध की किसी भी आवश्यकता को समाप्त कर देता है। यह वध केवल पाशविक मनोवृत्ति के कारण ही चलता रहता है। आवश्यक चर्बी प्राप्त करने की सभ्य विधि दूध है। वध अधम मनुष्यों का मार्ग है। प्रोटीन दाल, दलहन, समूचे गेहूँ आदि से पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

रजोगुणी भोजन, जो कटु, अत्यधिक नमकीन, अथवा अत्यधिक गरम अथवा अत्यधिक लाल मिर्च से युक्त होते हैं, आमाशय में श्लेष्मा उत्पन्न करके दुःख का कारण बनते हैं, जिससे रोग होता है। तमोगुणी अथवा अन्धकार के गुण वाले भोजन वस्तुतः वे हैं जो ताज़े नहीं होते। जो भी भोजन खाए जाने से तीन घण्टे से अधिक पूर्व पकाया गया हो (प्रसादम् को छोड़कर, अर्थात् भगवान् को अर्पित भोजन), वह तमोगुण में माना जाता है। क्योंकि वे विकृत हो रहे होते हैं, ऐसे भोजन दुर्गन्ध देते हैं, जो प्रायः इस गुण वाले लोगों को आकृष्ट करती है किन्तु सतोगुणी लोगों को विकर्षित करती है।

भोजन के अवशेष केवल तभी खाए जा सकते हैं जब वे ऐसे भोजन का अंश हों जो पहले परमेश्वर को अर्पित किया गया हो अथवा पहले सन्त-पुरुषों ने, विशेषतः आध्यात्मिक गुरु ने, ग्रहण किया हो। अन्यथा भोजन के अवशेष तमोगुण में माने जाते हैं, और वे संक्रमण अथवा रोग को बढ़ाते हैं। ऐसे खाद्य-पदार्थ, यद्यपि तमोगुणी व्यक्तियों को अत्यन्त रुचिकर होते हैं, सतोगुणी व्यक्तियों द्वारा न तो रुचिकर माने जाते हैं और न ही स्पर्श किए जाते हैं। सर्वोत्तम भोजन वह अवशेष है जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित किया जाता है। भगवद्गीता में परमेश्वर कहते हैं कि वे शाक, आटे एवं दूध के पदार्थों को स्वीकार करते हैं, जब वे भक्ति सहित अर्पित किए जाते हैं। पत्रं पुष्पं फलं तोयम्। निस्सन्देह, भक्ति एवं प्रेम ही प्रमुख वस्तुएँ हैं जिन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वीकार करते हैं। किन्तु यह भी उल्लिखित है कि प्रसादम् किसी विशेष रीति से तैयार किया जाना चाहिए। शास्त्र के आदेश के अनुसार तैयार किया गया कोई भी भोजन जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित किया गया हो, वह दीर्घकाल पूर्व तैयार किया गया हो तो भी ग्रहण किया जा सकता है, क्योंकि ऐसा भोजन दिव्य है। अतः भोजन को सभी व्यक्तियों के लिए विषाणुरहित, खाद्य एवं रुचिकर बनाने हेतु, मनुष्य को भोजन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित करना चाहिए।