भूमिका
om ajñāna-timirāndhasya jñānāñjana-śalākayā
cakṣur unmīlitaṁ yena tasmai śrī-gurave namaḥ
śrī-caitanya-mano ’bhīṣṭaṁ sthāpitaṁ yena bhū-tale
svayaṁ rūpaḥ kadā mahyaṁ dadāti sva-padāntikam
मैं घोरतम अज्ञान में जन्मा था, और मेरे गुरुदेव ने ज्ञान की मशाल से मेरे नेत्र खोले। उन्हें मैं सादर प्रणाम करता हूँ।
श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद, जिन्होंने इस भौतिक जगत् में भगवान् चैतन्य की इच्छा पूर्ण करने का मिशन स्थापित किया, मुझे अपने चरणकमलों की शरण कब प्रदान करेंगे?
vande ’haṁ śrī-guroḥ śrī-yuta-pada-kamalaṁ śrī-gurun vaiṣṇavāṁś ca śrī-rūpaṁ sāgrajātaṁ saha-gaṇa-raghunāthānvitaṁ taṁ sa-jīvam sādvaitaṁ sāvadhūtaṁ parijana-sahitaṁ Kṛṣṇa-caitanya-devaṁ śrī-rādhā-Kṛṣṇa-pādān saha-gaṇa-lalitā-śrī-viśākhānvitāṁś ca
मैं अपने गुरुदेव के चरणकमलों में तथा समस्त वैष्णवों के चरणों में सादर प्रणाम करता हूँ। मैं श्रील रूप गोस्वामी के चरणकमलों में, उनके ज्येष्ठ भ्राता सनातन गोस्वामी सहित, तथा रघुनाथ दास एवं रघुनाथ भट्ट, गोपाल भट्ट तथा श्रील जीव गोस्वामी को सादर प्रणाम करता हूँ। मैं भगवान् कृष्ण चैतन्य तथा भगवान् नित्यानन्द को, अद्वैत आचार्य, गदाधर, श्रीवास तथा अन्य पार्षदों सहित, सादर प्रणाम करता हूँ। मैं श्रीमती राधारानी तथा श्रीकृष्ण को, उनकी सखियों श्री ललिता एवं विशाखा सहित, सादर प्रणाम करता हूँ।
he Kṛṣṇa karunā-sindho dīna-bandho jagat-pate gopeśa gopikā-kānta rādhā-kānta namo ’stu te
हे मेरे प्रिय कृष्ण, आप दुखियों के मित्र तथा सृष्टि के उद्गम हैं। आप गोपियों के स्वामी तथा राधारानी के प्रियतम हैं। मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ।
tapta-kāñcana-gaurāṅgi rādhe vṛndāvaneśvari vṛṣabhānu-sute devi praṇamāmi hari-priye
मैं राधारानी को प्रणाम करता हूँ, जिनकी अंगकान्ति तप्त स्वर्ण के समान है और जो वृन्दावन की महारानी हैं। आप महाराज वृषभानु की पुत्री हैं, और आप भगवान् कृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं।
vāñchā-kalpatarubhyaś ca kṛpā-sindhubhya eva ca patitānāṁ pāvanebhyo vaiṣṇavebhyo namo namaḥ
मैं भगवान् के समस्त वैष्णव भक्तों को सादर प्रणाम करता हूँ, जो कल्पवृक्षों के समान सबकी इच्छाएँ पूर्ण कर सकते हैं और जो पतित आत्माओं के प्रति करुणा से परिपूर्ण हैं।
śrī Kṛṣṇa caitanya prabhu nityānanda śrī advaita gadādhara śrīvāsādi-gaura-bhakta-vṛnda
मैं श्रीकृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानन्द, श्री अद्वैत, गदाधर, श्रीवास तथा भक्ति-परम्परा के अन्य समस्त भक्तों को प्रणाम करता हूँ।
hare Kṛṣṇa, hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa, hare hare hare rāma, hare rāma, rāma rāma, hare hare.
भगवद्गीता को गीतोपनिषद् भी कहा जाता है। यह वैदिक ज्ञान का सार है तथा वैदिक साहित्य के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपनिषदों में से एक है। निस्सन्देह भगवद्गीता पर अंग्रेज़ी में अनेक भाष्य उपलब्ध हैं, और कोई पूछ सकता है कि एक और भाष्य की क्या आवश्यकता है। इस वर्तमान संस्करण का स्पष्टीकरण इस प्रकार दिया जा सकता है। हाल ही में एक अमेरिकी महिला ने मुझसे भगवद्गीता के किसी अंग्रेज़ी अनुवाद की संस्तुति करने को कहा। निस्सन्देह अमेरिका में भगवद्गीता के अनेक संस्करण अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं, किन्तु जहाँ तक मैंने देखा है, केवल अमेरिका में ही नहीं अपितु भारत में भी, उनमें से किसी को भी कठोर अर्थ में प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनमें से लगभग प्रत्येक में भाष्यकार ने भगवद्गीता यथारूप के भाव का स्पर्श किए बिना अपने ही मत व्यक्त किए हैं।
भगवद्गीता का भाव स्वयं भगवद्गीता में ही बताया गया है। बात ऐसी है : यदि हम कोई विशेष औषधि लेना चाहते हैं, तो हमें लेबल पर लिखे निर्देशों का पालन करना होता है। हम उस औषधि को अपनी मनमानी से अथवा किसी मित्र के निर्देश से नहीं ले सकते। उसे लेबल के निर्देशों के अनुसार अथवा चिकित्सक द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार ही लेना चाहिए। इसी प्रकार, भगवद्गीता को वैसे ही ग्रहण अथवा स्वीकार करना चाहिए जैसा स्वयं वक्ता ने निर्देश दिया है। भगवद्गीता के वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण हैं। भगवद्गीता के प्रत्येक पृष्ठ पर उनका उल्लेख पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, भगवान् के रूप में हुआ है। निस्सन्देह “भगवान्” शब्द कभी-कभी किसी भी शक्तिशाली व्यक्ति अथवा किसी भी शक्तिशाली देवता के लिए प्रयुक्त होता है, और यहाँ निश्चय ही भगवान् शब्द भगवान् श्रीकृष्ण को एक महान् व्यक्तित्व के रूप में सूचित करता है, किन्तु साथ ही हमें यह जानना चाहिए कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जैसा कि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्क स्वामी, श्री चैतन्य महाप्रभु तथा भारत के वैदिक ज्ञान के अन्य अनेक प्रामाणिक आचार्यों (आध्यात्मिक गुरुओं) ने पुष्ट किया है। स्वयं भगवान् भी भगवद्गीता में अपने को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्थापित करते हैं, और ब्रह्मसंहिता तथा समस्त पुराणों में, विशेषतया श्रीमद्भागवत में, जो भागवत पुराण के नाम से विख्यात है, उन्हें उसी रूप में स्वीकार किया गया है (कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्)। अतएव हमें भगवद्गीता को वैसे ही ग्रहण करना चाहिए जैसा स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने निर्देश दिया है।
गीता के चतुर्थ अध्याय में भगवान् कहते हैं :
(1) imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam vivasvān manave prāha manur ikṣvākave ’bravīt
(2) evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣayo viduḥ sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa
(3) sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ bhakto ’si me sakhā ceti rahasyaṁ hy etad uttamam
यहाँ भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि योग की यह पद्धति, भगवद्गीता, सर्वप्रथम सूर्यदेव से कही गई थी, और सूर्यदेव ने उसे मनु को समझाया, और मनु ने उसे इक्ष्वाकु को समझाया, और इस प्रकार गुरु-परम्परा द्वारा, एक वक्ता से दूसरे वक्ता तक, यह योग-पद्धति चली आती रही। किन्तु काल के प्रवाह में वह लुप्त हो गई। फलस्वरूप भगवान् को उसे पुनः कहना पड़ा, इस बार कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से।
वे अर्जुन से कहते हैं कि वे यह परम रहस्य उसे इसलिए सुना रहे हैं क्योंकि वह उनका भक्त तथा उनका मित्र है। इसका तात्पर्य यह है कि भगवद्गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो विशेष रूप से भगवान् के भक्त के लिए है। दिव्यज्ञान के साधकों की तीन श्रेणियाँ हैं, अर्थात् ज्ञानी, योगी तथा भक्त — अर्थात् निर्विशेषवादी, ध्यानी तथा भक्त। यहाँ भगवान् अर्जुन से स्पष्ट कहते हैं कि वे उसे एक नई परम्परा (गुरु-परम्परा) का प्रथम प्राप्तकर्ता बना रहे हैं, क्योंकि पुरानी परम्परा भंग हो चुकी थी। अतः भगवान् की यह इच्छा थी कि उसी विचारधारा में, जो सूर्यदेव से अन्यों तक चली आ रही थी, एक और परम्परा स्थापित की जाए, और उनकी यह इच्छा थी कि उनका उपदेश अर्जुन द्वारा नए सिरे से वितरित किया जाए। वे चाहते थे कि अर्जुन भगवद्गीता को समझने में प्रमाण बने। अतः हम देखते हैं कि भगवद्गीता का उपदेश अर्जुन को विशेष रूप से इसलिए दिया गया क्योंकि अर्जुन भगवान् का भक्त था, कृष्ण का साक्षात् शिष्य था, तथा उनका घनिष्ठ मित्र था। अतएव भगवद्गीता को वही व्यक्ति सर्वोत्तम रूप से समझ सकता है जिसमें अर्जुन जैसे गुण हों। अर्थात् उसे भगवान् के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखने वाला भक्त होना चाहिए। ज्योंही कोई भगवान् का भक्त बनता है, त्योंही उसका भगवान् के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध भी हो जाता है। यह अत्यन्त विस्तृत विषय है, किन्तु संक्षेप में इतना कहा जा सकता है कि भक्त का पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ पाँच भिन्न प्रकारों में से किसी एक प्रकार का सम्बन्ध होता है :
- कोई निष्क्रिय अवस्था में भक्त हो सकता है;
- कोई सक्रिय अवस्था में भक्त हो सकता है;
- कोई सखा के रूप में भक्त हो सकता है;
- कोई माता-पिता के रूप में भक्त हो सकता है;
- कोई माधुर्य-प्रेमी के रूप में भक्त हो सकता है।
अर्जुन का भगवान् के साथ सखा के रूप में सम्बन्ध था। निस्सन्देह इस मैत्री तथा भौतिक जगत् में पाई जाने वाली मैत्री में महान् अन्तर है। यह दिव्य मैत्री है, जो सबको प्राप्त नहीं हो सकती। निस्सन्देह प्रत्येक जीव का भगवान् के साथ एक विशेष सम्बन्ध है, और वह सम्बन्ध भक्ति की पूर्णता से जागृत होता है। किन्तु अपने जीवन की वर्तमान स्थिति में हम न केवल परमेश्वर को भूल चुके हैं, अपितु भगवान् के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को भी भूल चुके हैं। अरबों-खरबों जीवों में से प्रत्येक जीव का भगवान् के साथ नित्य रूप से एक विशेष सम्बन्ध है। इसे स्वरूप कहते हैं। भक्ति की प्रक्रिया द्वारा मनुष्य उस स्वरूप को पुनर्जीवित कर सकता है, और उस अवस्था को स्वरूप-सिद्धि कहते हैं — अपनी स्वाभाविक स्थिति की पूर्णता। तो अर्जुन भक्त था, और वह सख्य-भाव में परमेश्वर के सम्पर्क में था।
अर्जुन ने इस भगवद्गीता को किस प्रकार स्वीकार किया, यह ध्यान देने योग्य है। उसके स्वीकार करने की रीति दशम अध्याय में दी गई है।
(12) arjuna uvāca paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān puruṣaṁ śāśvataṁ divyam ādi-devam ajaṁ vibhum
(13) āhus tvām ṛṣayaḥ sarve devarṣir nāradas tathā asito devalo vyāsaḥ svayaṁ caiva bravīṣi me
(14) sarvam etad ṛtaṁ manye yan māṁ vadasi keśava na hi te bhagavan vyaktiṁ vidur devā na dānavāḥ
“अर्जुन ने कहा : आप परब्रह्म हैं, परम हैं, परम धाम तथा परम पवित्र हैं, परम सत्य तथा नित्य दिव्य पुरुष हैं। आप आदिदेव हैं, दिव्य तथा आदि हैं, और आप अजन्मा तथा सर्वव्यापी सौन्दर्य हैं। नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे समस्त महर्षि आपके विषय में यही घोषित करते हैं, और अब स्वयं आप मुझसे यही कह रहे हैं। हे कृष्ण, आपने मुझसे जो कुछ कहा है, उस सबको मैं पूर्णतया सत्य मानकर स्वीकार करता हूँ। हे भगवान्, न तो देवता आपके व्यक्तित्व को जानते हैं और न असुर।” (भगवद्गीता १०.१२-१४)।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से भगवद्गीता सुनने के पश्चात् अर्जुन ने कृष्ण को परं ब्रह्म, अर्थात् परब्रह्म के रूप में स्वीकार किया। प्रत्येक जीव ब्रह्म है, किन्तु परम जीव, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, परब्रह्म हैं। परं धाम का अर्थ है कि वे सबके परम विश्राम अथवा आश्रय हैं; पवित्रम् का अर्थ है कि वे शुद्ध हैं, भौतिक कल्मष से अछूते हैं; पुरुषम् का अर्थ है कि वे परम भोक्ता हैं; दिव्यम्, दिव्य; आदि-देवम्, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; अजम्, अजन्मा; तथा विभुम्, महानतम, सर्वव्यापी।
अब कोई यह सोच सकता है कि चूँकि कृष्ण अर्जुन के मित्र थे, अतः अर्जुन उनसे यह सब चाटुकारिता के रूप में कह रहा था; किन्तु अर्जुन, भगवद्गीता के पाठकों के मन से इस प्रकार का सन्देह निकाल देने के लिए ही, अगले श्लोक में इन स्तुतियों को प्रमाणित करता है, जब वह कहता है कि कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में केवल वही नहीं, अपितु नारद मुनि, असित, देवल, व्यासदेव आदि प्रामाणिक आचार्य भी स्वीकार करते हैं। ये वे महान् विभूतियाँ हैं जो वैदिक ज्ञान को उसी रूप में वितरित करती हैं जिस रूप में समस्त आचार्य उसे स्वीकार करते हैं। अतएव अर्जुन कृष्ण से कहता है कि वे जो कुछ कहते हैं, उसे वह पूर्णतया पूर्ण मानकर स्वीकार करता है। सर्वम् एतद् ऋतं मन्ये : “आप जो कुछ कहते हैं, उस सबको मैं सत्य मानता हूँ।” अर्जुन यह भी कहता है कि भगवान् के व्यक्तित्व को समझना अत्यन्त कठिन है और उन्हें बड़े-बड़े देवता तक नहीं जान सकते। इसका अर्थ है कि भगवान् को वे व्यक्ति भी नहीं जान सकते जो मनुष्यों से श्रेष्ठ हैं। तो फिर कोई मनुष्य उनका भक्त बने बिना श्रीकृष्ण को कैसे समझ सकता है?
