अध्याय 3 · 34 / 43
3.34
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥
इन्द्रियस्य—इन्द्रियों का; इन्द्रियस्य अर्थे—इन्द्रिय-विषयों में; राग—आसक्ति; द्वेषौ—तथा विराग में भी; व्यवस्थितौ—नियमों के अधीन रखे गए; तयोः—उनके; न—कभी नहीं; वशम्—वश में; आगच्छेत्—मनुष्य को आना चाहिए; तौ—वे; हि—निश्चय ही हैं; अस्य—उसके; परिपन्थिनौ—अवरोधक।
देहधारी प्राणी इन्द्रिय-विषयों के प्रति आकर्षण तथा विकर्षण का अनुभव करते हैं, किन्तु मनुष्य को इन्द्रियों एवं इन्द्रिय-विषयों के वश में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वे आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में अवरोधक हैं।
जो कृष्णभावनाभावित हैं, वे स्वभावतः भौतिक इन्द्रियतृप्ति में प्रवृत्त होने के प्रति अनिच्छुक रहते हैं। किन्तु जो ऐसी भावना से रहित हैं, उन्हें प्रकट शास्त्रों के नियमों एवं विधानों का अनुसरण करना चाहिए। अनियन्त्रित इन्द्रिय-भोग भौतिक बन्धन का कारण है, किन्तु जो प्रकट शास्त्रों के नियमों एवं विधानों का अनुसरण करता है, वह इन्द्रिय-विषयों से बन्धन में नहीं पड़ता। उदाहरणार्थ, बद्धजीव के लिए यौन-भोग एक आवश्यकता है, और यौन-भोग की अनुमति विवाह-बन्धन की मर्यादा के अन्तर्गत दी गई है। उदाहरणार्थ, शास्त्रीय आदेशों के अनुसार मनुष्य को अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री के साथ यौन-सम्बन्ध रखने का निषेध है। अन्य समस्त स्त्रियों को अपनी माता के समान मानना चाहिए। किन्तु ऐसे आदेशों के होते हुए भी मनुष्य अन्य स्त्रियों के साथ यौन-सम्बन्ध रखने की ओर प्रवृत्त रहता है। इन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना चाहिए; अन्यथा वे आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में अवरोधक बन जाएँगी। जब तक भौतिक शरीर विद्यमान है, तब तक भौतिक शरीर की आवश्यकताओं की अनुमति है, किन्तु नियमों एवं विधानों के अधीन। तथापि हमें ऐसी छूटों के नियन्त्रण पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मनुष्य को उन नियमों एवं विधानों का अनुसरण उनके प्रति अनासक्त रहकर करना होता है, क्योंकि नियमों के अधीन इन्द्रियतृप्ति का अभ्यास भी मनुष्य को पथभ्रष्ट कर सकता है—जैसे राजमार्गों पर भी दुर्घटना की सम्भावना सदा बनी रहती है। चाहे उनका कितने ही सावधानी से रखरखाव क्यों न किया जाए, कोई भी इसकी गारंटी नहीं दे सकता कि सुरक्षित से सुरक्षित मार्ग पर भी कोई संकट नहीं होगा। भौतिक संग के कारण इन्द्रिय-भोग की वृत्ति अत्यन्त दीर्घ काल से प्रचलित रही है। अतएव नियमित इन्द्रिय-भोग के होते हुए भी पतन की पूरी सम्भावना रहती है; इसलिए नियमित इन्द्रिय-भोग के प्रति किसी भी आसक्ति से भी हर प्रकार से बचना चाहिए। किन्तु श्रीकृष्ण की प्रेममयी सेवा में किया गया कर्म मनुष्य को समस्त प्रकार की ऐन्द्रिक क्रियाओं से विरक्त कर देता है। अतएव किसी को भी जीवन की किसी भी अवस्था में कृष्णभावनामृत से विरक्त होने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। समस्त प्रकार की इन्द्रिय-आसक्ति से विरक्ति का सम्पूर्ण प्रयोजन अन्ततः कृष्णभावनामृत के धरातल पर स्थित होना ही है।