हि

अध्याय 14 · 15 / 24

14.15

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥

रजसि—रजोगुण में; प्रलयम्—प्रलय को; गत्वा—प्राप्त करके; कर्म-सङ्गिषु—सकाम कर्मों के संसर्ग में; जायते—जन्म लेता है; तथा—तत्पश्चात्; प्रलीनः—प्रलीन होकर; तमसि—तमोगुण में; मूढ—पशु; योनिषु—योनियों में; जायते—जन्म लेता है।

जब मनुष्य रजोगुण में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह सकाम कर्म में संलग्न जनों के बीच जन्म लेता है; और जब वह तमोगुण में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह पशु-योनि में जन्म लेता है।

कुछ लोगों की यह धारणा होती है कि जब आत्मा मनुष्य-जीवन के स्तर पर पहुँच जाती है, तो वह पुनः कभी नीचे नहीं गिरती। यह असत्य है। इस श्लोक के अनुसार, यदि कोई तमोगुण विकसित करता है, तो उसकी मृत्यु के पश्चात् वह जीवन के पशु-रूप में अधोगति को प्राप्त होता है। वहाँ से मनुष्य को पुनः क्रमविकास की प्रक्रिया द्वारा पुनः मनुष्य-जीवन के रूप तक उन्नत होना पड़ता है। अतः जो वास्तव में मनुष्य-जीवन के विषय में गम्भीर हैं, उन्हें सत्त्वगुण को ग्रहण करना चाहिए और सत्संगति में गुणों को लाँघकर कृष्णभावनामृत में स्थित होना चाहिए। यही मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है। अन्यथा, इसकी कोई गारण्टी नहीं है कि मनुष्य पुनः मनुष्य-स्थिति को प्राप्त करेगा।