अतएव भगवद्गीता को भक्तिभाव से ग्रहण करना चाहिए। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह कृष्ण के तुल्य है, और न ही यह सोचना चाहिए कि कृष्ण कोई साधारण व्यक्ति हैं अथवा कोई अत्यन्त महान् व्यक्ति मात्र हैं। भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं — कम से कम सैद्धान्तिक रूप में, भगवद्गीता के कथनों के अनुसार अथवा अर्जुन के कथनों के अनुसार, जो भगवद्गीता को समझने का प्रयत्न कर रहा है। अतः हमें कम से कम सैद्धान्तिक रूप में श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार करना चाहिए, और उस विनम्र भाव से हम भगवद्गीता को समझ सकते हैं। जब तक मनुष्य भगवद्गीता को विनम्र भाव से नहीं पढ़ता, तब तक भगवद्गीता को समझना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि वह एक महान् रहस्य है।
आखिर भगवद्गीता है क्या? भगवद्गीता का प्रयोजन मानवजाति को भौतिक अस्तित्व के अज्ञान से उबारना है। प्रत्येक मनुष्य अनेक प्रकार से कठिनाई में पड़ा है, जैसे अर्जुन भी कुरुक्षेत्र के युद्ध में लड़ने की विवशता के कारण कठिनाई में पड़ा था। अर्जुन ने श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण की, और फलस्वरूप यह भगवद्गीता कही गई। केवल अर्जुन ही नहीं, अपितु हममें से प्रत्येक इस भौतिक अस्तित्व के कारण चिन्ताओं से भरा है। हमारा अस्तित्व ही अनस्तित्व के वातावरण में है। वस्तुतः हम अनस्तित्व से भयभीत होने के लिए नहीं बने हैं। हमारा अस्तित्व नित्य है। किन्तु किसी न किसी प्रकार हमें असत् में डाल दिया गया है। असत् का अर्थ है वह जिसका अस्तित्व नहीं है।
कष्ट भोगने वाले इतने सारे मनुष्यों में से कुछ ही ऐसे हैं जो वास्तव में अपनी स्थिति के विषय में जिज्ञासा करते हैं — कि वे क्या हैं, उन्हें इस विषम स्थिति में क्यों डाला गया है, इत्यादि। जब तक मनुष्य अपने कष्ट पर प्रश्न करने की इस स्थिति तक जागृत नहीं होता, जब तक वह यह अनुभव नहीं करता कि वह कष्ट नहीं चाहता अपितु समस्त कष्टों का समाधान चाहता है, तब तक उसे पूर्ण मनुष्य नहीं माना जा सकता। मनुष्यत्व तभी आरम्भ होता है जब इस प्रकार की जिज्ञासा मनुष्य के मन में जागृत होती है। ब्रह्मसूत्र में इस जिज्ञासा को “ब्रह्मजिज्ञासा” कहा गया है। मनुष्य की प्रत्येक क्रिया तब तक असफल ही माननी चाहिए जब तक वह परम सत्य के स्वरूप के विषय में जिज्ञासा न करे। अतएव जो लोग यह पूछने लगते हैं कि वे कष्ट क्यों भोग रहे हैं, अथवा वे कहाँ से आए हैं और मृत्यु के पश्चात् कहाँ जाएँगे, वे ही भगवद्गीता समझने के उपयुक्त विद्यार्थी हैं। निष्ठावान विद्यार्थी में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति दृढ़ आदर भी होना चाहिए। अर्जुन ऐसा ही विद्यार्थी था।
जब मनुष्य जीवन का वास्तविक प्रयोजन भूल जाता है, तब भगवान् कृष्ण विशेष रूप से उस प्रयोजन को पुनः स्थापित करने के लिए अवतरित होते हैं। तब भी, जागृत होने वाले अनेकानेक मनुष्यों में से कदाचित् कोई एक ही ऐसा होता है जो वस्तुतः अपनी स्थिति समझने के भाव में प्रवेश करता है, और उसी के लिए यह भगवद्गीता कही गई है। वस्तुतः हम सब अज्ञान रूपी व्याघ्र से पीछा किए जा रहे हैं, किन्तु भगवान् जीवों पर, विशेषतया मनुष्यों पर, अत्यन्त कृपालु हैं। इसी हेतु उन्होंने अपने मित्र अर्जुन को अपना शिष्य बनाकर भगवद्गीता कही।
भगवान् कृष्ण का पार्षद होने के कारण अर्जुन समस्त अज्ञान से ऊपर था, किन्तु अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अज्ञान में केवल इसलिए डाल दिया गया ताकि वह भगवान् कृष्ण से जीवन की समस्याओं के विषय में प्रश्न करे और भगवान् उन्हें मनुष्यों की भावी पीढ़ियों के कल्याण हेतु समझा सकें तथा जीवन की योजना निर्धारित कर सकें। तब मनुष्य तदनुसार कर्म करके मानव जीवन के लक्ष्य को सिद्ध कर सकता है।
भगवद्गीता के विषय में पाँच मूल तत्त्वों का बोध सम्मिलित है। सर्वप्रथम ईश्वर के विज्ञान की व्याख्या की गई है और तत्पश्चात् जीवों की, अर्थात् जीवात्माओं की, स्वाभाविक स्थिति की। ईश्वर है, जिसका अर्थ है नियन्ता, और जीव हैं, अर्थात् वे प्राणी जो नियन्त्रित हैं। यदि कोई जीव कहे कि वह नियन्त्रित नहीं है अपितु स्वतन्त्र है, तो वह विक्षिप्त है। जीव प्रत्येक दृष्टि से नियन्त्रित है, कम से कम अपने बद्ध जीवन में तो अवश्य। अतः भगवद्गीता में विषयवस्तु ईश्वर, अर्थात् परम नियन्ता, तथा जीवों, अर्थात् नियन्त्रित प्राणियों से सम्बन्धित है। प्रकृति (भौतिक प्रकृति), काल (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अथवा भौतिक प्रकृति के प्राकट्य की अवधि) तथा कर्म (क्रिया) की भी चर्चा की गई है। यह विश्व-प्रकटीकरण विविध क्रियाओं से भरा है। समस्त जीव भिन्न-भिन्न क्रियाओं में लगे हुए हैं। भगवद्गीता से हमें यह सीखना चाहिए कि ईश्वर क्या है, जीव क्या हैं, प्रकृति क्या है, यह विश्व-प्रकटीकरण क्या है और काल द्वारा वह किस प्रकार नियन्त्रित है, तथा जीवों की क्रियाएँ क्या हैं।
भगवद्गीता के इन पाँच मूल विषयों में से यह स्थापित होता है कि परमेश्वर, अथवा कृष्ण, अथवा ब्रह्म, अथवा परम नियन्ता, अथवा परमात्मा — आप जो भी नाम चाहें प्रयोग करें — सबसे महान् हैं। जीव गुण में परम नियन्ता के समान हैं। उदाहरणार्थ, भगवान् का ब्रह्माण्ड के कार्यों पर, भौतिक प्रकृति पर इत्यादि पर नियन्त्रण है, जैसा कि भगवद्गीता के आगे के अध्यायों में समझाया जाएगा। भौतिक प्रकृति स्वतन्त्र नहीं है। वह परमेश्वर के निर्देशन में कार्य कर रही है। जैसा कि भगवान् कृष्ण कहते हैं, “प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य कर रही है।” जब हम विश्व-प्रकृति में आश्चर्यजनक घटनाएँ होते देखते हैं, तब हमें यह जानना चाहिए कि इस विश्व-प्रकटीकरण के पीछे कोई नियन्ता है। बिना नियन्त्रित हुए कुछ भी प्रकट नहीं हो सकता। नियन्ता पर विचार न करना बचकानापन है। उदाहरणार्थ, कोई बालक यह सोच सकता है कि मोटरगाड़ी बड़ी विचित्र है जो बिना घोड़े या किसी अन्य पशु के खींचे चल सकती है, किन्तु समझदार मनुष्य मोटरगाड़ी की यान्त्रिक व्यवस्था का स्वरूप जानता है। वह सदैव जानता है कि यन्त्र के पीछे एक मनुष्य है, एक चालक। इसी प्रकार, परमेश्वर वे चालक हैं जिनके निर्देशन में सब कुछ चल रहा है। अब, जीवों को भगवान् ने अपना अंश स्वीकार किया है, जैसा कि हम आगे के अध्यायों में देखेंगे। स्वर्ण का कण भी स्वर्ण है, समुद्र की एक बूँद भी खारी है; इसी प्रकार हम जीव, परम नियन्ता ईश्वर अथवा भगवान् श्रीकृष्ण के अंश होने के कारण, परमेश्वर के समस्त गुण अत्यल्प मात्रा में रखते हैं, क्योंकि हम अणु-ईश्वर हैं, गौण ईश्वर हैं। हम प्रकृति पर नियन्त्रण करने का प्रयत्न कर रहे हैं, जैसे इस समय हम अन्तरिक्ष अथवा ग्रहों पर नियन्त्रण करने का प्रयत्न कर रहे हैं; और नियन्त्रण करने की यह प्रवृत्ति इसलिए है क्योंकि वह कृष्ण में है। किन्तु यद्यपि हममें भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की प्रवृत्ति है, तथापि हमें यह जानना चाहिए कि हम परम नियन्ता नहीं हैं। यही भगवद्गीता में समझाया गया है।
भौतिक प्रकृति क्या है? इसकी भी व्याख्या गीता में अपरा प्रकृति, अर्थात् निम्न प्रकृति के रूप में की गई है। जीव की व्याख्या परा प्रकृति के रूप में की गई है। प्रकृति सदैव नियन्त्रण में रहती है, चाहे वह अपरा हो अथवा परा। प्रकृति स्त्री है, और वह भगवान् द्वारा उसी प्रकार नियन्त्रित है जिस प्रकार पत्नी की क्रियाएँ पति द्वारा नियन्त्रित होती हैं। प्रकृति सदैव अधीन है, भगवान् द्वारा शासित है, जो शासक हैं। जीव तथा भौतिक प्रकृति — दोनों ही परमेश्वर द्वारा शासित तथा नियन्त्रित हैं। गीता के अनुसार जीव, यद्यपि परमेश्वर के अंश हैं, तथापि उन्हें प्रकृति ही मानना चाहिए। यह भगवद्गीता के सप्तम अध्याय के पञ्चम श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है : अपरेयम् इतस्त्वन्याम् — “यह प्रकृति मेरी अपरा प्रकृति है।” प्रकृतिं विद्धि मे परां जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् — और इससे परे एक और प्रकृति है : जीवभूता, अर्थात् जीव।
प्रकृति स्वयं तीन गुणों से बनी है : सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण। इन गुणों से ऊपर नित्य काल है, और प्रकृति के इन गुणों के संयोग से तथा नित्य काल के नियन्त्रण एवं क्षेत्र के अन्तर्गत जो क्रियाएँ होती हैं, उन्हें कर्म कहते हैं। ये क्रियाएँ अनादि काल से चली आ रही हैं, और हम अपनी क्रियाओं के फल भोग रहे हैं — कभी कष्ट के रूप में, कभी सुख के रूप में। उदाहरणार्थ, मान लीजिए मैं व्यापारी हूँ और मैंने बुद्धि से अत्यन्त परिश्रम किया है तथा बैंक में बड़ी राशि एकत्र कर ली है। तब मैं भोक्ता हूँ। किन्तु फिर मान लीजिए कि मैंने व्यापार में अपना सारा धन खो दिया; तब मैं दुःखभोगी हूँ। इसी प्रकार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हम अपने कार्य के फल भोगते हैं, अथवा उसके फलस्वरूप कष्ट पाते हैं। इसी को कर्म कहते हैं।
