हि

अध्याय 7 · 29 / 30

7.29

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥

जरा—वृद्धावस्था; मरण—मृत्यु; मोक्षाय—मुक्ति के प्रयोजन से; माम्—मेरी; आश्रित्य—शरण लेकर; यतन्ति—प्रयत्न करते हैं; ये—वे सब; ते—ऐसे व्यक्ति; ब्रह्म—ब्रह्म; तत्—वस्तुतः वह; विदुः—वे जानते हैं; कृत्स्नम्—सब कुछ; अध्यात्मम्—दिव्य; कर्म—सकाम कर्म; च—भी; अखिलम्—पूर्णतः।

जो बुद्धिमान व्यक्ति वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति के लिए प्रयत्नशील हैं, वे भक्ति में मेरी शरण लेते हैं। वे वस्तुतः ब्रह्म हैं, क्योंकि वे दिव्य तथा सकाम कर्मों के विषय में सब कुछ पूर्णतः जानते हैं।

जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग इस भौतिक शरीर को प्रभावित करते हैं, किन्तु आध्यात्मिक शरीर को नहीं। आध्यात्मिक शरीर के लिए न जन्म है, न मृत्यु, न वृद्धावस्था और न रोग; अतः जो आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करता है, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के पार्षदों में से एक बन जाता है और नित्य भक्ति में संलग्न हो जाता है, वही वास्तव में मुक्त है। अहं ब्रह्मास्मि—मैं आत्मा हूँ। कहा गया है कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह ब्रह्म है—आत्मा है। जीवन की यह ब्रह्म-धारणा भक्ति में भी विद्यमान है, जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है। शुद्ध भक्तगण दिव्य रूप से ब्रह्म-स्तर पर स्थित होते हैं, और वे दिव्य तथा भौतिक कर्मों के विषय में सब कुछ जानते हैं।

चार प्रकार के अशुद्ध भक्त, जो भगवान् की दिव्य सेवा में संलग्न होते हैं, अपने-अपने लक्ष्य प्राप्त करते हैं, और परमेश्वर की कृपा से, जब वे पूर्णतः कृष्णभावनाभावित हो जाते हैं, तब वे वास्तव में परमेश्वर के साथ आध्यात्मिक संगति का आनन्द लेते हैं। किन्तु जो देवताओं के उपासक हैं, वे परमेश्वर तक उनके परम लोक में कभी नहीं पहुँचते। यहाँ तक कि अल्पबुद्धि ब्रह्म-साक्षात्कारी व्यक्ति भी श्रीकृष्ण के गोलोक वृन्दावन नामक परम लोक तक नहीं पहुँच सकते। केवल वे ही व्यक्ति, जो कृष्णभावनामृत में कर्म करते हैं (माम् आश्रित्य), वास्तव में ब्रह्म कहलाने के अधिकारी हैं, क्योंकि वे वास्तव में श्रीकृष्ण के लोक तक पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं। ऐसे व्यक्तियों को श्रीकृष्ण के विषय में कोई सन्देह नहीं होता, और इस प्रकार वे तथ्यतः ब्रह्म हैं।

जो भगवान् के रूप अथवा अर्चा-विग्रह की पूजा में संलग्न हैं, अथवा जो भौतिक बन्धन से मुक्ति मात्र के लिए भगवान् के ध्यान में संलग्न हैं, वे भी भगवान् की कृपा से ब्रह्म, अधिभूत आदि के तात्पर्य को जान लेते हैं, जैसा कि भगवान् ने अगले अध्याय में समझाया है।