हि

अध्याय 16 · 5 / 19

16.7

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥

प्रवृत्तिम्—उचित कर्म; च—भी; निवृत्तिम्—अनुचित कर्म; च—तथा; जनाः—जन; न—कभी नहीं; विदुः—जानते हैं; आसुराः—आसुरी गुण वाले; न—कभी नहीं; शौचम्—शुचिता; न—न ही; अपि—भी; च—तथा; आचारः—आचरण; न—कभी नहीं; सत्यम्—सत्य; तेषु—उनमें; विद्यते—होता है।

जो आसुरी हैं, वे नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। उनमें न शुचिता, न उचित आचरण, न सत्य पाया जाता है।

प्रत्येक सभ्य मानव-समाज में शास्त्रीय नियमों तथा विधानों का कोई-न-कोई समूह होता है, जिनका आरम्भ से ही पालन किया जाता है—विशेष रूप से आर्यों में, जो वैदिक सभ्यता को अपनाते हैं और जो सर्वाधिक उन्नत सभ्य लोग माने जाते हैं। जो शास्त्रीय विधानों का पालन नहीं करते, वे असुर माने जाते हैं। अतः यहाँ कहा गया है कि असुर न शास्त्रीय नियमों को जानते हैं, और न उनके पालन की कोई प्रवृत्ति रखते हैं। उनमें से अधिकांश उन्हें नहीं जानते, और यदि उनमें से कुछ जानते भी हैं, तो उनमें उनके पालन की प्रवृत्ति नहीं होती। उनमें न श्रद्धा है, और न वे वैदिक विधानों के अनुसार कर्म करने के इच्छुक हैं। असुर न बाह्य रूप से शुद्ध होते हैं, न आन्तरिक रूप से।

मनुष्य को स्नान, दन्त-मार्जन, वस्त्र-परिवर्तन आदि द्वारा अपने शरीर को स्वच्छ रखने में सदा सावधान रहना चाहिए। जहाँ तक आन्तरिक शुचिता का सम्बन्ध है, मनुष्य को सदा ईश्वर के पवित्र नामों का स्मरण करना चाहिए तथा हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करना चाहिए। असुर बाह्य तथा आन्तरिक शुचिता के इन समस्त नियमों को न पसन्द करते हैं, न उनका पालन करते हैं।

जहाँ तक आचरण का सम्बन्ध है, मानव-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले अनेक नियम तथा विधान हैं, जैसे मनु-संहिता, जो मानव-जाति का विधान है। आज तक भी जो हिन्दू हैं, वे मनु-संहिता का अनुसरण करते हैं। उत्तराधिकार के नियम तथा अन्य वैधानिक व्यवस्थाएँ इसी ग्रन्थ से व्युत्पन्न हैं। अब, मनु-संहिता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्त्री को स्वतन्त्रता नहीं दी जानी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्रियों को दासियों के रूप में रखा जाए, अपितु वे बालकों के समान हैं। बालकों को स्वतन्त्रता नहीं दी जाती, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें दास के रूप में रखा जाता है। असुरों ने अब ऐसे विधानों की उपेक्षा कर दी है, और वे सोचते हैं कि स्त्रियों को पुरुषों के समान ही स्वतन्त्रता दी जानी चाहिए। तथापि, इससे संसार की सामाजिक दशा में सुधार नहीं हुआ है। वस्तुतः स्त्री को जीवन की प्रत्येक अवस्था में संरक्षण दिया जाना चाहिए। उसे बाल्यकाल में पिता द्वारा, यौवन में पति द्वारा तथा वृद्धावस्था में वयस्क पुत्रों द्वारा संरक्षण दिया जाना चाहिए। मनु-संहिता के अनुसार यही उचित सामाजिक आचरण है। किन्तु आधुनिक शिक्षा ने स्त्री-जीवन की एक कृत्रिम, दर्पयुक्त धारणा गढ़ ली है, और इसीलिए विवाह अब मानव-समाज में व्यावहारिक रूप से एक कल्पना मात्र है। और न ही अब स्त्री की नैतिक दशा अत्यन्त उत्तम है। अतएव असुर कोई ऐसी शिक्षा स्वीकार नहीं करते जो समाज के लिए हितकर हो, और चूँकि वे महान् ऋषियों के अनुभव तथा ऋषियों द्वारा निर्धारित नियमों एवं विधानों का पालन नहीं करते, अतः आसुरी जनों की सामाजिक दशा अत्यन्त दुःखमय है।