अध्याय 15 · 13 / 19
15.14
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
अहम्—मैं; वैश्वानरः—पाचक अग्नि के रूप में अपने पूर्णांश से; भूत्वा—बनकर; प्राणिनाम्—समस्त जीवों के; देहम्—शरीर में; आश्रितः—स्थित; प्राण—बहिर्गामी वायु; अपान—अधोगामी वायु; समायुक्तः—सन्तुलन रखते हुए; पचामि—पचाता हूँ; अन्नम्—भोजन; चतुः-विधम्—चार प्रकार का।
मैं प्रत्येक जीवित शरीर में पाचन की अग्नि हूँ, और मैं प्राण-वायु हूँ, बहिर्गामी तथा अन्तर्गामी, जिसके द्वारा मैं चार प्रकार के भोजन को पचाता हूँ।
आयुर्वेदिक शास्त्र के अनुसार हम समझते हैं कि उदर में एक अग्नि है, जो वहाँ भेजे गए समस्त भोजन को पचाती है। जब अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, तब भूख नहीं लगती, और जब अग्नि ठीक रहती है, तब हमें भूख लगती है। कभी जब अग्नि भली-भाँति नहीं जलती, तब उपचार की आवश्यकता होती है। किसी भी दशा में, यह अग्नि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की प्रतिनिधि है। वैदिक मन्त्र भी इसकी पुष्टि करते हैं कि परमेश्वर अथवा ब्रह्म उदर के भीतर अग्नि के रूप में स्थित हैं और समस्त प्रकार के भोजन को पचा रहे हैं। अतः चूँकि वे समस्त प्रकार के भोजन के पाचन में सहायता कर रहे हैं, अतः जीव भोजन की प्रक्रिया में स्वतन्त्र नहीं है। जब तक परमेश्वर पाचन में उसकी सहायता न करें, तब तक भोजन की कोई सम्भावना नहीं। इस प्रकार वे भोजन का उत्पादन तथा पाचन करते हैं, और उनकी कृपा से हम जीवन का भोग कर रहे हैं। वेदान्त-सूत्र में भी इसकी पुष्टि होती है : शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च। भगवान् ध्वनि के भीतर तथा शरीर के भीतर, वायु के भीतर तथा यहाँ तक कि उदर के भीतर पाचक शक्ति के रूप में स्थित हैं। चार प्रकार के भोजन होते हैं : कुछ निगले जाते हैं, कुछ चबाए जाते हैं, कुछ चाटे जाते हैं, और कुछ चूसे जाते हैं, और वे ही इन सबकी पाचक शक्ति हैं।