अध्याय 7 · 18 / 30
7.18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥
udārāḥ—उदार; sarve—सभी; eva—निश्चय ही; ete—ये; jñānī—जो ज्ञान में है; tu—किन्तु; ātmā eva—ठीक मेरे ही समान; me—मेरा; matam—मत; āsthitaḥ—स्थित; saḥ—वह; hi—निश्चय ही; yukta-ātmā—भक्ति में संलग्न; mām—मुझे; eva—निश्चय ही; anuttamām—परम लक्ष्य; gatim—गन्तव्य।
ये समस्त भक्त निःसन्देह उदार आत्माएँ हैं, किन्तु जो मेरे ज्ञान में स्थित है, उसे मैं वस्तुतः अपने में ही वास करता हुआ मानता हूँ। मेरी दिव्य सेवा में संलग्न होकर वह मुझे प्राप्त करता है।
ऐसा नहीं है कि अन्य भक्त, जो ज्ञान में कम पूर्ण हैं, भगवान् को प्रिय नहीं हैं। भगवान् कहते हैं कि सभी उदार हैं, क्योंकि जो कोई किसी भी प्रयोजन से भगवान् के पास आता है, उसे महात्मा अर्थात् महान् आत्मा कहा जाता है। जो भक्त भक्ति से कोई लाभ चाहते हैं, उन्हें भगवान् स्वीकार करते हैं, क्योंकि वहाँ स्नेह का आदान-प्रदान होता है। स्नेहवश वे भगवान् से कोई भौतिक लाभ माँगते हैं, और जब उन्हें वह प्राप्त हो जाता है तो वे इतने सन्तुष्ट हो जाते हैं कि वे भक्ति में भी उन्नति करते हैं। किन्तु पूर्ण ज्ञान वाले भक्त को भगवान् का अत्यन्त प्रिय माना जाता है, क्योंकि उसका एकमात्र प्रयोजन प्रेम और भक्ति से परमेश्वर की सेवा करना है। ऐसा भक्त परमेश्वर का सम्पर्क अथवा सेवा किए बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। इसी प्रकार, परमेश्वर अपने भक्त के प्रति अत्यन्त अनुरक्त हैं और उससे पृथक् नहीं हो सकते।
श्रीमद्भागवत (9.4.57) में भगवान् कहते हैं:
ahaṁ bhakta-parādhīno hy asvatantra iva dvija
sādhubhir grasta-hṛdayo bhaktair bhakta-jana-priyaḥ
“भक्त सदा मेरे हृदय में रहते हैं, और मैं सदा भक्तों के हृदय में रहता हूँ। भक्त मुझसे परे कुछ नहीं जानता, और मैं भी भक्त को नहीं भूल सकता। मेरे तथा शुद्ध भक्तों के बीच अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। पूर्ण ज्ञान वाले शुद्ध भक्त कभी आध्यात्मिक सम्पर्क से बाहर नहीं होते, और इसलिए वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।”