अध्याय 6 · 25 / 42
6.30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
यः—जो कोई; माम्—मुझे; पश्यति—देखता है; सर्वत्र—सर्वत्र; सर्वम्—सब कुछ; च—और; मयि—मुझमें; पश्यति—देखता है; तस्य—उसके लिए; अहम्—मैं; न—नहीं; प्रणश्यामि—लुप्त होता हूँ; सः—वह; च—भी; मे—मेरे लिए; न—न ही; प्रणश्यति—लुप्त होता है।
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी लुप्त नहीं होता, और न ही वह कभी मेरे लिए लुप्त होता है।
कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्ण को सर्वत्र देखता है, और वह सब कुछ श्रीकृष्ण में देखता है। ऐसा व्यक्ति भले ही भौतिक प्रकृति के समस्त पृथक् प्राकट्यों को देखता प्रतीत हो, किन्तु प्रत्येक स्थिति में वह श्रीकृष्ण के प्रति सचेत रहता है, यह जानते हुए कि सब कुछ श्रीकृष्ण की शक्ति का प्राकट्य है। श्रीकृष्ण के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता, और श्रीकृष्ण सबके स्वामी हैं — यही कृष्णभावनामृत का मूल सिद्धान्त है।
कृष्णभावनामृत श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम का विकास है — एक ऐसी स्थिति जो भौतिक मुक्ति से भी परे है। यह आत्म-साक्षात्कार से परे की अवस्था है, जहाँ भक्त इस अर्थ में श्रीकृष्ण से एक हो जाता है कि श्रीकृष्ण भक्त के लिए सब कुछ बन जाते हैं, और भक्त श्रीकृष्ण के प्रेम में परिपूर्ण हो जाता है। तब भगवान् और भक्त के बीच एक घनिष्ठ सम्बन्ध विद्यमान होता है। उस अवस्था में जीव अपनी अमरता प्राप्त करता है। न ही भगवान् कभी भक्त की दृष्टि से ओझल होते हैं। श्रीकृष्ण में विलीन हो जाना आध्यात्मिक विनाश है। भक्त ऐसा कोई संकट मोल नहीं लेता। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है:
premāñjana-cchurita-bhakti-vilocanena
santaḥ sadaiva hṛdayeṣu vilokayanti
yaṁ śyāmasundaram acintya-guṇa-svarūpaṁ
govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi
“मैं उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जो उस भक्त द्वारा सदैव देखे जाते हैं, जिसके नेत्र प्रेम के लेप से अनुलिप्त हैं। वे भक्त के हृदय में स्थित अपने नित्य श्यामसुन्दर रूप में देखे जाते हैं।” (ब्रह्म-संहिता 5.38)
इस अवस्था में भगवान् श्रीकृष्ण कभी भक्त की दृष्टि से ओझल नहीं होते, और न ही भक्त कभी भगवान् को दृष्टि से ओझल होने देता है। उस योगी के विषय में भी यही लागू होता है, जो भगवान् को हृदय में परमात्मा रूप में देखता है। ऐसा योगी शुद्ध भक्त बन जाता है और अपने भीतर भगवान् को देखे बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता।