अध्याय 4 · 5 / 42
4.5
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; बहूनि—अनेक; मे—मेरे; व्यतीतानि—बीत चुके हैं; जन्मानि—जन्म; तव—तुम्हारे; च—और भी; अर्जुन—हे अर्जुन; तानि—वे सब; अहम्—मैं; वेद—जानता हूँ; सर्वाणि—समस्त; न—नहीं; त्वम्—तुम; वेत्थ—जानते; परन्तप—हे शत्रुओं के दमनकर्ता।
श्रीभगवान् ने कहा : तुम्हारे और मेरे अनेकानेक जन्म बीत चुके हैं। मैं उन सबका स्मरण रख सकता हूँ, किन्तु तुम नहीं रख सकते, हे शत्रुओं के दमनकर्ता!
ब्रह्मसंहिता में हमें भगवान् के अनेकानेक अवतारों की जानकारी मिलती है। वहाँ कहा गया है :
advaitam acyutam anādim ananta-rūpam
ādyaṁ purāṇa-puruṣaṁ nava-yauvanaṁ ca
vedeṣu durllabham adurllabham ātma-bhaktau
govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi.
(ब्र.सं. 5.33)
“मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द [श्रीकृष्ण] की आराधना करता हूँ, जो आदिपुरुष हैं—परम, अच्युत, अनादि, यद्यपि असंख्य रूपों में विस्तृत हैं, फिर भी वही आदि, सर्वप्राचीन, तथा सदा नवयौवन के रूप में प्रकट होने वाले पुरुष हैं। भगवान् के ऐसे नित्य, आनन्दमय, सर्वज्ञ रूप सामान्यतः श्रेष्ठ वैदिक विद्वानों द्वारा समझे जाते हैं, किन्तु वे शुद्ध, अनन्य भक्तों के समक्ष सदा प्रकट रहते हैं।” ब्रह्मसंहिता में यह भी कहा गया है :
rāmādi mūrttiṣu kalā-niyamena tiṣṭhan
nānāvatāram akarod bhuvaneṣu kintu
kṛṣṇaḥ svayaṁ samabhavat paramaḥ pumān yo
govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi
(ब्र.सं. 5.39)
“मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द [श्रीकृष्ण] की आराधना करता हूँ, जो सदा राम, नृसिंह तथा अनेक उपावतारों जैसे विविध अवतारों में स्थित रहते हैं, किन्तु जो श्रीकृष्ण के नाम से विख्यात आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, तथा जो स्वयं भी साक्षात् अवतरित होते हैं।”
वेदों में भी कहा गया है कि भगवान्, यद्यपि अद्वितीय हैं, फिर भी अपने को असंख्य रूपों में प्रकट करते हैं। वे उस वैदूर्य मणि के समान हैं, जो रंग बदलती है फिर भी एक ही रहती है। वे समस्त बहुरूप शुद्ध, अनन्य भक्तों द्वारा समझे जाते हैं, किन्तु वेदों के मात्र अध्ययन से नहीं : vedeṣu durllabham adurllabham ātma-bhaktau। अर्जुन के समान भक्त भगवान् के नित्य संगी हैं, और जब भी भगवान् अवतरित होते हैं, तब उनके सहयोगी भक्त भी भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में भगवान् की सेवा करने हेतु अवतरित होते हैं। अर्जुन इन्हीं भक्तों में से एक है, और इस श्लोक से यह समझा जाता है कि कुछ लाखों वर्ष पूर्व जब भगवान् श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता सूर्यदेव विवस्वान् से कही थी, तब अर्जुन भी एक भिन्न भूमिका में उपस्थित था। किन्तु भगवान् तथा अर्जुन में अन्तर यह है कि भगवान् ने उस घटना का स्मरण रखा, जबकि अर्जुन स्मरण न रख सका। यही अंश-रूप जीव तथा परमेश्वर में अन्तर है। यद्यपि यहाँ अर्जुन को उस पराक्रमी वीर के रूप में सम्बोधित किया गया है जो शत्रुओं का दमन कर सकता था, फिर भी वह अपने विविध पूर्वजन्मों में घटित बातों का स्मरण करने में असमर्थ है। अतः जीव, भौतिक आकलन में चाहे कितना ही महान् क्यों न हो, कभी परमेश्वर की समता नहीं कर सकता। जो भी भगवान् का नित्य संगी है, वह निश्चय ही मुक्त पुरुष है, किन्तु वह भगवान् के समान नहीं हो सकता। ब्रह्मसंहिता में भगवान् को अच्युत (अविनाशी) कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे भौतिक सम्पर्क में रहते हुए भी कभी स्वयं को विस्मृत नहीं करते। अतः भगवान् तथा जीव सब प्रकार से कभी समान नहीं हो सकते, भले ही जीव अर्जुन के समान मुक्त ही क्यों न हो। यद्यपि अर्जुन भगवान् का भक्त है, फिर भी वह कभी-कभी भगवान् के स्वरूप को भूल जाता है, किन्तु दैवी कृपा से भक्त तुरन्त भगवान् की अच्युत स्थिति को समझ सकता है, जबकि अभक्त अथवा असुर इस दिव्य स्वरूप को नहीं समझ सकता। फलस्वरूप गीता के ये वर्णन आसुरी बुद्धियों द्वारा नहीं समझे जा सकते। श्रीकृष्ण ने उन कार्यों का स्मरण रखा जो उन्होंने लाखों वर्ष पूर्व किए थे, किन्तु अर्जुन स्मरण न रख सका, इस तथ्य के होते हुए भी कि श्रीकृष्ण तथा अर्जुन दोनों स्वभाव से नित्य हैं। हम यहाँ यह भी देख सकते हैं कि जीव अपने शरीर के परिवर्तन के कारण सब कुछ भूल जाता है, किन्तु भगवान् स्मरण रखते हैं, क्योंकि वे अपने सच्चिदानन्द शरीर को नहीं बदलते। वे अद्वैत हैं, जिसका अर्थ है कि उनके शरीर तथा उनके स्वयं में कोई भेद नहीं है। उनसे सम्बन्धित सब कुछ आत्मा (चिन्मय) है—जबकि बद्धजीव अपने भौतिक शरीर से भिन्न है। और चूँकि भगवान् का शरीर तथा स्वयं अभिन्न हैं, अतः उनकी स्थिति सदा सामान्य जीव से भिन्न रहती है, भले ही वे भौतिक धरातल पर अवतरित हों। असुर भगवान् के इस दिव्य स्वरूप के साथ समायोजित नहीं हो पाते, जैसा कि भगवान् अगले श्लोक में समझाते हैं।