अध्याय 3 · 40 / 43
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इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥
तस्मात्—अतएव; त्वम्—तुम; इन्द्रियाणि—इन्द्रियों को; आदौ—आरम्भ में ही; नियम्य—नियमित करके; भरतर्षभ—हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ; पाप्मानम्—पाप के महान् प्रतीक को; प्रजहि—अंकुश में लाओ; हि—निश्चय ही; एनम्—इसे; ज्ञान—ज्ञान; विज्ञान—शुद्ध आत्मा का वैज्ञानिक ज्ञान; नाशनम्—नाशक।
अतएव हे अर्जुन, भरतवंशियों में श्रेष्ठ! आरम्भ में ही इन्द्रियों को नियमित करके पाप के इस महान् प्रतीक [काम] को अंकुश में लाओ, और ज्ञान एवं आत्म-साक्षात्कार के इस नाशक का संहार करो।
भगवान् ने अर्जुन को सलाह दी कि वह आरम्भ से ही इन्द्रियों को नियमित करे, ताकि वह सबसे बड़े पापमय शत्रु काम को अंकुश में ला सके, जो आत्म-साक्षात्कार की उत्कण्ठा को, और विशेष रूप से आत्मा के ज्ञान को, नष्ट कर देता है। ज्ञानम् का तात्पर्य आत्मा के अनात्मा से भिन्न ज्ञान से है, अर्थात् दूसरे शब्दों में, इस ज्ञान से कि आत्मा शरीर नहीं है। विज्ञानम् का तात्पर्य आत्मा के विशिष्ट ज्ञान से तथा मनुष्य की स्वरूप-स्थिति एवं परमात्मा के साथ उसके सम्बन्ध के ज्ञान से है। श्रीमद्भागवत में इसे इस प्रकार समझाया गया है : ज्ञानं परम-गुह्यं मे यद्-विज्ञान-समन्वितम् / सरहस्यं तद्-अङ्गं च गृहाण गदितं मया : “आत्मा तथा परमात्मा का ज्ञान अत्यन्त गोपनीय एवं रहस्यमय है, क्योंकि वह माया से आच्छादित है, किन्तु ऐसा ज्ञान तथा विशिष्ट अनुभूति तभी समझी जा सकती है जब स्वयं भगवान् इसे समझाएँ।” भगवद्गीता हमें वही ज्ञान देती है, विशेष रूप से आत्मा का ज्ञान। जीव भगवान् के अंश हैं, अतएव वे केवल भगवान् की सेवा करने हेतु ही बने हैं। इस चेतना को ही कृष्णभावनामृत कहा जाता है। अतएव जीवन के आरम्भ से ही मनुष्य को यह कृष्णभावनामृत सीखना चाहिए, जिससे वह पूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित होकर तदनुसार आचरण कर सके।
काम केवल ईश्वर-प्रेम का विकृत प्रतिबिम्ब है, जो प्रत्येक जीव के लिए स्वाभाविक है। किन्तु यदि मनुष्य को आरम्भ से ही कृष्णभावनामृत में शिक्षित किया जाए, तो वह स्वाभाविक ईश्वर-प्रेम काम में अवनत नहीं हो सकता। जब ईश्वर-प्रेम काम में अवनत हो जाता है, तब सामान्य अवस्था में लौटना अत्यन्त कठिन हो जाता है। तथापि कृष्णभावनामृत इतना शक्तिशाली है कि विलम्ब से आरम्भ करने वाला भी भक्ति की विधि-विधानों का अनुसरण करके ईश्वर-प्रेमी बन सकता है। अतएव जीवन की किसी भी अवस्था से, अथवा उसकी अनिवार्यता के बोध के समय से, मनुष्य कृष्णभावनामृत में, अर्थात् भगवान् की भक्ति में, इन्द्रियों को नियमित करना आरम्भ कर सकता है, और काम को ईश्वर-प्रेम में—जो मानव-जीवन की सर्वोच्च पूर्णावस्था है—परिणत कर सकता है।