हि

अध्याय 7 · 28 / 30

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येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥

येषाम्—जिनके; तु—किन्तु; अन्त-गतम्—पूर्णतः निर्मूल; पापम्—पाप; जनानाम्—व्यक्तियों के; पुण्य—पुण्यमय; कर्मणाम्—पूर्व कर्म; ते—वे; द्वन्द्व—द्वैत; मोह—मोह; निर्मुक्ताः—से मुक्त; भजन्ते—पूजते हैं; माम्—मुझे; दृढ-व्रताः—दृढ़ निश्चय के साथ।

जिन व्यक्तियों ने पूर्व जन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यपूर्ण कर्म किए हैं, जिनके पापमय कर्म पूर्णतः निर्मूल हो चुके हैं और जो मोह के द्वैत से मुक्त हैं, वे दृढ़ निश्चय के साथ मेरी सेवा में संलग्न होते हैं।

जो दिव्य स्थिति को प्राप्त करने के योग्य हैं, उनका उल्लेख इस श्लोक में किया गया है। जो पापी, नास्तिक, मूर्ख और छली हैं, उनके लिए कामना और घृणा के द्वैत को लाँघना अत्यन्त कठिन है। केवल वे ही, जिन्होंने अपना जीवन धर्म के विधि-विधानों का अभ्यास करते हुए व्यतीत किया है, जिन्होंने पुण्यपूर्ण कर्म किए हैं और पापमय प्रतिक्रियाओं पर विजय प्राप्त की है, भक्ति को स्वीकार कर सकते हैं और क्रमशः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के शुद्ध ज्ञान तक उठ सकते हैं। तत्पश्चात्, क्रमशः, वे समाधि में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का ध्यान कर सकते हैं। यही आध्यात्मिक स्तर पर स्थित होने की प्रक्रिया है। यह उन्नति कृष्णभावनामृत में, शुद्ध भक्तगण की संगति में सम्भव है, जो किसी को मोह से उद्धार कर सकते हैं।

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि यदि कोई वास्तव में मुक्ति चाहता है तो उसे भक्तगण की सेवा करनी चाहिए; किन्तु जो भौतिकतावादी लोगों की संगति करता है, वह अस्तित्व के सर्वाधिक अन्धकारमय प्रदेश की ओर ले जाने वाले मार्ग पर है। भगवान् के समस्त भक्तगण इस पृथ्वी पर केवल इसीलिए विचरण करते हैं कि बद्धजीवों को उनके मोह से उबार सकें। निर्विशेषवादी यह नहीं जानते कि परमेश्वर के अधीन रहने की अपनी स्वरूपगत स्थिति को विस्मृत कर देना ईश्वर के नियम का सबसे बड़ा उल्लंघन है। जब तक कोई अपनी स्वरूपगत स्थिति में पुनः प्रतिष्ठित नहीं होता, तब तक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझना अथवा दृढ़ निश्चय के साथ उनकी दिव्य प्रेममयी सेवा में पूर्णतः संलग्न होना सम्भव नहीं है।