हि

अध्याय 3 · 37 / 43

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श्री भगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥

श्री भगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; कामः—काम; एषः—ये सब; क्रोधः—क्रोध; एषः—ये सब; रजो-गुण—रजोगुण से; समुद्भवः—उत्पन्न; महा-शनः—सर्वभक्षी; महा-पाप्मा—महापापी; विद्धि—जान लो; एनम्—इसे; इह—भौतिक जगत् में; वैरिणम्—सबसे बड़ा शत्रु।

श्रीभगवान् ने कहा : हे अर्जुन! यह केवल काम ही है, जो रजोगुण के सम्पर्क से उत्पन्न होता है और आगे चलकर क्रोध में परिणत हो जाता है, और जो इस जगत् का सर्वभक्षी, पापमय शत्रु है।

जब जीव भौतिक सृष्टि के सम्पर्क में आता है, तब रजोगुण के संग में उसका श्रीकृष्ण के प्रति नित्य प्रेम काम में परिणत हो जाता है। अथवा दूसरे शब्दों में, ईश्वर-प्रेम का भाव काम में उसी प्रकार परिणत हो जाता है, जैसे खट्टी इमली के सम्पर्क में दूध दही में बदल जाता है। पुनः जब काम अतृप्त रहता है, तब वह क्रोध में बदल जाता है; क्रोध मोह में परिणत होता है, और मोह भौतिक अस्तित्व को आगे बढ़ाता है। अतएव काम जीव का सबसे बड़ा शत्रु है, और यह काम ही है जो शुद्ध जीव को भौतिक जगत् में बँधा रहने के लिए प्रेरित करता है। क्रोध तमोगुण का प्रकटीकरण है; ये गुण क्रोध तथा अन्य अनुषंगी रूपों में अपने को प्रकट करते हैं। अतएव यदि रजोगुण, तमोगुण में अवनत होने के बजाय, विहित जीवन-शैली एवं कर्म-विधि द्वारा सत्त्वगुण तक उन्नत हो जाए, तो मनुष्य आध्यात्मिक आसक्ति द्वारा क्रोध की अवनति से बच सकता है।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने अपने सदा-वर्धमान आध्यात्मिक आनन्द हेतु स्वयं को अनेक रूपों में विस्तारित किया, और जीव इसी आध्यात्मिक आनन्द के अंश हैं। उनमें आंशिक स्वतन्त्रता भी है, किन्तु अपनी स्वतन्त्रता के दुरुपयोग से, जब सेवा-भाव इन्द्रिय-भोग की प्रवृत्ति में परिणत हो जाता है, तब वे काम के वश में आ जाते हैं। इस भौतिक सृष्टि की रचना भगवान् ने बद्धजीवों को इन कामपूर्ण प्रवृत्तियों की पूर्ति की सुविधा देने हेतु की है, और जब वे दीर्घकालीन कामपूर्ण क्रियाओं से पूर्णतः कुण्ठित हो जाते हैं, तब जीव अपनी वास्तविक स्थिति के विषय में जिज्ञासा करने लगते हैं।

यही जिज्ञासा वेदान्त-सूत्र का आरम्भ है, जहाँ कहा गया है, अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा : मनुष्य को परम के विषय में जिज्ञासा करनी चाहिए। और श्रीमद्भागवत में उस परम की परिभाषा इस प्रकार दी गई है—जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्च, अर्थात् “समस्त वस्तुओं का उद्गम परब्रह्म है।” अतएव काम का उद्गम भी परम में ही है। अतएव यदि काम परम के प्रति प्रेम में परिणत हो जाए, अथवा कृष्णभावनामृत में परिणत हो जाए—अर्थात् दूसरे शब्दों में, श्रीकृष्ण के लिए सब कुछ की कामना करने में—तो काम तथा क्रोध दोनों को आध्यात्मिक बनाया जा सकता है। भगवान् राम के महान् सेवक हनुमान् ने भगवान् की सन्तुष्टि हेतु अपने शत्रुओं पर अपना क्रोध प्रयुक्त किया। अतएव काम तथा क्रोध, जब वे कृष्णभावनामृत में प्रयुक्त किए जाते हैं, तब वे हमारे शत्रु के बजाय हमारे मित्र बन जाते हैं।