अध्याय 4 · 6 / 42
4.6
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ६ ॥
अजः—अजन्मा; अपि—यद्यपि; सन्—होते हुए; अव्यय—बिना क्षय के; आत्मा—शरीर; भूतानाम्—उन सबका जो जन्म लेते हैं; ईश्वरः—परमेश्वर; अपि—यद्यपि; सन्—होते हुए; प्रकृतिम्—दिव्य रूप; स्वाम्—अपने; अधिष्ठाय—इस प्रकार स्थित होकर; सम्भवामि—मैं अवतरित होता हूँ; आत्म-मायया—अपनी अन्तरंगा शक्ति से।
यद्यपि मैं अजन्मा हूँ और मेरे दिव्य शरीर का कभी क्षय नहीं होता, और यद्यपि मैं समस्त प्राणियों का स्वामी हूँ, फिर भी मैं प्रत्येक युग में अपने आदि दिव्य रूप में प्रकट होता हूँ।
भगवान् ने अपने जन्म की विशेषता के विषय में कहा है : यद्यपि वे सामान्य व्यक्ति के समान प्रकट हो सकते हैं, फिर भी वे अपने अनेकानेक भूतकालीन “जन्मों” की समस्त बातों का स्मरण रखते हैं, जबकि सामान्य मनुष्य यह भी स्मरण नहीं रख पाता कि उसने कुछ घण्टे पूर्व क्या किया था। यदि किसी से पूछा जाए कि उसने एक दिन पूर्व ठीक इसी समय क्या किया था, तो सामान्य मनुष्य के लिए तुरन्त उत्तर देना अति कठिन होगा। उसे निश्चय ही अपनी स्मृति को टटोलना पड़ेगा कि वह एक दिन पूर्व ठीक इसी समय क्या कर रहा था। और फिर भी, मनुष्य प्रायः स्वयं को ईश्वर अथवा श्रीकृष्ण होने का दावा करने का साहस करते हैं। मनुष्य को ऐसे निरर्थक दावों से भ्रमित नहीं होना चाहिए। तत्पश्चात् भगवान् पुनः अपनी प्रकृति अथवा अपने रूप की व्याख्या करते हैं। प्रकृति का अर्थ है स्वभाव तथा स्वरूप, अर्थात् किसी का अपना रूप। भगवान् कहते हैं कि वे अपने ही शरीर में प्रकट होते हैं। वे अपना शरीर नहीं बदलते, जैसे सामान्य जीव एक शरीर से दूसरे शरीर में बदलता है। बद्धजीव का इस वर्तमान जन्म में एक प्रकार का शरीर हो सकता है, किन्तु अगले जन्म में उसका भिन्न शरीर होता है। भौतिक जगत् में जीव का कोई स्थायी शरीर नहीं होता, अपितु वह एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करता रहता है। किन्तु भगवान् ऐसा नहीं करते। जब भी वे प्रकट होते हैं, अपनी अन्तरंगा शक्ति से उसी आदि शरीर में प्रकट होते हैं। दूसरे शब्दों में, श्रीकृष्ण इस भौतिक जगत् में अपने आदि नित्य रूप में, दो भुजाओं सहित, वंशी धारण किए हुए प्रकट होते हैं। वे ठीक अपने नित्य शरीर में, इस भौतिक जगत् से अदूषित, प्रकट होते हैं। यद्यपि वे उसी दिव्य शरीर में प्रकट होते हैं और ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि वे सामान्य जीव के समान जन्म लेते हैं। इस तथ्य के होते हुए भी कि भगवान् श्रीकृष्ण शैशव से बाल्यावस्था में तथा बाल्यावस्था से यौवन में बढ़ते हैं, आश्चर्यजनक रूप से वे यौवन से आगे कभी वृद्ध नहीं होते। कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय उनके घर पर अनेक पौत्र थे; अथवा, दूसरे शब्दों में, भौतिक गणना के अनुसार वे पर्याप्त वृद्ध हो चुके थे। फिर भी वे बीस-पच्चीस वर्ष के युवा के समान ही दिखते थे। हम कभी श्रीकृष्ण का वृद्धावस्था में कोई चित्र नहीं देखते, क्योंकि वे हमारे समान कभी वृद्ध नहीं होते, यद्यपि वे सम्पूर्ण सृष्टि में—भूत, वर्तमान तथा भविष्य में—सर्वप्राचीन पुरुष हैं। उनके शरीर तथा बुद्धि का कभी क्षय अथवा परिवर्तन नहीं होता। अतः यह स्पष्ट है कि भौतिक जगत् में रहते हुए भी वे वही अजन्मा, आनन्द एवं ज्ञान के नित्य रूप हैं, जो अपने दिव्य शरीर तथा बुद्धि में अपरिवर्तनशील हैं। वस्तुतः उनका आविर्भाव तथा तिरोभाव सूर्य के उदय होने, हमारे समक्ष गति करने, और तत्पश्चात् हमारी दृष्टि से ओझल होने के समान है। जब सूर्य दृष्टि से ओझल होता है, तो हम सोचते हैं कि सूर्य अस्त हो गया है, और जब सूर्य हमारे नेत्रों के समक्ष होता है, तो हम सोचते हैं कि सूर्य क्षितिज पर है। वास्तव में सूर्य सदा अपनी निश्चित स्थिति में रहता है, किन्तु अपनी दोषपूर्ण, अपर्याप्त इन्द्रियों के कारण हम आकाश में सूर्य के उदय तथा अस्त की गणना करते हैं। और चूँकि उनका आविर्भाव तथा तिरोभाव किसी भी सामान्य जीव से पूर्णतः भिन्न है, अतः यह स्पष्ट है कि वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से नित्य, आनन्दमय ज्ञान हैं—और वे भौतिक प्रकृति से कभी दूषित नहीं होते। वेद भी इसकी पुष्टि करते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अजन्मा हैं, फिर भी वे अनेक प्रकटीकरणों में जन्म लेते प्रतीत होते हैं। वैदिक अनुपूरक साहित्य भी इसकी पुष्टि करता है कि यद्यपि भगवान् जन्म लेते प्रतीत होते हैं, फिर भी वे शरीर के परिवर्तन के बिना ही रहते हैं। भागवत में वे अपनी माता के समक्ष नारायण के रूप में, चार भुजाओं तथा छह प्रकार के पूर्ण ऐश्वर्यों के अलंकरण सहित प्रकट होते हैं। विश्वकोश शब्दकोश के अनुसार, उनका अपने आदि नित्य रूप में प्रकट होना उनकी अहैतुकी कृपा है। भगवान् अपने समस्त पूर्ववर्ती आविर्भावों तथा तिरोभावों के प्रति सचेत हैं, किन्तु सामान्य जीव ज्योंही दूसरा शरीर पाता है, त्योंही अपने भूतकालीन शरीर की समस्त बातें भूल जाता है। वे समस्त जीवों के स्वामी हैं, क्योंकि वे इस पृथ्वी पर रहते हुए अद्भुत एवं अलौकिक कार्य करते हैं। अतः भगवान् सदा वही परम सत्य हैं और उनके रूप तथा स्वयं में, अथवा उनके गुण तथा शरीर में कोई भेद नहीं है। अब यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि भगवान् इस जगत् में क्यों आविर्भूत तथा तिरोभूत होते हैं। इसकी व्याख्या अगले श्लोक में की गई है।