अध्याय 3 · 31 / 43
3.31
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥
ये—वे; मे—मेरे; मतम्—आदेश; इदम्—यह; नित्यम्—नित्य कर्तव्य; अनुतिष्ठन्ति—नियमित रूप से सम्पन्न करते हैं; मानवाः—मनुष्य; श्रद्धावन्तः—श्रद्धा एवं भक्ति सहित; अनसूयन्तः—बिना ईर्ष्या के; मुच्यन्ते—मुक्त हो जाते हैं; ते—वे सभी; अपि—भी; कर्मभिः—सकाम कर्म के नियम के बन्धन से।
जो मनुष्य मेरे आदेशों के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करता है तथा इस शिक्षा का श्रद्धापूर्वक, बिना ईर्ष्या के अनुसरण करता है, वह सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाता है।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का आदेश समस्त वैदिक प्रज्ञा का सार है, अतएव वह बिना किसी अपवाद के नित्य सत्य है। जैसे वेद नित्य हैं, वैसे ही कृष्णभावनामृत का यह सत्य भी नित्य है। मनुष्य को भगवान् के प्रति ईर्ष्या किए बिना इस आदेश में दृढ़ श्रद्धा रखनी चाहिए। ऐसे अनेक दार्शनिक हैं जो भगवद्गीता पर टीका लिखते हैं, किन्तु श्रीकृष्ण में उनकी श्रद्धा नहीं होती। वे कभी भी सकाम कर्म के बन्धन से मुक्त नहीं होंगे। किन्तु भगवान् के नित्य आदेशों में दृढ़ श्रद्धा रखने वाला एक साधारण मनुष्य, यद्यपि वह ऐसे आदेशों को सम्पन्न करने में असमर्थ हो, तो भी कर्म के नियम के बन्धन से मुक्त हो जाता है। कृष्णभावनामृत के आरम्भ में मनुष्य भगवान् के आदेशों का पूर्ण रूप से निर्वाह भले न कर पाए, किन्तु क्योंकि वह इस सिद्धान्त के प्रति विरोध नहीं रखता और पराजय तथा निराशा का विचार किए बिना निष्ठापूर्वक कर्म करता है, इसलिए वह निश्चय ही शुद्ध कृष्णभावनामृत की अवस्था तक उन्नत होगा।