हि

अध्याय 16 · 18 / 19

16.23

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ २३ ॥

यः—जो कोई; शास्त्र-विधिम्—शास्त्रों के नियमों को; उत्सृज्य—त्यागकर; वर्तते—रहता है; काम-कारतः—काम के वशीभूत होकर स्वेच्छाचार करते हुए; न—कभी नहीं; सः—वह; सिद्धिम्—सिद्धि; अवाप्नोति—प्राप्त करता है; न—कभी नहीं; सुखम्—सुख; न—कभी नहीं; पराम्—परम; गतिम्—सिद्धावस्था को।

किन्तु जो मनुष्य शास्त्रीय आदेशों को त्यागकर अपनी मनमानी के अनुसार आचरण करता है, वह न तो सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख और न ही परम गति को।

जैसा कि पूर्व में वर्णित है, शास्त्र-विधि अर्थात् शास्त्र का निर्देश मानव-समाज के विभिन्न वर्णों और आश्रमों के लिए दिया गया है। प्रत्येक से इन नियमों के पालन की अपेक्षा की जाती है। यदि कोई इनका पालन न करके अपने काम, लोभ और इच्छा के अनुसार स्वेच्छाचार करता है, तो वह अपने जीवन में कभी सिद्ध नहीं होगा। दूसरे शब्दों में, कोई मनुष्य सैद्धान्तिक रूप से इन समस्त बातों को जानता हो, किन्तु यदि वह उन्हें अपने जीवन में लागू नहीं करता, तो उसे मनुष्यों में निकृष्टतम जानना चाहिए। मनुष्य-योनि में जीव से यह अपेक्षा की जाती है कि वह विवेकशील हो और अपने जीवन को सर्वोच्च स्तर तक उठाने के लिए दिये गये नियमों का पालन करे, किन्तु यदि वह उनका पालन नहीं करता, तो वह अपना अधःपतन कर लेता है। परन्तु यदि वह नियमों, विधियों तथा नैतिक सिद्धान्तों का पालन भी करे और अन्ततः परमेश्वर को समझने की अवस्था तक न पहुँचे, तो उसका समस्त ज्ञान व्यर्थ हो जाता है। अतएव मनुष्य को धीरे-धीरे अपने को कृष्णभावनामृत तथा भक्ति के स्तर तक उठाना चाहिए; तभी और वहीं वह सर्वोच्च सिद्धावस्था को प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं।

काम-कारतः शब्द अत्यन्त सार्थक है। जो व्यक्ति जान-बूझकर नियमों का उल्लंघन करता है, वह काम के वशीभूत होकर आचरण करता है। वह जानता है कि यह निषिद्ध है, फिर भी वह वैसा ही करता है। इसी को स्वेच्छाचार कहते हैं। वह जानता है कि अमुक कर्म करना चाहिए, फिर भी वह उसे नहीं करता; इसीलिए उसे स्वेच्छाचारी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति परमेश्वर द्वारा निन्दित होने के लिए ही नियत हैं। ऐसे व्यक्ति उस सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकते जो मनुष्य-जीवन के लिए अभिप्रेत है। मनुष्य-जीवन विशेष रूप से अपने अस्तित्व की शुद्धि के लिए है, और जो नियमों एवं विधियों का पालन नहीं करता, वह न तो अपने को शुद्ध कर सकता है और न ही सुख की वास्तविक अवस्था को प्राप्त कर सकता है।