हि

अध्याय 10 · 26 / 40

10.28

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥

आयुधानाम्—समस्त अस्त्रों में; अहम्—मैं हूँ; वज्रम्—वज्र; धेनूनाम्—गौओं में; अस्मि—मैं हूँ; कामधुक्—सुरभि गौएँ; प्रजनः—सन्तानोत्पत्ति हेतु; च—और; अस्मि—मैं हूँ; कन्दर्पः—कामदेव; सर्पाणाम्—समस्त सर्पों में; अस्मि—मैं हूँ; वासुकिः—वासुकि।

अस्त्रों में मैं वज्र हूँ; गौओं में मैं प्रचुर दुग्ध देने वाली सुरभि हूँ। सन्तानोत्पादकों में मैं कन्दर्प, प्रेम का देवता, हूँ, तथा सर्पों में मैं प्रमुख वासुकि हूँ।

वज्र, जो वस्तुतः एक प्रबल अस्त्र है, श्रीकृष्ण की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। आध्यात्मिक आकाश में स्थित कृष्णलोक में ऐसी गौएँ हैं, जिनका दुग्ध किसी भी समय दुहा जा सकता है, और वे जितना चाहो उतना दुग्ध देती हैं। निश्चय ही ऐसी गौएँ इस भौतिक जगत् में नहीं हैं, किन्तु कृष्णलोक में उनका उल्लेख है। भगवान् ऐसी अनेक गौएँ रखते हैं, जो सुरभि कहलाती हैं। कहा गया है कि भगवान् सुरभि गौओं को चराने में संलग्न रहते हैं। कन्दर्प उत्तम पुत्रों की प्राप्ति हेतु काम-वासना है; अतः कन्दर्प श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि है। कभी-कभी काम केवल इन्द्रियतृप्ति हेतु ही किया जाता है; ऐसा काम श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व नहीं करता। किन्तु उत्तम सन्तानों की उत्पत्ति हेतु किया गया काम कन्दर्प कहलाता है और श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है।