अध्याय 18 · 74 / 74
18.78
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥
यत्र—जहाँ; योगेश्वरः—योग के स्वामी; कृष्णः—भगवान् श्रीकृष्ण; यत्र—जहाँ; पार्थः—पृथापुत्र; धनुर्-धरः—धनुष-बाण धारण करने वाला; तत्र—वहाँ; श्रीः—ऐश्वर्य; विजयः—विजय; भूतिः—असाधारण शक्ति; ध्रुवा—निश्चय ही; नीतिः—नीति; मतिः मम—मेरा मत है।
जहाँ समस्त योगियों के स्वामी श्रीकृष्ण हैं, और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन है, वहाँ निश्चय ही ऐश्वर्य, विजय, असाधारण शक्ति तथा नीति भी होगी। यही मेरा मत है।
भगवद्गीता का आरम्भ धृतराष्ट्र की एक जिज्ञासा से हुआ। वह भीष्म, द्रोण तथा कर्ण जैसे महान् योद्धाओं द्वारा सहायता प्राप्त अपने पुत्रों की विजय की आशा कर रहा था। उसे आशा थी कि विजय उसी के पक्ष में होगी। किन्तु युद्धक्षेत्र के दृश्य का वर्णन करने के पश्चात् सञ्जय ने राजा से कहा, “आप विजय का विचार कर रहे हैं, किन्तु मेरा मत यह है कि जहाँ श्रीकृष्ण तथा अर्जुन उपस्थित हैं, वहाँ समस्त सौभाग्य रहेगा।” उसने स्पष्ट रूप से इसकी पुष्टि की कि धृतराष्ट्र अपने पक्ष की विजय की अपेक्षा नहीं कर सकता। अर्जुन के पक्ष की विजय निश्चित थी, क्योंकि वहाँ श्रीकृष्ण विद्यमान थे। श्रीकृष्ण का अर्जुन के सारथि का पद ग्रहण करना एक अन्य ऐश्वर्य का प्रदर्शन था। श्रीकृष्ण समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, और त्याग उनमें से एक है। ऐसे त्याग के अनेक उदाहरण हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण त्याग के भी स्वामी हैं।
वास्तव में युद्ध दुर्योधन तथा युधिष्ठिर के बीच था। अर्जुन अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की ओर से युद्ध कर रहा था। चूँकि श्रीकृष्ण तथा अर्जुन युधिष्ठिर के पक्ष में थे, अतः युधिष्ठिर की विजय निश्चित थी। यह युद्ध इस बात का निर्णय करने वाला था कि जगत् पर कौन शासन करेगा, और सञ्जय ने भविष्यवाणी की कि सत्ता युधिष्ठिर को हस्तान्तरित होगी। यहाँ यह भी भविष्यवाणी की गई है कि युधिष्ठिर, इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात्, उत्तरोत्तर समृद्ध होगा, क्योंकि वह केवल धर्मात्मा तथा पवित्र ही नहीं, अपितु एक कठोर नीतिवान् भी था। उसने अपने जीवन में कभी असत्य नहीं कहा।
ऐसे अनेक अल्पबुद्धि व्यक्ति हैं जो भगवद्गीता को युद्धक्षेत्र में दो मित्रों के बीच के विषयों की चर्चा मात्र मानते हैं। किन्तु ऐसी पुस्तक शास्त्र नहीं हो सकती। कुछ लोग यह आपत्ति कर सकते हैं कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए उकसाया, जो अनैतिक है, किन्तु स्थिति की वास्तविकता स्पष्ट रूप से कही गई है—भगवद्गीता नीति का परम निर्देश है। नीति का परम निर्देश नवें अध्याय के चौंतीसवें श्लोक में कहा गया है—मन्मना भव मद्भक्तः। मनुष्य को श्रीकृष्ण का भक्त बनना चाहिए, और समस्त धर्म का सार श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण करना है, जैसा कि कहा गया है—सर्व-धर्मान्। भगवद्गीता के निर्देश धर्म तथा नीति की परम प्रक्रिया का निर्माण करते हैं। अन्य समस्त प्रक्रियाएँ शुद्ध करने वाली हो सकती हैं और इस प्रक्रिया की ओर ले जा सकती हैं, किन्तु गीता का अन्तिम निर्देश समस्त नीति तथा धर्म का अन्तिम शब्द है—श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण। यही अठारहवें अध्याय का निर्णय है।
