अध्याय 3 · 35 / 43
3.35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥
श्रेयान्—कहीं श्रेष्ठ; स्व-धर्मः—अपने विहित कर्तव्य; विगुणः—त्रुटिपूर्ण होने पर भी; पर-धर्मात्—अन्यों के लिए कहे गए कर्तव्यों से; स्वनुष्ठितात्—भली-भाँति सम्पन्न किए जाने की अपेक्षा; स्व-धर्मे—अपने विहित कर्तव्यों में; निधनम्—विनाश; श्रेयः—श्रेष्ठ; पर-धर्मः—अन्यों के लिए विहित कर्तव्य; भय-आवहः—भयावह।
अपने विहित कर्तव्यों का पालन, चाहे वे त्रुटिपूर्ण ही क्यों न हों, अन्यों के कर्तव्यों की अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ है। अपने धर्म के पालन के क्रम में मृत्यु, अन्यों के कर्तव्यों में संलग्न होने से श्रेयस्कर है, क्योंकि अन्यों के मार्ग का अनुसरण भयावह है।
अतएव मनुष्य को अन्यों के लिए विहित कर्तव्यों के बजाय अपने विहित कर्तव्यों का पूर्ण कृष्णभावनामृत में निर्वाह करना चाहिए। विहित कर्तव्य मनुष्य की उस मनोदैहिक अवस्था के अनुरूप होते हैं जो भौतिक प्रकृति के गुणों के प्रभाव में होती है। आध्यात्मिक कर्तव्य वे हैं जिनका आदेश आध्यात्मिक गुरु, श्रीकृष्ण की दिव्य सेवा हेतु, देते हैं। किन्तु भौतिक रूप से हो या आध्यात्मिक रूप से, मनुष्य को अन्यों के विहित कर्तव्यों का अनुकरण करने के बजाय मृत्युपर्यन्त अपने विहित कर्तव्यों पर ही डटे रहना चाहिए। आध्यात्मिक धरातल के कर्तव्य तथा भौतिक धरातल के कर्तव्य भिन्न हो सकते हैं, किन्तु अधिकृत निर्देश के अनुसरण का सिद्धान्त कर्ता के लिए सदैव हितकर है। जब मनुष्य भौतिक प्रकृति के गुणों के प्रभाव में हो, तब उसे विशेष परिस्थितियों हेतु विहित नियमों का अनुसरण करना चाहिए और अन्यों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। उदाहरणार्थ, सत्त्वगुण में स्थित ब्राह्मण अहिंसक होता है, जबकि रजोगुण में स्थित क्षत्रिय को हिंसा की अनुमति है। ऐसे में क्षत्रिय के लिए अहिंसा के सिद्धान्तों का पालन करने वाले ब्राह्मण का अनुकरण करने की अपेक्षा हिंसा के नियमों का पालन करते हुए पराजित होना श्रेष्ठ है। प्रत्येक मनुष्य को अपना हृदय क्रमिक प्रक्रिया से शुद्ध करना होता है, सहसा नहीं। तथापि जब मनुष्य भौतिक प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और पूर्ण रूप से कृष्णभावनामृत में स्थित हो जाता है, तब वह प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के निर्देश के अधीन कुछ भी कर सकता है। कृष्णभावनामृत की उस पूर्ण अवस्था में क्षत्रिय ब्राह्मण के समान आचरण कर सकता है, अथवा ब्राह्मण क्षत्रिय के समान आचरण कर सकता है। दिव्य अवस्था में भौतिक जगत् के भेद लागू नहीं होते। उदाहरणार्थ, विश्वामित्र मूलतः क्षत्रिय थे, किन्तु आगे चलकर उन्होंने ब्राह्मण के समान आचरण किया, जबकि परशुराम ब्राह्मण थे, किन्तु आगे चलकर उन्होंने क्षत्रिय के समान आचरण किया। दिव्य रूप से स्थित होने के कारण वे ऐसा कर सके; किन्तु जब तक मनुष्य भौतिक धरातल पर है, तब तक उसे भौतिक प्रकृति के गुणों के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करना ही चाहिए। साथ ही उसमें कृष्णभावनामृत का पूर्ण बोध होना चाहिए।