अध्याय 4 · 27 / 42
4.27
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
सर्वाणि—समस्त; इन्द्रिय—इन्द्रियों के; कर्माणि—कार्य; प्राण-कर्माणि—प्राण-वायु के कार्य; च—भी; अपरे—अन्य; आत्म-संयम—मन को संयमित करना; योग—योजक प्रक्रिया; अग्नौ—की अग्नि में; जुह्वति—अर्पित करते हैं; ज्ञान-दीपिते—आत्म-साक्षात्कार की उत्कण्ठा के कारण।
जो मन और इन्द्रिय-संयम के द्वारा आत्म-साक्षात्कार में रुचि रखते हैं, वे समस्त इन्द्रियों के कार्यों को, साथ ही प्राण-वायु [श्वास] को भी, संयमित मन की अग्नि में आहुति रूप में अर्पित करते हैं।
पतञ्जलि द्वारा परिकल्पित योग प्रणाली का यहाँ उल्लेख किया गया है। पतञ्जलि के योग-सूत्र में आत्मा को प्रत्यग्-आत्मा और पराग्-आत्मा कहा गया है। जब तक आत्मा इन्द्रिय-भोग में आसक्त रहती है, तब तक वह पराग्-आत्मा कहलाती है। आत्मा शरीर के भीतर कार्यरत दस प्रकार की वायु के कार्यों के अधीन रहती है, और यह श्वसन-प्रणाली के माध्यम से अनुभव की जाती है। योग की पातञ्जल प्रणाली मनुष्य को शिक्षा देती है कि शरीर की वायु के कार्यों को तकनीकी रीति से किस प्रकार संयमित किया जाए, जिससे अन्ततः भीतर की वायु के समस्त कार्य आत्मा को भौतिक आसक्ति से शुद्ध करने के अनुकूल हो जाएँ। इस योग प्रणाली के अनुसार प्रत्यग् आत्मा अन्तिम लक्ष्य है। यह प्रत्यग् आत्मा पदार्थ में होने वाले कार्यों से विमुख होना है। इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों के साथ अन्योन्यक्रिया करती हैं, जैसे कान श्रवण के लिए, नेत्र देखने के लिए, नासिका सूँघने के लिए, जिह्वा स्वाद के लिए, हाथ स्पर्श के लिए, और वे सब इस प्रकार आत्म से बाहर के कार्यों में संलग्न रहती हैं। वे प्राण-वायु के कार्य कहलाते हैं। अपान-वायु नीचे की ओर जाती है, व्यान-वायु संकुचन और प्रसार का कार्य करती है, समान-वायु सन्तुलन को समायोजित करती है, उदान-वायु ऊपर की ओर जाती है—और जब मनुष्य प्रबुद्ध हो जाता है, तब वह इन सबको आत्म-साक्षात्कार की खोज में संलग्न कर देता है।