हि

अध्याय 4 · 40 / 42

4.40

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥

ajñaḥ—जो मूर्ख मानक शास्त्रों का ज्ञान नहीं रखते; ca—और; aśraddadhānaḥ—प्रकट शास्त्रों में श्रद्धा रहित; ca—भी; saṁśaya—सन्देह; ātmā—व्यक्ति; vinaśyati—पतित होता है; na—कभी नहीं; ayam—यह; lokaḥ—जगत्; asti—है; na—न तो; paraḥ—अगला जीवन; na—न; sukham—सुख; saṁśaya—सन्देहयुक्त; ātmanaḥ—व्यक्ति का।

किन्तु अज्ञानी एवं श्रद्धाहीन व्यक्ति, जो प्रकट शास्त्रों पर सन्देह करते हैं, ईश्वर-भावना प्राप्त नहीं करते। सन्देहशील आत्मा के लिए न तो इस जगत् में सुख है और न ही अगले में।

अनेक मानक एवं प्रामाणिक प्रकट शास्त्रों में भगवद्गीता सर्वश्रेष्ठ है। जो व्यक्ति प्रायः पशुओं के समान हैं, उन्हें मानक प्रकट शास्त्रों में न तो श्रद्धा है और न ही उनका ज्ञान; और कुछ लोग, यद्यपि उन्हें प्रकट शास्त्रों का ज्ञान है, अथवा वे उनके अंश उद्धृत कर सकते हैं, फिर भी वस्तुतः इन वचनों में उनकी कोई श्रद्धा नहीं होती। और यद्यपि अन्य लोगों की भगवद्गीता जैसे शास्त्रों में श्रद्धा हो सकती है, फिर भी वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण में विश्वास अथवा उनकी आराधना नहीं करते। ऐसे व्यक्तियों की कृष्णभावनामृत में कोई स्थिति नहीं हो सकती। वे पतित हो जाते हैं। उपर्युक्त समस्त व्यक्तियों में से जिनमें कोई श्रद्धा नहीं है और जो सदैव सन्देहशील रहते हैं, वे कोई उन्नति नहीं करते। ईश्वर तथा उनके प्रकट वचन में श्रद्धा रहित मनुष्य न तो इस जगत् में और न ही अगले में कोई कल्याण पाते हैं। उनके लिए किंचित् भी सुख नहीं है। अतः मनुष्य को श्रद्धा सहित प्रकट शास्त्रों के सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए और इस प्रकार ज्ञान के स्तर तक उठना चाहिए। केवल यही ज्ञान मनुष्य को आध्यात्मिक बोध के दिव्य स्तर तक उन्नत होने में सहायता करेगा। दूसरे शब्दों में, सन्देहशील व्यक्तियों की आध्यात्मिक मुक्ति में किंचित् भी स्थिति नहीं होती। अतएव मनुष्य को गुरु-परम्परा में स्थित महान् आचार्यगण के पदचिह्नों पर चलना चाहिए और इस प्रकार सफलता प्राप्त करनी चाहिए।