हि

अध्याय 4 · 2 / 42

4.2

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगे नष्टः परन्तप ॥ २ ॥

एवम्—इस प्रकार; परम्परा—गुरु-परम्परा से; प्राप्तम्—प्राप्त; इमम्—यह विज्ञान; राजर्षयः—साधु-स्वभाव राजाओं ने; विदुः—समझा; सः—वह ज्ञान; कालेन—समय के क्रम में; इह—इस संसार में; महता—महान्; योगः—परमेश्वर से अपने सम्बन्ध का विज्ञान; नष्टः—विछिन्न; परन्तप—हे अर्जुन, शत्रुओं का दमन करने वाले।

इस प्रकार यह परम विज्ञान गुरु-परम्परा की श्रृंखला से प्राप्त हुआ, और साधु-स्वभाव राजाओं ने इसे उसी रीति से समझा। किन्तु समय के क्रम में यह परम्परा विछिन्न हो गई, अतः यह विज्ञान अपने यथारूप में लुप्त-सा प्रतीत होता है।

स्पष्ट रूप से कहा गया है कि गीता विशेष रूप से साधु-स्वभाव राजाओं के निमित्त थी, क्योंकि उन्हें नागरिकों पर शासन करते हुए इसका प्रयोजन सिद्ध करना था। निश्चय ही भगवद्गीता कभी असुर-स्वभाव व्यक्तियों के निमित्त नहीं थी, जो किसी के लाभ के बिना इसके मूल्य को नष्ट कर देते और निजी मनमानी के अनुसार सब प्रकार की व्याख्याएँ गढ़ लेते। ज्योंही अनैतिक टीकाकारों के स्वार्थों द्वारा मूल प्रयोजन विछिन्न हुआ, त्योंही गुरु-परम्परा को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व स्वयं भगवान् ने यह जान लिया कि गुरु-परम्परा विछिन्न हो चुकी है, अतः उन्होंने घोषित किया कि गीता का प्रयोजन लुप्त-सा प्रतीत होता है। इसी प्रकार, वर्तमान समय में भी गीता के अनेक संस्करण हैं (विशेषतः अंग्रेज़ी में), किन्तु उनमें से प्रायः सभी अधिकृत गुरु-परम्परा के अनुसार नहीं हैं। भिन्न-भिन्न सांसारिक विद्वानों द्वारा की गई असंख्य व्याख्याएँ हैं, किन्तु उनमें से प्रायः सभी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को स्वीकार नहीं करतीं, यद्यपि वे श्रीकृष्ण के शब्दों पर अच्छा व्यापार करते हैं। यह वृत्ति आसुरी है, क्योंकि असुर ईश्वर में विश्वास नहीं करते, अपितु केवल परमेश्वर की सम्पत्ति का भोग करते हैं। चूँकि परम्परा (गुरु-परम्परा) पद्धति से प्राप्त गीता के अंग्रेज़ी संस्करण की महती आवश्यकता है, अतः यहाँ इस महान् अभाव की पूर्ति का प्रयत्न किया गया है। भगवद्गीता—यथारूप में स्वीकृत—मानवता के लिए महान् वरदान है; किन्तु यदि इसे दार्शनिक कल्पनाओं का ग्रन्थ मानकर स्वीकार किया जाए, तो यह मात्र समय का अपव्यय है।