भगवद्गीता से हम समझ सकते हैं कि दार्शनिक चिन्तन तथा ध्यान द्वारा आत्म-साक्षात्कार करना एक प्रक्रिया है, किन्तु श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण करना सर्वोच्च सिद्धि है। यही भगवद्गीता की शिक्षाओं का सार है। सामाजिक जीवन की व्यवस्थाओं के अनुसार तथा धर्म के विभिन्न मार्गों के अनुसार विधि-नियमों का मार्ग ज्ञान का एक गोपनीय मार्ग हो सकता है, जहाँ तक धर्म के कर्मकाण्ड गोपनीय हैं, किन्तु तब भी मनुष्य ध्यान तथा ज्ञान-अनुशीलन में संलग्न रहता है। पूर्ण कृष्णभावनामृत में भक्ति के द्वारा श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण ही सर्वाधिक गोपनीय निर्देश है और अठारहवें अध्याय का सार है।
भगवद्गीता की एक अन्य विशेषता यह है कि वास्तविक सत्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं। परम सत्य की अनुभूति तीन रूपों में होती है—निराकार ब्रह्म, स्थानिक परमात्मा तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण। परम सत्य का पूर्ण ज्ञान श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान है। यदि कोई श्रीकृष्ण को समझ ले, तो ज्ञान के समस्त विभाग उस समझ के अभिन्न अंग हैं। श्रीकृष्ण दिव्य हैं, क्योंकि वे सदैव अपनी नित्य अन्तरंगा शक्ति में स्थित रहते हैं। जीव प्रकट हैं और दो श्रेणियों में विभाजित हैं—नित्य बद्ध तथा नित्य मुक्त। ऐसे जीव असंख्य हैं, और उन्हें श्रीकृष्ण के मूलभूत अंश माना जाता है। भौतिक शक्ति चौबीस विभागों में प्रकट होती है। सृष्टि नित्य काल द्वारा सम्पन्न होती है, और इसकी रचना तथा संहार बहिरंगा शक्ति द्वारा होते हैं। विश्व-जगत् का यह प्रकटीकरण बारम्बार दृश्य तथा अदृश्य होता रहता है।
भगवद्गीता में पाँच प्रमुख विषयों की विवेचना की गई है—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, भौतिक प्रकृति, जीव, नित्य काल तथा समस्त प्रकार के कर्म। ये सभी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण पर आश्रित हैं। परम सत्य की समस्त धारणाएँ, अर्थात् निराकार ब्रह्म, स्थानिक परमात्मा, अथवा कोई अन्य दिव्य धारणा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझने की श्रेणी के भीतर ही विद्यमान हैं। यद्यपि ऊपरी दृष्टि से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जीव, भौतिक प्रकृति तथा काल भिन्न प्रतीत होते हैं, तथापि कोई भी परमेश्वर से भिन्न नहीं है। किन्तु परमेश्वर सदैव सबसे भिन्न हैं। भगवान् चैतन्य का दर्शन “अचिन्त्य एकता तथा भेद” का है। दर्शन की यह पद्धति परम सत्य के पूर्ण ज्ञान का निर्माण करती है।
जीव अपनी मूल स्थिति में शुद्ध आत्मा है। वह परमात्मा के एक आणविक कण के समान है। किन्तु बद्ध जीव भगवान् की तटस्थ शक्ति है; उसकी प्रवृत्ति भौतिक शक्ति तथा आध्यात्मिक शक्ति दोनों के सम्पर्क में रहने की होती है। दूसरे शब्दों में, जीव भगवान् की दो शक्तियों के मध्य स्थित है, और चूँकि वह भगवान् की परा शक्ति से सम्बन्ध रखता है, अतः उसमें स्वतन्त्रता का एक अंश है। उस स्वतन्त्रता के समुचित प्रयोग द्वारा वह श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष निर्देश के अधीन आ जाता है। इस प्रकार वह आह्लाददायिनी शक्ति में अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त करता है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय “उपसंहार—संन्यास की पूर्णता” पर भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं, और इसके साथ ही सम्पूर्ण भगवद्गीता का समापन होता है।