अध्याय 7 · 17 / 30
7.17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥
teṣām—इनमें से; jñānī—पूर्ण ज्ञान वाला; nitya-yuktaḥ—सदा संलग्न; eka—केवल एक; bhaktiḥ—भक्ति; viśiṣyate—विशेष रूप से; priyaḥ—अत्यन्त प्रिय; hi—निश्चय ही; jñāninaḥ—ज्ञानवान व्यक्ति को; atyartham—अत्यधिक; aham—मैं हूँ; saḥ—वह; ca—भी; mama—मेरा; priyaḥ—प्रिय।
इनमें से वह ज्ञानी, जो पूर्ण ज्ञान में स्थित होकर शुद्ध भक्ति के द्वारा मुझसे युक्त है, श्रेष्ठ है। क्योंकि मैं उसे अत्यन्त प्रिय हूँ, और वह मुझे प्रिय है।
भौतिक इच्छाओं के समस्त कल्मष से मुक्त होकर आर्त, जिज्ञासु, निर्धन तथा परम ज्ञान का अन्वेषक—ये सभी शुद्ध भक्त बन सकते हैं। किन्तु इनमें से जो परम सत्य के ज्ञान में स्थित है और समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त है, वह भगवान् का वास्तव में शुद्ध भक्त बन जाता है। और चारों वर्गों में से, जो भक्त पूर्ण ज्ञान में है और साथ ही भक्ति में संलग्न है, वह श्रेष्ठ है, भगवान् ऐसा कहते हैं। ज्ञान की खोज से मनुष्य यह अनुभव करता है कि उसकी आत्मा उसके भौतिक शरीर से भिन्न है, और जब वह और अधिक उन्नत होता है तो वह निराकार ब्रह्म तथा परमात्मा के ज्ञान तक पहुँचता है। जब मनुष्य पूर्णतः शुद्ध हो जाता है, तो वह अनुभव करता है कि उसकी स्वाभाविक स्थिति ईश्वर का नित्य सेवक होना है। अतः शुद्ध भक्तों की संगति से जिज्ञासु, आर्त, भौतिक उन्नति का अन्वेषक तथा ज्ञानवान मनुष्य—ये सभी स्वयं शुद्ध बन जाते हैं। किन्तु प्रारम्भिक अवस्था में, जो मनुष्य परमेश्वर के पूर्ण ज्ञान में है और साथ ही भक्ति का निष्पादन कर रहा है, वह भगवान् को अत्यन्त प्रिय है। जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की दिव्यता के शुद्ध ज्ञान में स्थित है, वह भक्ति में इतना सुरक्षित है कि भौतिक कल्मष उसका स्पर्श नहीं कर सकते।