अध्याय 15 · 16 / 19
15.17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥
uttamaḥ—सर्वोत्तम; puruṣaḥ—पुरुष; tu—किन्तु; anyaḥ—अन्य; param—परम; ātmā—आत्मा; iti—इस प्रकार; udāhṛtaḥ—कहा गया; yaḥ—जो; loka—ब्रह्माण्ड के; trayam—तीन विभाग; āviśya—प्रवेश करके; bibharti—पालन करते हुए; avyayaḥ—अक्षय; īśvaraḥ—भगवान्।
इन दोनों के अतिरिक्त एक परम पुरुष भी है, साक्षात् भगवान्, जिन्होंने इन समस्त लोकों में प्रवेश किया है और उनका पालन कर रहे हैं।
इस श्लोक का भाव कठोपनिषद् तथा श्वेताश्वतर उपनिषद् में अत्यन्त सुन्दर रीति से व्यक्त हुआ है। वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि असंख्य जीवों के ऊपर, जिनमें से कुछ बद्ध हैं और कुछ मुक्त, एक परम पुरुष विद्यमान हैं, जो परमात्मा हैं। उपनिषद् का वह श्लोक इस प्रकार है—nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām। इसका तात्पर्य यह है कि समस्त जीवों में, चाहे वे बद्ध हों या मुक्त, एक परम जीव-पुरुष हैं, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो उनका पालन करते हैं और भिन्न-भिन्न कर्म के अनुसार उन्हें भोग की समस्त सुविधाएँ प्रदान करते हैं। वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् परमात्मा रूप में प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं। जो विवेकी पुरुष उन्हें समझ सकता है, वही पूर्ण शान्ति प्राप्त करने का अधिकारी है, अन्य नहीं।
परमेश्वर तथा जीवों को एक ही स्तर पर अथवा सब प्रकार से समान मान लेना भ्रामक है। उनके व्यक्तित्व में सदैव श्रेष्ठता और निम्नता का प्रश्न बना रहता है। यह विशेष शब्द uttama अत्यन्त सार्थक है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को कोई भी पार नहीं कर सकता। Loke शब्द भी सार्थक है, क्योंकि पौरुष नामक वैदिक ग्रन्थ में कहा गया है—lokyate vedārtho ‘nena। परमात्मा रूप में अपने स्थानिक पक्ष से यही परमेश्वर वेदों के प्रयोजन की व्याख्या करते हैं। वेदों में निम्नलिखित श्लोक भी आता है—
tāvad eṣa samprasādo ‘smāc
charīrāt samutthāya paraṁ
jyoti-rūpaṁ sampadya svena
rūpeṇābhiniṣpadyate sa uttamaḥ puruṣaḥ
“शरीर से बाहर निकलकर परमात्मा निराकार ब्रह्मज्योति में प्रवेश करते हैं; तत्पश्चात् वे अपने रूप में अपनी आध्यात्मिक पहचान सहित स्थित रहते हैं। वही परम परम पुरुष कहलाते हैं।” इसका अर्थ यह है कि वे परम पुरुष अपनी आध्यात्मिक प्रभा को प्रकट तथा प्रसारित कर रहे हैं, जो परम प्रकाश है। उन परम पुरुष का परमात्मा रूप में एक स्थानिक पक्ष भी है। सत्यवती तथा पराशर के पुत्र रूप में अवतीर्ण होकर वे व्यासदेव के रूप में वैदिक ज्ञान की व्याख्या करते हैं।