अध्याय 16 · 17 / 19
16.22
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥
एतैः—इनसे; विमुक्तः—मुक्त होकर; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; तमः-द्वारैः—अज्ञान के द्वारों से; त्रिभिः—तीन प्रकार के; नरः—मनुष्य; आचरति—सम्पन्न करता है; आत्मनः—आत्मा का; श्रेयः—कल्याण; ततः—तत्पश्चात्; याति—जाता है; पराम्—परम; गतिम्—गति को।
हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य नरक के इन तीन द्वारों से बच निकलता है, वह आत्म-साक्षात्कार के अनुकूल कर्म करता है और इस प्रकार धीरे-धीरे परम गति को प्राप्त होता है।
मनुष्य-जीवन के इन तीन शत्रुओं—काम, क्रोध और लोभ—से अत्यन्त सावधान रहना चाहिए। मनुष्य जितना अधिक काम, क्रोध और लोभ से मुक्त होता है, उतना ही उसका अस्तित्व शुद्ध होता जाता है। तब वह वैदिक साहित्य में विहित नियमों का पालन कर सकता है। मनुष्य-जीवन के नियामक सिद्धान्तों का पालन करते हुए मनुष्य धीरे-धीरे अपने को आध्यात्मिक अनुभूति के स्तर तक उठा लेता है। यदि कोई इतना सौभाग्यशाली हो कि ऐसे अभ्यास द्वारा कृष्णभावनामृत के स्तर तक उठ जाए, तो उसके लिए सफलता सुनिश्चित है। वैदिक साहित्य में क्रिया एवं प्रतिक्रिया की विधियाँ इसलिए निर्धारित की गई हैं कि मनुष्य शुद्धि की अवस्था तक पहुँच सके। समूची विधि काम, लोभ और क्रोध के त्याग पर आधारित है। इस प्रक्रिया का ज्ञान अर्जित करके मनुष्य आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च अवस्था तक उन्नत हो सकता है; और यह आत्म-साक्षात्कार भक्ति में पूर्णता को प्राप्त होता है। उस भक्ति में बद्धजीव की मुक्ति सुनिश्चित है। अतः वैदिक प्रणाली के अनुसार जीवन के चार आश्रम तथा जीवन की चार अवस्थाएँ स्थापित की गई हैं, जिन्हें वर्ण-व्यवस्था तथा आश्रम-व्यवस्था कहते हैं। समाज के भिन्न-भिन्न वर्णों अथवा विभागों के लिए भिन्न-भिन्न नियम हैं, और यदि कोई मनुष्य उनका पालन करने में समर्थ हो, तो वह स्वतः ही आध्यात्मिक अनुभूति के सर्वोच्च स्तर तक उठ जाएगा। तब वह नि:सन्देह मुक्ति प्राप्त कर सकता है।