हि

अध्याय 16 · 4 / 19

16.6

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥

द्वौ—दो; भूत-सर्गौ—सृजित जीव; लोके—इस संसार में; अस्मिन्—इस; दैवः—देवतुल्य; आसुरः—आसुरी; एव—निश्चय ही; च—तथा; दैवः—दिव्य; विस्तरशः—विस्तारपूर्वक; प्रोक्तः—कहा गया; असुरम्—आसुरी; पार्थ—हे पृथापुत्र; मे—मुझसे; शृणु—सुनो।

हे पृथापुत्र! इस संसार में दो प्रकार के सृजित जीव हैं। एक दिव्य कहलाता है और दूसरा आसुरी। मैं तुम्हें दिव्य गुणों की विस्तारपूर्वक व्याख्या पहले ही कर चुका हूँ। अब मुझसे आसुरी गुणों के विषय में सुनो।

भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन को यह आश्वासन देने के पश्चात् कि वह दिव्य गुणों के साथ जन्मा है, अब आसुरी मार्ग का वर्णन कर रहे हैं। इस संसार में बद्धजीव दो वर्गों में विभाजित हैं। जो दिव्य गुणों के साथ जन्मे हैं, वे एक नियमित जीवन का पालन करते हैं; अर्थात् वे शास्त्रों के विधानों तथा अधिकारियों का अनुसरण करते हैं। मनुष्य को प्रामाणिक शास्त्र के आलोक में अपने कर्तव्यों का सम्पादन करना चाहिए। यह मनोवृत्ति दिव्य कहलाती है। जो शास्त्रों में निर्धारित नियामक सिद्धान्तों का पालन नहीं करता और जो अपनी सनक के अनुसार कर्म करता है, वह आसुरी अथवा असुर कहलाता है। शास्त्रों के नियामक सिद्धान्तों का पालन करने के अतिरिक्त अन्य कोई कसौटी नहीं है। वैदिक साहित्य में उल्लेख है कि देवता तथा असुर—दोनों प्रजापति से उत्पन्न हैं; एकमात्र अन्तर यह है कि एक वर्ग वैदिक विधानों का पालन करता है और दूसरा नहीं करता।