अध्याय 16 · 7 / 19
16.9
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥
एताम्—इस; दृष्टिम्—दृष्टि को; अवष्टभ्य—स्वीकार करके; नष्ट—खोया हुआ; आत्मानः—आत्मा; अल्प-बुद्धयः—अल्पबुद्धि; प्रभवन्ति—फलते-फूलते हैं; उग्र-कर्माणः—कष्टप्रद कर्मों में; क्षयाय—विनाश के लिए; जगतः—संसार के; अहिताः—अहितकर।
ऐसे निष्कर्षों का अनुसरण करते हुए, आसुरी जन, जो स्वयं को खो चुके हैं और जिनमें कोई बुद्धि नहीं है, अहितकर तथा भयंकर कर्मों में संलग्न होते हैं, जो संसार के विनाश हेतु अभिप्रेत हैं।
आसुरी जन ऐसे कर्मों में संलग्न हैं जो संसार को विनाश की ओर ले जाएँगे। भगवान् यहाँ कहते हैं कि वे अल्पबुद्धि हैं। भौतिकतावादी, जिनकी ईश्वर के विषय में कोई धारणा नहीं है, सोचते हैं कि वे प्रगति कर रहे हैं। किन्तु भगवद्गीता के अनुसार वे अबुद्धिमान् तथा समस्त विवेक से रहित हैं। वे इस भौतिक जगत् का अधिकतम सीमा तक भोग करने का प्रयत्न करते हैं और अतएव सदा इन्द्रियतृप्ति हेतु कुछ-न-कुछ आविष्कार करने में संलग्न रहते हैं। ऐसे भौतिकतावादी आविष्कार मानव-सभ्यता की उन्नति माने जाते हैं, किन्तु परिणाम यह होता है कि लोग अधिकाधिक हिंसक तथा अधिकाधिक क्रूर होते जाते हैं—पशुओं के प्रति क्रूर तथा अन्य मनुष्यों के प्रति क्रूर। उन्हें यह कोई बोध नहीं कि एक-दूसरे के प्रति कैसा व्यवहार किया जाए। आसुरी जनों में पशु-वध अत्यन्त प्रमुख है। ऐसे लोग संसार के शत्रु माने जाते हैं, क्योंकि अन्ततः वे ऐसी कोई वस्तु आविष्कृत अथवा सृजित करेंगे जो सबके लिए विनाश लाएगी। अप्रत्यक्ष रूप से यह श्लोक नाभिकीय अस्त्रों के आविष्कार की पूर्व-सूचना देता है, जिन पर आज समूचा संसार अत्यन्त गर्वित है। किसी भी क्षण युद्ध हो सकता है, और ये परमाणु अस्त्र महाविनाश रच सकते हैं। ऐसी वस्तुएँ केवल संसार के विनाश हेतु सृजित की जाती हैं, और यही यहाँ इंगित है। ईश्वर-विमुखता के कारण ही ऐसे अस्त्र मानव-समाज में आविष्कृत किए जाते हैं; वे संसार की शान्ति तथा समृद्धि के लिए अभिप्रेत नहीं हैं।