अध्याय 4 · 28 / 42
4.28
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥
द्रव्य-यज्ञाः—अपनी सम्पत्ति का यज्ञ करना; तपो-यज्ञाः—तपस्या में यज्ञ; योग-यज्ञाः—अष्टांग योग में यज्ञ; तथा—इस प्रकार; अपरे—अन्य; स्वाध्याय—वेदों के अध्ययन में यज्ञ; ज्ञान-यज्ञाः—दिव्य ज्ञान की उन्नति में यज्ञ; च—भी; यतयः—प्रबुद्ध; संशित—कठोर ग्रहण किए हुए; व्रताः—व्रत।
कुछ अन्य भी हैं जो, कठोर तपस्या में अपनी भौतिक सम्पत्ति का यज्ञ करके प्रबुद्ध होकर, कठोर व्रत लेते हैं और अष्टांग योग का अभ्यास करते हैं, तथा अन्य दिव्य ज्ञान की उन्नति के लिए वेदों का अध्ययन करते हैं।
इन यज्ञों को विभिन्न विभागों में रखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति हैं जो विभिन्न प्रकार के दान के रूप में अपनी सम्पत्ति का यज्ञ करते हैं। भारत में धनी व्यापारी समुदाय अथवा राजसी वर्ग धर्मशाला, अन्न-क्षेत्र, अतिथि-शाला, अनाथालय, विद्यापीठ आदि विभिन्न प्रकार की दानशील संस्थाएँ खोलते हैं। अन्य देशों में भी अनेक चिकित्सालय, वृद्धाश्रम और इसी प्रकार के दानशील प्रतिष्ठान हैं, जो निर्धनों को भोजन, शिक्षा और चिकित्सा निःशुल्क वितरित करने के लिए हैं। ये समस्त दानशील कार्य द्रव्यमय-यज्ञ कहलाते हैं। अन्य भी हैं जो, जीवन में उच्चतर उन्नति के लिए अथवा ब्रह्माण्ड के भीतर उच्चतर लोकों में पदोन्नति के लिए, स्वेच्छा से अनेक प्रकार की तपस्याएँ स्वीकार करते हैं, जैसे चान्द्रायण और चातुर्मास्य। ये प्रक्रियाएँ कुछ कठोर नियमों के अधीन जीवन के संचालन हेतु कठोर व्रतों को अपने में सम्मिलित करती हैं। उदाहरणार्थ, चातुर्मास्य व्रत के अन्तर्गत साधक वर्ष के चार मासों (जुलाई से अक्टूबर) तक क्षौर नहीं कराता, कुछ विशेष खाद्य पदार्थ नहीं खाता, दिन में दो बार भोजन नहीं करता और घर से बाहर नहीं जाता। जीवन के सुखों का ऐसा यज्ञ तपोमय-यज्ञ कहलाता है। अभी भी अन्य हैं जो विभिन्न प्रकार के योग-योगों में स्वयं को संलग्न करते हैं, जैसे पातञ्जल प्रणाली (परम के अस्तित्व में विलीन होने के लिए), अथवा हठयोग या अष्टांगयोग (विशेष सिद्धियों के लिए)। और कुछ समस्त पवित्र तीर्थस्थानों की यात्रा करते हैं। ये समस्त अभ्यास योग-यज्ञ कहलाते हैं, अर्थात् भौतिक जगत् में किसी विशेष प्रकार की सिद्धि के लिए यज्ञ। अन्य भी हैं जो विभिन्न वैदिक साहित्यों के अध्ययन में, विशेषकर उपनिषदों और वेदान्त-सूत्रों, अथवा सांख्य दर्शन के अध्ययन में, स्वयं को संलग्न करते हैं। ये सब स्वाध्याय-यज्ञ, अर्थात् अध्ययन के यज्ञ में संलग्नता कहलाते हैं। ये समस्त योगी विभिन्न प्रकार के यज्ञ में निष्ठापूर्वक संलग्न हैं और जीवन की उच्चतर स्थिति की खोज में हैं। तथापि, कृष्णभावनामृत इनसे भिन्न है, क्योंकि यह परमेश्वर की प्रत्यक्ष सेवा है। कृष्णभावनामृत उपर्युक्त प्रकार के किसी भी यज्ञ द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, अपितु केवल भगवान् और उनके प्रामाणिक भक्त की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है। अतः कृष्णभावनामृत दिव्य है।