हि

अध्याय 4 · 3 / 42

4.3

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥

सः—वही प्राचीन; एव—निश्चय ही; अयम्—यह; मया—मेरे द्वारा; ते—तुम्हें; अद्य—आज; योगः—योग का विज्ञान; प्रोक्तः—कहा गया; पुरातनः—अति प्राचीन; भक्तः—भक्त; असि—तुम हो; मे—मेरे; सखा—मित्र; च—भी; इति—अतः; रहस्यम्—रहस्य; हि—निश्चय ही; एतत्—यह; उत्तमम्—दिव्य।

परमेश्वर से सम्बन्ध का वही अति प्राचीन विज्ञान आज मैं तुमसे कह रहा हूँ, क्योंकि तुम मेरे भक्त तथा मेरे मित्र हो; अतः तुम इस विज्ञान के दिव्य रहस्य को समझ सकते हो।

मनुष्यों के दो वर्ग हैं, अर्थात् भक्त और असुर। भगवान् ने अर्जुन के भगवान् का भक्त होने के कारण उसे इस महान् विज्ञान का पात्र चुना, किन्तु असुर के लिए इस महान् रहस्यमय विज्ञान को समझना सम्भव नहीं है। ज्ञान की इस महान् पुस्तक के अनेक संस्करण हैं, और उनमें से कुछ पर भक्तों की टीकाएँ हैं, तथा कुछ पर असुरों की टीकाएँ हैं। भक्तों द्वारा की गई टीका यथार्थ है, जबकि असुरों की टीका निरर्थक है। अर्जुन श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार करता है, और अर्जुन के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए गीता पर की गई कोई भी टीका इस महान् विज्ञान के हेतु की यथार्थ भक्ति है। किन्तु असुर श्रीकृष्ण के विषय में कुछ-न-कुछ गढ़ लेते हैं और जनसामान्य तथा सामान्य पाठकों को श्रीकृष्ण के उपदेशों के पथ से विमुख कर देते हैं। मनुष्य को अर्जुन से चली आ रही गुरु-परम्परा का अनुसरण करने का प्रयत्न करना चाहिए, और इस प्रकार लाभान्वित होना चाहिए।