अध्याय 3 · 32 / 43
3.32
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥
ये—वे; तु—किन्तु; एतत्—यह; अभ्यसूयन्तः—ईर्ष्यावश; न—नहीं; अनुतिष्ठन्ति—नियमित रूप से सम्पन्न करते हैं; मे—मेरे; मतम्—आदेश; सर्व-ज्ञान—समस्त प्रकार के ज्ञान से; विमूढान्—पूर्णतः मूढ़; तान्—वे हैं; विद्धि—भली-भाँति जान लो; नष्टान्—सर्वथा नष्ट; अचेतसः—कृष्णभावनामृत से रहित।
किन्तु जो लोग ईर्ष्यावश इन शिक्षाओं की अवहेलना करते हैं और इनका नियमित रूप से अभ्यास नहीं करते, उन्हें समस्त ज्ञान से रहित, मूढ़ तथा अज्ञान एवं बन्धन की ओर अभिशप्त समझना चाहिए।
कृष्णभावनाभावित न होने का दोष यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है। जैसे परम शासनाध्यक्ष के आदेश की अवज्ञा पर दण्ड मिलता है, वैसे ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश की अवज्ञा पर भी निश्चय ही दण्ड मिलता है। आदेश की अवज्ञा करने वाला व्यक्ति, चाहे वह कितना ही महान् क्यों न हो, हृदय के रिक्त होने के कारण अपने स्वरूप का, परब्रह्म का, परमात्मा का तथा भगवान् का अज्ञानी रहता है। अतएव उसके लिए जीवन की पूर्णता की कोई आशा नहीं रहती।