अध्याय 15 · 12 / 19
15.13
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
गाम्—लोकों में; आविश्य—प्रवेश करके; च—भी; भूतानि—जीवों को; धारयामि—धारण करता हूँ; अहम्—मैं; ओजसा—अपनी ऊर्जा से; पुष्णामि—पोषित करता हूँ; च—और; औषधीः—समस्त वनस्पतियों को; सर्वाः—समस्त; सोमः—चन्द्रमा; भूत्वा—बनकर; रस-आत्मकः—रस प्रदान करते हुए।
मैं प्रत्येक लोक में प्रवेश करता हूँ, और मेरी ऊर्जा से वे अपनी कक्षा में बने रहते हैं। मैं चन्द्रमा बनता हूँ और इस प्रकार समस्त वनस्पतियों को जीवन-रस प्रदान करता हूँ।
यह समझा जाता है कि समस्त लोक केवल भगवान् की ऊर्जा से ही आकाश में तैर रहे हैं। भगवान् प्रत्येक अणु, प्रत्येक लोक तथा प्रत्येक जीव में प्रवेश करते हैं। इसकी विवेचना ब्रह्म-संहिता में की गई है। वहाँ कहा गया है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का एक पूर्णांश, परमात्मा, लोकों, ब्रह्माण्ड, जीव तथा यहाँ तक कि अणु में भी प्रवेश करते हैं। अतः उनके प्रवेश के कारण ही सब कुछ समुचित रूप से प्रकट होता है। जब आत्मा वहाँ होती है, तब जीवित मनुष्य जल पर तैर सकता है, किन्तु जब जीवन-स्फुलिंग शरीर से बाहर हो जाता है और शरीर मृत हो जाता है, तब वह डूब जाता है। निस्सन्देह, जब वह विघटित हो जाता है, तब वह तिनके तथा अन्य वस्तुओं के समान तैरता है, किन्तु ज्यों ही मनुष्य मृत होता है, वह तुरन्त जल में डूब जाता है। इसी प्रकार, ये समस्त लोक अन्तरिक्ष में तैर रहे हैं, और यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की परम ऊर्जा के प्रवेश के कारण है। उनकी ऊर्जा प्रत्येक लोक को धारण कर रही है, ठीक मुट्ठी भर धूल के समान। यदि कोई मुट्ठी भर धूल पकड़ ले, तो धूल के गिरने की कोई सम्भावना नहीं, किन्तु यदि कोई उसे आकाश में उछाल दे, तो वह नीचे गिर जाएगी। इसी प्रकार, ये लोक, जो आकाश में तैर रहे हैं, वस्तुतः परमेश्वर के विराट रूप की मुट्ठी में थमे हुए हैं। उनकी शक्ति तथा ऊर्जा से समस्त चर तथा अचर वस्तुएँ अपने स्थान पर बनी रहती हैं। कहा जाता है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के कारण ही सूर्य प्रकाशित हो रहा है और लोक स्थिर रूप से गतिमान हैं। यदि वे न होते, तो समस्त लोक आकाश में धूल के समान बिखर जाते और नष्ट हो जाते। इसी प्रकार, यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के कारण है कि चन्द्रमा समस्त वनस्पतियों को पोषित करता है। चन्द्रमा के प्रभाव के कारण वनस्पतियाँ स्वादिष्ट हो जाती हैं। चन्द्रमा के प्रकाश के बिना वनस्पतियाँ न तो उग सकती हैं और न ही रसमय स्वाद वाली हो सकती हैं। मनुष्य-समाज परमेश्वर से प्राप्त आपूर्ति के कारण कार्य कर रहा है, सुखपूर्वक जी रहा है तथा भोजन का भोग कर रहा है। अन्यथा मानवजाति जीवित न रह पाती। रसात्मकः शब्द अत्यन्त सार्थक है। प्रत्येक वस्तु चन्द्रमा के प्रभाव द्वारा परमेश्वर के माध्यम से स्वादिष्ट हो जाती है।