हि

अध्याय 16 · 14 / 19

16.19

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥

तान्—उन; अहम्—मैं; द्विषतः—ईर्ष्यालु; क्रूरान्—दुष्ट; संसारेषु—भौतिक अस्तित्व के सागर में; नराधमान्—मनुष्यों में निम्नतम; क्षिपामि—डालता हूँ; अजस्रम्—असंख्य; अशुभान्—अशुभ; आसुरीषु—आसुरी; एव—निश्चय ही; योनिषु—गर्भों में।

जो ईर्ष्यालु तथा दुष्ट हैं, जो मनुष्यों में निम्नतम हैं, उन्हें मैं भौतिक अस्तित्व के सागर में, विविध आसुरी जीवन-योनियों में डाल देता हूँ।

इस श्लोक में स्पष्ट रूप से इंगित है कि किसी विशिष्ट व्यष्टि-आत्मा को किसी विशिष्ट शरीर में रखना परम इच्छा का विशेषाधिकार है। आसुरी व्यक्ति भगवान् की सर्वोच्चता को स्वीकार करने के लिए सहमत न हो सकता है, और यह तथ्य है कि वह अपनी सनक के अनुसार कर्म कर सकता है, किन्तु उसका अगला जन्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के निर्णय पर निर्भर करेगा, स्वयं उस पर नहीं। श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध में कहा गया है कि व्यष्टि-आत्मा, अपनी मृत्यु के पश्चात्, एक माता के गर्भ में डाल दिया जाता है, जहाँ वह श्रेष्ठ शक्ति की देखरेख में एक विशिष्ट प्रकार का शरीर प्राप्त करता है। अतएव भौतिक अस्तित्व में हम इतनी जीवन-योनियाँ पाते हैं—पशु, कीट, मनुष्य, इत्यादि। ये सभी श्रेष्ठ शक्ति द्वारा व्यवस्थित हैं। वे आकस्मिक नहीं हैं। जहाँ तक असुरों का सम्बन्ध है, यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वे निरन्तर असुरों के गर्भों में डाले जाते हैं, और इस प्रकार वे ईर्ष्यालु, मनुष्यों में निम्नतम बने रहते हैं। ऐसी आसुरी जीवन-योनियाँ सदा काम से पूर्ण, सदा हिंसक तथा द्वेषपूर्ण और सदा अशुद्ध मानी जाती हैं। वे ठीक किसी जंगल के असंख्य पशुओं के समान हैं।