अध्याय 16 · 10 / 19
16.13-15
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥
इदम्—यह; अद्य—आज; मया—मेरे द्वारा; लब्धम्—अर्जित; इमम्—इस; प्राप्स्ये—मैं प्राप्त करूँगा; मनोरथम्—अपनी इच्छाओं के अनुसार; इदम्—यह; अस्ति—है; इदम्—यह; अपि—भी; मे—मेरा; भविष्यति—भविष्य में बढ़ेगा; पुनः—फिर; धनम्—धन; असौ—वह; मया—मेरे द्वारा; हतः—मारा जा चुका है; शत्रुः—शत्रु; हनिष्ये—मैं मारूँगा; च—भी; अपरान्—अन्यों को; अपि—निश्चय ही; ईश्वरः—स्वामी; अहम्—मैं हूँ; अहम्—मैं हूँ; भोगी—भोक्ता; सिद्धः—सिद्ध; अहम्—मैं हूँ; बलवान्—बलवान्; सुखी—सुखी; आढ्यः—धनवान्; अभिजनवान्—कुलीन सम्बन्धियों से घिरा हुआ; अस्मि—मैं हूँ; कः—कौन और; अन्यः—दूसरा; अस्ति—है; सदृशः—समान; मया—मेरे; यक्ष्ये—मैं यज्ञ करूँगा; दास्यामि—मैं दान दूँगा; मोदिष्ये—मैं आनन्द मनाऊँगा; इति—इस प्रकार; अज्ञान—अज्ञान; विमोहिताः—से मोहित।
आसुरी व्यक्ति सोचता है : “आज मेरे पास इतना धन है, और मैं अपनी योजनाओं के अनुसार और अधिक प्राप्त करूँगा। इतना अब मेरा है, और यह भविष्य में अधिकाधिक बढ़ेगा। वह मेरा शत्रु है, और मैंने उसे मार डाला है; और मेरे अन्य शत्रु भी मारे जाएँगे। मैं सबका स्वामी हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं सिद्ध, बलवान् तथा सुखी हूँ। मैं सर्वाधिक धनवान् व्यक्ति हूँ, कुलीन सम्बन्धियों से घिरा हुआ हूँ। मेरे समान बलवान् तथा सुखी अन्य कोई नहीं है। मैं यज्ञ करूँगा, मैं कुछ दान दूँगा, और इस प्रकार मैं आनन्द मनाऊँगा।” इस प्रकार ऐसे व्यक्ति अज्ञान से मोहित रहते हैं।