हि

अध्याय 7 · 15 / 30

7.15

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥

na—नहीं; mām—मेरी; duṣkṛtinaḥ—दुष्कर्मी; mūḍhāḥ—मूर्ख; prapadyante—शरण लेते हैं; narādhamāḥ—मनुष्यों में अधम; māyayā—माया-शक्ति द्वारा; apahṛta—भ्रम द्वारा अपहृत; jñānāḥ—ज्ञान; asuram—आसुरी; bhāvam—स्वभाव; āśritāḥ—ग्रहण करते हुए।

वे दुष्कर्मी, जो अत्यन्त मूर्ख हैं, मनुष्यों में अधम हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा अपहृत हो गया है, और जो असुरों के नास्तिक स्वभाव को धारण करते हैं, मेरी शरण नहीं लेते।

भगवद्गीता में कहा गया है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में मात्र आत्मसमर्पण करने से ही मनुष्य भौतिक प्रकृति के कठोर नियमों को पार कर सकता है। इस बिन्दु पर एक प्रश्न उठता है: ऐसा क्यों है कि शिक्षित दार्शनिक, वैज्ञानिक, व्यवसायी, प्रशासक तथा सामान्य मनुष्यों के सभी नेता सर्वशक्तिमान पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में शरण नहीं लेते? मुक्ति, अर्थात् भौतिक प्रकृति के नियमों से छुटकारा, मानवता के नेताओं द्वारा भिन्न-भिन्न उपायों से तथा महान् योजनाओं और दृढ़ अध्यवसाय के साथ अनेकों वर्षों और जन्मों तक खोजी जाती है। किन्तु यदि वह मुक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों में मात्र शरणागति से ही सम्भव है, तो ये बुद्धिमान और परिश्रमी नेता इस सरल विधि को क्यों नहीं अपनाते?

गीता इस प्रश्न का अत्यन्त स्पष्ट उत्तर देती है। समाज के वे वास्तव में विद्वान नेता, जैसे ब्रह्मा, शिव, कपिल, कुमारगण, मनु, व्यास, देवल, असित, जनक, प्रह्लाद, बलि, और कालान्तर में मध्वाचार्य, रामानुजाचार्य, श्रीचैतन्य तथा अन्य अनेक—जो श्रद्धावान दार्शनिक, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद्, वैज्ञानिक आदि हैं—परम पुरुष, सर्वशक्तिमान सत्ता के चरणकमलों में शरण लेते हैं। जो वस्तुतः दार्शनिक, वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, प्रशासक आदि नहीं हैं, किन्तु भौतिक लाभ हेतु स्वयं को ऐसा दर्शाते हैं, वे परमेश्वर की योजना अथवा मार्ग को स्वीकार नहीं करते। उन्हें ईश्वर का कोई बोध नहीं है; वे केवल अपनी ही सांसारिक योजनाएँ गढ़ते हैं और फलतः उन्हें सुलझाने के अपने व्यर्थ प्रयासों में भौतिक अस्तित्व की समस्याओं को और जटिल बना देते हैं। चूँकि भौतिक ऊर्जा (प्रकृति) इतनी प्रबल है, वह नास्तिकों की अनधिकृत योजनाओं का प्रतिरोध कर सकती है और “योजना आयोगों” के ज्ञान को विफल कर सकती है।

नास्तिक योजना-निर्माताओं को यहाँ duṣkṛtina अर्थात् “दुष्कर्मी” शब्द से वर्णित किया गया है। kṛtina का अर्थ है वह जिसने सत्कर्म किया हो। नास्तिक योजना-निर्माता कभी-कभी अत्यन्त बुद्धिमान और गुणसम्पन्न भी होता है, क्योंकि कोई भी विशाल योजना, चाहे अच्छी हो अथवा बुरी, उसे क्रियान्वित करने के लिए बुद्धि अपेक्षित होती है। किन्तु चूँकि नास्तिक की बुद्धि परमेश्वर की योजना के विरोध में अनुचित रूप से प्रयुक्त होती है, अतएव नास्तिक योजना-निर्माता को duṣkṛtina कहा जाता है, जो यह संकेत करता है कि उसकी बुद्धि तथा प्रयास कुमार्ग में लगे हैं।

गीता में स्पष्टतः उल्लिखित है कि भौतिक ऊर्जा पूर्णतः परमेश्वर के निर्देशन में कार्य करती है। उसका कोई स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। वह वैसे ही कार्य करती है जैसे छाया वस्तु की गति के अनुसार चलती है। किन्तु फिर भी भौतिक ऊर्जा अत्यन्त प्रबल है, और नास्तिक अपने ईश्वरविहीन स्वभाव के कारण यह नहीं जान सकता कि वह कैसे कार्य करती है; न ही वह परमेश्वर की योजना को जान सकता है। माया तथा रजोगुण और तमोगुण के अधीन उसकी समस्त योजनाएँ विफल हो जाती हैं, जैसा हिरण्यकशिपु तथा रावण के प्रसंग में हुआ, जिनकी योजनाएँ चूर-चूर हो गईं यद्यपि वे दोनों ही वैज्ञानिक, दार्शनिक, प्रशासक तथा शिक्षाविद् के रूप में भौतिक दृष्टि से विद्वान थे। ये duṣkṛtina अर्थात् दुष्कर्मी चार भिन्न प्रकार के होते हैं, जिनका वर्णन नीचे किया गया है:

(1) mūḍha वे हैं जो अत्यन्त मूर्ख हैं, परिश्रमी भारवाहक पशुओं के समान। वे अपने श्रम के फलों का भोग स्वयं करना चाहते हैं, और इसलिए उन्हें परम के लिए छोड़ना नहीं चाहते। भारवाहक पशु का विशिष्ट उदाहरण गधा है। इस विनम्र पशु से उसका स्वामी अत्यन्त कठोर परिश्रम कराता है। गधा वस्तुतः यह नहीं जानता कि वह दिन-रात इतना कठोर परिश्रम किसके लिए करता है। वह घास के एक गट्ठर से अपना पेट भरकर, अपने स्वामी से पीटे जाने के भय के अधीन कुछ काल सोकर, और विपरीत पक्ष द्वारा बार-बार दुलत्ती खाने का जोखिम उठाते हुए अपनी काम-वासना को तृप्त करके सन्तुष्ट रहता है। गधा कभी-कभी कविता तथा दर्शन गाता है, किन्तु यह रेंकना केवल दूसरों को बाधित करता है। यही उस मूर्ख सकाम कर्मी की स्थिति है जो यह नहीं जानता कि उसे किसके लिए कर्म करना चाहिए। वह नहीं जानता कि कर्म (क्रिया) यज्ञ (बलिदान) के लिए है।

प्रायः वे लोग, जो स्व-निर्मित कर्तव्यों के भार को हलका करने के लिए दिन-रात कठोर परिश्रम करते हैं, कहते हैं कि उनके पास जीव की अमरता के विषय में सुनने का समय नहीं है। ऐसे mūḍha के लिए भौतिक लाभ, जो नश्वर हैं, जीवन का सर्वस्व हैं—इस तथ्य के बावजूद कि वे mūḍha श्रम के फल का अत्यन्त अल्प अंश ही भोगते हैं। कभी-कभी वे सकाम लाभ के लिए रात्रियाँ और दिन निद्राहीन बिताते हैं, और यद्यपि उन्हें व्रण अथवा अजीर्ण हो सकता है, वे प्रायः बिना भोजन के ही सन्तुष्ट रहते हैं; वे केवल मायामय स्वामियों के लाभ के लिए दिन-रात कठोर परिश्रम में निमग्न रहते हैं। अपने वास्तविक स्वामी से अनभिज्ञ, वे मूर्ख कर्मी अपना अमूल्य समय धन की सेवा में नष्ट करते हैं। दुर्भाग्यवश वे सभी स्वामियों के परम स्वामी की शरण कभी नहीं लेते, न ही उपयुक्त स्रोतों से उनके विषय में सुनने का समय निकालते हैं। मिट्टी खाने वाले सूअर शक्कर तथा घी से बनी मिठाइयाँ स्वीकार करने की चिन्ता नहीं करते। इसी प्रकार वह मूर्ख कर्मी भौतिक जगत् को चलाने वाली क्षणभंगुर सांसारिक शक्ति के इन्द्रिय-भोग्य समाचार अथक रूप से सुनता रहेगा।

(2) duṣkṛtina अर्थात् दुष्कर्मी का दूसरा वर्ग narādhama अर्थात् मनुष्यों में अधम कहलाता है। nara का अर्थ है मनुष्य, और adhama का अर्थ है अधम। जीवों की 84,00,000 भिन्न योनियों में से 4,00,000 मानव योनियाँ हैं। इनमें से अनेक मानव-जीवन के निम्नतर रूप हैं जो प्रायः असभ्य हैं। सभ्य मनुष्य वे हैं जिनके सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक जीवन के नियमित सिद्धान्त हैं। जो सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टि से विकसित हैं, किन्तु जिनके कोई धार्मिक सिद्धान्त नहीं हैं, उन्हें narādhama मानना चाहिए। न ही ईश्वर रहित धर्म, धर्म है, क्योंकि धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करने का प्रयोजन परम सत्य को तथा उसके साथ मनुष्य के सम्बन्ध को जानना है। गीता में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्पष्टतः कहते हैं कि उनसे ऊपर कोई सत्ता नहीं है और वे ही परम सत्य हैं। मानव-जीवन का सभ्य रूप मनुष्य के लिए परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण, जो सर्वशक्तिमान हैं, के साथ अपने नित्य सम्बन्ध की विस्मृत चेतना को पुनर्जीवित करने के लिए है। जो कोई इस अवसर को खोता है, उसे narādhama की श्रेणी में रखा जाता है। हमें प्रकट शास्त्रों से ज्ञात होता है कि जब शिशु माता के गर्भ में होता है (एक अत्यन्त असुविधाजनक स्थिति) तो वह उद्धार के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है और प्रतिज्ञा करता है कि बाहर आते ही वह केवल उन्हीं की आराधना करेगा। संकट में पड़ने पर ईश्वर से प्रार्थना करना प्रत्येक जीव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, क्योंकि वह नित्य ईश्वर से सम्बन्धित है। किन्तु अपने उद्धार के पश्चात् वह शिशु, माया अर्थात् मायामय ऊर्जा से प्रभावित होकर, जन्म की कठिनाइयों को भूल जाता है और अपने उद्धारकर्ता को भी भूल जाता है।

बच्चों के संरक्षकों का यह कर्तव्य है कि वे उनमें सुप्त दिव्य चेतना को पुनर्जीवित करें। मनु-स्मृति में निर्दिष्ट संस्कारों के दस कर्म, जो धार्मिक सिद्धान्तों का मार्गदर्शक है, वर्णाश्रम की व्यवस्था में ईश्वर-चेतना को पुनर्जीवित करने के लिए हैं। तथापि, अब संसार के किसी भी भाग में कोई भी विधि कठोरता से नहीं पाली जाती, और इसलिए जनसंख्या का 99.9 प्रतिशत narādhama है।

जब समस्त जनसंख्या narādhama बन जाती है, तो स्वाभाविक रूप से उनकी समस्त तथाकथित शिक्षा भौतिक प्रकृति की सर्वशक्तिमान ऊर्जा द्वारा निरर्थक कर दी जाती है। गीता के मानदण्ड के अनुसार, विद्वान वह है जो विद्वान ब्राह्मण, कुत्ते, गौ, हाथी तथा श्वपच को समान दृष्टि से देखता है। यही सच्चे भक्त की दृष्टि है। श्रीनित्यानन्द प्रभु, जो दिव्य गुरु के रूप में भगवान् के अवतार हैं, ने विशिष्ट narādhama, जगाई तथा माधाई बन्धुओं का उद्धार किया, और यह दर्शाया कि किस प्रकार सच्चे भक्त की कृपा मनुष्यों में अधम पर बरसती है। अतः जिस narādhama की पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा निन्दा की गई है, वह केवल किसी भक्त की कृपा से ही पुनः अपनी आध्यात्मिक चेतना को जागृत कर सकता है।

श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भागवत-धर्म अर्थात् भक्तों की क्रियाओं का प्रचार करते हुए यह अनुशंसा की है कि लोग विनम्रतापूर्वक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के सन्देश को सुनें। इस सन्देश का सार भगवद्गीता है। मनुष्यों में अधम का उद्धार केवल इसी विनम्र श्रवण-विधि से हो सकता है, किन्तु दुर्भाग्यवश वे इन सन्देशों को कान देने से भी इनकार कर देते हैं, फिर परमेश्वर की इच्छा के समक्ष शरणागति की तो बात ही क्या? narādhama अर्थात् मनुष्यों में अधम जानबूझकर मनुष्य के प्रमुख कर्तव्य की उपेक्षा करते हैं।

(3) duṣkṛtina का अगला वर्ग māyayāpahṛta-jñāna कहलाता है, अर्थात् वे व्यक्ति जिनका विद्वत्तापूर्ण ज्ञान मायामय भौतिक ऊर्जा के प्रभाव से निरर्थक हो गया है। वे प्रायः अत्यन्त विद्वान जन होते हैं—महान् दार्शनिक, कवि, साहित्यकार, वैज्ञानिक आदि—किन्तु मायामय ऊर्जा उन्हें कुमार्ग पर ले जाती है, और इसलिए वे परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं।

इस समय māyayāpahṛta-jñāna की एक विशाल संख्या है, यहाँ तक कि गीता के विद्वानों में भी। गीता में स्पष्ट और सरल भाषा में कहा गया है कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। उनके समान अथवा उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। उन्हें ब्रह्मा के पिता, समस्त मनुष्यों के आदि पिता के रूप में वर्णित किया गया है। वस्तुतः श्रीकृष्ण को केवल ब्रह्मा का ही नहीं, अपितु जीवन की समस्त योनियों का पिता कहा गया है। वे निराकार ब्रह्म तथा परमात्मा के मूल हैं; प्रत्येक जीव में स्थित परमात्मा उनका पूर्ण अंश है। वे सर्वस्व के उद्गम-स्रोत हैं, और प्रत्येक को उनके चरणकमलों में शरण लेने का परामर्श दिया जाता है। इन सब स्पष्ट कथनों के बावजूद māyayāpahṛta-jñāna परमेश्वर के व्यक्तित्व का उपहास करते हैं और उन्हें एक सामान्य मनुष्य मात्र मानते हैं। वे नहीं जानते कि मानव-जीवन का श्रेष्ठ रूप परमेश्वर के नित्य और दिव्य स्वरूप के अनुरूप रचा गया है।

māyayāpahṛta-jñāna वर्ग द्वारा परम्परा-प्रणाली के बाहर की गई गीता की समस्त अनधिकृत व्याख्याएँ आध्यात्मिक बोध के मार्ग में इतने सारे विघ्न हैं। ये भ्रमित व्याख्याकार न तो श्रीकृष्ण के चरणकमलों में शरण लेते हैं, न ही दूसरों को इस सिद्धान्त का अनुसरण करना सिखाते हैं।

(4) duṣkṛtina का अन्तिम वर्ग āsuraṁ bhāvam āśrita कहलाता है, अर्थात् वे जो आसुरी सिद्धान्तों के हैं। यह वर्ग खुले रूप से नास्तिक है। उनमें से कुछ तर्क करते हैं कि परमेश्वर कभी इस भौतिक जगत् में अवतरित नहीं हो सकते, किन्तु वे इसका कोई ठोस कारण नहीं दे पाते कि ऐसा क्यों नहीं। कुछ अन्य हैं जो उन्हें निराकार पक्ष के अधीन बना देते हैं, यद्यपि गीता में इसके विपरीत घोषित किया गया है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से ईर्ष्या करते हुए नास्तिक अपने मस्तिष्क की कारख़ाने में गढ़े गए अनेक अवैध अवतारों को प्रस्तुत करेगा। ऐसे व्यक्ति, जिनके जीवन का मूल सिद्धान्त ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की निन्दा करना है, श्रीकृष्ण के चरणकमलों में शरण नहीं ले सकते।

दक्षिण भारत के श्रीयामुनाचार्य आळवन्दार ने कहा, “हे मेरे प्रभु! आप नास्तिक सिद्धान्तों में संलग्न व्यक्तियों के लिए अज्ञेय हैं, यद्यपि आपके गुण, स्वरूप और लीलाएँ असाधारण हैं, यद्यपि आपका व्यक्तित्व सत्त्वगुण में स्थित समस्त प्रकट शास्त्रों द्वारा प्रमाणित है, और यद्यपि दिव्य विज्ञान में अपने गहन ज्ञान के लिए विख्यात तथा ईश्वरीय गुणों में स्थित प्रसिद्ध प्रामाणिक अधिकारियों द्वारा आप स्वीकृत हैं।”

अतः (1) अत्यन्त मूर्ख व्यक्ति, (2) मनुष्यों में अधम, (3) भ्रमित कल्पनावादी, तथा (4) घोषित नास्तिक, जैसा ऊपर वर्णित है, समस्त शास्त्रीय और प्रामाणिक परामर्श के बावजूद पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों में कभी शरण नहीं लेते।