ईश्वर (परमेश्वर), जीव, प्रकृति, नित्य काल तथा कर्म (क्रिया) — इन सबकी व्याख्या भगवद्गीता में की गई है। इन पाँचों में से भगवान्, जीव, भौतिक प्रकृति तथा काल नित्य हैं। प्रकृति का प्राकट्य क्षणिक हो सकता है, किन्तु वह मिथ्या नहीं है। कुछ दार्शनिक कहते हैं कि भौतिक प्रकृति का प्राकट्य मिथ्या है, किन्तु भगवद्गीता के दर्शन के अनुसार अथवा वैष्णवों के दर्शन के अनुसार ऐसा नहीं है। जगत् के प्राकट्य को मिथ्या नहीं माना जाता; उसे वास्तविक किन्तु क्षणिक माना जाता है। उसकी उपमा आकाश में चलते हुए बादल से, अथवा वर्षा ऋतु के आगमन से दी गई है, जो अनाज को पोषित करती है। ज्योंही वर्षा ऋतु समाप्त होती है और ज्योंही बादल चला जाता है, त्योंही वे सारी फसलें जो वर्षा से पोषित हुई थीं, सूख जाती हैं। इसी प्रकार यह भौतिक प्राकट्य एक निश्चित अन्तराल पर होता है, कुछ काल ठहरता है और फिर लुप्त हो जाता है। प्रकृति के कार्य ऐसे ही हैं। किन्तु यह चक्र नित्य चलता रहता है। अतएव प्रकृति नित्य है; वह मिथ्या नहीं है। भगवान् उसे “मेरी प्रकृति” कहकर सम्बोधित करते हैं। यह भौतिक प्रकृति परमेश्वर की पृथक् की गई शक्ति है, और इसी प्रकार जीव भी परमेश्वर की शक्ति हैं, किन्तु वे पृथक् नहीं हैं। वे नित्य रूप से सम्बन्धित हैं। अतः भगवान्, जीव, भौतिक प्रकृति तथा काल — ये सब परस्पर सम्बन्धित हैं और सब नित्य हैं। किन्तु शेष वस्तु, कर्म, नित्य नहीं है। कर्म के फल निश्चय ही अत्यन्त पुराने हो सकते हैं। हम अनादि काल से अपनी क्रियाओं के फल भोग रहे हैं, किन्तु हम अपने कर्म के, अर्थात् अपनी क्रिया के, फल बदल सकते हैं, और यह परिवर्तन हमारे ज्ञान की पूर्णता पर निर्भर करता है। हम विविध क्रियाओं में लगे हुए हैं। निस्सन्देह हम नहीं जानते कि इन समस्त क्रियाओं की क्रिया-प्रतिक्रियाओं से छुटकारा पाने के लिए हमें किस प्रकार की क्रियाएँ अपनानी चाहिए, किन्तु यह भी भगवद्गीता में समझाया गया है।
ईश्वर की स्थिति परम चेतना की स्थिति है। जीव, परमेश्वर के अंश होने के कारण, चेतन भी हैं। जीव तथा भौतिक प्रकृति — दोनों की व्याख्या प्रकृति के रूप में, अर्थात् परमेश्वर की शक्ति के रूप में की गई है, किन्तु इन दोनों में से एक, जीव, चेतन है। दूसरी प्रकृति चेतन नहीं है। यही अन्तर है। अतएव जीव-प्रकृति को परा कहा जाता है, क्योंकि जीव में चेतना है जो भगवान् की चेतना के सदृश है। किन्तु भगवान् की चेतना परम है, और किसी को यह दावा नहीं करना चाहिए कि जीव भी परम चेतन है। जीव अपनी पूर्णता की किसी भी अवस्था में परम चेतन नहीं हो सकता, और यह सिद्धान्त कि वह ऐसा हो सकता है, एक भ्रामक सिद्धान्त है। चेतन वह हो सकता है, किन्तु वह पूर्ण रूप से अथवा परम रूप से चेतन नहीं है।
जीव तथा ईश्वर के बीच के भेद की व्याख्या भगवद्गीता के त्रयोदश अध्याय में की जाएगी। भगवान् क्षेत्रज्ञ हैं, अर्थात् चेतन हैं, और जीव भी चेतन है; किन्तु जीव अपने विशेष शरीर के प्रति चेतन है, जबकि भगवान् समस्त शरीरों के प्रति चेतन हैं। चूँकि वे प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करते हैं, अतः वे प्रत्येक जीव की मानसिक गतिविधियों के प्रति चेतन रहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए। यह भी समझाया गया है कि परमात्मा, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, ईश्वर के रूप में, अर्थात् नियन्ता के रूप में, प्रत्येक के हृदय में निवास करते हैं, और वे जीव को उसकी इच्छानुसार कर्म करने के लिए निर्देश देते रहते हैं। जीव भूल जाता है कि उसे क्या करना है। सर्वप्रथम वह किसी विशेष प्रकार से कर्म करने का निश्चय करता है, और फिर अपने ही कर्म की क्रिया-प्रतिक्रियाओं में उलझ जाता है। एक प्रकार का शरीर त्यागकर वह दूसरे प्रकार के शरीर में प्रवेश करता है, जैसे हम पुराने वस्त्र पहनते और उतारते हैं। आत्मा जब इस प्रकार देहान्तर करता है, तब वह अपनी विगत क्रियाओं की क्रिया-प्रतिक्रियाएँ भोगता है। ये क्रियाएँ तब बदली जा सकती हैं जब जीव सतोगुण में हो, विवेक में हो, और यह समझे कि उसे किस प्रकार की क्रियाएँ अपनानी चाहिए। यदि वह ऐसा करता है, तो उसकी विगत क्रियाओं की समस्त क्रिया-प्रतिक्रियाएँ बदली जा सकती हैं। फलस्वरूप कर्म नित्य नहीं है। अतएव हमने कहा कि इन पाँच वस्तुओं (ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल तथा कर्म) में से चार नित्य हैं, जबकि कर्म नित्य नहीं है।
परम चेतन ईश्वर जीव के सदृश इस प्रकार है : भगवान् की चेतना तथा जीव की चेतना — दोनों ही दिव्य हैं। ऐसा नहीं है कि चेतना पदार्थ के संयोग से उत्पन्न होती है। यह भ्रान्त धारणा है। यह सिद्धान्त कि भौतिक संयोग की कुछ विशेष परिस्थितियों में चेतना विकसित होती है, भगवद्गीता में स्वीकार नहीं किया गया। भौतिक परिस्थितियों के आवरण से चेतना विकृत रूप में प्रतिबिम्बित हो सकती है, जैसे रंगीन काँच से परावर्तित प्रकाश किसी विशेष रंग का प्रतीत हो सकता है; किन्तु भगवान् की चेतना भौतिक रूप से प्रभावित नहीं होती। भगवान् कृष्ण कहते हैं : मयाध्यक्षेण प्रकृतिः। जब वे भौतिक ब्रह्माण्ड में अवतरित होते हैं, तब उनकी चेतना भौतिक रूप से प्रभावित नहीं होती। यदि वे इस प्रकार प्रभावित होते, तो वे दिव्य विषयों पर वैसे बोलने के अयोग्य होते जैसे वे भगवद्गीता में बोलते हैं। भौतिक रूप से दूषित चेतना से मुक्त हुए बिना कोई दिव्य जगत् के विषय में कुछ नहीं कह सकता। अतः भगवान् भौतिक रूप से दूषित नहीं हैं। किन्तु इस समय हमारी चेतना भौतिक रूप से दूषित है। भगवद्गीता सिखाती है कि हमें इस भौतिक रूप से दूषित चेतना को शुद्ध करना है। शुद्ध चेतना में हमारे कर्म ईश्वर की इच्छा के अनुरूप हो जाएँगे, और वही हमें सुखी बनाएगा। ऐसा नहीं है कि हमें समस्त क्रियाएँ बन्द कर देनी हैं। अपितु हमारी क्रियाओं को शुद्ध करना है, और शुद्ध की गई क्रियाओं को भक्ति कहते हैं। भक्ति में की गई क्रियाएँ साधारण क्रियाओं जैसी प्रतीत होती हैं, किन्तु वे दूषित नहीं होतीं। अज्ञानी व्यक्ति यह देख सकता है कि भक्त साधारण मनुष्य की भाँति कर्म कर रहा है अथवा काम कर रहा है, किन्तु ऐसा अल्पज्ञ व्यक्ति यह नहीं जानता कि भक्त की अथवा भगवान् की क्रियाएँ अशुद्ध चेतना अथवा पदार्थ से दूषित नहीं होतीं। वे प्रकृति के तीनों गुणों से परे, दिव्य हैं। किन्तु हमें यह जानना चाहिए कि इस समय हमारी चेतना दूषित है।
जब हम भौतिक रूप से दूषित होते हैं, तब हमें बद्ध कहा जाता है। मिथ्या चेतना इस धारणा के अन्तर्गत प्रकट होती है कि “मैं भौतिक प्रकृति की उपज हूँ।” इसे मिथ्या अहंकार कहते हैं। जो देहात्म-बुद्धि के विचार में डूबा है, वह अपनी स्थिति नहीं समझ सकता। भगवद्गीता जीवन की देहात्म-बुद्धि से मुक्त करने के लिए कही गई थी, और अर्जुन ने भगवान् से यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्वयं को इस स्थिति में रखा। मनुष्य को जीवन की देहात्म-बुद्धि से मुक्त होना ही चाहिए; दिव्यज्ञान के साधक के लिए यही प्रारम्भिक कार्य है। जो मुक्त होना चाहता है, जो मोक्ष चाहता है, उसे सर्वप्रथम यह सीखना चाहिए कि वह यह भौतिक शरीर नहीं है। मुक्ति का अर्थ है भौतिक चेतना से छुटकारा। श्रीमद्भागवत में भी मुक्ति की परिभाषा दी गई है : मुक्ति का अर्थ है इस भौतिक जगत् की दूषित चेतना से छुटकारा तथा शुद्ध चेतना में स्थिति। भगवद्गीता के समस्त उपदेश इसी शुद्ध चेतना को जागृत करने के लिए हैं, और इसीलिए हम गीता के उपदेशों की अन्तिम अवस्था में पाते हैं कि कृष्ण अर्जुन से पूछ रहे हैं कि क्या वह अब शुद्ध चेतना में है। शुद्ध चेतना का अर्थ है भगवान् के उपदेशों के अनुसार कर्म करना। शुद्ध चेतना का सम्पूर्ण सार यही है। चेतना तो पहले से ही विद्यमान है, क्योंकि हम भगवान् के अंश हैं; किन्तु हममें निम्न गुणों से प्रभावित होने की प्रवृत्ति है। किन्तु भगवान्, परम होने के कारण, कभी प्रभावित नहीं होते। परमेश्वर तथा बद्धजीवों में यही अन्तर है।
यह चेतना क्या है? यह चेतना है “मैं हूँ।” तो फिर मैं क्या हूँ? दूषित चेतना में “मैं हूँ” का अर्थ है “जो कुछ मैं देखता हूँ, उस सबका मैं स्वामी हूँ। मैं भोक्ता हूँ।” संसार इसीलिए चलता है क्योंकि प्रत्येक जीव यह सोचता है कि वह भौतिक जगत् का स्वामी तथा स्रष्टा है। भौतिक चेतना के दो मानसिक विभाग हैं। एक यह कि मैं स्रष्टा हूँ, और दूसरा यह कि मैं भोक्ता हूँ। किन्तु वास्तव में परमेश्वर ही स्रष्टा तथा भोक्ता दोनों हैं, और जीव, परमेश्वर का अंश होने के कारण, न स्रष्टा है न भोक्ता, अपितु सहयोगी है। वह सृजित है और भोग्य है। उदाहरणार्थ, यन्त्र का एक भाग सम्पूर्ण यन्त्र के साथ सहयोग करता है; शरीर का एक अंग सम्पूर्ण शरीर के साथ सहयोग करता है। हाथ, पैर, नेत्र, टाँगें इत्यादि सब शरीर के अंग हैं, किन्तु वे वास्तव में भोक्ता नहीं हैं। उदर भोक्ता है। टाँगें चलती हैं, हाथ भोजन जुटाते हैं, दाँत चबाते हैं, और शरीर के समस्त अंग उदर को तृप्त करने में लगे रहते हैं, क्योंकि उदर ही वह प्रमुख तत्त्व है जो शरीर की व्यवस्था को पोषित करता है। अतएव सब कुछ उदर को दिया जाता है। मनुष्य वृक्ष की जड़ में जल देकर वृक्ष को पोषित करता है, और उदर को भोजन देकर शरीर को पोषित करता है; क्योंकि यदि शरीर को स्वस्थ रखना है, तो शरीर के अंगों को उदर के पोषण हेतु सहयोग करना ही होगा। इसी प्रकार परमेश्वर भोक्ता तथा स्रष्टा हैं, और हम, अधीन जीवों के रूप में, उन्हें तृप्त करने हेतु सहयोग करने के लिए हैं। यह सहयोग वास्तव में हमारी ही सहायता करेगा, जैसे उदर द्वारा ग्रहण किया गया भोजन शरीर के अन्य समस्त अंगों की सहायता करता है। यदि हाथ की अँगुलियाँ यह सोचें कि उन्हें भोजन उदर को देने के बजाय स्वयं ले लेना चाहिए, तो वे निराश ही होंगी। सृष्टि तथा भोग की केन्द्रीय विभूति परमेश्वर हैं, और जीव सहयोगी हैं। सहयोग द्वारा ही वे भोग करते हैं। यह सम्बन्ध स्वामी तथा सेवक के सम्बन्ध जैसा भी है। यदि स्वामी पूर्ण रूप से तृप्त है, तो सेवक तृप्त है। इसी प्रकार परमेश्वर को तृप्त करना चाहिए, यद्यपि स्रष्टा बनने की प्रवृत्ति तथा भौतिक जगत् को भोगने की प्रवृत्ति जीवों में भी है, क्योंकि ये प्रवृत्तियाँ उन परमेश्वर में हैं जिन्होंने इस प्रकट विश्व की रचना की है।
अतएव हम इस भगवद्गीता में पाएँगे कि पूर्ण समग्र में परम नियन्ता, नियन्त्रित जीव, विश्व-प्रकटीकरण, नित्य काल तथा कर्म — ये सब सम्मिलित हैं, और इन सबकी व्याख्या इस ग्रन्थ में की गई है। ये सब मिलकर पूर्ण समग्र बनाते हैं, और उस पूर्ण समग्र को परम सत्य कहा जाता है। पूर्ण समग्र तथा पूर्ण परम सत्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं। समस्त प्राकट्य उनकी विभिन्न शक्तियों के कारण हैं। वे ही पूर्ण समग्र हैं।
गीता में यह भी समझाया गया है कि निराकार ब्रह्म भी उस पूर्ण के अधीन है। ब्रह्मसूत्र में ब्रह्म की अधिक स्पष्ट व्याख्या सूर्य की किरणों के समान की गई है। निराकार ब्रह्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की देदीप्यमान किरणें हैं। निराकार ब्रह्म परम समग्र की अपूर्ण अनुभूति है, और द्वादश अध्याय में वर्णित परमात्मा की धारणा भी वैसी ही है। वहाँ यह देखा जाएगा कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, पुरुषोत्तम, निराकार ब्रह्म तथा परमात्मा की आंशिक अनुभूति — दोनों से ऊपर हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सच्चिदानन्द-विग्रह कहा जाता है। ब्रह्मसंहिता का आरम्भ इस प्रकार होता है : ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्। “कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं। वे आदि कारण हैं, और वे नित्य सत्, ज्ञान तथा आनन्द के साक्षात् स्वरूप हैं।” निराकार ब्रह्म की अनुभूति उनके सत् (अस्तित्व) पक्ष की अनुभूति है। परमात्मा की अनुभूति चित् (नित्य ज्ञान) पक्ष की अनुभूति है। किन्तु भगवान् कृष्ण की अनुभूति समस्त दिव्य पक्षों की अनुभूति है : सत्, चित् तथा आनन्द (अस्तित्व, ज्ञान, आनन्द) — पूर्ण विग्रह (स्वरूप) में।
अल्पबुद्धि लोग परम सत्य को निराकार मानते हैं, किन्तु वे दिव्य पुरुष हैं, और समस्त वैदिक साहित्य में इसकी पुष्टि की गई है। नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्। जैसे हम सब पृथक्-पृथक् जीव हैं और हमारा अपना व्यक्तित्व है, वैसे ही परम सत्य भी अन्ततः एक व्यक्ति हैं, और भगवान् की अनुभूति समस्त दिव्य पक्षों की अनुभूति है। पूर्ण समग्र निराकार नहीं है। यदि वे निराकार हों, अथवा यदि वे किसी अन्य वस्तु से न्यून हों, तो वे पूर्ण समग्र नहीं हो सकते। पूर्ण समग्र में वह सब कुछ होना चाहिए जो हमारे अनुभव के भीतर है और जो हमारे अनुभव से परे है; अन्यथा वह पूर्ण नहीं हो सकता। पूर्ण समग्र, भगवान्, अपार शक्तियों से युक्त हैं।
कृष्ण किस प्रकार विभिन्न शक्तियों में कार्य कर रहे हैं, यह भी भगवद्गीता में समझाया गया है। यह दृश्य जगत् अथवा भौतिक जगत् जिसमें हमें रखा गया है, वह भी अपने आप में पूर्ण है, क्योंकि सांख्य दर्शन के अनुसार जिन चौबीस तत्त्वों का यह भौतिक ब्रह्माण्ड एक क्षणिक प्राकट्य है, वे इस ब्रह्माण्ड के पालन तथा निर्वाह के लिए आवश्यक समस्त साधन उत्पन्न करने हेतु पूर्ण रूप से व्यवस्थित हैं। न कुछ अतिरिक्त है, न किसी वस्तु की आवश्यकता है। इस प्राकट्य का अपना काल परम समग्र की शक्ति द्वारा नियत है, और जब उसका काल पूरा हो जाएगा, तब ये क्षणिक प्राकट्य उस पूर्ण की पूर्ण व्यवस्था द्वारा विनष्ट कर दिए जाएँगे। छोटी पूर्ण इकाइयों को, अर्थात् जीवों को, उस पूर्ण की अनुभूति करने की पूर्ण सुविधा उपलब्ध है, और सब प्रकार की अपूर्णताएँ पूर्ण के विषय में अपूर्ण ज्ञान के कारण ही अनुभव की जाती हैं। अतः भगवद्गीता में वैदिक प्रज्ञा का पूर्ण ज्ञान निहित है।
समस्त वैदिक ज्ञान अचूक है, और हिन्दू वैदिक ज्ञान को पूर्ण तथा अचूक मानते हैं। उदाहरणार्थ, गोबर पशु का मल है, और स्मृति अथवा वैदिक विधान के अनुसार यदि कोई पशु के मल का स्पर्श करे तो उसे शुद्ध होने के लिए स्नान करना पड़ता है। किन्तु वैदिक शास्त्रों में गोबर को शुद्धिकारक माना गया है। कोई इसे विरोधाभास मान सकता है, किन्तु इसे इसलिए स्वीकार किया जाता है क्योंकि यह वैदिक विधान है; और निश्चय ही इसे स्वीकार करने से मनुष्य कोई भूल नहीं करेगा। बाद में आधुनिक विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया कि गोबर में समस्त रोगाणुनाशक गुण विद्यमान हैं। अतः वैदिक ज्ञान पूर्ण है, क्योंकि वह समस्त सन्देहों तथा भूलों से परे है, और भगवद्गीता समस्त वैदिक ज्ञान का सार है।
वैदिक ज्ञान अनुसन्धान का विषय नहीं है। हमारा अनुसन्धान-कार्य अपूर्ण है, क्योंकि हम अपूर्ण इन्द्रियों से वस्तुओं का अनुसन्धान कर रहे हैं। हमें वह पूर्ण ज्ञान स्वीकार करना होगा जो, जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, गुरु-परम्परा द्वारा उतरकर आता है। हमें ज्ञान उचित स्रोत से, गुरु-परम्परा में, प्राप्त करना होगा — जिसका आरम्भ परम गुरु, स्वयं भगवान् से होता है और जो आचार्यों की परम्परा द्वारा नीचे तक पहुँचाया गया है। अर्जुन, वह शिष्य जिसने भगवान् श्रीकृष्ण से शिक्षा ग्रहण की, उनका खण्डन किए बिना उनकी प्रत्येक बात स्वीकार करता है। किसी को यह अनुमति नहीं है कि वह भगवद्गीता का एक अंश स्वीकार करे और दूसरा नहीं। नहीं। हमें भगवद्गीता को बिना मनगढ़न्त व्याख्या के, बिना काट-छाँट के, तथा इस विषय में अपनी मनमानी भागीदारी के बिना स्वीकार करना चाहिए। गीता को वैदिक ज्ञान की सर्वाधिक पूर्ण प्रस्तुति के रूप में ग्रहण करना चाहिए। वैदिक ज्ञान दिव्य स्रोतों से प्राप्त होता है, और प्रथम शब्द स्वयं भगवान् ने कहे थे। भगवान् द्वारा कहे गए शब्द उन शब्दों से भिन्न हैं जो सांसारिक जगत् का कोई व्यक्ति कहता है, जो चार दोषों से ग्रस्त है। सांसारिक व्यक्ति १) निश्चय ही भूलें करता है, २) अनिवार्य रूप से मोहग्रस्त रहता है, ३) दूसरों को ठगने की प्रवृत्ति रखता है, तथा ४) अपूर्ण इन्द्रियों से सीमित है। इन चार अपूर्णताओं के साथ कोई भी सर्वव्यापी ज्ञान की पूर्ण जानकारी नहीं दे सकता।
वैदिक ज्ञान ऐसे दोषयुक्त जीवों द्वारा प्रदान नहीं किया जाता। वह सर्वप्रथम सृजित जीव ब्रह्मा के हृदय में प्रदान किया गया था, और ब्रह्मा ने अपनी ओर से यह ज्ञान अपने पुत्रों तथा शिष्यों में उसी रूप में वितरित किया जिस रूप में उन्होंने उसे मूलतः भगवान् से प्राप्त किया था। भगवान् पूर्णम् हैं, अर्थात् सर्वथा पूर्ण हैं, और उनके भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन होने की कोई सम्भावना नहीं है। अतएव मनुष्य को इतना बुद्धिमान् होना चाहिए कि वह जान सके कि ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु के एकमात्र स्वामी भगवान् हैं और वे ही आदि स्रष्टा हैं, ब्रह्मा के स्रष्टा हैं। एकादश अध्याय में भगवान् को प्रपितामह कहकर सम्बोधित किया गया है, क्योंकि ब्रह्मा को पितामह कहा जाता है और वे उस पितामह के स्रष्टा हैं। अतः किसी को भी किसी वस्तु का स्वामी होने का दावा नहीं करना चाहिए; मनुष्य को केवल वही वस्तुएँ स्वीकार करनी चाहिए जो भगवान् ने उसके निर्वाह हेतु उसके भाग के रूप में नियत की हैं।
भगवान् द्वारा हमारे लिए नियत की गई वस्तुओं का हमें किस प्रकार उपयोग करना चाहिए, इसके अनेक उदाहरण दिए गए हैं। यह भी भगवद्गीता में समझाया गया है। आरम्भ में अर्जुन ने निश्चय किया कि उसे कुरुक्षेत्र के युद्ध में नहीं लड़ना चाहिए। यह उसका अपना निर्णय था। अर्जुन ने भगवान् से कहा कि अपने ही स्वजनों को मारकर राज्य भोगना उसके लिए सम्भव नहीं है। यह निर्णय शरीर पर आधारित था, क्योंकि वह सोच रहा था कि शरीर ही वह स्वयं है और उसके शारीरिक सम्बन्धी अथवा विस्तार ही उसके भाई, भतीजे, साले, पितामह इत्यादि हैं। वह अपनी शारीरिक माँगों को तृप्त करने के लिए इस प्रकार सोच रहा था। भगवान् ने भगवद्गीता इसी दृष्टिकोण को बदलने के लिए कही, और अन्त में अर्जुन भगवान् के निर्देशन में युद्ध करने का निश्चय करता है, जब वह कहता है : करिष्ये वचनं तव। “मैं आपके वचन के अनुसार कार्य करूँगा।”
इस संसार में मनुष्य सूअरों की भाँति खटने के लिए नहीं बना है। उसे इतना बुद्धिमान् होना चाहिए कि वह मानव जीवन का महत्त्व समझ सके और साधारण पशु की भाँति आचरण करने से इनकार कर सके। मनुष्य को अपने जीवन का लक्ष्य जानना चाहिए, और यह निर्देश समस्त वैदिक साहित्य में दिया गया है, तथा उसका सार भगवद्गीता में दिया गया है। वैदिक साहित्य मनुष्यों के लिए है, पशुओं के लिए नहीं। पशु अन्य जीवित पशुओं को मार सकते हैं, और उनकी ओर से पाप का कोई प्रश्न नहीं उठता; किन्तु यदि मनुष्य अपनी अनियन्त्रित रुचि की तृप्ति के लिए किसी पशु को मारता है, तो उसे प्रकृति के नियमों को तोड़ने का उत्तरदायी होना पड़ेगा। भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार तीन प्रकार की क्रियाएँ होती हैं : सतोगुण की, रजोगुण की तथा तमोगुण की क्रियाएँ। इसी प्रकार तीन प्रकार के खाद्य पदार्थ भी हैं : सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक। यह सब स्पष्ट रूप से वर्णित है, और यदि हम भगवद्गीता के उपदेशों का ठीक-ठीक उपयोग करें, तो हमारा सम्पूर्ण जीवन शुद्ध हो जाएगा, और अन्ततः हम उस गन्तव्य तक पहुँच सकेंगे जो इस भौतिक आकाश से परे है।
उस गन्तव्य को सनातन आकाश, अर्थात् नित्य आध्यात्मिक आकाश कहते हैं। इस भौतिक जगत् में हम पाते हैं कि प्रत्येक वस्तु क्षणिक है। वह उत्पन्न होती है, कुछ काल ठहरती है, कुछ उपोत्पाद उत्पन्न करती है, क्षीण होती है और फिर लुप्त हो जाती है। यही भौतिक जगत् का नियम है, चाहे हम उदाहरण के लिए इस शरीर को लें, अथवा किसी फल को, अथवा किसी भी वस्तु को। किन्तु इस क्षणिक जगत् से परे एक और जगत् है, जिसकी जानकारी हमें प्राप्त है। वह जगत् एक अन्य प्रकृति से बना है, जो सनातन है, नित्य है। जीव को भी सनातन, अर्थात् नित्य कहा गया है, और एकादश अध्याय में भगवान् को भी सनातन कहा गया है। भगवान् के साथ हमारा घनिष्ठ सम्बन्ध है, और चूँकि हम सब गुण में एक हैं — सनातन-धाम अथवा आकाश, सनातन परम पुरुष तथा सनातन जीव — अतः भगवद्गीता का सम्पूर्ण प्रयोजन हमारे सनातन व्यवसाय को, अर्थात् सनातन-धर्म को पुनर्जीवित करना है, जो जीव का नित्य व्यवसाय है। हम अस्थायी रूप से विभिन्न क्रियाओं में लगे हुए हैं, किन्तु ये समस्त क्रियाएँ तब शुद्ध की जा सकती हैं जब हम इन समस्त क्षणिक क्रियाओं को त्यागकर उन क्रियाओं को अपना लें जो परमेश्वर द्वारा विहित हैं। उसी को हमारा शुद्ध जीवन कहते हैं।
परमेश्वर तथा उनका दिव्य धाम — दोनों सनातन हैं, और जीव भी सनातन हैं; और सनातन धाम में परमेश्वर तथा जीवों का सम्मिलित संग ही मानव जीवन की पूर्णता है। भगवान् जीवों पर अत्यन्त कृपालु हैं, क्योंकि वे उनके पुत्र हैं। भगवान् कृष्ण भगवद्गीता में घोषित करते हैं : सर्वयोनिषु… अहं बीजप्रदः पिता। “मैं सबका पिता हूँ।” निस्सन्देह अपने-अपने कर्मों के अनुसार सब प्रकार के जीव हैं, किन्तु यहाँ भगवान् दावा करते हैं कि वे उन सबके पिता हैं। अतएव भगवान् इन समस्त पतित बद्धजीवों का उद्धार करने के लिए अवतरित होते हैं, ताकि उन्हें सनातन नित्य आकाश में वापस बुला सकें और सनातन जीव भगवान् के नित्य संग में अपनी नित्य सनातन स्थिति पुनः प्राप्त कर सकें। भगवान् स्वयं विभिन्न अवतारों में आते हैं, अथवा वे अपने अन्तरंग सेवकों को पुत्रों के रूप में, अथवा अपने पार्षदों को, अथवा आचार्यों को बद्धजीवों का उद्धार करने के लिए भेजते हैं।
अतएव सनातन-धर्म किसी साम्प्रदायिक धार्मिक पद्धति की ओर संकेत नहीं करता। वह नित्य परमेश्वर के साथ सम्बन्ध में नित्य जीवों का नित्य कार्य है। सनातन-धर्म, जैसा पहले कहा गया, जीव के नित्य व्यवसाय की ओर संकेत करता है। रामानुजाचार्य ने सनातन शब्द की व्याख्या “उस वस्तु के रूप में की है जिसका न आदि है न अन्त”; अतः जब हम सनातन-धर्म की बात करते हैं, तब हमें श्री रामानुजाचार्य के प्रमाण पर यह मान लेना चाहिए कि उसका न आदि है न अन्त।
अंग्रेज़ी शब्द “रिलिजन” सनातन-धर्म से कुछ भिन्न है। “रिलिजन” श्रद्धा का भाव प्रकट करता है, और श्रद्धा बदल सकती है। किसी की किसी विशेष पद्धति में श्रद्धा हो सकती है, और वह इस श्रद्धा को बदलकर दूसरी अपना सकता है; किन्तु सनातन-धर्म उस कार्य की ओर संकेत करता है जो बदला नहीं जा सकता। उदाहरणार्थ, जल से तरलता नहीं ली जा सकती, और न अग्नि से उष्णता ली जा सकती है। इसी प्रकार नित्य जीव का नित्य कार्य जीव से नहीं लिया जा सकता। सनातन-धर्म जीव के साथ नित्य रूप से अभिन्न है। अतएव जब हम सनातन-धर्म की बात करते हैं, तब हमें श्री रामानुजाचार्य के प्रमाण पर यह मान लेना चाहिए कि उसका न आदि है न अन्त। जिसका न अन्त है न आदि, वह साम्प्रदायिक नहीं हो सकता, क्योंकि उसे किन्हीं सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता। फिर भी किसी साम्प्रदायिक श्रद्धा के अनुयायी भ्रमवश यह मानेंगे कि सनातन-धर्म भी साम्प्रदायिक है; किन्तु यदि हम इस विषय में गहराई से जाएँ और आधुनिक विज्ञान के प्रकाश में इस पर विचार करें, तो हमारे लिए यह देखना सम्भव है कि सनातन-धर्म संसार के समस्त लोगों का — नहीं, ब्रह्माण्ड के समस्त जीवों का — कार्य है।
असनातन धार्मिक श्रद्धा का मानव इतिहास के वृत्तान्त में कोई आरम्भ हो सकता है, किन्तु सनातन-धर्म के इतिहास का कोई आरम्भ नहीं है, क्योंकि वह नित्य रूप से जीवों के साथ रहता है। जहाँ तक जीवों का प्रश्न है, प्रामाणिक शास्त्र कहते हैं कि जीव का न जन्म है न मृत्यु। गीता में कहा गया है कि जीव न कभी जन्मता है और न कभी मरता है। वह नित्य तथा अविनाशी है, और अपने क्षणिक भौतिक शरीर के विनाश के पश्चात् भी वह जीवित रहता है। सनातन-धर्म की धारणा के सन्दर्भ में हमें धर्म की धारणा को शब्द के संस्कृत मूल अर्थ से समझने का प्रयत्न करना चाहिए। धर्म उस वस्तु की ओर संकेत करता है जो किसी विशेष पदार्थ के साथ निरन्तर विद्यमान रहती है। हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि अग्नि के साथ उष्णता तथा प्रकाश रहते हैं; उष्णता तथा प्रकाश के बिना अग्नि शब्द का कोई अर्थ नहीं है। इसी प्रकार हमें जीव के उस आवश्यक अंश को खोजना चाहिए, उस अंश को जो उसका निरन्तर संगी है। वह निरन्तर संगी ही उसका नित्य गुण है, और वही नित्य गुण उसका नित्य धर्म है।
जब सनातन गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से प्रत्येक जीव के स्वरूप के विषय में पूछा, तब भगवान् ने उत्तर दिया कि जीव का स्वरूप, अर्थात् स्वाभाविक स्थिति, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करना है। यदि हम भगवान् चैतन्य के इस कथन का विश्लेषण करें, तो हम सरलता से देख सकते हैं कि प्रत्येक जीव निरन्तर किसी अन्य जीव की सेवा करने में लगा है। जीव दो रूपों में अन्य जीवों की सेवा करता है। ऐसा करने से जीव जीवन का भोग करता है। निम्न पशु मनुष्यों की सेवा करते हैं, जैसे सेवक अपने स्वामी की सेवा करते हैं। “अ” अपने स्वामी “ब” की सेवा करता है, “ब” अपने स्वामी “स” की सेवा करता है, “स” अपने स्वामी “द” की सेवा करता है, इत्यादि। इन परिस्थितियों में हम देख सकते हैं कि एक मित्र दूसरे मित्र की सेवा करता है, माता पुत्र की सेवा करती है, पत्नी पति की सेवा करती है, पति पत्नी की सेवा करता है, इत्यादि। यदि हम इसी भाव से खोजते जाएँ, तो देखा जाएगा कि जीवों के समाज में सेवा के कार्य का कोई अपवाद नहीं है। राजनीतिज्ञ जनता के समक्ष अपना घोषणापत्र प्रस्तुत करता है ताकि उन्हें अपनी सेवा-क्षमता का विश्वास दिला सके। अतः मतदाता राजनीतिज्ञ को अपने बहुमूल्य मत देते हैं, यह सोचकर कि वह समाज की बहुमूल्य सेवा करेगा। दुकानदार ग्राहक की सेवा करता है, और शिल्पी पूँजीपति की सेवा करता है। पूँजीपति परिवार की सेवा करता है, और परिवार नित्य जीव की नित्य क्षमता के अनुसार राज्य की सेवा करता है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि कोई भी जीव अन्य जीवों की सेवा करने से मुक्त नहीं है, और अतएव हम निश्चयपूर्वक यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सेवा जीव की निरन्तर संगिनी है और सेवा करना ही जीव का नित्य धर्म है।
फिर भी मनुष्य किसी विशेष काल तथा परिस्थिति के सन्दर्भ में किसी विशेष प्रकार की श्रद्धा से सम्बद्ध होने का दावा करता है और इस प्रकार स्वयं को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध अथवा किसी अन्य सम्प्रदाय का कहता है। ऐसी उपाधियाँ सनातन-धर्म नहीं हैं। कोई हिन्दू अपनी श्रद्धा बदलकर मुसलमान बन सकता है, अथवा कोई मुसलमान अपनी श्रद्धा बदलकर हिन्दू बन सकता है, अथवा कोई ईसाई अपनी श्रद्धा बदल सकता है, इत्यादि। किन्तु समस्त परिस्थितियों में धार्मिक श्रद्धा का परिवर्तन दूसरों की सेवा करने के नित्य व्यवसाय को प्रभावित नहीं करता। हिन्दू, मुसलमान अथवा ईसाई — समस्त परिस्थितियों में किसी न किसी का सेवक है। अतः किसी विशेष सम्प्रदाय को मानना अपने सनातन-धर्म को मानना नहीं है। सेवा करना ही सनातन-धर्म है।
वस्तुतः हम परमेश्वर से सेवा के सम्बन्ध में जुड़े हैं। परमेश्वर परम भोक्ता हैं, और हम जीव उनके सेवक हैं। हम उनके भोग के लिए रचे गए हैं, और यदि हम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ उस नित्य भोग में भाग लें, तो हम सुखी हो जाते हैं। अन्यथा हम सुखी नहीं हो सकते। स्वतन्त्र रूप से सुखी होना सम्भव नहीं है, जैसे शरीर का कोई भी अंग उदर के साथ सहयोग किए बिना सुखी नहीं हो सकता। जीव के लिए परमेश्वर की दिव्य प्रेममयी सेवा किए बिना सुखी होना सम्भव नहीं है।
भगवद्गीता में विभिन्न देवताओं की पूजा अथवा उनकी सेवा का अनुमोदन नहीं किया गया। सप्तम अध्याय के बीसवें श्लोक में कहा गया है :
kāmais tais tair hṛt-ajñānāḥ prapadyante ’nya-devatāḥ taṁ taṁ niyamam āsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā
“जिनके मन भौतिक इच्छाओं से विकृत हो चुके हैं, वे देवताओं की शरण ग्रहण करते हैं और अपने-अपने स्वभाव के अनुसार पूजा के विशेष विधि-विधानों का पालन करते हैं।” (भगवद्गीता ७.२०) यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो लोग कामना से प्रेरित हैं, वे देवताओं की पूजा करते हैं, न कि परमेश्वर कृष्ण की। जब हम कृष्ण नाम का उल्लेख करते हैं, तब हम किसी साम्प्रदायिक नाम की ओर संकेत नहीं करते। कृष्ण का अर्थ है परम आनन्द, और इसकी पुष्टि की गई है कि परमेश्वर समस्त आनन्द के आगार अथवा भण्डार हैं। हम सब आनन्द के लिए लालायित हैं। आनन्दमयोऽभ्यासात्। (वेदान्तसूत्र १.१.१२) जीव, भगवान् की भाँति, चेतना से परिपूर्ण हैं, और वे सुख के पीछे हैं। भगवान् नित्य सुखी हैं, और यदि जीव भगवान् का संग करें, उनके साथ सहयोग करें तथा उनकी संगति में भाग लें, तो वे भी सुखी हो जाते हैं।
भगवान् इस मर्त्यलोक में वृन्दावन की अपनी लीलाएँ दिखाने के लिए अवतरित होते हैं, जो आनन्द से परिपूर्ण हैं। जब भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावन में थे, तब अपने ग्वालबाल सखाओं के साथ, अपनी सखियों के साथ, वृन्दावनवासियों के साथ तथा गौओं के साथ उनकी समस्त क्रीड़ाएँ आनन्द से परिपूर्ण थीं। वृन्दावन की समस्त जनता कृष्ण के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानती थी। किन्तु भगवान् कृष्ण ने अपने पिता नन्द महाराज को भी इन्द्र देवता की पूजा करने से रोका, क्योंकि वे यह तथ्य स्थापित करना चाहते थे कि लोगों को किसी देवता की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें केवल परमेश्वर की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य भगवान् के धाम को लौटना है।
भगवान् श्रीकृष्ण के धाम का वर्णन भगवद्गीता के पञ्चदश अध्याय के छठे श्लोक में किया गया है :
na tad bhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ yad gatvā na nivartante tad dhāma paramaṁ mama
“मेरा वह धाम न सूर्य से प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा से, न विद्युत् से। और जो कोई वहाँ पहुँच जाता है, वह इस भौतिक जगत् में कभी नहीं लौटता।” (भगवद्गीता १५.६)
यह श्लोक उस नित्य आकाश का वर्णन देता है। निस्सन्देह आकाश की हमारी धारणा भौतिक है, और हम उसे सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों इत्यादि के सम्बन्ध में सोचते हैं; किन्तु इस श्लोक में भगवान् कहते हैं कि नित्य आकाश में न सूर्य की आवश्यकता है, न चन्द्रमा की, न किसी प्रकार की अग्नि की, क्योंकि आध्यात्मिक आकाश पहले से ही ब्रह्मज्योति से, अर्थात् परमेश्वर से निकलने वाली किरणों से प्रकाशित है। हम कठिनाई से अन्य ग्रहों तक पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु परमेश्वर के धाम को समझना कठिन नहीं है। इस धाम को गोलोक कहते हैं। ब्रह्मसंहिता में उसका सुन्दर वर्णन है : गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतः। भगवान् अपने धाम गोलोक में नित्य निवास करते हैं, फिर भी उन तक इस जगत् से पहुँचा जा सकता है; और इसी हेतु भगवान् अपना वास्तविक रूप, सच्चिदानन्द-विग्रह, प्रकट करने आते हैं। जब वे यह रूप प्रकट करते हैं, तब हमें यह कल्पना करने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि वे कैसे दिखते हैं। ऐसी काल्पनिक अटकलों को रोकने के लिए ही वे अवतरित होते हैं और अपने को यथारूप, श्यामसुन्दर के रूप में, प्रकट करते हैं। दुर्भाग्यवश अल्पबुद्धि लोग उनका उपहास करते हैं, क्योंकि वे हमारे ही जैसे एक होकर आते हैं और मनुष्य की भाँति हमारे साथ क्रीड़ा करते हैं। किन्तु इस कारण हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि भगवान् हममें से ही एक हैं। यह उनकी शक्ति ही है जिससे वे हमारे समक्ष अपने वास्तविक रूप में उपस्थित होते हैं और अपनी लीलाएँ प्रदर्शित करते हैं, जो उनके धाम में होने वाली लीलाओं के प्रतिरूप हैं।
आध्यात्मिक आकाश की देदीप्यमान किरणों में असंख्य लोक तैर रहे हैं। ब्रह्मज्योति परम धाम कृष्णलोक से निकलती है, और उन किरणों में आनन्दमय-चिन्मय लोक तैरते हैं, जो भौतिक नहीं हैं। भगवान् कहते हैं : न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। जो उस आध्यात्मिक आकाश तक पहुँच सकता है, उसे फिर भौतिक आकाश में उतरने की आवश्यकता नहीं रह जाती। भौतिक आकाश में, चन्द्रमा की तो बात ही क्या, यदि हम उच्चतम लोक (ब्रह्मलोक) तक भी पहुँच जाएँ, तो भी हमें जीवन की वही दशाएँ मिलेंगी, अर्थात् जन्म, मृत्यु, रोग तथा वृद्धावस्था। भौतिक ब्रह्माण्ड का कोई भी लोक भौतिक अस्तित्व के इन चार सिद्धान्तों से मुक्त नहीं है। अतएव भगवान् भगवद्गीता में कहते हैं : आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। जीव एक लोक से दूसरे लोक की यात्रा कर रहे हैं, किन्तु किसी यान्त्रिक व्यवस्था से नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक प्रक्रिया से। इसका भी उल्लेख है : यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः। यदि हम अन्तर्ग्रहीय यात्रा करना चाहें तो किसी यान्त्रिक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है। गीता उपदेश देती है : यान्ति देवव्रता देवान्। चन्द्रमा, सूर्य तथा उच्च लोक स्वर्गलोक कहलाते हैं। लोकों की तीन भिन्न श्रेणियाँ हैं : उच्च, मध्य तथा अधम लोक-व्यवस्थाएँ। पृथ्वी मध्य लोक-व्यवस्था की है। भगवद्गीता हमें एक अत्यन्त सरल सूत्र से बताती है कि उच्च लोक-व्यवस्थाओं (देवलोक) की यात्रा कैसे की जाए : यान्ति देवव्रता देवान्। मनुष्य को केवल उस विशेष लोक के विशेष देवता की पूजा करनी है और उसी प्रकार वह चन्द्रमा, सूर्य अथवा किसी भी उच्च लोक-व्यवस्था में जा सकता है।
फिर भी भगवद्गीता हमें इस भौतिक जगत् के किसी भी लोक में जाने का परामर्श नहीं देती, क्योंकि यदि हम किसी यान्त्रिक साधन से, सम्भवतः चालीस हज़ार वर्ष की यात्रा करके (और इतना लम्बा जीवित कौन रहेगा?), उच्चतम लोक ब्रह्मलोक तक पहुँच भी जाएँ, तो भी हमें जन्म, मृत्यु, रोग तथा वृद्धावस्था की भौतिक असुविधाएँ वहाँ भी मिलेंगी। किन्तु जो परम लोक कृष्णलोक तक, अथवा आध्यात्मिक आकाश के किसी भी अन्य लोक तक पहुँचना चाहता है, उसे ये भौतिक असुविधाएँ नहीं मिलेंगी। आध्यात्मिक आकाश के समस्त लोकों में एक परम लोक है जिसे गोलोक वृन्दावन कहते हैं, जो आदि पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के धाम का आदि लोक है। यह सारी जानकारी भगवद्गीता में दी गई है, और उसके उपदेश द्वारा हमें यह जानकारी दी गई है कि भौतिक जगत् को कैसे छोड़ें और आध्यात्मिक आकाश में वास्तव में आनन्दमय जीवन कैसे आरम्भ करें।
भगवद्गीता के पञ्चदश अध्याय में भौतिक जगत् का वास्तविक चित्र दिया गया है। वहाँ कहा गया है :
ūrdhva-mūlam adhaḥ-śākham aśvatthaṁ prāhur avyayam chandāṁsi yasya parṇāni yas taṁ veda sa veda-vit
“श्रीभगवान् ने कहा : एक अश्वत्थ वृक्ष है जिसकी जड़ें ऊपर की ओर तथा शाखाएँ नीचे की ओर हैं, और वैदिक स्तोत्र उसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वेदों का ज्ञाता है।” (भगवद्गीता १५.१) यहाँ भौतिक जगत् का वर्णन एक ऐसे वृक्ष के रूप में किया गया है जिसकी जड़ें ऊपर की ओर तथा शाखाएँ नीचे की ओर हैं। ऊपर की ओर जड़ों वाले वृक्ष का अनुभव हमें है : यदि कोई नदी के अथवा किसी जलाशय के तट पर खड़ा हो, तो वह देख सकता है कि जल में प्रतिबिम्बित वृक्ष उलटे हैं। शाखाएँ नीचे की ओर जाती हैं और जड़ें ऊपर की ओर। इसी प्रकार यह भौतिक जगत् आध्यात्मिक जगत् का प्रतिबिम्ब है। भौतिक जगत् वास्तविकता की छाया मात्र है। छाया में कोई वास्तविकता अथवा सारभूतता नहीं होती, किन्तु छाया से हम यह समझ सकते हैं कि कोई सार तथा वास्तविकता है। मरुभूमि में जल नहीं होता, किन्तु मृगतृष्णा यह सुझाती है कि जल नामक कोई वस्तु है। भौतिक जगत् में जल नहीं है, सुख नहीं है, किन्तु वास्तविक सुख का असली जल आध्यात्मिक जगत् में है।
भगवान् सुझाते हैं कि हम आध्यात्मिक जगत् को इस प्रकार प्राप्त करें :
nirmāna-mohā jita-saṅga-doṣā adhyātma-nityā vinivṛtta-kāmāḥ dvandvair vimuktāḥ sukha-duḥkha-saṁjñair gacchanty amūḍhāḥ padam avyayaṁ tat.
वह पदम् अव्ययम्, अर्थात् नित्य राज्य, वही प्राप्त कर सकता है जो निर्मान-मोह है। इसका क्या अर्थ है? हम उपाधियों के पीछे पड़े हैं। कोई पुत्र बनना चाहता है, कोई स्वामी बनना चाहता है, कोई राष्ट्रपति अथवा धनी मनुष्य अथवा राजा अथवा और कुछ बनना चाहता है। जब तक हम इन उपाधियों से आसक्त हैं, तब तक हम शरीर से आसक्त हैं, क्योंकि उपाधियाँ शरीर की होती हैं। किन्तु हम ये शरीर नहीं हैं, और इसकी अनुभूति ही आध्यात्मिक अनुभूति की प्रथम अवस्था है। हम भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से जुड़े हैं, किन्तु हमें भगवान् की भक्ति द्वारा अनासक्त होना चाहिए। यदि हम भगवान् की भक्ति में आसक्त नहीं हैं, तो हम भौतिक प्रकृति के गुणों से अनासक्त नहीं हो सकते। उपाधियाँ तथा आसक्तियाँ हमारी काम-वासना तथा इच्छा के कारण हैं, अर्थात् भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की हमारी अभिलाषा के कारण। जब तक हम भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की इस प्रवृत्ति को नहीं त्यागते, तब तक परमेश्वर के राज्य, सनातन-धाम को लौटने की कोई सम्भावना नहीं है। वह नित्य राज्य, जो कभी नष्ट नहीं होता, वही प्राप्त कर सकता है जो मिथ्या भौतिक भोगों के आकर्षणों से मोहित नहीं है, जो परमेश्वर की सेवा में स्थित है। इस प्रकार स्थित व्यक्ति सरलता से उस परम धाम तक पहुँच सकता है।
गीता में अन्यत्र कहा गया है :
avyakto ’kṣara ity uktas tam āhuḥ paramāṁ gatim yaṁ prāpya na nivartante tad dhāma paramaṁ mama.
