हि

अध्याय 15 · 15 / 19

15.16

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥

द्वौ—दो; इमौ—इस (संसार) में; पुरुषौ—जीव; लोके—संसार में; क्षरः—च्युत; च—और; अक्षरः—अच्युत; एव—निश्चय ही; च—और; क्षरः—च्युत; सर्वाणि—समस्त; भूतानि—जीव; कूटस्थः—एकता में; अक्षरः—अच्युत; उच्यते—कहलाता है।

दो प्रकार के जीव हैं—च्युत तथा अच्युत। भौतिक जगत् में प्रत्येक जीव च्युत है, और आध्यात्मिक जगत् में प्रत्येक जीव अच्युत कहलाता है।

जैसा कि पहले समझाया जा चुका है, भगवान् ने व्यासदेव के रूप में अपने अवतार में वेदान्त-सूत्र का संकलन किया। यहाँ भगवान् संक्षेप में वेदान्त-सूत्र की विषय-वस्तु दे रहे हैं : वे कहते हैं कि जीव, जो असंख्य हैं, दो वर्गों में विभाजित किए जा सकते हैं—च्युत तथा अच्युत। जीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के नित्य विभिन्नांश हैं। जब वे भौतिक जगत् के सम्पर्क में होते हैं, तब वे जीव-भूताः कहलाते हैं, और यहाँ दिए गए संस्कृत शब्द, सर्वाणि भूतानि, यह बताते हैं कि वे च्युत हैं। तथापि जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ एकता में हैं, वे अच्युत कहलाते हैं। एकता का अर्थ यह नहीं कि उनमें व्यक्तित्व नहीं, अपितु यह कि उनमें कोई फूट नहीं। वे सभी सृष्टि के प्रयोजन के प्रति अनुकूल हैं। निस्सन्देह, आध्यात्मिक जगत् में सृष्टि जैसी कोई वस्तु नहीं, किन्तु चूँकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने वेदान्त-सूत्र में कहा है कि वे समस्त उद्भवों के स्रोत हैं, अतः वह धारणा समझाई गई है।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के कथन के अनुसार दो प्रकार के मनुष्य हैं। वेद इसका प्रमाण देते हैं, अतः इसमें कोई सन्देह नहीं। जो जीव इस संसार में मन तथा पाँच इन्द्रियों के साथ संघर्ष कर रहे हैं, उनके भौतिक शरीर हैं, जो तब तक बदलते रहते हैं जब तक जीव बद्ध हैं। मनुष्य का शरीर पदार्थ के सम्पर्क के कारण बदलता है; पदार्थ बदलता रहता है, अतः जीव बदलता प्रतीत होता है। किन्तु आध्यात्मिक जगत् में शरीर पदार्थ से नहीं बना होता; अतः वहाँ कोई परिवर्तन नहीं। भौतिक जगत् में जीव छह परिवर्तन झेलता है—जन्म, वृद्धि, स्थिति, प्रजनन, फिर क्षय तथा विनाश। ये भौतिक शरीर के परिवर्तन हैं। किन्तु आध्यात्मिक जगत् में शरीर नहीं बदलता; वहाँ न वृद्धावस्था है, न जन्म है, न मृत्यु है। वहाँ सब कुछ एकता में विद्यमान है। इसे सर्वाणि भूतानि के रूप में और अधिक स्पष्ट रूप से समझाया गया है : कोई भी जीव जो पदार्थ के सम्पर्क में आया है, प्रथम सृष्ट प्राणी ब्रह्मा से लेकर एक छोटी चींटी तक, अपना शरीर बदल रहा है; अतः वे सभी च्युत हैं। तथापि आध्यात्मिक जगत् में वे सदा एकता में मुक्त रहते हैं।