हि

अध्याय 3 · 4 / 43

3.4

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥

न—बिना; कर्मणाम्—विहित कर्तव्यों के; अनारम्भात्—अनाचरण; नैष्कर्म्यम्—प्रतिक्रिया से मुक्ति; पुरुषः—मनुष्य; अश्नुते—प्राप्त करता है; न—न तो; च—भी; संन्यसनात्—त्याग से; एव—मात्र; सिद्धिम्—सफलता; समधिगच्छति—प्राप्त करता है।

न तो केवल कर्म से विरत होने मात्र से कोई प्रतिक्रिया से मुक्ति पा सकता है, और न ही केवल त्याग से कोई सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

विहित कर्तव्यों के निर्वाह से शुद्ध हो जाने पर ही संन्यास-आश्रम स्वीकार किया जा सकता है, और ये कर्तव्य भौतिकतावादी मनुष्यों के हृदय को शुद्ध करने हेतु ही निर्धारित किए गए हैं। शुद्धि के बिना, चौथे आश्रम (संन्यास) को सहसा अपनाने से कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। अनुभववादी दार्शनिकों के अनुसार, केवल संन्यास ग्रहण करने अथवा सकाम कर्मों से निवृत्त होने मात्र से ही मनुष्य तत्काल नारायण के तुल्य हो जाता है। किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण इस सिद्धान्त का अनुमोदन नहीं करते। हृदय की शुद्धि के बिना, संन्यास तो सामाजिक व्यवस्था के लिए मात्र एक उपद्रव है। दूसरी ओर, यदि कोई अपने विहित कर्तव्यों का निर्वाह किए बिना भी भगवान् की दिव्य सेवा ग्रहण कर लेता है, तो वह इस ध्येय में जो भी उन्नति कर पाता है, उसे भगवान् स्वीकार कर लेते हैं (बुद्धियोग)। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्। ऐसे सिद्धान्त का अल्प आचरण भी मनुष्य को महान् कठिनाइयों से पार उतार देता है।