हि

अध्याय 3 · 39 / 43

3.39

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥

आवृतम्—ढकी हुई; ज्ञानम्—शुद्ध चेतना; एतेन—इससे; ज्ञानिनः—ज्ञानी की; नित्य-वैरिणा—नित्य शत्रु; काम-रूपेण—काम के रूप में; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; दुष्पूरेण—कभी न तृप्त होने वाले; अनलेन—अग्नि के द्वारा; च—भी।

इस प्रकार मनुष्य की शुद्ध चेतना उसके नित्य शत्रु काम के रूप में ढकी रहती है, जो कभी तृप्त नहीं होता और जो अग्नि के समान जलता रहता है।

मनु-स्मृति में कहा गया है कि काम को किसी भी मात्रा के इन्द्रिय-भोग से तृप्त नहीं किया जा सकता, ठीक जैसे अग्नि ईंधन की निरन्तर आपूर्ति से कभी नहीं बुझती। भौतिक जगत् में समस्त क्रियाओं का केन्द्र यौन-भोग है, और इसीलिए इस भौतिक जगत् को मैथुन्य-आगार, अथवा यौन-जीवन का बन्धन कहा जाता है। साधारण कारागार में अपराधियों को सींखचों के भीतर रखा जाता है; इसी प्रकार जो अपराधी भगवान् के नियमों के अवज्ञाकारी हैं, वे यौन-जीवन से बँधे रहते हैं। इन्द्रियतृप्ति के आधार पर भौतिक सभ्यता की उन्नति का अर्थ है जीव के भौतिक अस्तित्व की अवधि को बढ़ाना। अतएव यह काम अज्ञान का प्रतीक है, जिसके द्वारा जीव भौतिक जगत् में बँधा रखा जाता है। जब मनुष्य इन्द्रियतृप्ति का भोग करता है, तब सम्भव है कि सुख की कुछ अनुभूति हो, किन्तु वस्तुतः वह तथाकथित सुखानुभूति इन्द्रिय-भोगी की परम शत्रु है।