हि

अध्याय 7 · 6 / 30

7.6

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥

एतत्—ये दोनों प्रकृतियाँ; योनीनि—जन्म का स्रोत; भूतानि—प्रत्येक सृजित वस्तु; सर्वाणि—समस्त; इति—इस प्रकार; उपधारय—जानो; अहम्—मैं; कृत्स्नस्य—सर्व-समावेशी; जगतः—जगत् का; प्रभवः—प्रकटीकरण का स्रोत; प्रलयः—संहार; तथा—तथा।

इस जगत् में जो कुछ भौतिक है तथा जो कुछ आध्यात्मिक है, निश्चय ही जान लो कि मैं ही उन सबका उद्गम तथा प्रलय हूँ।

जो कुछ विद्यमान है, वह पदार्थ तथा आत्मा की उपज है। आत्मा सृष्टि का मूल क्षेत्र है, और पदार्थ आत्मा द्वारा सृजित होता है। आत्मा भौतिक विकास की किसी विशेष अवस्था पर सृजित नहीं होती। प्रत्युत यह भौतिक जगत् आध्यात्मिक शक्ति के आधार पर ही प्रकट होता है। यह भौतिक शरीर इसलिए विकसित होता है क्योंकि पदार्थ के भीतर आत्मा विद्यमान है; एक बालक धीरे-धीरे किशोरावस्था तथा फिर युवावस्था तक इसलिए बढ़ता है क्योंकि वह परा शक्ति, अर्थात् आत्मा, उपस्थित रहती है। इसी प्रकार, विशाल ब्रह्माण्ड का समूचा विश्व-प्रकटीकरण इसलिए विकसित होता है क्योंकि परमात्मा, विष्णु, उपस्थित हैं। अतएव आत्मा तथा पदार्थ, जो इस विशाल विराट् रूप को प्रकट करने हेतु परस्पर संयुक्त होते हैं, मूलतः भगवान् की दो शक्तियाँ हैं, और परिणामस्वरूप भगवान् ही प्रत्येक वस्तु के आदि कारण हैं। भगवान् का खण्ड-अंश, अर्थात् जीव, भौतिक शक्ति के संचालन द्वारा गगनचुम्बी भवन, कारखाना अथवा नगर का निर्माण कर सकता है, किन्तु वह शून्य से पदार्थ की सृष्टि नहीं कर सकता, और निश्चय ही वह किसी ग्रह अथवा ब्रह्माण्ड का निर्माण नहीं कर सकता। ब्रह्माण्ड का कारण परमात्मा श्रीकृष्ण हैं, जो समस्त व्यष्टि आत्माओं के परम स्रष्टा तथा समस्त कारणों के आदि कारण हैं, जैसा कि कठ उपनिषद् पुष्टि करता है: नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्।