अव्यक्त का अर्थ है अप्रकट। सम्पूर्ण भौतिक जगत् भी हमारे समक्ष प्रकट नहीं है। हमारी इन्द्रियाँ इतनी अपूर्ण हैं कि हम इस भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर के समस्त नक्षत्र भी नहीं देख सकते। वैदिक साहित्य में हमें समस्त लोकों के विषय में बहुत जानकारी मिल सकती है, और हम उस पर विश्वास करें या न करें। समस्त महत्त्वपूर्ण लोकों का वर्णन वैदिक साहित्य में, विशेषतया श्रीमद्भागवत में किया गया है; और आध्यात्मिक जगत्, जो इस भौतिक आकाश से परे है, अव्यक्त, अर्थात् अप्रकट कहा गया है। मनुष्य को उस परम राज्य की कामना तथा उसके लिए लालसा रखनी चाहिए, क्योंकि जब कोई उस राज्य को प्राप्त कर लेता है, तब उसे इस भौतिक जगत् में लौटना नहीं पड़ता।
आगे कोई यह प्रश्न उठा सकता है कि परमेश्वर के उस धाम तक पहुँचा कैसे जाए। इसकी जानकारी अष्टम अध्याय में दी गई है। वहाँ कहा गया है :
anta-kāle ca mām eva smaran muktvā kalevaram yaḥ prayāti sa mad-bhāvam yāti nāsty atra saṁśayaḥ
“जो कोई जीवन के अन्त में मेरा स्मरण करते हुए अपना शरीर त्यागता है, वह तत्काल मेरे स्वभाव को प्राप्त होता है; इसमें कोई सन्देह नहीं है।” (भगवद्गीता ८.५) जो मृत्यु के समय कृष्ण का चिन्तन करता है, वह कृष्ण के पास जाता है। मनुष्य को कृष्ण के रूप का स्मरण करना चाहिए; यदि वह इस रूप का चिन्तन करते हुए शरीर त्यागता है, तो वह आध्यात्मिक राज्य को प्राप्त होता है। मद्भावम् परम पुरुष के परम स्वभाव की ओर संकेत करता है। परम पुरुष सच्चिदानन्द-विग्रह हैं — नित्य, ज्ञान तथा आनन्द से परिपूर्ण। हमारा वर्तमान शरीर सच्चिदानन्द नहीं है। वह असत् है, सत् नहीं। वह नित्य नहीं है; वह नाशवान् है। वह चित्, अर्थात् ज्ञान से परिपूर्ण नहीं है, अपितु अज्ञान से भरा है। हमें आध्यात्मिक राज्य का कोई ज्ञान नहीं है, और न ही इस भौतिक जगत् का पूर्ण ज्ञान है, जहाँ इतनी सारी वस्तुएँ हमारे लिए अज्ञात हैं। शरीर निरानन्द भी है; आनन्द से परिपूर्ण होने के बजाय वह दुःख से भरा है। भौतिक जगत् में हम जो भी दुःख भोगते हैं, वे सब शरीर से उत्पन्न होते हैं; किन्तु जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का चिन्तन करते हुए इस शरीर को छोड़ता है, वह तत्काल सच्चिदानन्द शरीर प्राप्त करता है, जैसा कि अष्टम अध्याय के इस पञ्चम श्लोक में वचन दिया गया है, जहाँ भगवान् कृष्ण कहते हैं : “वह मेरे स्वभाव को प्राप्त होता है।”
इस शरीर को छोड़ने तथा भौतिक जगत् में दूसरा शरीर पाने की प्रक्रिया भी व्यवस्थित है। मनुष्य की मृत्यु तब होती है जब यह निश्चित हो चुका होता है कि अगले जीवन में उसका शरीर किस रूप का होगा। यह निर्णय उच्च अधिकारी करते हैं, स्वयं जीव नहीं। इस जीवन में हमारी क्रियाओं के अनुसार हम या तो ऊपर उठते हैं या नीचे गिरते हैं। यह जीवन अगले जीवन की तैयारी है। अतएव यदि हम इस जीवन में भगवद्धाम को जाने की तैयारी कर सकें, तो निश्चय ही इस भौतिक शरीर को त्यागने के पश्चात् हम भगवान् के समान ही आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करेंगे।
जैसा पहले समझाया गया, दिव्यज्ञान के साधक विभिन्न प्रकार के होते हैं — ब्रह्मवादी, परमात्मवादी तथा भक्त; और जैसा उल्लेख किया गया, ब्रह्मज्योति (आध्यात्मिक आकाश) में असंख्य आध्यात्मिक लोक हैं। इन लोकों की संख्या इस भौतिक जगत् के समस्त लोकों से कहीं अधिक, कहीं अधिक है। इस भौतिक जगत् का अनुमान सम्पूर्ण सृष्टि के केवल एक चौथाई भाग के रूप में लगाया गया है। इस भौतिक खण्ड में लाखों-करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं, जिनमें खरबों लोक तथा सूर्य, नक्षत्र एवं चन्द्रमा हैं। किन्तु यह सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि समग्र सृष्टि का एक अंश मात्र है। सृष्टि का अधिकांश भाग आध्यात्मिक आकाश में है। जो परब्रह्म के अस्तित्व में लीन होना चाहता है, वह तत्काल परमेश्वर की ब्रह्मज्योति में स्थानान्तरित कर दिया जाता है और इस प्रकार आध्यात्मिक आकाश प्राप्त करता है। भक्त, जो भगवान् का संग भोगना चाहता है, वैकुण्ठ लोकों में प्रवेश करता है, जो असंख्य हैं; और परमेश्वर वहाँ चतुर्भुज नारायण के रूप में अपने पूर्ण अंशों द्वारा, तथा प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, गोविन्द इत्यादि विभिन्न नामों से, उसका संग करते हैं। अतएव जीवन के अन्त में दिव्यज्ञान के साधक या तो ब्रह्मज्योति का, या परमात्मा का, या पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं। समस्त स्थितियों में वे आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करते हैं, किन्तु केवल भक्त ही, अर्थात् वही जो परमेश्वर के साथ साक्षात् सम्पर्क में है, वैकुण्ठ लोकों में प्रवेश करता है। भगवान् आगे यह भी जोड़ते हैं कि इसमें “कोई सन्देह नहीं है।” इस पर दृढ़ विश्वास करना चाहिए। जो हमारी कल्पना से मेल नहीं खाता, उसे हमें अस्वीकार नहीं करना चाहिए; हमारा भाव अर्जुन जैसा होना चाहिए : “आपने जो कुछ कहा है, उस सब पर मैं विश्वास करता हूँ।” अतएव जब भगवान् कहते हैं कि मृत्यु के समय जो कोई उनका चिन्तन ब्रह्म के रूप में, अथवा परमात्मा के रूप में, अथवा भगवान् के रूप में करता है, वह निश्चय ही आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करता है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं है। इस पर अविश्वास करने का प्रश्न ही नहीं उठता।
मृत्यु के समय परम पुरुष का चिन्तन कैसे करें, इसकी जानकारी भी गीता में दी गई है :
yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajaty ante kalevaram taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ
“मनुष्य जिस भी भाव में अपना वर्तमान शरीर त्यागता है, अगले जीवन में वह उसी भाव को अवश्य प्राप्त होता है।” (भगवद्गीता ८.६) भौतिक प्रकृति परमेश्वर की शक्तियों में से एक का प्रदर्शन है। विष्णुपुराण में परमेश्वर की समग्र शक्तियों का वर्णन विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता इत्यादि के रूप में किया गया है। परमेश्वर की विविध तथा असंख्य शक्तियाँ हैं जो हमारी धारणा से परे हैं; तथापि महान् विद्वान् मुनियों अथवा मुक्त आत्माओं ने इन शक्तियों का अध्ययन किया है और उनका विश्लेषण तीन भागों में किया है। समस्त शक्तियाँ विष्णु-शक्ति की हैं, अर्थात् वे भगवान् विष्णु की भिन्न-भिन्न शक्तियाँ हैं। वह शक्ति परा है, दिव्य है। जीव भी परा शक्ति के अन्तर्गत आते हैं, जैसा पहले ही समझाया जा चुका है। शेष शक्तियाँ, अर्थात् भौतिक शक्तियाँ, तमोगुण में हैं। मृत्यु के समय हम या तो इस भौतिक जगत् की अपरा शक्ति में रह सकते हैं, या आध्यात्मिक जगत् की शक्ति में स्थानान्तरित हो सकते हैं।
जीवन में हम या तो भौतिक शक्ति का चिन्तन करने के अभ्यस्त हैं, या आध्यात्मिक शक्ति का। ऐसे बहुत से साहित्य हैं जो हमारे विचारों को भौतिक शक्ति से भर देते हैं — समाचारपत्र, उपन्यास इत्यादि। हमारा चिन्तन, जो अब इन साहित्यों में डूबा है, वैदिक साहित्य की ओर मोड़ना चाहिए। अतएव महान् मुनियों ने पुराण इत्यादि जैसे इतने सारे वैदिक ग्रन्थ लिखे। पुराण काल्पनिक नहीं हैं; वे ऐतिहासिक अभिलेख हैं। चैतन्य-चरितामृत में निम्नलिखित श्लोक है :
māyā mugdha jīver nāhi svataḥ Kṛṣṇa-jñāna jīvera kṛpāya kailā Kṛṣṇa veda-purāṇa (Cc. Madhya 20.122)
विस्मरणशील जीव, अर्थात् बद्धजीव, परमेश्वर के साथ अपना सम्बन्ध भूल चुके हैं, और वे भौतिक क्रियाओं के चिन्तन में डूबे हुए हैं। उनकी चिन्तन-शक्ति को आध्यात्मिक आकाश की ओर मोड़ने के लिए ही कृष्ण ने बहुत से वैदिक ग्रन्थ दिए। सर्वप्रथम उन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित किया, फिर उनकी व्याख्या पुराणों में की, और कम सामर्थ्य वाले लोगों के लिए उन्होंने महाभारत लिखा। महाभारत में ही भगवद्गीता दी गई है। तत्पश्चात् समस्त वैदिक साहित्य का सार वेदान्तसूत्र में दिया गया, और भावी मार्गदर्शन के लिए उन्होंने वेदान्तसूत्र पर एक स्वाभाविक भाष्य दिया, जिसे श्रीमद्भागवत कहते हैं। हमें अपने मन को सदैव इन वैदिक ग्रन्थों के पठन में लगाना चाहिए। जैसे भौतिकतावादी अपने मन को समाचारपत्रों, पत्रिकाओं तथा इतने सारे भौतिकतावादी साहित्य के पठन में लगाते हैं, वैसे ही हमें अपना पठन उन ग्रन्थों की ओर मोड़ना चाहिए जो हमें व्यासदेव ने दिए हैं; इस प्रकार मृत्यु के समय परमेश्वर का स्मरण करना हमारे लिए सम्भव होगा। भगवान् द्वारा सुझाया गया यही एकमात्र उपाय है, और वे फल की गारंटी देते हैं : “इसमें कोई सन्देह नहीं है।” (भगवद्गीता ८.७)
tasmāt sarveṣu kāleṣu mām anusmara yudhya ca mayy arpita-mano-buddhir mām evaiṣyasy asaṁśayaḥ
“अतएव, हे अर्जुन, तुम्हें सदैव मेरा स्मरण करना चाहिए, और साथ ही अपना विहित कर्तव्य, अर्थात् युद्ध, करते रहना चाहिए। अपने मन तथा कर्मों को सदैव मुझमें स्थिर करके और सब कुछ मुझमें अर्पित करके तुम निस्सन्देह मुझे प्राप्त करोगे।”
वे अर्जुन को यह परामर्श नहीं देते कि वह केवल उनका स्मरण करे और अपना व्यवसाय त्याग दे। नहीं, भगवान् कभी कोई अव्यावहारिक बात नहीं सुझाते। इस भौतिक जगत् में शरीर के निर्वाह हेतु मनुष्य को कार्य करना ही पड़ता है। मानव समाज कार्य के अनुसार सामाजिक व्यवस्था के चार विभागों में विभाजित है — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। ब्राह्मण वर्ग, अर्थात् बुद्धिजीवी वर्ग, एक प्रकार से कार्य करता है; क्षत्रिय, अर्थात् प्रशासक वर्ग, दूसरे प्रकार से कार्य करता है; और वाणिज्य-वर्ग तथा श्रमिक अपने-अपने विशिष्ट कर्तव्यों में लगे रहते हैं। मानव समाज में, चाहे कोई श्रमिक हो, व्यापारी हो, योद्धा हो, प्रशासक हो, या कृषक हो, अथवा चाहे कोई उच्चतम वर्ग का हो और साहित्यकार, वैज्ञानिक या धर्मशास्त्री हो, उसे अपने अस्तित्व के निर्वाह हेतु कार्य करना ही पड़ता है। अतएव भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि उसे अपना व्यवसाय त्यागने की आवश्यकता नहीं है, किन्तु अपने व्यवसाय में लगे रहते हुए उसे कृष्ण का स्मरण करना चाहिए। यदि वह अस्तित्व के लिए संघर्ष करते समय कृष्ण के स्मरण का अभ्यास नहीं करता, तो मृत्यु के समय उसके लिए कृष्ण का स्मरण करना सम्भव नहीं होगा। भगवान् चैतन्य भी यही परामर्श देते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य को सदैव भगवान् के नामों का कीर्तन करके भगवान् के स्मरण का अभ्यास करना चाहिए। भगवान् के नाम तथा भगवान् अभिन्न हैं। अतः भगवान् कृष्ण का अर्जुन को “मेरा स्मरण करो” यह उपदेश और भगवान् चैतन्य का “सदैव भगवान् कृष्ण के नामों का कीर्तन करो” यह विधान — दोनों एक ही उपदेश हैं। इनमें कोई भेद नहीं है, क्योंकि कृष्ण तथा कृष्ण का नाम अभिन्न हैं। परम स्थिति में संकेतक तथा संकेत्य में कोई भेद नहीं होता। अतएव हमें उनके नामों का कीर्तन करके तथा अपने जीवन की क्रियाओं को इस प्रकार ढालकर कि हम उनका सदैव स्मरण कर सकें, चौबीसों घण्टे भगवान् के स्मरण का अभ्यास करना चाहिए।
