अध्याय 16 · 9 / 19
16.11-12
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥ १२ ॥
चिन्ताम्—भय तथा चिन्ताओं को; अपरिमेयाम्—अपरिमेय; च—तथा; प्रलय-अन्ताम्—मृत्यु-पर्यन्त; उपाश्रिताः—उनकी शरण लेकर; काम-उपभोग—इन्द्रियतृप्ति; परमाः—जीवन का परम लक्ष्य; एतावत्—इतना; इति—इस प्रकार; निश्चिताः—निश्चय किए हुए; आशा-पाश—आशा के जाल में बन्धन; शतैः—सैकड़ों से; बद्धाः—बँधे हुए; काम—काम; क्रोध—क्रोध; परायणाः—सदा उसी मनोवृत्ति में स्थित; ईहन्ते—इच्छा करते हैं; काम—काम; भोग—इन्द्रिय-भोग; अर्थम्—उस प्रयोजन हेतु; अन्यायेन—अवैध रूप से; अर्थ—धन; सञ्चयान्—संचय करते हैं।
वे मानते हैं कि जीवन के अन्त तक इन्द्रियों को तृप्त करना मानव-सभ्यता की प्रमुख आवश्यकता है। इस प्रकार उनकी चिन्ता का कोई अन्त नहीं होता। सैकड़ों-सहस्रों इच्छाओं से, काम तथा क्रोध से बँधे हुए, वे इन्द्रियतृप्ति हेतु अवैध साधनों से धन एकत्र करते हैं।
आसुरी जन यह स्वीकार करते हैं कि इन्द्रियों का भोग जीवन का परम लक्ष्य है, और इस धारणा को वे मृत्यु-पर्यन्त बनाए रखते हैं। वे मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास नहीं करते, और न वे इसमें विश्वास करते हैं कि मनुष्य अपने कर्म अर्थात् इस संसार में किए गए कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर धारण करता है। उनकी जीवन-योजनाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं, और वे योजना पर योजना बनाते जाते हैं, जिनमें से कोई भी कभी पूर्ण नहीं होती। ऐसी आसुरी मनोवृत्ति वाले एक व्यक्ति का हमें व्यक्तिगत अनुभव है, जो मृत्यु के क्षण में भी चिकित्सक से अपना जीवन चार वर्ष और बढ़ाने का अनुरोध कर रहा था, क्योंकि उसकी योजनाएँ अभी पूर्ण नहीं हुई थीं। ऐसे मूर्ख लोग नहीं जानते कि चिकित्सक एक क्षण के लिए भी जीवन नहीं बढ़ा सकता। जब बुलावा आता है, तब मनुष्य की इच्छा का कोई विचार नहीं होता। प्रकृति के नियम जितना मनुष्य के भोग में बदा है, उससे एक क्षण भी अधिक की अनुमति नहीं देते।
आसुरी व्यक्ति, जिसे ईश्वर अथवा अपने भीतर स्थित परमात्मा में कोई श्रद्धा नहीं, केवल इन्द्रियतृप्ति हेतु सब प्रकार के पापकर्म करता है। वह नहीं जानता कि उसके हृदय के भीतर एक साक्षी विराजमान है। परमात्मा व्यष्टि-आत्मा के कर्मों का अवलोकन कर रहे हैं। जैसा वैदिक साहित्य, उपनिषदों में कहा गया है, एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं; एक कर्म कर रहा है और शाखाओं के फलों का भोग अथवा कष्ट भोग रहा है, और दूसरा साक्षी है। किन्तु जो आसुरी है, उसे वैदिक शास्त्र का कोई ज्ञान नहीं है, और न उसमें कोई श्रद्धा है; अतएव वह परिणामों की चिन्ता किए बिना इन्द्रिय-भोग हेतु कुछ भी करने में स्वयं को स्वतन्त्र अनुभव करता है।