अध्याय 4 · 1 / 42
4.1
श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; इमम्—यह; विवस्वते—सूर्यदेव को; योगम्—परमेश्वर से अपने सम्बन्ध का विज्ञान; प्रोक्तवान्—उपदेश दिया; अहम्—मैंने; अव्ययम्—अविनाशी; विवस्वान्—विवस्वान् (सूर्यदेव का नाम); मनवे—मानवजाति के पिता (वैवस्वत नामक) को; प्राह—कहा; मनुः—मानवजाति के पिता; इक्ष्वाकवे—राजा इक्ष्वाकु को; अब्रवीत्—कहा।
श्रीभगवान् ने कहा : मैंने योग के इस अविनाशी विज्ञान का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान् को दिया, और विवस्वान् ने इसका उपदेश मानवजाति के पिता मनु को दिया, तथा मनु ने बारी आने पर इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।
यहाँ हमें भगवद्गीता का इतिहास उस सुदूर काल से प्राप्त होता है, जब यह राजवर्ग को, अर्थात् समस्त लोकों के राजाओं को प्रदान की गई थी। यह विज्ञान विशेष रूप से प्रजा की रक्षा के निमित्त है, अतः राजवर्ग को इसे समझना चाहिए, जिससे वे नागरिकों पर शासन कर सकें और उन्हें कामवासना के भौतिक बन्धन से बचा सकें। मानव-जीवन आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन हेतु है, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ नित्य सम्बन्ध में स्थित है, और समस्त राज्यों तथा समस्त लोकों के शासन-प्रमुखों का यह कर्तव्य है कि वे शिक्षा, संस्कृति एवं भक्ति के माध्यम से यह पाठ नागरिकों को प्रदान करें। दूसरे शब्दों में, समस्त राज्यों के शासन-प्रमुखों का प्रयोजन कृष्णभावनामृत के विज्ञान का प्रसार करना है, जिससे लोग इस महान् विज्ञान से लाभान्वित हो सकें और मानव-जीवन के अवसर का सदुपयोग करते हुए सफलता के पथ का अनुसरण कर सकें।
इस युग में सूर्यदेव विवस्वान् के नाम से विख्यात हैं, जो सूर्य के अधिपति हैं, और सूर्य ही सौरमण्डल के समस्त लोकों का उद्गम है। ब्रह्मसंहिता में कहा गया है :
yac-cakṣur eṣa savitā sakala-grahāṇāṁ
rājā samasta-sura-mūrttir aśeṣa-tejāḥ
yasyājñayā bhramati sambhṛta-kālacakro
govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi
ब्रह्माजी ने कहा, “मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द [श्रीकृष्ण] की आराधना करता हूँ, जो आदिपुरुष हैं और जिनकी आज्ञा से सूर्य, जो समस्त लोकों का अधिपति है, अपार शक्ति एवं ताप धारण कर रहा है। सूर्य भगवान् के नेत्र का प्रतिनिधित्व करता है और उनकी आज्ञा के पालन में अपनी कक्षा में भ्रमण करता है।”
सूर्य समस्त लोकों का अधिपति है, और सूर्यदेव (इस समय विवस्वान् नामक) सूर्यलोक पर शासन करते हैं, जो ताप एवं प्रकाश की आपूर्ति करके अन्य समस्त लोकों का नियन्त्रण कर रहा है। वे श्रीकृष्ण की आज्ञा से घूमते हैं, और भगवान् श्रीकृष्ण ने मूलतः विवस्वान् को ही अपना प्रथम शिष्य बनाया, जिससे वे भगवद्गीता का विज्ञान समझ सकें। अतः गीता तुच्छ सांसारिक विद्वान् के लिए कोई काल्पनिक ग्रन्थ नहीं है, अपितु अनादि काल से चली आ रही ज्ञान की एक प्रामाणिक पुस्तक है। महाभारत (शान्ति-पर्व 348.51-52) में हम गीता का इतिहास इस प्रकार खोज सकते हैं :
tretā-yugādau ca tato vivasvān manave dadau
manuś ca loka-bhṛty-arthaṁ sutāyekṣvākave dadau
ikṣvākuṇā ca kathito vyāpya lokān avasthitāḥ
“त्रेतायुग के आरम्भ में परमेश्वर से सम्बन्ध का यह विज्ञान विवस्वान् द्वारा मनु को प्रदान किया गया। मनु ने, मानवजाति के पिता होने के नाते, इसे अपने पुत्र महाराज इक्ष्वाकु को दिया, जो इस पृथ्वीलोक के राजा तथा उस रघुवंश के पूर्वज थे जिसमें भगवान् श्रीरामचन्द्र प्रकट हुए। अतः भगवद्गीता महाराज इक्ष्वाकु के काल से ही मानव-समाज में विद्यमान रही है।”
इस समय हम कलियुग के पाँच हज़ार वर्ष पार कर चुके हैं, जिसकी अवधि 4,32,000 वर्ष है। इससे पूर्व द्वापरयुग (8,00,000 वर्ष) था, और उससे पूर्व त्रेतायुग (12,00,000 वर्ष) था। इस प्रकार लगभग 20,05,000 वर्ष पूर्व मनु ने अपने शिष्य एवं पुत्र महाराज इक्ष्वाकु, जो इस पृथ्वीलोक के राजा थे, से भगवद्गीता कही। वर्तमान मनु की आयु लगभग 30,53,00,000 वर्ष आँकी जाती है, जिनमें से 12,04,00,000 वर्ष बीत चुके हैं। यह स्वीकार करते हुए कि मनु के जन्म से पूर्व गीता भगवान् ने अपने शिष्य सूर्यदेव विवस्वान् से कही थी, एक स्थूल अनुमान यह है कि गीता कम-से-कम 12,04,00,000 वर्ष पूर्व कही गई थी; और मानव-समाज में यह बीस लाख वर्षों से विद्यमान रही है। इसे भगवान् ने पुनः लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व अर्जुन से कहा। गीता के अनुसार तथा वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण के कथन के अनुसार, यही गीता के इतिहास का स्थूल अनुमान है। यह सूर्यदेव विवस्वान् से इसलिए कही गई, क्योंकि वे भी क्षत्रिय हैं और उन समस्त क्षत्रियों के पिता हैं जो सूर्यदेव के वंशज हैं, अर्थात् सूर्य-वंश के क्षत्रियों के। चूँकि भगवद्गीता वेदों के समान ही है, क्योंकि इसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा है, अतः यह ज्ञान अपौरुषेय अर्थात् अलौकिक है। चूँकि वैदिक उपदेश ज्यों-के-त्यों, बिना मानवीय व्याख्या के स्वीकार किए जाते हैं, अतः गीता को भी सांसारिक व्याख्या के बिना स्वीकार करना चाहिए। सांसारिक तर्कशास्त्री गीता पर अपने-अपने ढंग से कल्पना कर सकते हैं, किन्तु वह यथार्थ भगवद्गीता नहीं है। अतः भगवद्गीता को यथारूप, गुरु-परम्परा से स्वीकार करना होगा, और यहाँ वर्णित है कि भगवान् ने सूर्यदेव से कहा, सूर्यदेव ने अपने पुत्र मनु से कहा, और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा।