हि

अध्याय 16 · 8 / 19

16.10

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥

कामम्—काम; आश्रित्य—शरण लेकर; दुष्पूरम्—अतृप्य; दम्भ—घमण्ड; मान—मिथ्या प्रतिष्ठा; मद-अन्विताः—दर्प में लीन; मोहात्—मोह के कारण; गृहीत्वा—ग्रहण करके; असत्—अनित्य; ग्राहान्—वस्तुओं को; प्रवर्तन्ते—फलते-फूलते हैं; अशुचि—अशुद्ध; व्रताः—व्रती।

आसुरी जन, अतृप्य काम, घमण्ड तथा मिथ्या प्रतिष्ठा की शरण लेकर, और इस प्रकार मोहग्रस्त होकर, अनित्य की ओर आकृष्ट हुए, सदा अशुद्ध कर्म के व्रती रहते हैं।

आसुरी मनोवृत्ति का यहाँ वर्णन है। असुरों का काम कभी तृप्त नहीं होता। वे भौतिक भोग की अपनी अतृप्य इच्छाओं को निरन्तर बढ़ाते जाएँगे। यद्यपि अनित्य वस्तुओं को स्वीकार करने के कारण वे सदा चिन्ताओं से पूर्ण रहते हैं, फिर भी वे मोह के कारण ऐसे कर्मों में संलग्न रहते हैं। उनमें कोई ज्ञान नहीं है और वे यह नहीं बता सकते कि वे ग़लत मार्ग की ओर बढ़ रहे हैं। अनित्य वस्तुओं को स्वीकार करके, ऐसे आसुरी जन अपना ईश्वर गढ़ लेते हैं, अपने स्तोत्र गढ़ लेते हैं और तदनुसार जप करते हैं। परिणाम यह होता है कि वे दो वस्तुओं की ओर अधिकाधिक आकृष्ट हो जाते हैं—यौन-भोग तथा भौतिक धन का संचय। इस सन्दर्भ में अशुचि-व्रताः अर्थात् अशुद्ध व्रत शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ऐसे आसुरी जन केवल मद्य, स्त्री, द्यूत तथा मांस-भक्षण की ओर आकृष्ट रहते हैं; ये ही उनके अशुचि अर्थात् अशुद्ध आचरण हैं। घमण्ड तथा मिथ्या प्रतिष्ठा से प्रेरित होकर, वे धर्म के कुछ सिद्धान्त गढ़ लेते हैं जो वैदिक विधानों द्वारा अनुमोदित नहीं हैं। यद्यपि ऐसे आसुरी जन संसार में सर्वाधिक निन्द्य हैं, फिर भी कृत्रिम साधनों से संसार उनके लिए एक मिथ्या मान सृजित कर देता है। यद्यपि वे नरक की ओर फिसल रहे हैं, फिर भी वे स्वयं को अत्यन्त उन्नत मानते हैं।