यह कैसे सम्भव है? आचार्य निम्नलिखित उदाहरण देते हैं। यदि कोई विवाहित स्त्री किसी अन्य पुरुष से आसक्त हो, अथवा यदि किसी पुरुष की अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री में आसक्ति हो, तो वह आसक्ति अत्यन्त प्रबल मानी जाती है। ऐसी आसक्ति वाला व्यक्ति सदैव अपने प्रिय का चिन्तन करता रहता है। जो पत्नी अपने प्रेमी का चिन्तन करती है, वह अपने गृहकार्य करते हुए भी सदैव उससे मिलने का ही चिन्तन करती रहती है। वस्तुतः वह अपना गृहकार्य और भी अधिक सावधानी से करती है, ताकि उसके पति को उसकी आसक्ति का सन्देह न हो। इसी प्रकार हमें सदैव परम प्रियतम श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए और साथ ही अपने भौतिक कर्तव्य भलीभाँति करने चाहिए। यहाँ प्रबल प्रेमभाव अपेक्षित है। यदि हममें परमेश्वर के प्रति प्रबल प्रेमभाव हो, तो हम अपना कर्तव्य भी निभा सकते हैं और साथ ही उनका स्मरण भी कर सकते हैं। किन्तु हमें वह प्रेमभाव विकसित करना होगा। उदाहरणार्थ, अर्जुन सदैव कृष्ण का चिन्तन करता रहता था; वह कृष्ण का निरन्तर संगी था, और साथ ही वह योद्धा भी था। कृष्ण ने उसे यह परामर्श नहीं दिया कि वह युद्ध छोड़कर ध्यान करने वन में चला जाए। जब भगवान् कृष्ण अर्जुन को योग-पद्धति का वर्णन करते हैं, तब अर्जुन कहता है कि इस पद्धति का अभ्यास उसके लिए सम्भव नहीं है।
arjuna uvāca yo ‘yaṁ yogas tvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana etasyāhaṁ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṁ sthirām
“अर्जुन ने कहा : हे मधुसूदन, आपने जिस योग-पद्धति का सार कहा है, वह मुझे अव्यावहारिक तथा असह्य प्रतीत होती है, क्योंकि मन चंचल तथा अस्थिर है।” (भगवद्गीता ६.३३)
किन्तु भगवान् कहते हैं :
yoginām api sarveṣāṁ mad-gatenāntarātmanā śraddhāvān bhajate yo māṁ sa me yuktatamo mataḥ
“समस्त योगियों में से जो महान् श्रद्धा के साथ सदैव मुझमें स्थित रहता है और दिव्य प्रेममयी सेवा में मेरी आराधना करता है, वही योग में मुझसे सर्वाधिक घनिष्ठ रूप से युक्त है, और वही सबमें श्रेष्ठ है।” (भगवद्गीता ६.४७) अतः जो सदैव परमेश्वर का चिन्तन करता है, वही सबसे बड़ा योगी है, सर्वोपरि ज्ञानी है, और साथ ही सबसे बड़ा भक्त है। भगवान् आगे अर्जुन से कहते हैं कि क्षत्रिय होने के नाते वह युद्ध नहीं छोड़ सकता, किन्तु यदि अर्जुन कृष्ण का स्मरण करते हुए युद्ध करे, तो वह मृत्यु के समय उनका स्मरण कर सकेगा। किन्तु मनुष्य को भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में पूर्ण रूप से शरणागत होना चाहिए।
वस्तुतः हम अपने शरीर से नहीं, अपितु अपने मन तथा बुद्धि से कार्य करते हैं। अतः यदि बुद्धि तथा मन सदैव परमेश्वर के चिन्तन में लगे रहें, तो स्वाभाविक रूप से इन्द्रियाँ भी उनकी सेवा में लग जाती हैं। कम से कम ऊपर से इन्द्रियों की क्रियाएँ वही रहती हैं, किन्तु चेतना बदल जाती है। भगवद्गीता सिखाती है कि मन तथा बुद्धि को भगवान् के चिन्तन में कैसे लीन किया जाए। ऐसी तल्लीनता मनुष्य को भगवद्धाम में स्थानान्तरित होने में समर्थ बनाएगी। यदि मन कृष्ण की सेवा में लगा है, तो इन्द्रियाँ स्वतः ही उनकी सेवा में लग जाती हैं। यही कला है, और यही भगवद्गीता का रहस्य भी है : श्रीकृष्ण के चिन्तन में पूर्ण तल्लीनता।
आधुनिक मनुष्य ने चन्द्रमा तक पहुँचने के लिए अत्यन्त कठिन संघर्ष किया है, किन्तु उसने अपने को आध्यात्मिक रूप से ऊपर उठाने के लिए बहुत कठिन प्रयत्न नहीं किया। यदि किसी के आगे पचास वर्ष का जीवन शेष है, तो उसे वह अल्प काल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के स्मरण के इस अभ्यास को विकसित करने में लगाना चाहिए। यह अभ्यास निम्नलिखित भक्ति-प्रक्रिया है :
śravaṇaṁ kīrtanaṁ viṣṇoḥ smaraṇaṁ pāda-sevanam arcanaṁ vandanaṁ dāsyaṁ sakhyam ātma-nivedanam
ये नौ प्रक्रियाएँ, जिनमें सबसे सरल श्रवणम् है — अर्थात् आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति से भगवद्गीता सुनना — मनुष्य को परम पुरुष के चिन्तन की ओर मोड़ देंगी। इससे निश्चल स्थिति आएगी, अर्थात् परमेश्वर का स्मरण होगा, और मनुष्य शरीर छोड़ने पर ऐसा आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करने में समर्थ होगा जो परमेश्वर के संग के सर्वथा योग्य है।
भगवान् आगे कहते हैं :
abhyāsa-yoga-yuktena cetasā nānya-gāminā paramaṁ puruṣaṁ divyaṁ yāti pārthānucintayan
“हे कुन्तीपुत्र, इस स्मरण का अभ्यास करते हुए, विचलित हुए बिना, सदैव परमेश्वर का चिन्तन करते हुए, मनुष्य निश्चय ही उन दिव्य परम पुरुष के लोक को प्राप्त करता है।” (भगवद्गीता ८.८)
यह कोई अत्यन्त कठिन प्रक्रिया नहीं है। तथापि मनुष्य को इसे किसी अनुभवी व्यक्ति से सीखना चाहिए, ऐसे व्यक्ति से जो पहले से ही इस अभ्यास में है। मन सदैव इधर-उधर उड़ता रहता है, किन्तु मनुष्य को सदैव अपने मन को परमेश्वर श्रीकृष्ण के रूप पर अथवा उनके नाम की ध्वनि पर एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिए। मन स्वभावतः चंचल है, इधर-उधर भटकता रहता है, किन्तु वह कृष्ण की शब्द-ध्वनि में विश्राम पा सकता है। इस प्रकार मनुष्य को परमं पुरुषम् का, अर्थात् परम पुरुष का ध्यान करना चाहिए, और इस प्रकार उन्हें प्राप्त करना चाहिए। अन्तिम अनुभूति तथा अन्तिम प्राप्ति के उपाय एवं साधन भगवद्गीता में बताए गए हैं, और इस ज्ञान के द्वार सबके लिए खुले हैं। किसी का निषेध नहीं है। सभी वर्गों के लोग भगवान् का चिन्तन करके उन तक पहुँच सकते हैं, क्योंकि उनके विषय में सुनना तथा उनका चिन्तन करना सबके लिए सम्भव है।
भगवान् आगे कहते हैं :
māṁ hi pārtha vyapāśritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ striyo vaiśyās tathā śūdrās te ’pi yānti parāṁ gatim
kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayas tathā anityam asukhaṁ lokam imaṁ prāpya bhajasva mām
“हे पृथापुत्र, जो कोई मेरी शरण ग्रहण करेगा — चाहे वह स्त्री हो, या व्यापारी हो, या नीच कुल में जन्मा हो — वह भी परम गति को प्राप्त कर सकता है। तब फिर पुण्यात्मा ब्राह्मणों, भक्तों तथा राजर्षियों की तो बात ही क्या! इस दुःखमय जगत् में ये भगवान् की भक्ति में स्थिर हैं।” (भगवद्गीता ९.३२-३३)
जीवन की निम्न स्थितियों में रहने वाले मनुष्य भी (व्यापारी, स्त्री अथवा श्रमिक) परमेश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए अत्यधिक विकसित बुद्धि की आवश्यकता नहीं है। बात यह है कि जो कोई भक्तियोग के सिद्धान्त को स्वीकार करता है और परमेश्वर को जीवन का परम श्रेय, सर्वोच्च लक्ष्य, अन्तिम ध्येय मानता है, वह आध्यात्मिक आकाश में भगवान् तक पहुँच सकता है। यदि मनुष्य भगवद्गीता में प्रतिपादित सिद्धान्तों को अपना ले, तो वह अपना जीवन पूर्ण बना सकता है और जीवन की उन समस्त समस्याओं का पूर्ण समाधान कर सकता है जो भौतिक अस्तित्व के क्षणभंगुर स्वभाव से उत्पन्न होती हैं। सम्पूर्ण भगवद्गीता का सार यही है।
निष्कर्षतः भगवद्गीता एक दिव्य ग्रन्थ है जिसे अत्यन्त सावधानी से पढ़ना चाहिए। वह मनुष्य को समस्त भय से बचाने में समर्थ है।
nehābhikrama-nāśo ’sti pratyavāyo na vidyate svalpam apy asya dharmasya trāyate mahato bhayāt
“इस प्रयास में न कोई हानि है न क्षय, और इस मार्ग पर थोड़ी-सी प्रगति भी मनुष्य को महानतम भय से रक्षा कर सकती है।” (भगवद्गीता २.४०) यदि मनुष्य भगवद्गीता को निष्ठापूर्वक तथा गम्भीरता से पढ़े, तो उसके विगत दुष्कर्मों की समस्त प्रतिक्रियाएँ उस पर प्रभाव नहीं डालेंगी। भगवद्गीता के अन्तिम भाग में भगवान् श्रीकृष्ण घोषित करते हैं :
sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ
“समस्त प्रकार के धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आओ; और बदले में मैं तुम्हें समस्त पापकर्मों की प्रतिक्रियाओं से बचाऊँगा। अतः तुम्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।” (भगवद्गीता १८.६६) इस प्रकार भगवान् उस व्यक्ति का समस्त उत्तरदायित्व ले लेते हैं जो उनकी शरण ग्रहण करता है, और वे पाप की समस्त प्रतिक्रियाओं की क्षतिपूर्ति कर देते हैं।
मनुष्य जल में स्नान करके प्रतिदिन अपने को शुद्ध करता है, किन्तु जो भगवद्गीता के पवित्र गंगाजल में केवल एक बार भी स्नान कर लेता है, वह भौतिक जीवन का समस्त मल धो डालता है। चूँकि भगवद्गीता स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा कही गई है, अतः मनुष्य को कोई अन्य वैदिक ग्रन्थ पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल ध्यानपूर्वक तथा नियमित रूप से भगवद्गीता सुननी तथा पढ़नी चाहिए। वर्तमान युग में मानवजाति सांसारिक क्रियाओं में इतनी डूबी हुई है कि समस्त वैदिक साहित्य पढ़ना सम्भव नहीं है। किन्तु इसकी आवश्यकता भी नहीं है। यह एक ग्रन्थ, भगवद्गीता, पर्याप्त होगा, क्योंकि वह समस्त वैदिक साहित्य का सार है और क्योंकि वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा कही गई है। कहा जाता है कि जो गंगा का जल पीता है, उसे निश्चय ही मोक्ष मिलता है; तो फिर उसकी क्या बात जो भगवद्गीता का जल पीता है? गीता महाभारत का साक्षात् अमृत है, जो स्वयं विष्णु द्वारा कही गई है, क्योंकि भगवान् कृष्ण ही आदि विष्णु हैं। वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के मुख से निकला हुआ अमृत है, और गंगा भगवान् के चरणकमलों से निकली हुई कही जाती है। निस्सन्देह परमेश्वर के मुख तथा चरणों में कोई भेद नहीं है, किन्तु अपनी स्थिति में हम यह समझ सकते हैं कि भगवद्गीता गंगा से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
भगवद्गीता ठीक गौ के समान है, और भगवान् कृष्ण, जो ग्वालबाल हैं, इस गौ को दुह रहे हैं। दूध वेदों का सार है, और अर्जुन ठीक बछड़े के समान है। बुद्धिमान् जनों को, महान् मुनियों तथा शुद्ध भक्तों को, भगवद्गीता का यह अमृतमय दूध पीना है।
आज के दिन मनुष्य एक शास्त्र, एक ईश्वर, एक धर्म तथा एक व्यवसाय पाने के लिए अत्यन्त उत्सुक है। अतः सम्पूर्ण विश्व के लिए एक ही सामान्य शास्त्र हो — भगवद्गीता। और सम्पूर्ण विश्व के लिए एक ही ईश्वर हो — श्रीकृष्ण। और एक ही मन्त्र हो — हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। और एक ही कर्म हो — पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा।