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अध्याय 3 · 5 / 43

3.5

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥

न—न तो; हि—निश्चय ही; कश्चित्—कोई; क्षणम्—क्षण भर; अपि—भी; जातु—कभी; तिष्ठति—रहता है; अकर्म-कृत्—बिना कुछ किए; कार्यते—करने को विवश है; हि—निश्चय ही; अवशः—विवश होकर; कर्म—कर्म; सर्वः—समस्त; प्रकृति-जैः—भौतिक प्रकृति के गुणों से उत्पन्न; गुणैः—गुणों के द्वारा।

समस्त मनुष्य भौतिक प्रकृति के गुणों से उत्पन्न प्रवृत्तियों के अनुसार विवश होकर कर्म करने को बाध्य हैं; अतः कोई भी एक क्षण के लिए भी कुछ किए बिना नहीं रह सकता।

यह देहधारी जीवन का प्रश्न नहीं, अपितु आत्मा का स्वभाव ही सदा सक्रिय रहना है। आत्मा की उपस्थिति के बिना, भौतिक शरीर हिल नहीं सकता। शरीर तो केवल एक निर्जीव वाहन है, जिसे आत्मा के द्वारा चलाया जाना है, जो सदा सक्रिय रहती है और एक क्षण के लिए भी रुक नहीं सकती। ऐसी स्थिति में, आत्मा को कृष्णभावनामृत के शुभ कर्म में संलग्न रहना चाहिए, अन्यथा वह माया-शक्ति द्वारा निर्दिष्ट कार्यों में संलग्न रहेगी। भौतिक ऊर्जा के सम्पर्क में आकर आत्मा भौतिक गुणों को ग्रहण कर लेती है, और आत्मा को ऐसे लगावों से शुद्ध करने हेतु शास्त्रों में विहित कर्तव्यों में प्रवृत्त होना आवश्यक है। किन्तु यदि आत्मा अपने स्वाभाविक कार्य कृष्णभावनामृत में संलग्न रहे, तो वह जो भी कर पाती है, उसके लिए कल्याणकारी ही होता है। श्रीमद्भागवत इसकी पुष्टि करता है:

त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरेर्

भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि ।

यत्र क्व वाभद्रमभूदमुष्य किं

को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः ॥

“यदि कोई कृष्णभावनामृत ग्रहण कर लेता है, यद्यपि वह शास्त्रों में विहित कर्तव्यों का पालन न करे और न ही भक्ति का समुचित निर्वाह करे, और यद्यपि वह उस स्तर से पतित भी हो जाए, तो भी उसकी कोई हानि या अनिष्ट नहीं होता। किन्तु यदि कोई शुद्धि के लिए शास्त्रों के समस्त विधानों का पालन करे, तो यदि वह कृष्णभावनाभावित नहीं है, तो उससे उसे क्या लाभ?” (भा. 1.5.17) अतः कृष्णभावनामृत के इस बिन्दु तक पहुँचने के लिए शुद्धिकारक प्रक्रिया आवश्यक है। इसलिए संन्यास अथवा कोई भी शुद्धिकारक प्रक्रिया, कृष्णभावनाभावित होने के परम लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करने हेतु ही है, जिसके बिना समस्त वस्तुएँ विफल मानी जाती हैं।