हि

अध्याय 16 · 15 / 19

16.20

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥

आसुरीम्—आसुरी; योनिम्—योनि; आपन्नाः—प्राप्त करते हुए; मूढाः—मूर्ख; जन्मनि जन्मनि—जन्म-जन्मान्तर में; माम्—मुझे; अप्राप्य—प्राप्त किये बिना; एव—निश्चय ही; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; ततः—तत्पश्चात्; यान्ति—जाते हैं; अधमाम्—निकृष्ट; गतिम्—गति को।

आसुरी जीवन की योनियों में बारम्बार जन्म पाते हुए ऐसे व्यक्ति मुझे कभी प्राप्त नहीं कर पाते। धीरे-धीरे वे अस्तित्व के अत्यन्त निन्दनीय प्रकार में गिरते चले जाते हैं।

यह विख्यात है कि ईश्वर सर्वकरुणामय हैं, किन्तु यहाँ हम पाते हैं कि ईश्वर असुरों पर कभी करुणा नहीं करते। स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आसुरी प्रकृति के लोग जन्म-जन्मान्तर में वैसे ही असुरों के गर्भ में डाले जाते हैं, और परमेश्वर की कृपा प्राप्त न होने के कारण वे नीचे और नीचे गिरते जाते हैं, यहाँ तक कि अन्ततः वे बिल्ली, कुत्ते और सूअर जैसे शरीर प्राप्त करते हैं। स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ऐसे असुरों को परवर्ती जीवन की किसी भी अवस्था में ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का प्रायः कोई अवसर नहीं रहता। वेदों में भी कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति धीरे-धीरे गिरते हुए कुत्ते और सूअर बन जाते हैं। इस सन्दर्भ में यह तर्क किया जा सकता है कि यदि ईश्वर ऐसे असुरों पर करुणामय नहीं हैं, तो उन्हें सर्वकरुणामय रूप में प्रचारित नहीं करना चाहिए। इस प्रश्न के उत्तर में वेदान्त-सूत्र में हम पाते हैं कि परमेश्वर किसी से द्वेष नहीं करते। असुरों को जीवन की निम्नतम अवस्था में रखना तो मात्र उनकी कृपा का ही एक और रूप है। कभी-कभी असुरों का वध परमेश्वर द्वारा किया जाता है, किन्तु यह वध भी उनके लिए कल्याणकारी ही होता है, क्योंकि वैदिक साहित्य में हम पाते हैं कि जो कोई परमेश्वर द्वारा मारा जाता है वह मुक्त हो जाता है। इतिहास में अनेक असुरों के उदाहरण हैं—रावण, कंस, हिरण्यकशिपु—जिनका वध करने के लिए ही भगवान् ने विविध अवतार धारण किये। अतः यदि असुर इतने सौभाग्यशाली हों कि उनके द्वारा मारे जाएँ, तो उन पर भी ईश्वर की कृपा प्रकट होती है।